बहु ने सिमा रेखा खिंच दी। – बबीता झा

शांति जब अठारह वर्ष कि हुइ तभी उसकी शादी कर दि गइ।  मायके से वह सबके लिए इज्जत और प्यार का तोहफ़ा लेकर आई। शांति जैसा नाम, बस वैसी ही उसकी पहचान थी। छोटी उम्र में ही ससुराल आने के बाद उसने घर का सब काम अपने ऊपर ले लिया था, यानी कहिए जिम्मेदारी। शांति जैसा नाम था, शांत थी और सिधापन भी था। 

इससे उसके ससुराल वाले धीरे-धीरे उसके चुप्पी और सीधेपन का फायदा उठाने लगे। यहां तक कि उसकी छोटी नंद और उसकी देवरानी भी उसको किसी काम के लिए बोल देती थी और शांति “ना” नहीं कह पाती थी। पति का तो यह हाल था कि वह उसको घरवाली से ज्यादा घर के कामों के लिए लाया। शांति भी सबका मान-अपमान सहकर सबके लिए सब कुछ कर रही थी। 

धीरे-धीरे उसको एहसास हो रहा था कि “मैं ही क्यों? मैं भी तो यहां किसी की पत्नी, बहू, भाभी, जेठानी बनकर आई हूं। मेरा भी तो सब पर अधिकार है।” कोई कहीं से आकर कोई ना कोई काम थमा के चला जाता। 

जैसे कि—”अभी तक चाय नहीं बनी क्या? आज कितनी देर हो गई नाश्ते में। लगता है शांति आज लेट से किचन में आई है। सबको स्कूल- कॉलेज जाना होता है, क्या यह नहीं पता? थोड़ा और सवेरे आ जाया कर किचन में।” सास बोली। 

इतना ही नहीं, रात को सबका बिस्तर लगाना, घर-घर में सबको पानी देना और सुबह में सबके घर-घर चाय पहुंचाना। पतिदेव का तो क्या कहना, उनके तो हाथ में ब्रश-पेस्ट लगाकर देना पड़ता था। इतना ही नहीं, बाथरूम में नहाने के लिए पानी देना और रात को सासू मां के बिना पैर दबाए सो नहीं सकती थी। 

कभी-कभी तो पैर दबाते-दबाते वही सो जाती, तो कोई उठा देता तो उठकर अपने घर में सो जाती थी। और सुबह उठते ही सबका लंच-नाश्ता तैयार करना, बच्चों को स्कूल भेजना। इतना ही नहीं, कोई ना कोई रिश्तेदार आकर 10–24 दिन रुकता ही था। क्योंकि सब यहां आराम करने आते थे। 

शांति जैसी बहू जो मिली थी, सासू मां तो सबको बुला-बुलाकर अपने पास रखना चाहती थी। हर दो-चार दिन के बाद किसी न किसी को बुला लेती थी। शांति चुपचाप, “मैं क्यों?” याद करके रोती रहती थी। 

इतना सब कुछ करने के बाद भी कोई ना कोई रिश्तेदार आकर बोल ही देता था—”बहू, सबका ध्यान रखना। मायके कम ही जाना। सासु भी अब बूढ़ी हो रही है।” ऐसी सलाह वही लोग दे जाते थे जिनकी बहुएं उन्हें छोड़कर चली जाती थीं। 

शांति यह सब सुनकर अंदर ही अंदर कुढ़ती रहती थी। घर में कोई भी उसके लिए बोलने वाला नहीं था। इतना समय बीत गया कि अब उसके बच्चों की शादी का समय भी आ गया। तब शांति सोचने लगी—”अब तो वह सास बनेगी और वह अपनी बहू के सामने अपना अपमान सह नहीं सकती।” 

तब शांति ने सोचा—”अब तो एक सीमा रेखा खींचनी पड़ेगी।” उसने सोचा कि वह तो प्यार से सबके लिए सब कुछ कर रही थी, लेकिन अब तो उसके लिए मान-सम्मान की बात हो गई थी। दिन-रात यही वह सोच रही थी। 

