बहू हम इस घर के नौकर नहीं मालिक हैं – मुकेश पटेल 

जब घर में आई नई बहू ने अपने वृद्ध सास ससुर को घर से निकालने और अपनी चलाने के लिए रची साजिश तो वृद्ध सास ससुर ने चली ऐसी चाल कि बहू की रूह कांप गई.

“उफ्फ! मम्मी जी,” शालिनी ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, “मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि अपनी ये आयुर्वेदिक दवाइयां किचन के स्लैब पर मत रखा करें। पूरे घर में जड़ी-बूटियों की अजीब सी महक आती है। मेरे फ्रेंड्स आने वाले हैं आज, क्या सोचेंगे वो? कि हम किसी डिस्पेंसरी में रहते हैं?”

सुमेधा जी ने चुपचाप अपनी दवाइयां उठाईं। उनके हाथ कांप रहे थे। “माफ़ करना बेटा, भूल गई थी।”

निमेश अखबार पढ़ रहा था। उसने एक बार भी अपनी पत्नी को नहीं टोका। प्रभाकर जी ने अपने चश्मे के ऊपर से बेटे को देखा, पर निमेश ने नज़रें चुरा लीं। प्रभाकर जी समझ गए कि बेटा अब सिर्फ़ शालिनी की परछाई बनकर रह गया है।

शालिनी का असली प्लान सिर्फ़ दवाइयां हटाना नहीं था। उसका प्लान था इन “दो पुराने फर्नीचरों” को घर से हटाना। उसे आज़ादी चाहिए थी। उसे ‘आशीर्वाद भवन’ का नाम बदलकर ‘शालिनी विला’ करना था। उसे अपनी किटी पार्टीज़ के लिए पूरा स्पेस चाहिए था, और ये खांसते-कराहते बूढ़े लोग उसकी लाइफस्टाइल में फिट नहीं बैठ रहे थे।

लखनऊ के गोमती नगर में स्थित ‘आशीर्वाद भवन’ कभी हंसी-ठिठोली से गूंजा करता था। रिटायर्ड जज प्रभाकर नाथ और उनकी पत्नी सुमेधा जी ने इस घर की एक-एक ईंट को अपने प्यार और सलीके से जोड़ा था। लेकिन पिछले छह महीनों में, जब से उनके बेटे निमेश की शादी शालिनी से हुई थी, इस घर की दीवारों ने सिर्फ़ कानाफूसी और षड्यंत्र ही सुने थे।

शालिनी एक एमबीए ग्रेजुएट थी, महत्वाकांक्षी और बेहद चालाक। उसे निमेश से प्यार था या नहीं, यह कहना मुश्किल था, लेकिन उसे निमेश के रूतबे और प्रभाकर जी की करोड़ों की संपत्ति से ज़रूर प्यार था।

उस सुबह नाश्ते की मेज पर शालिनी ने नाटक का पहला अंक शुरू किया।

“उफ्फ! मम्मी जी,” शालिनी ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, “मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि अपनी ये आयुर्वेदिक दवाइयां किचन के स्लैब पर मत रखा करें। पूरे घर में जड़ी-बूटियों की अजीब सी महक आती है। मेरे फ्रेंड्स आने वाले हैं आज, क्या सोचेंगे वो? कि हम किसी डिस्पेंसरी में रहते हैं?”

सुमेधा जी ने चुपचाप अपनी दवाइयां उठाईं। उनके हाथ कांप रहे थे। “माफ़ करना बेटा, भूल गई थी।”

निमेश अखबार पढ़ रहा था। उसने एक बार भी अपनी पत्नी को नहीं टोका। प्रभाकर जी ने अपने चश्मे के ऊपर से बेटे को देखा, पर निमेश ने नज़रें चुरा लीं। प्रभाकर जी समझ गए कि बेटा अब सिर्फ़ शालिनी की परछाई बनकर रह गया है।

शालिनी का असली प्लान सिर्फ़ दवाइयां हटाना नहीं था। उसका प्लान था इन “दो पुराने फर्नीचरों” को घर से हटाना। उसे आज़ादी चाहिए थी। उसे ‘आशीर्वाद भवन’ का नाम बदलकर ‘शालिनी विला’ करना था। उसे अपनी किटी पार्टीज़ के लिए पूरा स्पेस चाहिए था, और ये खांसते-कराहते बूढ़े लोग उसकी लाइफस्टाइल में फिट नहीं बैठ रहे थे।

रात को अपने बेडरूम में शालिनी ने निमेश के कान भरने शुरू किए।

“निमेश, तुमने पापा को देखा? आज कल वो अजीब बहकी-बहकी बातें करने लगे हैं। कल वो पड़ोसी शर्मा अंकल से कह रहे थे कि घर की रजिस्ट्री के कागज़ कहाँ रखे हैं, उन्हें याद नहीं आ रहा। मुझे डर है कि कहीं बुढ़ापे में, डिमेंशिया के चक्कर में वो घर किसी और के नाम न कर दें या किसी फ्रॉड का शिकार न हो जाएं।”

