“बहू पर आरोप लगा… लेकिन सास ने ऐसा जवाब दिया कि मोहल्ला चुप हो गया!” – गरिमा चौधरी

“अरे बहन, आजकल की बहुओं का तो यही ड्रामा है। मोबाइल पर लगी रहती होंगी। अब देखो, तुम्हारा बेटा ‘रजत’ तो बेचारा सुबह आठ बजे ही अपनी गाड़ी साफ करता दिख रहा था। और महारानी जी अभी तक बिस्तर तोड़ रही हैं? छुट्टी का दिन तो पति की सेवा के लिए होता है, या कुंभकर्ण बनने के लिए?”

सुमित्रा जी को गुस्सा आ रहा था, लेकिन उन्होंने संयम बनाए रखा। वे जानती थीं कि ईशा कल रात 3 बजे सोई थी, क्योंकि उसका कोई इंटरनेशनल क्लाइंट के साथ प्रोजेक्ट चल रहा था। लेकिन यह बात मिसेस खन्ना को समझाने का मतलब था भैंस के आगे बीन बजाना।

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रविवार की सुबह थी। हल्की बारिश के कारण मौसम में एक खुशनुमा ठंडक घुली हुई थी। सुमित्रा जी अपने बरामदे में बैठी अदरक वाली चाय की चुस्कियां ले रही थीं और अखबार के पन्नों को पलट रही थीं। घर में सन्नाटा था, जो उन्हें बेहद सुकून दे रहा था।

तभी लोहे के गेट के खुलने की चरमराहट हुई। सुमित्रा जी ने चश्मे के ऊपर से देखा। सामने मिसेस खन्ना चली आ रही थीं। मिसेस खन्ना, यानी मोहल्ले की वो सीसीटीवी कैमरा, जिनका अपना नेटवर्क किसी भी न्यूज़ चैनल से तेज़ था। सुमित्रा जी का सुकून उसी पल हवा हो गया।

“अरे सुमित्रा बहन! इतनी देर हो गई और घर का मुख्य दरवाज़ा अभी तक बंद है?” मिसेस खन्ना ने बरामदे की सीढ़ियां चढ़ते हुए, बिना सांस लिए सवाल दागा।

सुमित्रा जी ने एक फीकी मुस्कान के साथ स्वागत किया। “आइए खन्ना जी। बस बारिश का मज़ा ले रही थी। दरवाज़ा इसलिए बंद है ताकि मच्छर न आएं।”

मिसेस खन्ना सोफे पर धम्म से बैठ गईं। उनकी नज़रे रडार की तरह घर के अंदर झांकने की कोशिश कर रही थीं।

“मच्छर तो ठीक है बहन, पर ग्यारह बजने को आए हैं। तुम्हारी बहू ‘ईशा’ अब तक सो रही है क्या? मैंने देखा कि दूधवाला दो बार घंटी बजाकर चला गया, किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला। वो तो भला हो तुम्हारा कि तुम बाहर बैठी थीं।”

सुमित्रा जी ने गहरी सांस ली। उन्हें पता था कि बात कहाँ जाने वाली है।

“हाँ, ईशा सो रही है,” सुमित्रा जी ने सहज भाव से कहा। “कल रात उसे सोने में देर हो गई थी।”

“देर हो गई थी?” मिसेस खन्ना की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। “अरे बहन, आजकल की बहुओं का तो यही ड्रामा है। मोबाइल पर लगी रहती होंगी। अब देखो, तुम्हारा बेटा ‘रजत’ तो बेचारा सुबह आठ बजे ही अपनी गाड़ी साफ करता दिख रहा था। और महारानी जी अभी तक बिस्तर तोड़ रही हैं? छुट्टी का दिन तो पति की सेवा के लिए होता है, या कुंभकर्ण बनने के लिए?”

