लिजिए मां जी आपकी अदरक वाली चाय…
गर्म चाय की कप सास के सामने पड़ी छोटी टेबल पर रख कर स्मृति मन ही मन भुनभुनाते हुए रसोई में जाने लगी..
“कभी बहू का हक नहीं मिला मुझे…”
“जब देखो तब खाली पीली हुक्म चलाती रहती है”
बेटी जरा यहां आना,बेटी जरा ये कर देना वो कर देना..
बहू की भुनभुनाहट सुन विमला जी ने मुस्कुराते हुए धीरे से कहा..
अरे जरा प्यार से रख इतना भी क्या भुनभुनाना..
क्या कहा आपने.. स्मृति ने पूछा
कुछ नहीं…
मुझे लगा कुछ कहा आपने…
तेरे कान बज रहें..जा इलाज करा अपना
कभी फुर्सत मिले तब कराऊं…
ओह…. विमला जी ने गहरी सांस छोड़ी..
पहाड़ जो तोड़ती दिनभर..
और नहीं तो क्या???
पहाड़ से कम थोड़े ही हैं आपके नाज़ नखरे…
बेटा बाहर काम पर रहता है आप यहां दिनभर हुक्म हांकती रहती हैं..मुझपर
शुक्र मानिए कि मैं मिल गई नहीं तो कोई और होती तो…???
मुंह नहीं नोंच लेती उसका..
यह कहते हुए सास का चेहरा देख स्मृति हंसने लगी…
अच्छा एक बात बता कभी कुछ कहा तुम्हें जो इस तरह उखड़ी उखड़ी रहती है मुझसे..
इतना कुछ तो कहती सुनाती हैं मुझे,
अब क्या लाठी लेकर मारेगी
हां अगर जरूरत पड़ी तो
अच्छा…???
अगर मैं कुछ कह दूं तो बुरी हो जाती हूँ..
लल्ला देख समझा दे अपनी मेहरारू को, बहुत जवान चलती है इसकी..
वो तो है..
और आप तो मानो गाय माता बनी बैठी जैसे क्या कुछ नहीं कहती क्या कुछ नहीं सुनाती..दिनभर
तुझे ही तो कहती हूं और कहीं तो नहीं कहती.
तो मैं कहां ढिंढोरा पीटती रहती हूँ..बाहर मुहल्ले में जाकर..मैं भी तो आपसे ही कहती हूँ न,
पर दुख तो होगा न..
जब शादी कर ससुराल आई थी तो कितनी उम्मीदों के साथ आई थी.. कितने सपने थे मन में,पति को लेकर सास को लेकर ससुराल को लेकर पर कभी लगा ही नहीं कि यह मेरा ससुराल है..और मैं इस घर की बहू..कितना काम करना पड़ता है ऊपर से आपकी फरमाइशें हे भगवान..
तो क्या रैन बसेरा समझ रखा है मेरे घर को..
नहीं तो क्या..
कभी बहू का हक नहीं मिला मुझे,कभी आपने मुझे बहू कहकर आवाज नहीं दी..कान तरस गए मेरे..बहू शब्द सुनने को..
बहू की बात सुनकर विमला जी हंस पड़ी..
पगली…
बहू न सही बेटी तो कहती हूं तुझे..
और यह हक वक क्या सबकुछ तुम्हारा ही तो है.. आखिर कितने दिन की जिंदगी है मेरी..
एक पते की बात बताती हूं,गांठ बांध ले
जब कोई लड़की अपने घर को छोड़कर अपने पति के घर में आती है तो बहुत से सपने लेकर आती है,उसे वहां के तौर तरीकों को अपनाना पड़ता है,सास ननद के साथ सामंजस्य बिठाना होता है,जो कि पहले से ही नकारात्मकता भरा होता है. जो हर जगह सही नहीं होता,कोई सास या बहू कभी खराब नहीं होती इनके
रिश्ते में थोड़ा सा धैर्य और विश्वास की जरूरत है। जब सास और बहू के रिश्ते में धैर्य और विश्वास दोनों की कमी हो जाती है तो बहू को लगता है कि सास उन पर जिम्मेदारियों को थोप रही है। वहीं सास को महसूस होता है कि बहू उसके द्वारा दिए कामों को ठीक प्रकार से नहीं कर रही है। और यहीं से दोनों में खटर पटर शुरू हो जाती है, रिश्ते में दरार आने लगती है..
इसलिए मैंने तुम्हें कभी बहू का हक नहीं दिया , सदा अपनी बेटी माना है,मुझे लगता है बहू तो बेटी हो सकती है लेकिन बेटी कभी अपने ही घर में बहू नहीं हो सकती ,अब तुम्हें जो समझना है जो सोचना है सोच मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता,हां तुझे जो कुछ कहती हूं बाहरी मन से कहती बस ..कहना नहीं आता मुझे पर प्यार बहुत करती हूँ तुझे,
कभी बीमार पड़ती है तो मैं ही देख भाल करती हूं तुम्हारी अम्मा नहीं आती
हां अलग बात है कि तेरे मेरे रिश्ते में अगर हल्की फुल्की खटर पटर नहीं बनी रहेगी तो मजा नहीं आएगा..मुझे
स्मृति अपनी सास की बातें सुनकर मुस्कुरा रही थी..जानती थी उसकी सास बुरी नहीं..
अब दिमाग ठंडा हो गया हो तो एक कप और अदरक वाली चाय बना ला मेरे लिए,माथा दर्द करने लगा मेरा तुझसे बात कर के..
स्मृति ने पलट कर कहा…
कहिए तो अगली कप लहसून वाली बना लाऊं..
अपनी अम्मा को पिलाना लहसून वाली चाय मेरे लिए तो अदरक वाली चाय ही सही..
दोनो खिलखिला कर हंस पड़ी.. उनकी ठहाकों से पूरा कमरा गूंजने लगा..
विनोद सिन्हा “सुदामा“