निमेश चौंक गया। “क्या बात कर रही हो? पापा तो बिल्कुल ठीक हैं।”

“तुम्हें ऐसा लगता है,” शालिनी ने घड़ियाली आंसू बहाए। “मैं दिन भर घर पर रहती हूँ, मैं देखती हूँ उनकी हरकतें। और मम्मी जी… उनसे तो अब चला भी नहीं जाता। निमेश, हमें प्रेक्टिकल होना पड़ेगा। मेरे एक जानकार का ‘आनंद धाम’ नाम का एक बहुत हाई-क्लास सीनियर लिविंग रिसोर्ट है। वहाँ डॉक्टर्स हैं, नर्सें हैं, हम उम्र लोग हैं। वो वहाँ खुश रहेंगे। और यहाँ… यहाँ हम घर को रेनोवेट करवाकर तुम्हारे क्लिनिक का विस्तार कर सकते हैं।”

निमेश पहले हिचकिचाया, लेकिन शालिनी की तर्कों और “भविष्य की सुरक्षा” के नाम पर उसने घुटने टेक दिए।

अगले एक हफ्ते तक घर में एक अजीब सा नाटक चला। शालिनी जानबूझकर खाने में नमक तेज़ कर देती और फिर सास पर इल्ज़ाम लगाती कि उनकी याददाश्त जा रही है। वह चीज़ें इधर-उधर छुपा देती और ससुर जी को भूलक्कड़ साबित करने की कोशिश करती।

प्रभाकर जी जज रहे थे। उन्होंने सैकड़ों अपराधियों की आँखों में देखकर उनका सच पकड़ा था। शालिनी तो अभी कल की खिलाड़ी थी। वह सब समझ रहे थे।

एक शाम, जब शालिनी अपनी सहेली से फोन पर बात कर रही थी, प्रभाकर जी ने इंटरकॉम पर उसकी बातें सुन लीं।

“हाँ यार, बस दो दिन और। मैंने निमेश को मना लिया है। अगले हफ्ते तक ये दोनों ‘आनंद धाम’ में होंगे। और फिर… पूरा घर अपना। सबसे पहले मैं वो पुराना पूजा का कमरा तुड़वाकर वहाँ बार (Bar) बनवाऊंगी। बहुत ओल्ड फैशन लगता है वो।”

प्रभाकर जी के चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं आया, बल्कि एक ठंडी, रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने सुमेधा जी को बुलाया और धीरे से कहा, “सुमेधा, तैयारी कर लो। बहू रानी हमें घर से निकालना चाहती हैं। हमें उनकी मदद करनी चाहिए।”

सुमेधा जी रोने लगीं, लेकिन प्रभाकर जी ने उन्हें चुप कराया और अपने प्लान का हिस्सा समझाया।

अगले दिन रविवार था। नाश्ते की मेज पर प्रभाकर जी और सुमेधा जी बेहद खुश नज़र आ रहे थे। उन्होंने अपने सबसे अच्छे कपड़े पहन रखे थे।

निमेश और शालिनी हैरान थे। उन्हें लगा था कि आज ‘वृद्धाश्रम’ की बात छेड़ने पर हंगामा होगा, रोना-धोना मचेगा।

“निमेश, शालिनी,” प्रभाकर जी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, “हम तुम दोनों से कुछ ज़रूरी बात करना चाहते हैं।”

शालिनी की आँखों में चमक आ गई। लो, काम आसान हो गया, उसने सोचा।

“पापा, अगर आप ‘आनंद धाम’ के बारे में सोच रहे हैं, तो मैंने ब्रोशर मंगवा लिया है…” शालिनी ने उत्साह में कहा।

“अरे नहीं बहू,” प्रभाकर जी ने हाथ हिलाया। “वह सब तो बहुत छोटी जगहें हैं। दरअसल, कल रात मुझे और तुम्हारी माँ को अहसास हुआ कि तुम सही कहती हो। इस घर में हम दोनों की वजह से तुम लोगों की आज़ादी छिन रही है। और सच कहूँ तो, हम भी अब इस रोज़-रोज़ की किचकिच से तंग आ चुके हैं।”

निमेश ने सिर झुका लिया।

“तो…” प्रभाकर जी ने अपनी बात जारी रखी, “हमने फैसला किया है कि हम यह घर छोड़ देंगे।”

शालिनी ने मेज के नीचे निमेश का पैर दबाया। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था।

