“चटाक!” जोर से एक थप्पड़ नेहल ने अपने 3 वर्षीय पुत्र को लगा दिया।
“तुमको कितनी बार समझाना पड़ेगा कि सी का मुँह राइट तरफ होता है और डी का लेफ्ट तरफ फिर भी हर बार गलती करते हो। हर बार सी को लेफ्ट की तरफ और डी को राइट तरफ करते हो!”
नेहल अपनी गुस्से से लाल आँखों से अपने बेटे प्रियंक को घूर रही थी और नन्हा सा प्रियंक भयभीत हो कर अपनी मासूम आँखों से अपनी माँ को देख रहा था। उसका गोरा गाल नेहल के थप्पड़ से लाल हो गया था।
उसकी आँखों में आँसू आ गए और वो धीरे धीरे सुबकने लगा। वो छोटा सा बच्चा अपनी माँ की पिटाई का विरोध भी नहीं कर पाया क्योंकि उसे अभी बराबर बोलना ही नहीं आता था। उसे ये भी समझ नहीं आ रहा था कि ये सी और डी का क्या झोल है? अगर उल्टा भी लिख दिया तो क्या बिगड़ गया क्योंकि उसके नन्हे से मस्तिष्क में अभी पढ़ाई क्या है,,यही समझ नहीं आया था।
“चुप, बिल्कुल चुप!! आँखों से एक आँसू नहीं निकलना चाहिए और मुँह से रोने की आवाज नहीं आनी चाहिए।” नेहल इतनी गुस्से में थी कि अपने बच्चे की मासूमियत और उसकी छोटी सी उम्र भी नजर नहीं आ रही थी।
प्रियंक नेहल के डांटने के बावजूद धीरे धीरे सुबकता रहा।
“एक बार बोला समझ नहीं आता क्या कि रोना बंद करो, एकदम बंद!” नेहल जोर से चिल्लाई।
“म.. म..मम्मी! एकदम से रोना बंद ..बंद नहीं होता!” प्रियंक धीरे धीरे सुबकते हुए बोला।
तब नेहल ने अपने नन्हे से बेटे को देखा, उसका लाल गाल, और धीरे धीरे हिचकी खाते हुए रोते हुए देखा।
उसने उठ कर अपने बेटे को गले लगा लिया और छोटा सा बच्चा अपनी माँ की डांट और मार भूल कर माँ के गले लग गया।
नेहल को आज ही प्रियंक की डायरी में उसकी मेम का नोट मिला था कि प्रियंक हमेशा सी और डी को उल्टा लिखता है। नेहल ने कई बार अपने बेटे को सिखाया लेकिन नन्हा बच्चा हर बार गलती कर देता था। आज उसकी मेम का नोट देख कर नेहल के गुस्से का पार ना रहा और अपने बेटे को मार दिया।
नेहल अपने बेटे को हमेशा उसकी कक्षा में प्रथम स्थान पर देखना चाहती है और इसीलिये उसकी पढ़ाई को ले कर नर्सरी कक्षा से ही बहुत सख्त थी।
“तुमसे कहा ना स्कूल से आ कर पहले अपना होमवर्क करो फिर बाहर खेलने जाओ!”
“मम्मी मेरे सारे दोस्त बाहर गार्डन में खेल रहे है। मैं आ कर होमवर्क कर लूंगा ना!”
“नहीं! पहले होमवर्क कंप्लीट करो।” नेहल उसे ले कर होमवर्क कराने बैठ गई। नेहल खुद ही प्रियंक को पढ़ाती थी।
होमवर्क करने के बाद नन्हा प्रियंक बाहर खेलने गया तब तक उसके सारे दोस्त घर चले गए थे। वो उदास सा घर आया और अपने खिलौनों के साथ खेलने लगा। उसका मन खिलौने खेलने में भी नहीं लगा और खेलते हुए वहीं जमीन पर सो गया।
नेहल को अपने बेटे की उदासी नजर नहीं आई क्योंकि उसकी नजर में उसका होमवर्क जरूरी थी। अगर प्रियंक ने होमवर्क कंप्लीट नहीं किया तो क्लास में पिछड़ जाएगा और नेहल तो उसे प्रथम स्थान पर देखना चाहती है।
प्रियंक पांचवीं कक्षा में आ गया था। वो एग्जाम के समय ही बीमार हो गया। उसने बुखार में एग्जाम्स दी।
नेहल ने उसका रिजल्ट देखा तो फिर बरस पड़ी।
“ये तुमने मैथ्स में जहां एडिशन करना था, वहां सब्सट्रक्शन कर दिया है और जहां मल्टीप्लाय करना था वहां डिविजन कर दिया है। तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है क्या जो छोटी छोटी मिस्टेक कर आते हो!”
