बड़ी बहन – निभा राजीव 

गुलाबी रंग की बनारसी साड़ी में लिपटी नीलम, घर के आँगन से लेकर रसोई तक किसी फिरकी की तरह घूम रही थी। पिछले तीन दिनों से घर में शादी की शहनाइयाँ गूँज रही थीं, और नीलम ने शायद कुल मिलाकर चार घंटे की नींद भी ठीक से नहीं ली होगी। फिर भी, उसके चेहरे पर थकावट का नामोनिशान नहीं था। माथे पर लगी छोटी सी लाल बिंदी पसीने की हल्की बूंदों के साथ चमक रही थी, जो उसकी मेहनत और समर्पण का सबूत थी।

घर के हर छोटे-बड़े काम की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी। हलवाई को मसालों का डिब्बा पकड़ाना हो, मेहमानों के कमरों में तौलिये भिजवाने हों, या फिर रूठी हुई चाचियों को मनाना हो—नीलम हर मोर्चे पर तैनात थी।

“अरे नीलम बिटिया! जरा इधर तो आना,” दादी ने दालान से आवाज लगाई।

नीलम दौड़ती हुई पहुँची, “जी दादी, बताइए?”

“अरे, दूल्हे राजा के स्वागत वाली थाली में रोली-अक्षत रख दिया न? और वो नारियल पर कलावा बांधा कि नहीं?”

नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा, “सब हो गया दादी। आप चिंता मत कीजिए, आरती की थाली मैंने खुद सजाकर मंदिर के पास रख दी है।”

तभी घर के बाहर से बैंड-बाजे की धुन सुनाई देने लगी। ढम-ढम की आवाज ने घर के वातावरण में एक नई बिजली दौड़ा दी। औरतों और लड़कियों का हुजूम सीढ़ियों की तरफ भागा। सबको छत से बारात देखने की जल्दी थी।

नीलम भी अपना पल्लू ठीक करती हुई, बच्चों को संभालती हुई छत की ओर बढ़ी। छत की मुंडेर पर पहले से ही घर की बहुएं, बेटियां और आस-पड़ोस की महिलाएं जमा थीं। रात का वक्त था, और सड़क पर मरकरी लाइट्स की रोशनी में बारात की चमक-धमक देखते ही बन रही थी।

अचानक, नीलम की चचेरी बहन, शिखा, मुंडेर से झुकते हुए चिल्लाई, “वो देखो! वो देखो! बारात आ गई। उफ़्फ़, कितनी भीड़ है!”

पास खड़ी बुआ जी ने अपनी आँखों को सिकोड़ते हुए नीचे देखा और उत्साह से बोलीं, “अरे वाह! दूल्हा तो बड़ा ही शानदार लग रहा है। देखो तो, कैसे अकड़ कर चल रहा है शेरवानी में।”

वहाँ खड़ी सभी औरतें खिलखिला कर हंस पड़ीं। नीलम ने भी नीचे झांका और अपनी हंसी नहीं रोक पाई।

“अरे बुआ जी,” नीलम ने हंसते हुए कहा, “वो दूल्हा नहीं है, वो तो लाइट पकड़ने वाला आदमी है जिसने सिर पर सजावटी पगड़ी पहन रखी है। दूल्हा तो वो पीछे घोड़ी पर है।”

शर्मिंदा होकर बुआ जी ने अपनी साड़ी ठीक की, “धत्त! ये रोशनी की चकाचौंध में पता ही नहीं चलता। मुझे लगा वही हमारा जमाई राजा है।”

माहौल हंसी-ठिठोली से भर गया। सब मंगल गीत गाने लगीं। “बन्ना रे बागा में झूला घाल्या…” के सुर छत से गूँजने लगे।

लेकिन इस हंसी-मजाक के बीच, नीलम की नज़रें घोड़ी पर बैठे दूल्हे, ‘विक्रांत’, पर टिक गईं। ऊपर से सब कुछ बहुत सुंदर लग रहा था—नाचते बाराती, आतिशबाजी, फूलों की वर्षा। लेकिन नीलम की पारखी नज़र ने कुछ ऐसा देखा जो शायद जश्न के शोर में किसी और को दिखाई नहीं दे रहा था।