“लेकिन,” प्रभाकर जी ने एक फ़ाइल मेज पर रखी, “घर छोड़ने से पहले कुछ कानूनी कार्यवाही ज़रूरी थी। तुम तो जानती हो शालिनी, मैं कानून का आदमी हूँ। सब कुछ पक्का करके जाना चाहता हूँ।”

“बिल्कुल पापा, बिल्कुल!” शालिनी ने झटपट कहा। “आप वसीयत बदलना चाहते हैं? या पावर ऑफ अटॉर्नी निमेश के नाम करना चाहते हैं? मैं अभी वकील साहब को बुलाती हूँ।”

“वकील की ज़रूरत नहीं है, वो आ चुके हैं,” प्रभाकर जी ने दरवाज़े की ओर इशारा किया।

दरवाज़े पर शहर के सबसे नामी वकील, मिस्टर खन्ना खड़े थे। उनके साथ दो और अजनबी थे।

शालिनी को लगा अब तो जीत पक्की है। उसने जल्दी से निमेश को इशारा किया।

मिस्टर खन्ना अंदर आए और फाइलों का एक पुलिंदा मेज पर रख दिया।

“तो जज साहब, जैसा आपने निर्देश दिया था, सारे कागज़ात तैयार हैं,” खन्ना जी ने कहा।

“ये क्या है पापा?” निमेश ने पूछा।

“बेटा,” प्रभाकर जी ने बहुत ही शांत स्वर में कहा, “शालिनी ने मुझे अहसास दिलाया कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ और मेरी याददाश्त कमज़ोर हो रही है। और उसने यह भी कहा कि इस बड़े घर को संभालना मेरे बस की बात नहीं। इसलिए, अपनी ‘सठियाने’ वाली हालत में कहीं मैं प्रॉपर्टी का कुछ गलत न कर दूँ, मैंने एक परमानेंट हल निकाल लिया।”

शालिनी के चेहरे पर मुस्कान चिपकी हुई थी।

“मैंने यह घर, ‘आशीर्वाद भवन’, और अपनी सारी जमा पूंजी… बेच दी है,” प्रभाकर जी ने बम फोड़ा।

कमरे में सन्नाटा छा गया। शालिनी की मुस्कान गायब हो गई।

“ब… बेच दी?” शालिनी हकलाते हुए बोली। “किसे? और क्यों?”

“अरे बहू, तुम ही तो कहती थी कि हमें ‘हाई क्लास’ जगह रहना चाहिए,” प्रभाकर जी ने मासूमियत से कहा। “तो मैंने पता किया। दुनिया का सबसे बेहतरीन सीनियर सिटिजन क्रूज़ (Cruise) है, जो पूरी दुनिया घुमाता है। वहाँ फाइव स्टार सुविधाएं हैं। लेकिन उसका खर्चा बहुत ज़्यादा था। मेरी पेंशन से काम नहीं चलता। इसलिए, मैंने सोचा कि जब हम घर छोड़ ही रहे हैं, तो घर खाली पड़ा-पड़ा क्या करेगा? और तुम लोग तो अपनी गृहस्थी संभाल ही लोगे, निमेश डॉक्टर है, अच्छा कमाता है।”

“लेकिन पापा!” शालिनी चीख पड़ी। “यह घर करोड़ों का है! आपने ऐसे कैसे बेच दिया? और हमें कहाँ रहने को मिलेगा?”

“अरे, यही तो सरप्राइज़ है,” प्रभाकर जी ने उन दो अजनबियों की तरफ इशारा किया। “मिलिए, मिस्टर और मिसेज दीवान से। ये इस घर के नए मालिक हैं। इन्होंने पूरी पेमेंट कर दी है। और चूँकि तुम लोगों को घर खाली करने में वक़्त लगेगा, मैंने इनसे रिक्वेस्ट की है कि तुम्हें एक हफ्ते का टाइम दें।”

शालिनी का सिर चकराने लगा। पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस घर की मालकिन बनने के लिए उसने सास-ससुर को निकालने की साज़िश रची थी, वह घर अब बिक चुका था।

“पापा, आप ऐसा नहीं कर सकते!” निमेश खड़ा हो गया। “मेरा हक़ है इस घर पर!”