एक दिन अगली सुबह शांति आराम से सो रही थी। उसने आज पहली बार घड़ी में अलार्म नहीं लगाया। शांति के घर के लोग बारी-बारी से उसका दरवाजा टकटका रहे थे, लेकिन शांति आराम से सो रही थी। तभी पति ने चिल्लाते हुए कहा—”आज क्या बात है? अभी तक क्यों सोई हो? सबके स्कूल और ऑफिस का टाइम हो गया है। चाय-नाश्ता कब बनेगा?” 

शांति पति की तरफ मुस्कुराते हुए देखकर बोली—”तो क्या हुआ? और सब भी तो हैं ना घर में। मुझे थोड़ी थकान महसूस हो रही है। मैंने शायद कुछ ज्यादा ही भार अपने ऊपर ले लिया है।” 

शांति का पति बड़े ही आश्चर्य से शांति की ओर देख रहा था और बोला—”अच्छा, अब उठो भी। मुझे भी ऑफिस के लिए देर हो रही है।” 

शांति बड़े आराम से बोली—”हां-हां, ठीक है। आप तैयार हो जाइए। मां या देवरानी आपको नाश्ता दे देगी।” 

शांति के पति को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आज शांति ऐसा व्यवहार क्यों कर रही है। वह चुपचाप उठकर तैयार होकर बाहर आया तो बाहर देखा, सब अपने आप में उथल-पुथल हो रहे थे कि आज शांति बाहर क्यों नहीं आई। सब चाय का इंतजार कर रहे थे। 

शांति का पति सबको देखकर चुपचाप बिना नाश्ता किए ऑफिस चला गया। मां ने जैसे ही बेटे को जाते देखा तो पीछे से आवाज देते हुए कहा—”आज शांति को क्या हो गया है? वह बाहर क्यों नहीं आई? और तुम भी बिना नाश्ता किए जा रहे हो?” 

बेटे ने कुछ जवाब नहीं दिया और ऑफिस के लिए चला गया। इतने में शांति बाहर आई और एक कप चाय बनाकर कुर्सी पर बैठकर पेपर पढ़ने लगी। यह देखकर सासू मां ने जोर से कहा—”शांति, आज क्या हुआ तुमको? आज तुमने किसी के लिए चाय नहीं बनाई, सिर्फ एक कप चाय क्यों?” 

शांति ने आराम से जवाब दिया—”आप लोगों ने चाय नहीं पी क्या? 9:00 बज गए हैं। आप लोग तो 7:00 बजे तक सब चाय पी लेते थे।” 

शांति की बात सुनकर सब अवाक होकर शांति की तरफ देख रहे थे। शांति बिना किसी की परवाह के आराम से चाय की घूंट ले रही थी। 

सासू मां फिर बोली—”ठीक है, चाय पी के खाना तो बना दो कम से कम, बहुत आराम कर ली।” 

शांति बोली—”ठीक है, मैं सब्जी काट देती हूं। देवरानी को बोलिए खाना बना लेगी।” 

देवरानी तुनक कर बोली—”रोज तो आप ही बनाते हो ना, फिर आज क्या हो गया है?” 

शांति ने बड़े प्यार से कहा—”इसी का तो सब फायदा उठा रहे थे। तुम बनाओ। जो नहीं होगा, मैं देख लूंगी।” 

तभी देवर चिल्लाते हुए आया—”भाभी, आज मेरे कपड़े आपने आयरन नहीं किए। मुझे ऑफिस जाने में देर हो रही है।” 

शांति ने कहा—”देवर जी, अब से बाहर से ही आयरन करवा लिया कीजिए। मुझे और भी काम करने होते हैं।” कहकर शांति वहां से उठकर चली गई। 

शाम को देवर चार-पांच दोस्तों को घर ले आया और बोला—”भाभी, सबके लिए अच्छा सा नाश्ता बना देना।” 

शांति बोली—”बना देती, लेकिन अभी मैं अपनी सहेली के घर जा रही हूं। देवरानी को बोलो, बना देगी।” 

सुनकर देवर बोला—”उसे कैसे होगा?” 

