वृषाली रसोई में खड़ी सब्जी काट रही थी। सुबह-सुबह का समय था और घर में हलचल शुरू हो चुकी थी। उसका मन काफी हल्का-फुल्का था क्योंकि आज वह अपनी सास मालती देवी की पसंद की बैंगन की स्वादिष्ट सब्जी बनाने वाली थी। उसने बड़े मन से तैयारी की, गैस हल्की रखी और बाहर आकर आँगन में सूखते कपड़े समेटने लगी।
पर लौटकर आई तो देखा कि कड़ाही से धुआँ उठ रहा है। सब्जी काली हो चुकी थी।
“अरे भगवान! अभी तो धीमी आँच पर रखकर गई थी…”
वृषाली का चेहरा मुरझा गया। उसने थककर कड़ाही हटाई ही थी कि मालती देवी की आवाज आई—
“बहू, खाना लगा दे। दवा ले ली है, अब तुरंत खाना जरूरी है।”
वृषाली के हाथ-पैर फूल गए।
“माँजी… वो… सब्ज़ी थोड़ी जल गई है। मैं आपको सुबह बची दाल और थोड़ा सलाद दे देती हूँ, ताकि आप समय पर खाना खा लें…”
वह पूरी हिम्मत करके बोली ही थी कि तभी बरामदे से रीता आ गई—घर की बड़ी बहू।
“वाह रे वृषाली! अभी दो महीने हुए आए और घर का ये हाल? इतनी महँगाई में खाना बर्बाद? क्या कभी ध्यान रखती भी हो?”
रीता की आवाज में कटुता और विजय दोनों थे।
मालती देवी ने जैसे ही यह सुना, वे रीता की ओर घूमीं—
“रीता, तू शांत रह। सब्जी जल गई तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट गया? वृषाली, तू मुझे सुबह वाली दाल दे दे। बाकी लोग तो देर से खाएंगे, तब तक दूसरी सब्जी बना लेना। तू परेशान मत हो।”
रीता को जैसे बिजली छू गई।
उसे उम्मीद थी कि उसकी माँ सख़्ती से वृषाली को डांटेंगी, लेकिन उल्टा उसका ही चेहरा उतर गया।
असल में, जब वृषाली आँगन में गई थी, तब गैस को तेज़ किसी और ने किया था—रीता ने।
क्योंकि पिछले दो महीनों से जबसे वृषाली घर में आई थी, घरवालों का ध्यान उसकी ओर बढ़ गया था। उसकी विनम्रता, समझदारी और समय पर हर काम कर देने की आदत ने सबका दिल जीत लिया था।
रीता को लगता था कि उसकी पाँच साल की मेहनत की कोई कदर ही नहीं रही।
वह घर में सबसे पहले उठती थी, सब्जियाँ काटती थी, बेटी सिया का ध्यान रखती थी…
पर जितना वह शिकायत करती रहती, उतना ही घरवाले वृषाली की हँसमुख स्वभाव की ओर खिंचते गए।
रीता को बात चुभती थी—“सब उसकी तारीफ क्यों करते हैं? मैं क्या बेकार हूँ?”
अपनी जलन छुपाते-छुपाते वह कई बार गलत हरकतें भी कर बैठती।
एक दिन की बात है—
वृषाली ने कपड़े सुखाए थे। उनमें मालती देवी की नीली सिल्क की साड़ी भी थी—उनकी सबसे प्रिय।
रीता धीरे-धीरे आई और छिपकर उस साड़ी की पिन निकाल दी।
साड़ी नीचे सड़क पर गिर गई।
थोड़ी ही देर में सफाई करने वाली बाला साड़ी उठाकर ले आई—
“मालकिन, ये सड़क पर पड़ी मिली।”
साड़ी गंदी हो चुकी थी।
रीता ने मौका देखकर चिल्लाना शुरू कर दिया—
“वृषाली! ये क्या किया तुमने? माँजी की मनपसंद साड़ी गंदी कर दी! अब तो तुम्हें सज़ा मिलेगी!”
वृषाली स्तब्ध रह गई।
उसे समझ नहीं आया कि यह कैसे हुआ।
मालती देवी साड़ी देखकर गुस्सा नहीं हुईं, बल्कि उन्होंने वृषाली से कहा—
“तू कमरे में जा बेटा।”
और फिर रीता को अपने कमरे में बुलाकर दरवाज़ा बंद कर लिया।
रीता के दिल में धुकधुकी थी।
“अब तो माँ मुझे शाबाशी देंगी… वृषाली की पोल खुल जाएगी…”
लेकिन हुआ उल्टा।
मालती देवी ने गहरी साँस ली—
“रीता, पांच साल घर में रहकर तूने इतना नहीं सीखा कि रिश्तों को कैसे संभालते हैं? बड़ी बहू होना सम्मान है, अधिकार नहीं। मुझे सब पता है—”
रीता की आँखें फैल गईं।
“उस दिन गैस भी तूने तेज की थी। सोचा कि वृषाली की सब्जी जलेगी तो मैं उसे डाँट दूँगी?”
