बड़े भाई हो बाप मत बनो। – सीमा सिंघी

छोटे भाई राज के घर में घुसते ही ब्रजेश बोल उठा। छोटे लाइट का बिल कल याद कर के दे देना और हां कल दुकान पर भी तुम थोड़ी जल्दी चले जाना, कुछ ग्राहक आने वाले हैं। अभी आते वक्त तुम सब्जी लेकर घर आ सकते थे। खैर कोई बात नहीं, अब आ गए हो तो फिर जाकर ले आना।

बृजेश जी की इस तरह रोज राज के घर में घुसते ही कुछ काम कहने की आदत आज की नहीं बरसों पुरानी आदत थी। शुरुआती दिनों में तो राज भी जी भैया मैं सब कर लूंगा कहकर वहां से हट जाता मगर

धीरे-धीरे बृजेश की यह आदत और बढ़ती गई । राज जैसे ही दिन ढले घर आता। बृजेश रोज की तरह उसे काम और उलहाने देना नहीं भूलता मगर अब धीरे-धीरे रोज-रोज यही उलहाने सुनते-सुनते अब राज को बोझ लगने लगे थे। 

वह अच्छी तरह समझ चुका था कि उसका बड़ा भाई अपने बड़े भाई होने का फायदा उठाकर उस पर अधिकार जमा रहा है । जबकि दुकान दोनों भाइयों की थी। राज रोज दुकान जाकर खोलता और शाम को बंद करने की ड्यूटी भी उसी की थी। घर से दोपहर को उसका टिफिन जाता। बृजेश दुकान पर आराम से पहुंचता और दोपहर को घर खाना खाने आता तो वापस जाता ही नहीं था। 

धीरे-धीरे बृजेश की दुकान जाने की आदत छूटती चली गई। अब राज को अकेले दुकान पर बहुत मुश्किलें आने लगी मगर बड़ा भाई होने के नाते वो ब्रजेश से कुछ नहीं कहता मगर आज उसके सब्र का बांध टूट गया और वह तुरंत बोल उठा। भैया आखिर आप मुझे कब समझ पाएंगे । 

मैंने आपका बड़े भाई होने के नाते बहुत मान सम्मान रखा मगर आपने सदा उसका फायदा उठाया। आपको छोटे भाई पर अधिकार तो याद रहा मगर बड़े भाई के हिस्से का प्यार और फर्ज निभाना तो आप भूल ही गए। क्या आपको कभी याद है, मुझसे प्यार के दो शब्द बोले हुए, मेरी डायरी के पन्नों में तो आपके वह दो मीठे शब्द शायद ही मिले।

राज की बात सुनते ही बृजेश तुरंत गुस्से में बोल उठा। छोटे  आजकल बहुत बोलने लगे हो। मुझे कहने का अधिकार है आखिर बड़ा भाई हूं तुम्हारा। 

बड़े भाई बृजेश की यह बात सुनते ही राज तुरंत बोल उठा । शायद यह मेरी बड़ी भूल थी । जो एक दिन आपके मेरी तकलीफों को समझने का,मैं भी इंसान हूं यह महसूस करने का टकटकी लगाए इंतजार करते रहा । आज के बाद मुझे “छोटे” नहीं राज कहकर बुलाया कीजिए क्योंकि आपने अब वह अधिकार खो दिया है। 

जब आपने मेरी तकलीफें नहीं समझी तो अब छोटे भाई पर अधिकार कैसा। मैंने आपको सम्मान बाबूजी के जितना दिया मगर आज मैं समझ गया हूं। 

आप बाबूजी जैसा कभी नहीं बन सकते इसीलिए अब मेरे बड़े भाई हो ,मेरे बाप मत बनो क्योंकि मैं अच्छी तरह जान चुका हूं की पिता पिता ही होते हैं और बड़े भाई बड़े भाई ही होते हैं कहकर राज वहां से जाने लगा।

आज राज ने जो भी बातें बड़े भाई बृजेश से कहीं वह सौ प्रतिशत सही थी। तभी तो बृजेश की नजरे झुक गई और वह शांत मन से फिर बोल उठा। तुम ठीक कह रहे हो छोटे। मैंने बड़े होने का हमेशा तुम पर अधिकार चाहा मगर तुम्हें प्यार करना,तुम्हारे प्रति फर्ज निभाना, तुम्हारी फिकर करना तो मैं भूल ही गया मगर आज मैं अच्छी तरह समझ गया हूं इसीलिए आगे से फिर कभी ना कहना कि मैंने “छोटे” कहने का अधिकार खो दिया है। तुम मेरे छोटे भाई हो और छोटे ही रहोगे क्योंकि मैं अपने हिस्से का प्यार और अपना फर्ज अब तुम्हारे प्रति सदा याद रखूंगा और हां कल से दुकान हम दोनों भाई साथ ही चलेंगे कहते हुए बृजेश अपने हाथों से राज की पीठ को बड़े प्यार से सहलाने लगा।

बृजेश का यह बर्ताव देखकर राज से भी रहा नहीं गया और वह भी अपने बड़े भाई के गले लग पड़ा।

दूर कहीं संगीत बज रहा था” मेरा भाई तु मेरी जान है’।

स्वरचित 

सीमा सिंघी 

गोलाघाट असम

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