“किस कानून के तहत, निमेश?” प्रभाकर जी की आवाज़ अब जज वाली कड़क आवाज़ में बदल गई। “यह मेरी स्व-अर्जित (self-acquired) संपत्ति है। पुश्तैनी नहीं है। मैं इसे किसी को भी दे सकता हूँ, जला सकता हूँ या दान कर सकता हूँ। और रही बात हक़ की… तो हक़ सेवा और सम्मान से मिलता है, साज़िशों से नहीं।”

प्रभाकर जी ने शालिनी की ओर देखा, जिसकी रूह अब कांप रही थी।

“शालिनी बहू,” उन्होंने अपनी जेब से एक छोटा सा पेन ड्राइव निकाला और मेज पर रखा। “तुम्हें लगा कि मैं बहरा हो गया हूँ? या अंधा? तुम्हारे वो फोन कॉल्स… ‘घर की रजिस्ट्री’, ‘पागल साबित करना’, ‘पूजा घर तुड़वाना’… सब रिकॉर्डेड है इसमें।”

शालिनी का चेहरा फक पड़ गया।

“मैं चाहता तो डोमेस्टिक वायलेंस और सीनियर सिटिजन एक्ट के तहत तुम्हें और निमेश को जेल भिजवा सकता था,” प्रभाकर जी ने कहा। “लेकिन मैं बाप हूँ। अपने ही बच्चों को कोर्ट में नहीं घसीटना चाहता था। इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं खुद ही अपनी ज़िंदगी से तुम्हें बेदखल कर दूँ।”

“पापा, प्लीज़…” शालिनी घुटनों पर आ गई। उसे घर जाने का दुख तो था ही, लेकिन समाज में बेइज्जती और निमेश की कमाई पर गुज़ारा करने का डर उसे खाए जा रहा था। “हमसे गलती हो गई। ये डील कैंसिल कर दीजिये। हम आपकी सेवा करेंगे।”

“डील हो चुकी है,” खन्ना वकील ने बीच में कहा। “रजिस्ट्री परसों हो चुकी है। पैसा जज साहब के अकाउंट में आ चुका है, जो एक ‘नॉन-रिफंडेबल एन्युइटी ट्रस्ट’ में डाल दिया गया है। यानी अब जज साहब चाहकर भी पैसा वापस नहीं निकाल सकते, उन्हें हर महीने एक मोटी रकम मिलेगी जिससे वो दुनिया घूमेंगे।”

प्रभाकर जी और सुमेधा जी खड़े हुए। सुमेधा जी ने अपनी पोतली उठाई।

“बेटा निमेश,” सुमेधा जी ने नम आँखों से कहा, “मैंने तुझे चलना सिखाया था, ताकि तू अपने पैरों पर खड़ा हो सके। पर तूने अपनी रीढ़ की हड्डी ही अपनी पत्नी के सामने गिरवी रख दी। अब किराए के मकान में रहोगे, तो शायद ईंट-पत्थर की कीमत समझ आएगी।”

“मिस्टर दीवान,” प्रभाकर जी ने नए मालिक से हाथ मिलाया। “घर अब आपका है। एक हफ्ता इन बच्चों को दे दीजियेगा, सामान समेटने के लिए।”

इसके बाद, प्रभाकर जी ने अपनी पत्नी का हाथ थाम लिया। वह बूढ़ा जोड़ा, जिसे कुछ पल पहले तक ‘बेचारा’ समझा जा रहा था, अब राजा की तरह सीना तानकर मुख्य द्वार की ओर बढ़ा।

शालिनी और निमेश पत्थर की मूरत बने खड़े थे। बाहर एक लक्ज़री टैक्सी खड़ी थी जो प्रभाकर और सुमेधा को एयरपोर्ट ले जाने के लिए आई थी।

जाते-जाते प्रभाकर जी ने खिड़की से झांका और शालिनी से कहा, “बहू, तुमने सही कहा था। ‘आनंद धाम’ से बेहतर जगह ढूंढनी चाहिए थी। देखो, अब पूरी दुनिया हमारा ‘आनंद धाम’ है। और हाँ, पूजा घर तुड़वाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि मिस्टर दीवान बहुत धार्मिक हैं।”

गाड़ी धूल उड़ाती हुई निकल गई।

पीछे रह गए निमेश और शालिनी। और वह आलीशान घर, जो अब उनका नहीं था। शालिनी की साज़िश ने न सिर्फ़ उसके सिर से छत छीन ली थी, बल्कि उसे उस दौलत से भी महरूम कर दिया था जिसके लालच में उसने रिश्तों का गला घोंटा था।

शालिनी सोफे पर गिर पड़ी। उसे अब दवाइयों की गंध नहीं, बल्कि अपनी ही लालच की सड़ांध आ रही थी। उसे एहसास हो गया था कि उसने शतरंज की बिसात तो बिछाई थी, लेकिन वह यह भूल गई थी कि सामने वाला खिलाड़ी उसका ‘बाप’ (ससुर) है, जिसने उसे यह खेल सिखाया नहीं, बल्कि उसे मात देने के लिए बस एक चाल का इंतज़ार किया था।

उस दिन आशीर्वाद भवन खाली हो गया, लेकिन असली ‘अनाथ’ वो बूढ़े माँ-बाप नहीं हुए, बल्कि वो बेटा-बहू हुए जो सब कुछ होते हुए भी सड़क पर आ गए थे।

लेखक : मुकेश पटेल 

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