बड़े भाई हो, बाप मत बनो – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव

“माँ! अब और नाटक नहीं होगा। कह दो भैया से कि आज ही हिसाब कर दें। मैं अब इनके टुकड़ों पर पलने वाला नहीं हूँ। मुझे मेरा हिस्सा चाहिए, अभी और इसी वक़्त!” सुमित की आवाज़ से ड्राइंग रूम की खिड़कियाँ थरथरा गईं। उसका चेहरा गुस्से से लाल था और उंगली सीधे अपने बड़े भाई, राघव की ओर उठी हुई थी।

सावित्री देवी, जो अब तक सोफे पर सिर झुकाए बैठी थीं, ने धीरे से सिर उठाया। उनकी आँखों में ममता थी, लेकिन दुर्भाग्य से वह ममता अंधी थी और सिर्फ़ छोटे बेटे सुमित के लिए बह रही थी।

“राघव,” सावित्री देवी ने कठोर स्वर में कहा, “सुन तो रहा है तू सुमित क्या कह रहा है? दे क्यों नहीं देता इसका हिस्सा? कब तक दबाकर बैठेगा बाप की जायदाद? अरे, छोटा है वो, अपनी गृहस्थी जमाना चाहता है, तो तुझे क्या परेशानी है? तू तो हमेशा से ही चाहता था कि सुमित मेरे पल्लू से बंधा रहे, कभी अपने पैरों पर खड़ा न हो पाए।”

राघव, जो कमरे के एक कोने में खंभा पकड़े खड़ा था, सन्न रह गया। उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जायदाद? कौन सी जायदाद? वो छोटी सी लोहे की फैक्ट्री जिसे उसने अपने खून-पसीने से सींचकर खड़ा किया था, क्या वो उसे “बाप की जायदाद” कह रही थीं?

“माँ…” राघव की आवाज़ भारी हो गई, “आप जानती हैं न कि बाबूजी जब गुज़रे थे, तो हमारे पास सिर्फ़ कर्ज़ था? उस टूटी हुई वर्कशॉप को मैंने खड़ा किया है। सुमित का एमबीए, उसकी शादी, घर का रिनोवेशन… सब उसी कमाई से हुआ है। आज आप कह रही हैं कि मैंने इसे दबाकर रखा है?”

“एहसान मत जताओ भैया!” सुमित बीच में ही चिल्ला पड़ा। “तुमने जो किया, वो तुम्हारा फ़र्ज़ था। बड़े भाई हो, बाप की जगह थे। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम मेरी ज़िंदगी के फैसले लोगे। मुझे वो फैक्ट्री बेचनी है। मुझे अपना स्टार्टअप शुरू करना है। मुझे कैश चाहिए।”

राघव ने अपनी पत्नी, मेधा की ओर देखा। मेधा चुपचाप आँसू पोंछ रही थी। वह जानती थी कि राघव ने इस परिवार के लिए अपनी जवानी, अपने सपने, सब कुछ होम कर दिया था।

राघव ने एक गहरी सांस ली और माँ की आँखों में देखा। “माँ, फैक्ट्री बेचना सुमित के भविष्य के लिए सही नहीं है। यह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है। इसे बेचकर जो पैसा आएगा, वो सुमित साल भर में उड़ा देगा। मैं इसे बर्बाद होते नहीं देख सकता।”

सावित्री देवी खड़ी हो गईं। “बस! बहुत हो गया तेरा ज्ञान। तू साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहता कि तुझे जलन हो रही है? तुझे डर है कि कहीं सुमित तुझसे आगे न निकल जाए। सुन राघव, यह घर और वो फैक्ट्री मेरे पति के नाम पर थी। क़ानूनी तौर पर मेरा हक़ है। और मैं कहती हूँ कि बंटवारा होगा। अगर तुझे सुमित के साथ नहीं रहना, तो तू जा सकता है। वैसे भी, अब बच्चे बड़े हो गए हैं, सुमित समझदार है, वो संभाल लेगा। तेरी यह ‘चौधरियों’ वाली आदत अब यहाँ नहीं चलेगी।”

