शुभ्रा मैंने तुमसे कितनी बार कहा है । जब भी रसोई में काम करती हो तो पूरा निपटा के ही रसोई से निकला करो। मैं जब भी रसोई में आती हूं तो मुझे रसोई बिखरी हुई ही मिलती है।
न जाने तुम कौन सी दुनिया में खोई रहती हो। जो तुम्हारा काम खत्म होता ही नहीं। अगर तुम सोचती हो कि तुम्हारी बिखरी रसोई मैं समेटू तो यह तो मुझसे नहीं होने वाला। तुम्हें मेरा इतना सम्मान तो करना ही पड़ेगा। आखिर मैं तुम्हारी जेठानी हूं। इस घर की बड़ी बहू हूं।
जेठानी मानवी की ऐसी कड़वी बातें सुनकर शुभ्रा को बहुत तकलीफ हुई। वह फिर बड़े सलीके से अपनी जेठानी मानवी से बोल उठी। दीदी आप तो जानती हो ।
मुन्ना दो दिन से कितना बीमार है। उसका बुखार उतर ही नहीं रहा है। मैं जैसे ही रसोई का काम निपटाने आती हूं। मुन्ना रोने लगता है, इसीलिए मुझे उस काम को बीच में ही छोड़ कर मुन्ने के पास जाना होता है । आप ही बताओ दीदी,मैं मां होकर उसे इस तरह कैसे छोड़ सकती हूं।
शुभ्रा की बात सुनकर भी मानवी का दिल नहीं पसीजा और अपने ही अंदाज में अकड़ कर कहने लगी।
देखो शुभ्रा मां तो मैं भी हूं मगर फिर भी मैं तो अपना काम समय से निपटा लेती हूं। हां यह बात अलग है किसी में यह गुण होते हैं और किसी में नहीं कह कर मानवी अपने कमरे में चली गई।
मैंने देखा शुभ्रा की आंखें नम हो गई थी ।
दोनों बहू के आपस का व्यवहार देखकर मुझे अच्छा नहीं लगा। आज मैंने ठान लिया कि मैं बड़ी बहू मानवी को समझाकर रहूंगी।
शाम को मौका मिलते ही मैं मानवी से बोल उठी। देखो बहू शुभ्रा को इस घर में रचने, बसने का समय तो दो । वैसे भी अभी शुभ्रा की शादी को ज्यादा समय भी नहीं हुआ हैं और फिर अब उसे मुन्ने को भी देखना होता है ।
इस वक्त तुम्हें उसकी मदद करनी चाहिए ना कि ऐसे कड़वे शब्द कहने चाहिए। मानवी बहू अब तुम्हारे बच्चे बड़े हो चुके हैं। मगर याद करो।
जब तुम्हारे बच्चे छोटे थे तो, तुम भी अक्सर वैसी ही परिस्थिति में हो जाया करती थी। जिस परिस्थिति में आज शुभ्रा खड़ी है । सोचो, अगर उस वक्त मैं तुम्हारा साथ नहीं देती, तो क्या तुम्हारी नजर में मेरा सम्मान होता । नहीं ना??
अरे बहू वैसे भी हर औरत की गृहस्थी में जब पहली संतान आती है तो उसे एक तरफ घर के काम काज और एक तरफ अपने बच्चों को संभालना होता है।
ऐसे में उसे परिवार के सदस्यों के साथ की जरूरत होती है और तुम ऐसे में उसकी मदद करने की जगह उसके मन को चोट पहुंचा रही हो ।
जबकि मैं जानती हूं तुम दिल की भली हो। मगर तुम्हारे कड़वे शब्द घर परिवार में हर किसी के मन को जब तब चोट दे जाते हैं और वहीं शुभ्रा जिसे आए हुए हमारे परिवार में ज्यादा समय भी नहीं हुआ है। मगर उसने परिवार के सभी सदस्यों का मन जीत लिया है।
मेरी बात सुनकर धीमे से मानवी बोल उठी। मम्मी जी मैं तो घर की बड़ी बहू हूं । मुझे तो ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए बल्कि जब से शुभ्रा इस घर में आई है। मैं देख रही हूं, शुभ्रा को ज्यादा सम्मान दिया जा रहा है।
मैं मानवी की बात सुनकर तुरंत उसे समझाते हुए बोल उठी । अरे बहू बड़ा ओहदा यानि कि परिवार की बड़ी जिम्मेदारी लेना ना कि उस ओहदे का कोई गलत इस्तेमाल करना, उसका फायदा उठाना। हां बड़ी बहू होना सम्मान की बात है मगर अधिकार नहीं क्योंकि अधिकार तो घर के छोटे सदस्यों का भी उतना ही होता है ।
तुम मुझे ही देख लो मैं घर में सबसे बड़ी हूं मगर मैं घर के बाकी सदस्यों की मजबूरी अगर कल को समझना छोड़ दूं, उन्हें प्यार देना, आशीर्वाद देना छोड़ दूं और उन पर अधिकार जमाने लगूं तो मैं भी अपना सम्मान बिल्कुल खो दूंगी।
अरे बहू देखा जाए तो घर के मर्दों को तो कुछ पता ही नहीं होता । सच कहूं तो यह घर गृहस्थी तो हम औरतों को ही चलानी होती है इसीलिए हम औरतों का आपसी रिश्ता मधुर और एक दूसरे को समझने वाला होना चाहिए।
मानवी को मेरी बातें काफी हद तक समझ आ गई थी इसीलिए वह मुझे कहने लगी। मम्मी जी आप मुझे क्षमा कर दीजिए। आप बिल्कुल सही कह रही हैं। मैं अपना वक्त और परिस्थिति सब भूल कर शुभ्रा के साथ ऐसा व्यवहार करने लगी।
मैं दूसरों का सम्मान भूल कर अपने ओहदे का अधिकार चाहने लगी थी। जो कि सही नहीं था। मैंने गलत किया है तो मैं ही उसे अब ठीक भी करूंगी कहते हुए मानवी शुभ्रा के कमरे की ओर चल पड़ी।
मैंने मानवी को देखकर चैन की सांस ली की चलो समय रहते मानवी बहू संभल गई।
स्वरचित
सीमा सिंघी
गोलाघाट असम