सुमित्रा जी को गुस्सा आ रहा था, लेकिन उन्होंने संयम बनाए रखा। वे जानती थीं कि ईशा कल रात 3 बजे सोई थी, क्योंकि उसका कोई इंटरनेशनल क्लाइंट के साथ प्रोजेक्ट चल रहा था। लेकिन यह बात मिसेस खन्ना को समझाने का मतलब था भैंस के आगे बीन बजाना।

“रजत को गाड़ी साफ करना पसंद है, वो उसका शौक है,” सुमित्रा जी ने बात पलटने की कोशिश की। “आप चाय लेंगी?”

“चाय तो पी लूँगी,” मिसेस खन्ना ने मुंह बनाते हुए कहा। “पर सुमित्रा, बुरा मत मानना। मैं तो तुम्हारी शुभचिंतक हूँ इसलिए कह रही हूँ। मैंने कल शाम को देखा था, तुम्हारे घर फिर से ज़ोमैटो वाला आया था। रोज़-रोज़ बाहर का खाना? रजत की कमाई में आग लगा रही है यह लड़की। सुना है, रजत की सैलरी अच्छी है, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि पैसे पेड़ पर उगते हैं। अगर घर की औरत ही फूहड़ हो, तो लक्ष्मी कभी नहीं टिकती।”

सुमित्रा जी के हाथ में पकड़ा अखबार कांपने लगा। ईशा के बारे में ‘फूहड़’ शब्द सुनना उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ।

“मिसेस खन्ना,” सुमित्रा जी ने अपनी आवाज़ को थोड़ा सख्त किया। “घर की रसोई कब जलनी है और कब बुझनी है, यह तो घर के लोगों की आपसी समझ होती है न।”

“अरे, तुम तो मेरी बात का बुरा मान गईं,” मिसेस खन्ना ने अपनी कुर्सी थोड़ी और पास खींच ली और आवाज़ धीमी करके बोलीं, जैसे कोई बहुत बड़ा राज़ खोल रही हों। “देखो, मुझे पता चला है कि ईशा ने पिछले महीने अपने लिए एक डायमंड की रिंग खरीदी है। और वो भी बिना किसी त्योहार के। तुम भोली हो सुमित्रा, तुम्हें नहीं पता। ये आज की लड़कियां पति को इमोशनल ब्लैकमेल करके अपनी तिजोरियां भरती हैं। रजत बेचारा सीधा है, वो तो लुटा देगा सब कुछ। तुम्हें अब कमान अपने हाथ में लेनी चाहिए। बहू को बताओ कि गृहस्थी कैसे चलती है, वरना बुढ़ापे में पाई-पाई को तरस जाओगी।”

तभी अंदर के कमरे का दरवाज़ा खुला। ईशा बाहर आई। उसकी आँखें नींद से भरी थीं, बाल बिखरे हुए थे और उसने एक ढीला-ढाला टी-शर्ट और पजामा पहन रखा था।

मिसेस खन्ना ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरा। “लो, आ गई महारानी। ग्यारह बजे सुबह हो रही है इनकी।”

ईशा ने मिसेस खन्ना को नमस्ते किया, लेकिन मिसेस खन्ना ने मुंह फेर लिया और सुमित्रा जी से बोलीं, “देख रही हो? न सिर पर पल्लू, न ढंग के कपड़े। मेहमान बैठे हैं और ऐसे चली आई। कोई शर्म-हया है या नहीं?”

ईशा रसोई की तरफ मुड़ गई। उसे पानी पीना था। वह मिसेस खन्ना की बातों को अनसुना करने की आदी हो चुकी थी।

लेकिन सुमित्रा जी के सब्र का बांध अब टूट चुका था।

रजत, जो अंदर अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था, आवाज़ें सुनकर बाहर आया। उसने देखा कि माँ का चेहरा तमतमाया हुआ है।

“खन्ना जी,” सुमित्रा जी ने अपनी चाय की प्याली मेज़ पर जोर से रखी। “आपने बहुत पते की बात कही कि मुझे कमान अपने हाथ में लेनी चाहिए और सच का पता लगाना चाहिए।”

मिसेस खन्ना के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। “वही तो मैं कह रही हूँ बहन! नकेल कसो, नकेल।”