राघव के होठों पर एक फीकी, दर्दनाक मुस्कान तैर गई। उसने धीरे से कहा, “ठीक है माँ। शायद आप सही कह रही हैं। इस घर को अब मेरी ज़रूरत नहीं रही। और कड़वा सच यही है कि जहाँ ज़रूरत ख़त्म हो जाए, वहां इंसान की इज़्ज़त भी ख़त्म हो जाती है। मैं ही शायद दीवार बनकर खड़ा था, अब हट जाता हूँ।”

इस कहानी की जड़ें आज के झगड़े में नहीं, बल्कि पंद्रह साल पुराने उस काले दिन में थीं, जब राघव महज़ इक्कीस साल का था।

घर के बाहर सफ़ेद कपड़ों में लिपटे लोगों की भीड़ थी। राघव के पिता, मनोहर जी का हार्ट अटैक से आकस्मिक निधन हो गया था। राघव उस समय इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर में था। आँखों में बड़े सपने थे, विदेश जाकर नौकरी करने का अरमान था। लेकिन पिता की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि कर्ज़दारों ने दरवाज़ा खटखटाना शुरू कर दिया था।

मनोहर जी एक छोटी सी लेथ मशीन की वर्कशॉप चलाते थे, जो घाटे में चल रही थी। सुमित तब सिर्फ़ दस साल का था। घर में खाने के लाले पड़ने वाले थे। सावित्री देवी का रो-रोकर बुरा हाल था। वे बार-बार राघव को पकड़कर कहती थीं, “अब क्या होगा बेटा? सुमित का क्या होगा? हम तो सड़क पर आ गए।”

उस दिन इक्कीस साल के राघव ने अपने सपनों की बलि चढ़ा दी थी। उसने कॉलेज छोड़ दिया। अपनी स्कॉलरशिप के पैसे कर्ज़दारों के मुंह पर मारे और पिता की धूल भरी, तेल से सनी वर्कशॉप में जा बैठा। उसके दोस्तों ने उसे समझाया, “राघव, तू टॉपर है, तू यहाँ बर्बाद हो जाएगा।” पर राघव के कानों में सिर्फ़ माँ की सिसकियाँ और छोटे भाई की भूख गूंज रही थी।

राघव ने दिन नहीं देखा, रात नहीं देखी। वह दिन भर मशीनों पर काम करता और रात को ऑर्डर्स का हिसाब लगाता। उसने खुद के लिए कभी नए कपड़े नहीं खरीदे, लेकिन सुमित को शहर के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ाया। सुमित को ब्रांडेड जूते चाहिए होते, तो राघव अपनी पुरानी चप्पल सिलवा लेता।

सावित्री देवी ने अनजाने में ही सही, सुमित को यह अहसास दिला दिया था कि राघव तो है ही कमाने के लिए। “तुझे क्या चिंता बेटा, तेरा भाई है ना,” यह वाक्य सुमित के लिए एक कवच बन गया था और राघव के लिए एक जंजीर।

साल दर साल बीतते गए। वर्कशॉप एक छोटी फैक्ट्री में बदल गई। राघव ने मेधा से शादी की, जो एक समझदार और सुलझी हुई लड़की थी। मेधा ने आते ही घर संभाल लिया, ताकि राघव पूरा ध्यान काम पर दे सके। फिर सुमित बड़ा हुआ, उसने एमबीए किया और ‘आधुनिक विचारों’ के साथ घर लौटा। उसकी शादी हुई ‘रिया’ से, जो आते ही इस बात से परेशान रहने लगी कि घर का सारा कंट्रोल राघव और मेधा के हाथ में क्यों है।

रिया ने सुमित के कान भरने शुरू किए। “तुम्हारे भैया ने तुम्हें बस एक एम्प्लॉई बनाकर रखा है। असली मालिक तो वो खुद बने बैठे हैं। एमबीए तुमने किया है, और फैक्ट्री वो चला रहे हैं?”