विक्रांत घोड़ी पर बैठा ज़रूर था, लेकिन उसका संतुलन ठीक नहीं लग रहा था। वह बार-बार घोड़ी की लगाम को झटके दे रहा था और पास खड़े अपने दोस्तों के साथ कुछ ज्यादा ही आक्रामक तरीके से हंस रहा था। बीच-बीच में वह घोड़ी वाले को पैर से मार रहा था ताकि वह घोड़ी को नचाए।

नीलम का दिल एक पल के लिए ठिठक गया। यह व्यवहार सामान्य उत्साह नहीं लग रहा था। उसे पाँच साल पहले की अपनी शादी याद आ गई। उसका पति भी बारात में ऐसे ही झूमता हुआ आया था, और फिर… नीलम ने सिर को झटक दिया। वह आज अपनी छोटी बहन ‘रिया’ की शादी में कोई अपशकुन नहीं सोचना चाहती थी। रिया उसे जान से प्यारी थी। माँ-बाप के गुजर जाने के बाद, नीलम ने ही रिया को पाल-पोसकर बड़ा किया था।

बारात अब बिल्कुल दरवाजे के करीब आ चुकी थी। नीलम जल्दी से नीचे भागी। स्वागत की रस्में होनी थीं।

द्वार पर पिताजी की जगह नीलम के ताऊजी खड़े थे। बारात का स्वागत हुआ। विक्रांत घोड़ी से उतरा। नीलम आरती की थाली लेकर आगे बढ़ी। जैसे ही वह पास गई, उसके नथुनों में एक तीखी, अप्रिय गंध टकराई। शराब की बदबू। और यह कोई हल्की-फुल्की गंध नहीं थी; ऐसा लग रहा था जैसे विक्रांत ने पूरी बोतल पी रखी हो।

नीलम का हाथ कांप गया। आरती की लौ थरथराई। विक्रांत की आँखें लाल थीं और वह नीलम को देखकर अजीब सी मुस्कान के साथ बोला, “अरे साली साहिबा! आरती उतारोगी या सिर्फ घूरोगी? नेग-वेग तैयार है न? कम हुआ तो अंदर नहीं आऊँगा।”

उसकी जुबान लड़खड़ा रही थी। उसके दोस्तों ने पीछे से ठहाका लगाया, “अरे भाई, अभी तो एंट्री है, असली वसूली तो फेरों पर होगी!”

नीलम ने किसी तरह खुद को संभाला। उसने सोचा, “शायद दोस्तों के दबाव में थोड़ी पी ली होगी। आज का दिन खराब नहीं करना चाहिए।” उसने आरती उतारी और रास्ता छोड़ा।

जयमाला के लिए स्टेज सजा हुआ था। रिया लाल लहंगे में किसी परी से कम नहीं लग रही थी। वह धीरे-धीरे स्टेज की तरफ बढ़ी। विक्रांत पहले से वहां खड़ा था। जैसे ही रिया ऊपर चढ़ी, विक्रांत ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उसका पैर लड़खड़ा गया और वह लगभग रिया के ऊपर गिरने ही वाला था कि उसके दोस्त ने उसे संभाल लिया।

भीड़ में थोड़ी कानाफूसी शुरू हो गई।

“लड़का तो पूरा टल्ली है,” किसी ने पीछे से कहा।

“अरे, आजकल के लड़के हैं, खुशी में पी लेते हैं,” किसी बुजुर्ग ने बात संभालने की कोशिश की।

लेकिन नीलम की चिंता अब डर में बदल रही थी। जयमाला के वक्त विक्रांत ने रिया के गले में माला डालने के बजाय उसे जोर से खींचा। रिया घबरा गई। उसकी आँखों में डर साफ दिख रहा था। विक्रांत हंस रहा था, “अरे, डरो मत डार्लिंग! अभी तो पूरी जिंदगी बाकी है।”

