बहू मैं अपने पति का पैसा खर्च कर रही हू – अर्चना खण्डेलवाल 

अरे!! जीजी अब ये साड़ी पसंद आ रही है तो ले ही लो, आप पर वैसे भी ये गुलाबी रंग बहुत खिलता है, जीजाजी देखकर प्रसन्न हो जायेंगे, रीता ने अपनी बड़ी जीजी सविता से कहा।

रीता की बात सुनकर सविता जी सोच में पड़ गई, आखिर इतनी महंगी साड़ी वो कैसे ले सकती है ?अब इस उम्र में अपने पर इतना खर्चा करना समझदारी तो नहीं है,  बहू और पोते-पोतियों के दिन है, उनकी इस सोच में एक दबाव सा एक तनाव सा झलक रहा था।

अभी पिछले महीने वो बाजार से अपने लिए एक अच्छा सा पर्स ले आई थी, उन्हें कहीं आने-जाने के लिए चाहिए था, घर पर ले जाकर उन्होंने खुशी-खुशी वो अपनी बहू पलक को दिखाया, पलक की ये देखते ही त्योरियां चढ़ गई।

अरे!! इतना महंगा पर्स आपको इस बुढ़ापे में चाहिए?

आपको तो घर के बजट की जरा भी परवाह नहीं है, अब माना आप पापाजी की पेंशन से ये सब खर्च कर रही हो, लेकिन महंगाई के बारे में भी सोचना चाहिए, वो ही पैसा बचाकर आप आगे आने वाले समय लिए बचा सकती हो, उसे निवेश कर सकती हो, पर आप में तो जरा भी समझदारी नहीं है।

अपनी बहू की कड़वी बातें सुनकर सविता जी का सारा उत्साह ही चला गया, और ये सिर्फ एक पर्स की बात नहीं थी, वो जब भी अपने लिए या अपने पति के लिए कुछ भी खरीदती थी, पलक ऐसे ही टोक देती थी, जैसे उन्होंने सविता जी के लिए एक सीमा रेखा 

खींच दी हो कि तुम्हें अब इसी दायरे में रहना है, सदैव ऐसे ही रहना है, ज्यादा खर्च करने का, अपनी इच्छायें पूरी करने का खुश रहने का उन्हें कोई हक नहीं है।

अभी कुछ दिनों पहले बेटा आकाश कंपनी के काम के सिलसिले में शहर से बाहर गया था तो बहू ने पिज्जा ऑर्डर कर दिया था, और उन्हें कह दिया था कि आप सुबह की रखी रोटियां खा लेना, नया कुछ बनाने की जरूरत नहीं है। उनकी भी इच्छा होती है कि वो भी कभी-कभी बाहर का चटपटा खाना खायें, उन्हें भी रसोई से एक समय के लिए मुक्ति मिले, लेकिन बहू ने ये सीमा तय कर दी थी कि आपको तो बस घर का ही खाना है, आप तो कभी बाहर कुछ नहीं खा सकती है।

सविता जी इतनी बंदिशों के बीच रहकर तड़पने लगी थी। ऐसा लगता था पलक ने उनकी सारी आजादी ही छीन ली।

पहले वो अपनी सासू मॉं की बंदिशों में रही थी, तो अपना जीवन अच्छे से नहीं जी पाई, बच्चों और घर परिवार की जिम्मेदारियों में सारा जीवन निकल गया, अपनी इच्छाओं और भावनाओं को सदैव दबाती रही।

दोनों बेटियों के विवाह के लिए पाई-पाई जोड़ा, जैसा मिला पहन लिया, जैसा मिला खा लिया, कभी कोई जिद नहीं की, बेटियों को घर से विदा कर दिया, जब बेटे के विवाह का समय आया तो पलक को घर की बहू बनाकर लाई, उसके लिए भी वो ही सब किया, गहने चढ़ाएं, कपड़े बनवायें, आखिरकार एक ही बहू थी, विवाह के बाद भी पलक को बेटी से बढ़कर रखा, उसकी हर इच्छा पूरी की, कहीं भी आने-जाने से रोका नहीं, इतना करने के पश्चात भी पलक को अपनी ही सास की खुशी सहन नहीं होती थी, और वो सदैव टोका-टोकी करने लगी थी।

घर में शांति रहें, सब एक जगह एक होकर खुशी से रहें तो इसलिए वो कुछ नहीं बोलती थी, बल्कि वो फिर से अपनी इच्छाओं और खुशियों को दबाने लगी थी।

क्या हुआ जीजी? रीता ने झिंझोड़ा तो वो अपने अतीत से बाहर आई, मुझे ये साड़ी नहीं लेनी है, अब इस उम्र में कौनसा ये रंग मुझ पर खिलेगा।

उन्होंने दुकानदार को कहा कि उन्हें कोई कम पैसों की साड़ी दिखा दें।

जीजी, ये साड़ी भी ज्यादा महंगी नहीं है, आप ले सकती है, फिर भाई के बेटे की शादी है, बुआ इतनी हल्की साड़ी में अच्छी नहीं लगेगी।

रीता की बात काटते हुए सविता जी बोली, अब मुझे इस उम्र में इतना महंगे कपड़े पहनकर क्या करना है?