शांति ने जवाब दिया—”जैसे मैं बना देती थी।” कहकर वह बाहर चली गई। 

किसी को समझ नहीं आ रहा था कि शांति को क्या हो गया है। वह इतना कैसे बदल गई है। 

रात में मां शांति को बोली—”शांति, सबके रूम में पानी रख दी क्या?” 

शांति बोली—”आपके रूम में मैं रख दिया है। नंद जी को बोलिए अपने लिए ले जाएगी। और देवरानी को तो लेना ही चाहिए अपने लिए।” कहकर शांति अपने लिए पानी लेकर अपने रूम में चली गई। 

सासू मां सोच में पड़ गई थी। सासू मां ही क्यों, सभी घर में सोच में पड़ गए थे कि शांति के बदलाव का क्या कारन है। वह एक ही रात में कैसे बदल गई। 

शाम के 6:00 बज रहे थे। सभी घर में बैठे हुए थे। कहीं ना कहीं सबके दिमाग में शांति के बदलाव का कारण जानने की इच्छा हो रही थी। तभी शांति सबके लिए चाय और नाश्ता लेकर आई। 

सभी एकटक शांति को देख रहे थे। शांति ने मुस्कुराते हुए कहा—”क्या बात है? एक ही दिन में सबको आश्चर्य क्यों हो रहा है कि मैं कैसे बदल गई? मेरे बदलने का कारण भी आप ही लोग हो। ऐसा नहीं है कि मैं अपने परिवार से प्यार नहीं करती और उनका सम्मान नहीं करती। आप ही लोग सोचिए कि मेरे एक दिन के व्यवहार से आप लोग इतने परेशान हो गए और मेरे साथ आप लोग सालों से ऐसा कर रहे हैं और मैं यह अपमान सह रही हूं। यहां तक कि बाहर वाला भी मुझे उपदेश देकर चला जाता है। मैं जब से इस घर में आई हूं, तब से मैं इस घर को प्यार और सम्मान दोनों दिया है। लेकिन मुझे बदले में क्या मिला? सबके नजरों में मैं एक घर में काम करने वाली हूं, इससे ज्यादा कुछ नहीं।” 

इस पर सास ने जवाब दिया—”तो अब तुम क्या करोगी? यह घर छोड़कर चली जाओगी?” 

शांति ने जवाब दिया—”नहीं, मैं घर छोड़कर कहीं जाने वाली नहीं हूं। इसी घर में रहूंगी, लेकिन सम्मान के साथ। मैं कोई विद्रोह नहीं कर रही हूं, मैं अपने सम्मान की घोषणा कर रही हूं। इस घर में मेरा क्या स्थान है, इसके लिए मुझे एक सीमा रेखा खींचनी जरूरी थी। मैं इस घर में वह बेटी और बहू दोनों बनकर रहना चाहती हूं।” 

कहते हुए शांति की आंखों में आंसू भर गए और सबकी तरफ चाय-नाश्ता बढ़ाते हुए बैठ गई। 

आज पहली बार शांति के पति को शांति के दर्द का एहसास हुआ। एक दिन पहले के व्यवहार को देखकर उसे वगा था—”शांति शायद हमारा घर तोड़ना चाहती है।” लेकिन अब समझ में आया कि वह तो घर जोड़ना चाहती है। बस उसने अपने लिए आत्मसम्मान की सीमा रेखा खींची है। 

पति शांति की तरफ प्यार से देख रहा था, मानो जैसे कह रहा हो—”शांति, अब मैं तुम्हारे साथ हूं और अब इस घर में तुम आत्मसम्मान के साथ रहोगी।”

बबीता झा 

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