नीलम स्टेज के कोने पर खड़ी थी। उसकी मुट्ठियाँ भिंच गईं। रिया ने कांपते हाथों से किसी तरह माला डाली और पीछे हट गई।

खाना शुरू हुआ। नीलम मेहमानों को देख रही थी, लेकिन उसका पूरा ध्यान विक्रांत और उसके परिवार पर था। विक्रांत के पिताजी, समधी जी, ताऊजी के साथ बैठे थे और ऊंची आवाज में बात कर रहे थे।

“देखिए शर्मा जी,” विक्रांत के पिता ने कहा, “खाने में वो बात नहीं है। हमने कहा था कि पनीर की तीन वैरायटी होनी चाहिए, यहाँ तो दो ही हैं। और वो गाड़ी… जो आपने देने का वादा किया था, वो गेट पर खड़ी तो नहीं दिखी।”

ताऊजी हाथ जोड़कर खड़े थे, “समधी जी, गाड़ी की बुकिंग हो गई है, बस डिलीवरी में दो दिन की देरी है। और खाने में…”

“देरी-वेरी हम नहीं जानते!” विक्रांत के पिता ने थाली को झटके से दूर कर दिया। “इज्जत का सवाल है। बारात खाली हाथ नहीं जाएगी। गाड़ी की चाबी फेरों से पहले चाहिए, वरना फेरे नहीं होंगे।”

इधर स्टेज के पीछे बने कमरे में विक्रांत रिया पर चिल्ला रहा था।

“तुम्हारे बाप-चाचा ने क्या समझा है? हम भिखारी हैं? एसी का बंदोबस्त नहीं है इस कमरे में? पसीना आ रहा है मुझे!” विक्रांत ने पास रखा पानी का गिलास दीवार पर दे मारा। कांच के टुकड़े रिया के पैरों के पास गिरे।

नीलम, जो रिया को पानी देने आ रही थी, दरवाजे पर ही रुक गई। उसने यह सब देख लिया।

यह अब सिर्फ शराब की बात नहीं थी। यह बदतमीजी, यह हिंसा, यह दहेज का लोभ—यह सब एक पैटर्न था। नीलम ने अपनी जिंदगी के पांच साल एक ऐसे ही नर्क में बिताए थे। उसका पति भी शराब पीकर हंगामा करता था, दहेज के लिए ताने मारता था, और अंततः उसे छोड़कर दूसरी औरत के पास चला गया था। नीलम तलाकशुदा थी और मायके में रहती थी। उसने कसम खाई थी कि जो उसके साथ हुआ, वह रिया के साथ नहीं होने देगी।

नीलम कमरे में दाखिल हुई।

“क्या चल रहा है यहाँ?” उसकी आवाज़ में वो खनक थी जो पिछले तीन दिनों की भागदौड़ में कहीं दब गई थी।

विक्रांत ने मुड़कर देखा। “ओहो! बड़ी साली साहिबा। तुम ही समझाओ अपनी बहन को और अपने कंजूस रिश्तेदारों को। मुझे गर्मी लग रही है और मूड खराब हो रहा है।”

नीलम ने रिया को देखा। रिया सुबक रही थी।

“रिया, तुम रो रही हो?” नीलम ने पूछा।

“दीदी, ये… ये बहुत अजीब व्यवहार कर रहे हैं। मुझे डर लग रहा है,” रिया ने धीरे से कहा।

नीलम ने एक गहरी सांस ली। वह बाहर आई और सीधे ताऊजी के पास गई। वहाँ अभी भी गाड़ी को लेकर बहस चल रही थी।

“ताऊजी,” नीलम ने कहा, “गाड़ी की बात छोड़िए। यह शादी नहीं होगी।”

वहाँ सन्नाटा छा गया। बैंड का शोर, मेहमानों की बातें, सब जैसे थम गया।

ताऊजी ने घबराकर कहा, “नीलम! पागल हो गई है? बारात दरवाजे पर है, जयमाला हो चुकी है। यह क्या अपशकुन बोल रही है?”