यहीं से वो चिंगारी भड़की थी, जिसने आज दावानल का रूप ले लिया था।

वापस वर्तमान में, राघव अपने कमरे में गया। उसने एक पुराना बैग निकाला।

मेधा ने सिसकते हुए पूछा, “हम सच में जा रहे हैं राघव? अपना बनाया सब कुछ छोड़कर?”

राघव ने मेधा के आंसू पोंछे। “मेधा, मकान ईंटों से बनता है, उसे छोड़ा जा सकता है। घर विश्वास से बनता है, वो तो माँ ने आज तोड़ ही दिया। जब माँ को ही लगता है कि मैं उनके लाडले का दुश्मन हूँ, तो मेरा यहाँ रहना हर रोज़ एक नए युद्ध को जन्म देगा। मैं सुमित से लड़ सकता हूँ, दुनिया से लड़ सकता हूँ, पर अपनी माँ से नहीं लड़ सकता।”

राघव ने अपनी अलमारी से फैक्ट्री की चाबियां, बैंक के कागज़ात और चेकबुक निकाली। वह बाहर आया और उन्हें टेबल पर रख दिया।

“ये लो सुमित,” राघव की आवाज़ अब शांत थी, जैसे तूफ़ान के बाद का सन्नाटा। “ये फैक्ट्री की चाबियां हैं। अभी आर्डर बुक फुल है। अगले महीने की पेमेंट 10 तारीख को देनी है। लेबर का हिसाब हर हफ़्ते होता है। सब कुछ फ़ाइल में लिखा है।”

सुमित ने झपटकर चाबियां उठा लीं, जैसे उसे डर हो कि राघव अपना इरादा न बदल दे। रिया के चेहरे पर विजयी मुस्कान थी।

राघव सावित्री देवी के पास गया और उनके पैर छुए। सावित्री देवी ने मुंह फेर लिया।

“खुश रहिये माँ,” राघव ने कहा। “बस एक बात याद रखिएगा। नींव दिखाई नहीं देती, इसलिए लोगों को लगता है कि उसका कोई महत्व नहीं है। आज आपने इस घर की नींव उखाड़ दी है। दुआ करूँगा कि आपकी ये इमारत बिना नींव के खड़ी रह सके।”

राघव और मेधा ने अपने कुछ कपड़े लिए और उस घर से निकल गए जिसे राघव ने अपने खून से सींचा था। पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत न राघव में थी, न मेधा में।

शुरुआती कुछ महीने सुमित और रिया के लिए जश्न जैसे थे। फैक्ट्री सुमित के हाथ में थी। उसने आते ही ‘पुराने ढर्रे’ को बदलने की ठानी। उसने पुराने वफ़ादार कर्मचारियों को निकाल दिया क्योंकि वे “राघव भैया” की रट लगाते थे, और उनकी जगह कम पैसे में नए, अनुभवहीन लड़के रख लिए। उसने वो मशीनें बेच दीं जिन्हें राघव ने बहुत जतन से लगाया था, ताकि वह कैश खड़ा कर सके और अपना तथाकथित ‘स्टार्टअप’ शुरू कर सके।

सावित्री देवी को लगता था कि अब उनका लाडला राजा बेटा है। सुमित उन्हें महंगे तोहफ़े देता, रिया उन्हें घुमाने ले जाती। वे खुश थीं कि राघव के ‘दबाव’ से मुक्ति मिली।

लेकिन, जीवन का गणित भावनाओं से नहीं, कर्मों से चलता है।

छह महीने बीतते-बीतते फैक्ट्री का उत्पादन गिरने लगा। पुराने क्लाइंट्स ने माल वापस भेजना शुरू कर दिया क्योंकि क्वालिटी ख़राब थी। सुमित का स्टार्टअप सिर्फ़ कागज़ों पर था, हकीकत में वह फैक्ट्री का पैसा अपनी अय्याशी और रिया की डिमांड्स पूरी करने में उड़ा रहा था। जिन लेनदारों को राघव समय पर पैसा देता था, वे अब घर के चक्कर काटने लगे थे।