बेकार में ही खर्चा हो जायेगा…..और फिर पलक गुस्सा हो जायेगी, उनके मुंह से निकल गया।

सविता जी ने अपनी बहन को सारी बातें बता दी, जो आज तक छुपाकर रखी थी, रीता ये सब सुनकर हैरान रह गई, और उन्होंने सविता जी को समझाया और वो ही साड़ी दिलाकर घर भेज दिया, अपनी बहन से सविता जी को हिम्मत मिली और वो घर चली गई।

वो जब घर गई तो पलक बाहर कमरे में ही थी, उन्होंने उसी के सामने अपने पति को वो गुलाबी साड़ी खुशी-खुशी दिखाई।

उसकी कीमत जानकर पलक फिर से भड़क गई, आखिर आप नहीं सुधरोगे? इतनी बार कहा है कि फालतू खर्च मत किया करो, इतनी महंगी साड़ी ले आई, बचत तो आपसे होती ही नहीं है, आगे आपका बुढ़ापा और आयेगा, उसके लिए भी तो पैसे बचाने होंगे।

सविता जी भी ऊंचे स्वर में बोली, बहू चुप कर…. मैं अब एक भी अपशब्द सहन नहीं करूंगी, मैंने अपनी हर जिम्मेदारी निभा दी है, और अब मुझे अपनी मर्जी से जीने दो, बचत करने की अकेले मेरी जिम्मेदारी नहीं है, आखिर तुमको मेरा खर्च इतना क्यों अखरता है, मैं अपने पति का पैसा खर्च कर रही हूं।

तुम अपने पति का पैसा इतना फालतू खर्च करती हो, मैं तो कुछ भी नहीं कहती हूं, तुम जब हर किटी के लिए नई ड्रेस लाती हो तो मैं तो तुम्हारी ड्रेस देखकर खुश होती हूं, आये दिन खाना नहीं बनाती हो, बाहर से पिज्जा ऑर्डर करती हो, तो मैं कुछ नहीं कहती, आये दिन तुम सिनेमा और शॉपिंग जाती हो तो मैं कुछ नहीं कहती हूं।

क्या तुम्हारा बुढ़ापा नहीं आयेगा? तुम्हें तो अभी बच्चों की जिम्मेदारी भी पूरी करनी है और तुम्हारा बुढ़ापा भी देखना है, आकाश की नौकरी भी प्राइवेट है, उसमें तो तुम्हें पेंशन भी नहीं मिलेगी। आकाश तो अपनी कमाई से एक घर भी नहीं ले पाया, ये मत भुलो बहू कि ये घर भी मेरी पति की कमाई का है , मैंने बरसों से अपने प्यार से इस घर को सजाया है, मेरे पास घर भी है, पति की पेंशन भी है, मुझसे ज्यादा तुम्हें अपने भविष्य के लिए बचत करनी चाहिए, निवेश करना चाहिए ताकि तुम्हारा बुढ़ापा अच्छे से बीते।

सविता जी की बातें सुनकर पलक को लगा जैसे किसी ने गर्म शीशा उसके कानों में डाल दिया हो, आज उसकी सास ने उसे आइना दिखा दिया है, और उन्होंने कुछ गलत भी नहीं कहा है, अभी उसके ऊपर दोनों बच्चों की पढ़ाई की, करियर की और विवाह की बड़ी जिम्मेदारी है, आकाश की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी ही तो है, और प्राइवेट कंपनी वालों का भरोसा भी नहीं है, कब नौकरी से निकाल दें, भविष्य में उसे पेंशन भी नहीं मिलेगी, यही सब सोचकर पलक एकदम बुत बन गई।

पलक…. सविता जी ने उसे झकझोरा…. मुझे इस बात का कोई अहंकार नहीं है, मैं तो बस तुम्हें समझा रही हूं, मुझे भी अपनी कुछ इच्छाएं पूरी करने का अधिकार है, इस तरह बात-बात पर टोका-टोकी मुझसे बर्दाश्त नहीं होती है…. मुझे उम्मीद है, तुम मेरी बातें दिल पर ना लेकर दिमाग पर लेकर सोचोगी, और सही फैसला करोगी।

पलक चुपचाप अपने कमरे में चली जाती है, और दो-तीन दिन तक वो गुमसुम रहती है, कुछ दिनों तक वो परेशान ही रहती है।

क्या हुआ पलक? सविता जी ने पूछा तो वो बिफर गई, मम्मी जी मुझे माफ कर दीजिए, मैंने आपका बहुत अपमान किया, आपका बहुत दिल दुखाया, उसकी मुझे सजा मिल रही है, मैंने नौकरी ढूंढने की बहुत कोशिश की, लेकिन मुझे कहीं नहीं मिली, मैं आकाश को सहयोग करना चाहती हूं, ताकि घर में दूसरी कमाई का जरिया भी हो।

कोई बात नहीं पलक, तुम घर से कुछ शुरू कर सकती हो, तुम इतने अच्छे केक बनाती हो, सोसाइटी में ही तुम्हें बहुत से ऑर्डर मिल जायेंगे, तुम शुरूआत तो करो, और जो कमाई हो उसे निवेश करो।

पलक को सविता जी की बात अच्छी लगी, उसने घर से ही  काम शुरू किया,  उसके बनाए केक सोसाइटी में सबको पसंद आने लगे,और उसकी अच्छी कमाई शुरू हो गई, अब पलक हमेशा अपनी सास को धन्यवाद देती है कि उनकी वजह से उसने घर से ही काम शुरू किया। अब वो अपनी सास सविता जी को टोकती नहीं थी, बल्कि अपनी कमाई से कभी-कभी उनकी अधुरी इच्छाओं को पूरा करती थी।

धन्यवाद 

लेखिका 

अर्चना खण्डेलवाल 

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