रीता के पैरों तले जमीन खिसक गई।
मालती देवी बोलती गईं—
“मैंने तुझे सब्ज़ी खराब करते हुए देखा था। आज भी तूने साड़ी की पिन निकाली थी। तू यह क्यों कर रही है? वृषाली ने कब तुझे नीचा दिखाया? कब तेरा हक छीना?”
रीता का चेहरा उतरता चला गया।
मालती देवी ने आगे कहा—
“तूने घर को पाँच साल झल्लाते हुए, चिड़चिड़ेपन से संभाला है।
और वृषाली वही काम मुस्कुराकर करती है।
अंतर यही है कि वह बोझ समझकर काम नहीं करती।
दूसरों की सेवा से उसका मन हल्का होता है।
तू उसकी इस बात से क्यों जलती है?
जलन की आग में घर टूटते हैं, रीता।”
रीता की आँखें भर आईं।
लेकिन मालती देवी अभी भी सख़्त थीं, पर उनकी भाषा प्यार की थी।
“सुन रीता—
रिश्ते नीचे गिराकर नहीं, प्यार देकर ऊपर उठाए जाते हैं।
वृषाली तुझे बड़ी बहन समझती है।
तू उसे छोटी बहन क्यों नहीं मान सकती?
उसने खुद कहा था कि तुम बच्चे को संभालो, बाकी काम वह कर लेगी…”
रीता ने धीमे स्वर में कहा—
“माँ… मुझे लगा… सब उससे प्यार करते हैं… मेरी कीमत कम हो रही है…”
मालती देवी ने उसका कंधा थपथपाया—
“मूल्य बढ़ाने के लिए दूसरों का ताज छीनना नहीं पड़ता…
अपने सिर पर मेहनत का फूल सजाना पड़ता है।
और वह तू कर सकती है, अगर चाहे तो।”
कमरा एक पल को शांत हो गया।
रीता अपने भीतर टूट रही थी।
उसे पहली बार लगा—
वह गलत रास्ते पर थी।
उसने माँ का हाथ पकड़ लिया—
“माँ… मैं बदल जाऊँगी। सच में बदल जाऊँगी।”
मालती देवी मुस्कुराईं।
“बेटी, ये घर दो बहुओं की साझेदारी से ही सुंदर लगेगा।
एक पेड़ घना तभी होता है जब उसकी दो मुख्य टहनियाँ मिलकर हवा को थामें—
न कि एक-दूसरे को काटें।”
उस दिन रीता कमरे से बदली हुई निकली।
उसका चेहरा शांत था।
उसके भीतर की जलन जैसे ढल गई थी।
अगले दिन…
सुबह के समय वृषाली पूजा घर में दिया जला रही थी।
रीता धीरे-धीरे उसके पास आई।
“वृषाली…”
वृषाली ने पलटकर देखा—
“जी भाभी?”
रीता ने गहरी साँस ली—
“कल… जो हुआ… वह मेरी गलती थी। मुझे माफ़ कर दो।”
वृषाली एक पल को चौंक गई।
“भाभी, आप ऐसा क्यों कह रही हैं? मैं तो…”
रीता ने उसका हाथ पकड़ लिया—
“नहीं वृषाली, अब से हम दोनों मिलकर घर संभालेंगे।
तू छोटी बहन है मेरी… और अब ये घर हमारा है—साथ मिलकर हँसी-खुशी चलाने लायक।”
वृषाली की आँखें नम हो गईं।
“भाभी… मैं तो आपके बिना कुछ नहीं हूँ…”
दोनों की आँखों में पारिवारिक स्नेह की चमक उभर आई।
मालती देवी दूर खड़ी यह दृश्य देख रहीं थीं—
उनके चेहरे पर संतोष था।
उन्होंने सोचा—
“घर तभी सुंदर बनता है जब मन के कोने साफ़ हों…
और आज मेरा घर सचमुच चमक उठा है।”
अब घर बदल चुका था…
जहाँ पहले तूतू-मैंमैं और अनकही जलन हवा में तैरती थी, वहाँ अब हँसी की महक फैल रही थी।
रीता और वृषाली अब एक-दूसरे के काम में हाथ बँटातीं—
रीता बच्चे को खिलाती तो वृषाली जल्दी से काम निपटा देती।
वृषाली साड़ी सुखाती तो रीता मदद करके उसे गिरने से बचाती।
और मालती देवी…
वो दोनों बहुओं के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देतीं—
“जुग-जुग जियो बेटियों…
रिश्ते जोड़ने वाली बहुएँ घर की सबसे बड़ी दौलत होती हैं।”
घर के आँगन में वह सब्जी की खुशबू फिर से फैली थी—
पर इस बार गैस किसी ने छिपकर नहीं छेड़ी थी।
संशय, जलन और कटुता की जगह
विश्वास, अपनापन और मुस्कान ने ले ली थी।
और यही परिवार की असली जीत थी।
मूल लेखिका—अर्चना खंडेलवाल
समाप्त।