एक दिन, घर में बिजली कट गई। बिल नहीं भरा गया था।

“सुमित! ये क्या है?” सावित्री देवी ने पसीने में लथपथ होकर चिल्लाया।

“माँ, चिल्लाओ मत। थोड़ा कैश फ्लो का इश्यू है। दे दूंगा कल,” सुमित ने झल्लाहट में जवाब दिया और घर से निकल गया।

धीरे-धीरे घर का माहौल नर्क बनने लगा। रिया और सुमित के बीच झगड़े शुरू हो गए। रिया को अब सावित्री देवी बोझ लगने लगी थीं।

“तुम्हारी माँ को बोलो खुद पानी ले लें, मैं नौकरानी नहीं हूँ,” रिया ने एक दिन सुमित से चीखकर कहा, और सावित्री देवी ने यह सुन लिया।

उन्हें मेधा की याद आई। मेधा, जो बिना कहे उनके लिए गर्म पानी और दवाइयाँ लेकर खड़ी रहती थी।

फिर वो दिन आया जब बैंक का नोटिस घर पहुँचा। फैक्ट्री और घर, दोनों गिरवी थे। सुमित ने बिज़नेस बढ़ाने के नाम पर भारी लोन लिया था और किस्तें नहीं चुकाई थीं।

सावित्री देवी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “सुमित, तूने तो कहा था सब ठीक चल रहा है? ये नीलामी का नोटिस क्या है?”

सुमित ने सिर पकड़ लिया। “माँ, वो राघव… भाई ने सब पुराने सिस्टम से चलाया था। मुझे समझ नहीं आया। मार्किट डाउन हो गया। मैं क्या करता?”

“राघव…” सावित्री देवी के मुंह से यह नाम एक आह की तरह निकला।

उस रात सावित्री देवी को दिल का दौरा पड़ा। अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए सुमित के पास क्रेडिट कार्ड तो थे, पर सब ‘लिमिट एक्सीडेड’ (limit exceeded) बता रहे थे। रिया ने अपने गहने देने से साफ़ मना कर दिया।

अस्पताल के कॉरिडोर में खड़ा सुमित रो रहा था। उसे अपनी औकात समझ आ गई थी। उसने कांपते हाथों से राघव को फ़ोन लगाया। उसे उम्मीद नहीं थी कि राघव फ़ोन उठाएगा।

“हेलो?” उधर से राघव की शांत आवाज़ आई।

“भैया… भैया माँ…” सुमित सुबक पड़ा। “माँ अस्पताल में है। हार्ट अटैक… मेरे पास पैसे नहीं हैं भैया। सब ख़त्म हो गया।”

फ़ोन कट गया। सुमित को लगा राघव ने ठुकरा दिया।

लेकिन आधे घंटे बाद, राघव अस्पताल में था। उसने काउंटर पर पैसे जमा कराए, डॉक्टर्स से बात की और सीधे आईसीयू की तरफ भागा। मेधा भी उसके साथ थी।

दो दिन बाद सावित्री देवी को होश आया। उन्होंने आँखें खोलीं तो देखा राघव उनके पैरों के पास स्टूल पर बैठा झपकी ले रहा था। उसके चेहरे पर थकान थी, बाल थोड़े सफ़ेद हो गए थे, लेकिन वो वही राघव था—ज़िम्मेदार, मज़बूत।

सावित्री देवी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कांपते हाथ से राघव का सिर छूना चाहा।

राघव की आँख खुल गई। “माँ? आप ठीक हैं?”