“अपशकुन तो तब होगा ताऊजी, जब रिया की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी,” नीलम ने अपनी आवाज ऊंची की ताकि आसपास के लोग भी सुन सकें। “लड़का शराब के नशे में धुत है। स्टेज के पीछे उसने रिया पर हाथ उठाने की कोशिश की है। और यहाँ उसके पिता दहेज के लिए आपको जलील कर रहे हैं। क्या हम अपनी फूल सी रिया को इन जानवरों के हवाले कर दें?”

विक्रांत के पिता खड़े हो गए, “जुबान संभाल कर बात करो लड़की! तुम खुद तो अपना घर बसा नहीं पाई, अब अपनी बहन का घर उजाड़ना चाहती हो? हमें पता है तुम्हारे बारे में, छोड़ी हुई औरत हो तुम।”

यह ताना नीलम के दिल पर तीर की तरह लगा, लेकिन आज वह कमजोर नहीं पड़ने वाली थी।

“हाँ, हूँ मैं छोड़ी हुई औरत। और इसीलिए मैं जानती हूं कि गलत आदमी के साथ रहने का अंजाम क्या होता है। मैंने पांच साल घुट-घुट कर जिया है, लेकिन मैं अपनी बहन को एक दिन भी नहीं घुटने दूंगी।”

तभी विक्रांत लड़खड़ाता हुआ वहां आया। “कौन रोकेगा शादी? मैं देखता हूँ। रिया मेरी है!” उसने ताऊजी का कॉलर पकड़ने की कोशिश की।

यह हद थी। नीलम ने आगे बढ़कर विक्रांत का हाथ झटक दिया और एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर रसीद कर दिया।

चटाक!

आवाज़ इतनी तेज़ थी कि डीजे का संगीत भी उसके आगे फीका पड़ गया।

“खबरदार जो मेरे पिता समान ताऊजी को हाथ लगाया,” नीलम शेरनी की तरह दहाड़ी। “नशा उतर गया या और उतारूँ? निकल जाओ यहाँ से। अभी के अभी! वरना पुलिस को बुलाने में मुझे दो मिनट लगेंगे। शराब पीकर हंगामा करना, दहेज मांगना और लड़की को डराना—तीनों की धाराएं लगवाऊँगी तो सारी हेकड़ी निकल जाएगी।”

विक्रांत गाल सहलाते हुए हक्का-बक्का रह गया। उसके पिता और रिश्तेदार भी सन्न थे। उन्होंने सोचा था कि लड़की वाले हैं, दब जाएंगे, इज्जत की दुहाई देंगे। लेकिन यहाँ तो नीलम ने दुर्गा का रूप धर लिया था।

ताऊजी कांप रहे थे, “नीलम बेटा, समाज क्या कहेगा? बारात वापस जाएगी तो…”

“समाज रोटी देने नहीं आता ताऊजी,” नीलम ने उनकी आँखों में देख कर कहा। “कल अगर रिया को ये लोग मार-पीट कर घर से निकाल देंगे, या जला देंगे, तब भी समाज सिर्फ बातें ही बनाएगा। रिया की लाश पर रोने से अच्छा है कि हम उसकी शादी टूटने का गम मना लें।”

तभी रिया पीछे से आई। उसने अपने गले से वरमाला उतार कर फेंक दी।

“दीदी सही कह रही हैं। मुझे नहीं करनी यह शादी। जो इंसान शादी के दिन, सबके सामने मेरे परिवार की इज्जत नहीं कर सकता, वो बंद कमरे में मेरी क्या इज्जत करेगा? बापूजी (ताऊजी), मुझे माफ़ कर दीजिए, पर मैं इस शराबी के साथ नहीं जा सकती।”

रिया की हिम्मत देखकर ताऊजी की आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने अपनी पगड़ी संभाली और सीना चौड़ा करके समधी जी से कहा, “सुन लिया आपने? मेरी बेटियों ने फैसला सुना दिया है। अपनी बारात वापस ले जाइए। और शुक्र मनाइए कि हम पुलिस केस नहीं कर रहे। गेट खुला है, निकलिए!”