सुमित्रा जी उठीं और अंदर गईं। एक मिनट बाद वे एक फाइल और एक पासबुक लेकर बाहर आईं। उन्होंने वो पासबुक मिसेस खन्ना के सामने मेज़ पर रख दी।

“ये क्या है?” मिसेस खन्ना ने पूछा।

“यह इस घर का सच है,” सुमित्रा जी ने शांत लेकिन कड़े स्वर में कहा। “आप कह रही थीं न कि ईशा रजत की कमाई में आग लगा रही है? ज़रा खोलकर देखिए इसे।”

मिसेस खन्ना ने झिझकते हुए पासबुक खोली।

“यह होम लोन का स्टेटमेंट है,” सुमित्रा जी ने उंगली रखकर दिखाया। “इस घर की ईएमआई (EMI) हर महीने की 5 तारीख को कटती है। 45 हज़ार रुपये। और ज़रा देखिए, यह किस खाते से कटती है? नाम पढ़िए।”

मिसेस खन्ना ने आँखें गड़ा कर पढ़ा। नाम लिखा था – ईशा शर्मा

सुमित्रा जी ने अगला पन्ना पलटा। “और यह देखिए। पिछले महीने जो डायमंड रिंग आई थी, उसका बिल। यह रजत के क्रेडिट कार्ड से नहीं, ईशा के बोनस के पैसों से आई थी। उसने वह रिंग अपने लिए नहीं, मेरे लिए खरीदी थी क्योंकि मेरे पुराने कंगन टूट गए थे।”

मिसेस खन्ना का चेहरा फक पड़ गया। रजत अपनी हंसी दबाते हुए दीवार से टिक गया। ईशा पानी का गिलास लिए रसोई के दरवाज़े पर खड़ी यह सब देख रही थी।

सुमित्रा जी रुकी नहीं। “खन्ना जी, आपको शायद पता नहीं है। पिछले छह महीने से रजत की नौकरी नहीं थी। उसका स्टार्टअप डूब गया था। वह डिप्रेशन में था। उस वक़्त इस घर का राशन, बिजली का बिल, मेरी दवाइयां और रजत का हौसला… सब ईशा ने संभाला है। वो जो ज़ोमैटो से खाना आता है न? वो इसलिए आता है क्योंकि वो लड़की दिन में 12 घंटे ऑफिस का काम करती है और रात में फ्रीलांसिंग करती है ताकि रजत पर बोझ न पड़े। उसे खाना बनाने का वक़्त नहीं मिलता, और मुझे इस उम्र में चूल्हा फूंकना नहीं है। इसलिए हम बाहर से मंगाते हैं।”

सुमित्रा जी की आवाज़ अब गूंज रही थी। “आप जिसे ‘कुंभकर्ण’ कह रही हैं, वो कल रात 3 बजे तक जागकर काम कर रही थी। और आप जिसे ‘महारानी’ कह रही हैं, वो असल में इस घर की ‘रीढ़ की हड्डी’ है।”

मिसेस खन्ना को काटो तो खून नहीं। वे अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करने लगीं, उनकी नज़रें ज़मीन में गड़ी थीं।

“लेकिन… लेकिन रजत तो सुबह गाड़ी साफ कर रहा था…” मिसेस खन्ना ने एक आखिरी, कमज़ोर तर्क दिया।

“हाँ,” सुमित्रा जी ने गर्व से कहा। “क्योंकि रजत को अपनी पत्नी की मेहनत की कद्र है। उसे शर्म नहीं आती कि उसकी पत्नी कमा रही है और वो घर का काम कर रहा है। वो उसका हाथ बंटा रहा है। और मुझे गर्व है कि मैंने एक ऐसे बेटे को पाला है जो अपनी मर्दानगी का ढिंढोरा पीटने के बजाय अपनी पत्नी का साझीदार बनना जानता है।”