सावित्री देवी ने हाथ जोड़ लिए। “मुझे माफ़ कर दे मेरे बच्चे। मैंने हीरे को पत्थर समझा और कोयले को कलेजे से लगाया। मैंने तेरे त्याग को तेरा फ़र्ज़ समझ लिया और सुमित के स्वार्थ को उसका हक़। मैंने तेरा घर छीन लिया…”

राघव ने माँ के हाथ थाम लिए। “माँ, घर दीवारों से नहीं, बड़ों के आशीर्वाद से बचता है। आपने घर नहीं छीना, बस मुझे यह सिखा दिया कि कभी-कभी दूर रहना ही पास रहने का सबसे अच्छा तरीका होता है।”

“तू वापस आ जा राघव। यह सब तेरा है। सुमित से नहीं संभलेगा,” सावित्री देवी गिड़गिड़ाईं।

राघव मुस्कुराया, लेकिन उस मुस्कान में अब वापसी की गुंजाइश नहीं थी।

“नहीं माँ। वो धागा जो एक बार टूट कर जुड़ता है, उसमें गांठ पड़ जाती है। मैंने और मेधा ने शहर के दूसरे छोर पर एक छोटी सी दुनिया बसा ली है। मैंने फिर से ज़ीरो से शुरू किया है, एक छोटी वर्कशॉप डाली है। सुकून है वहां।”

सुमित भी कमरे में खड़ा सिर झुकाए रो रहा था। “भैया, मुझे माफ़ कर दो। फैक्ट्री नीलाम हो रही है। मैं बर्बाद हो गया।”

राघव खड़ा हुआ। उसने सुमित के कंधे पर हाथ रखा।

“फैक्ट्री नीलाम नहीं होगी सुमित। मैंने बैंक से बात कर ली है। अपनी नई वर्कशॉप और तुम्हारी फैक्ट्री का मर्जर (विलय) कर रहा हूँ। कर्ज़ मैं चुका दूंगा। लेकिन…”

राघव की आवाज़ सख्त हो गई।

“…लेकिन अब मालिक मैं हूँगा। तुम सिर्फ़ वहां नौकरी करोगे। तुम्हें सैलरी मिलेगी। अगर मंज़ूर है, तो कल से काम पर आ जाना। और अगर तुम्हें अभी भी ‘हिस्सा’ चाहिए, तो आज ही यह शहर छोड़कर चले जाओ।”

सुमित ने राघव के पैर पकड़ लिए। उसका अहंकार आंसुओं में बह चुका था।

सावित्री देवी ने देखा कि उनका बड़ा बेटा आज फिर से उस परिवार को बचाने के लिए खड़ा था जिसने उसे धक्के मारकर निकाला था। लेकिन आज राघव की आँखों में वो पुराना वाला भावुक बेटा नहीं था, आज वहां एक व्यावहारिक पुरुष था जिसने अपनी कीमत पहचान ली थी।

राघव ने मेधा की ओर देखा। “चलो मेधा, माँ अब खतरे से बाहर हैं।”

“तू जा रहा है?” सावित्री देवी ने पूछा। “घर नहीं आएगा?”

“आऊंगा माँ, मिलने आऊंगा। पर रहने नहीं,” राघव ने दरवाज़े पर रुककर कहा। “क्योंकि मुझे समझ आ गया है कि इज़्ज़त मांगने से नहीं मिलती, और जहाँ इज़्ज़त न हो, वहां रहना खुदकुशी के बराबर है। मैं आपका बेटा हूँ, आपका सेवक रहूँगा, पर अब अपनी शर्तों पर।”

राघव और मेधा चले गए। सावित्री देवी और सुमित खामोश रह गए। उन्हें समझ आ गया था कि उन्होंने क्या खोया है। उन्होंने एक ऐसा साया खो दिया था जो धूप में खुद जलकर उन्हें छांव देता था। अब छत तो बच गई थी, लेकिन वो सुकून और वो विश्वास… वो हमेशा के लिए उस दरवाज़े से बाहर जा चुका था।

मूल लेखिका : डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

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