विक्रांत और उसके पिता बड़बड़ाते हुए, धमकियां देते हुए, लेकिन अपमानित होकर बारात लेकर वापस चले गए। वो बैंड-बाजा जो खुशियों का पैगाम लेकर आया था, अब खामोश हो चुका था।

मेहमानों में कानाफूसी शुरू हो गई।

“बेचारी रिया, मंडप से बारात लौट गई।”

“नीलम ने तो अपनी बहन का घर बसने से पहले ही उजाड़ दिया।”

“अब कौन शादी करेगा इससे?”

नीलम ने यह सब सुना। वह स्टेज पर गई और माइक हाथ में लिया।

“आप सब सोच रहे होंगे कि आज बहुत बुरा हुआ। लेकिन मैं कहती हूँ, आज बहुत अच्छा हुआ। आज एक घर बर्बाद होने से बच गया। एक लड़की की हंसी, उसकी स्वाभिमान और उसकी जान बच गई। शादी जीवन का हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं। मेरी बहन कोई बोझ नहीं है जिसे किसी भी शराबी के गले बांध दिया जाए। वो पढ़ी-लिखी है, अपना भविष्य खुद बनाएगी। और उसे किसी ऐसे इंसान की ज़रूरत नहीं जो उसे कमज़ोर समझे।”

नीलम ने रिया को गले लगा लिया। दोनों बहनें रो रही थीं, लेकिन ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि एक भारी बोझ के उतर जाने के थे।

धीरे-धीरे मेहमानों को बात समझ आने लगी। कुछ समझदार बुजुर्गों और महिलाओं ने आगे बढ़कर ताऊजी और नीलम की पीठ थपथपाई।

“सही किया बेटा। ऐसी नारकीय जिंदगी से तो कुंवारा रहना अच्छा,” पड़ोस की काकी ने कहा।

रात के दो बज चुके थे। घर खाली हो गया था। वो सजावट, वो फूल, वो रोशनी अब भी वैसी ही थी, बस दूल्हा और बाराती गायब थे।

नीलम और रिया छत पर बैठी थीं। वही छत जहाँ से उन्होंने बारात को आते देखा था।

रिया ने नीलम के कंधे पर सिर रखा। “दीदी, अगर तुम न होतीं तो आज मैं…”

नीलम ने उसके मुंह पर उंगली रख दी। “शशश… कुछ नहीं होता। तू मेरी गुड़िया है। तुझे खरोंच भी आए, तो तकलीफ मुझे होती है।”

नीलम ने आसमान की तरफ देखा। तारे टिमटिमा रहे थे। उसे लगा जैसे उसके माता-पिता ऊपर से मुस्कुरा रहे हैं। आज उसने अपनी ‘बड़ी बहन’ होने का असली फर्ज निभाया था। उसे थकान महसूस होनी चाहिए थी, तीन रातों की जागी हुई थी, एक बड़ा तूफान झेलकर निकली थी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, उसके चेहरे पर अब भी थकावट की कोई लकीर नहीं थी।

बल्कि, उसके चेहरे पर एक नई चमक थी—आत्मसम्मान और साहस की चमक। उसने समाज के डर को हराकर अपनी बहन की खुशियों को चुना था।

नीलम ने रिया से कहा, “चल, नीचे चल। भूख लगी है। हलवाई ने जो गुलाब जामुन बनाए थे, वो तो बच ही गए। आज हम जी भर के खाएंगे। यह हमारी आज़ादी की पार्टी है।”

दोनों बहनें खिलखिला कर हंस पड़ीं। उनकी हंसी ने उस सूने घर में फिर से जान डाल दी। यह अंत नहीं, बल्कि एक नई और बेहतर शुरुआत थी।

मूल लेखिका : निभा राजीव 

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