सुमित्रा जी ने पासबुक वापस उठाई।

“खन्ना जी, बहुएं अब वो नहीं रहीं जिन्हें ‘कायदे’ में रखा जाए। ये बेटियां हैं जो कायदे से घर चलाना जानती हैं—कभी रसोई संभाल कर, तो कभी ऑफिस की फाइलें संभाल कर। और रही बात मेरे बुढ़ापे की, तो जिस बहू ने मेरे बेटे की बेरोजगारी में मेरा घर नहीं बिखरने दिया, वो मुझे कभी पाई-पाई को मोहताज़ नहीं होने देगी। मुझे अपनी ‘लक्ष्मी’ पर पूरा भरोसा है।”

मिसेस खन्ना के पास अब बोलने के लिए कुछ नहीं बचा था। उनका ‘क्लेश का बीज’ बंजर ज़मीन पर गिरकर सूख चुका था। वे उठीं।

“अच्छा सुमित्रा बहन… मुझे याद आया, गैस पर दूध रखा है। मैं चलती हूँ।”

वे जितनी तेज़ी से आई थीं, उससे दोगुनी तेज़ी से वापस चली गईं।

जैसे ही गेट बंद हुआ, रजत और ईशा ज़ोर से हंस पड़े। ईशा दौड़कर सुमित्रा जी के पास आई और उन्हें गले लगा लिया।

“माँ, आपने तो उनकी बोलती ही बंद कर दी! लेकिन आपको वो पासबुक दिखाने की क्या ज़रूरत थी? उनकी नज़र लग जाएगी,” ईशा ने हंसते हुए कहा।

सुमित्रा जी ने ईशा के बिखरे बालों को संवारा। “नज़र नहीं लगेगी बेटा, आईना दिखाया है उन्हें। समाज को लगता है कि अगर बहू देर तक सो रही है तो वो आलसी है, और अगर बेटा घर पर है तो वो जोरू का गुलाम है। उन्हें क्या पता कि चारदीवारी के अंदर कौन किस मोर्चे पर लड़ रहा है।”

रजत ने माँ के कंधे पर हाथ रखा। “थैंक यू माँ। मुझे लगा था आप भी कहीं पड़ोसियों की बातों में आकर…”

“चुप कर,” सुमित्रा जी ने रजत को डांटा, लेकिन प्यार से। “मैं तेरी माँ हूँ, कोई न्यूज़ चैनल की दर्शक नहीं जो किसी की भी बात पर यकीन कर लूँ। मुझे पता है मेरे घर की नींव किसने थाम रखी है।”

सुमित्रा जी ने ईशा की तरफ देखा। “जा बेटा, मुंह-हाथ धो ले। आज बाहर से खाना नहीं आएगा।”

“क्यों माँ? आपको बनाना पड़ेगा फिर…” ईशा ने चिंतित होकर कहा।

“नहीं,” सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए कहा। “आज मैं अपनी ‘कमाऊ’ बहू को अपने हाथ से अदरक वाली चाय और गरमा-गरम पकौड़े खिलाऊंगी। और रजत, तू चटनी पीसेगा। ठीक है?”

“जो हुक्म, माते!” रजत ने सैल्यूट किया।

बारिश फिर से तेज़ हो गई थी। लेकिन इस बार वह बारिश घर के अंदर किसी तरह की सीलन या ठंडक नहीं ला रही थी। सुमित्रा जी ने महसूस किया कि घर का असली सुकून पड़ोसियों को खुश रखने में नहीं, बल्कि अपनों पर विश्वास रखने में है।

उन्होंने गेट की तरफ देखा और मन ही मन बुदबुदाईं—”अपने काम से काम रखिए… इसी में सबकी भलाई है।”

और फिर, रसोई से अदरक और खुशियों की मिली-जुली महक आने लगी।

दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि
घर की असली लड़ाई रसोई में नहीं… समाज की सोच से होती है।
और हर बहू को बस एक ऐसी सास चाहिए जो उस पर भरोसा करे।

👉 अब आप बताइए…

अगर आपके घर में कोई पड़ोसन ऐसा बोले, तो आप क्या जवाब देंगे?

और क्या सच में आज की बहुएं घर की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी हैं?

💬 नीचे कमेंट में अपनी राय ज़रूर लिखिए…

क्या आपको भी कभी किसी ने बिना जाने-समझे जज किया है?

लेखिका : गरिमा चौधरी

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