प्रियंक उदास हो कर अपनी नानी जो उनके घर आई हुई थी से बोला,
“नानी मुझे एग्जाम के दिनों में बहुत तेज़ बुखार था। मेरा सर बहुत दुखता था इसलिए मुझसे गलतियां हो गई!”
“नेहल, प्रियंक अभी छोटा है। तू अभी से उसके ऊपर पढ़ाई का इतना दबाव क्यों डालती है। बच्चा है वो, अभी से कौनसा कलेक्टर बन जाने वाला है?” नानी ने नेहल को समझाने की कोशिश की।
“मम्मी आप रहने दो। बच्चे की नींव मजबूत होगी तो ही वो आगे जा कर पढ़ाई को सीरियसली लेगा और कुछ बन पाएगा।” उसकी नानी ने प्रियंक के पापा की तरफ देखा।
“मैं हमेशा नेहल को यही बात समझाता हूँ कि अपनी आंकाक्षा के पीछे वो प्रियंक का बचपन बर्बाद कर रही है। ये उसके खेलने कूदने के दिन है। उसका बचपन वापस नहीं आने वाला है। आगे बड़ी क्लास में जो पढ़ेगा वो ही उसके काम आएगा, अभी का पढ़ा कुछ काम नहीं आएगा। अभी उसे सिर्फ प्रारंभिक शिक्षा देना है। लेकिन ये उसका बचपन गया तो वापस नहीं आएगा और उसके पास बचपन की कोई याद नहीं रहेगी सिवाय होमवर्क और पढ़ाई के लिए डांट और मार के सिवाय!” प्रियंक के पापा ने एक बार फिर नेहल को समझाया लेकिन नेहल मुँह बिचका कर चली गई। उसे अपनी जिद की मेरा बच्चा हमेशा प्रथम आना चाहिए, उसके सिवाय कुछ नजर नहीं आता था।
प्रियंक आठवीं कक्षा में आ गया। उसके इतिहास के नंबर सुनाए गए। उसके 100 में से 87 नंबर आए जो क्लास में सबसे ज्यादा थे। बाकी सारे बच्चों के उससे कम नंबर थे फिर भी सारे बच्चे खुश थे और चहक रहे थे। लेकिन अकेला प्रियंक उदास था।
उसने घर आ कर नेहल को अपने नंबर बताए तो नेहल नंबर सुन कर उस पर बरस पड़ी,
“इतने कम नंबर कैसे आए। तुमको दिन रात पढ़ाती हूँ फिर भी मेरी मेहनत पर पानी फेर देते हो!”
“मम्मी आपको पता सब बच्चो के मेरे से कम नंबर आए थे फिर भी वो अपने नंबर से खुश थे और मस्ती कर रहे थे लेकिन मैं अकेला टेंशन में था क्योंकि मुझे पता था कि मेरे नंबर सबसे ज्यादा है फिर भी कम नंबर देख कर आप मुझे डांट लगाओगे!” आज पहली बार प्रियंक उदास हो कर बोला। क्योंकि अब प्रियंक बड़ा हो गया था और अपनी बात रख सकता था।
उसकी इस बात से नेहल के दिमाग में कुछ कौंध गया।
“सब बच्चे खुश थे, मस्ती कर रहे थे, और मेरा बच्चा अकेला क्लास में उदास था, सिर्फ मेरे डर से…!” आज पहली बार नेहल को अपने बच्चे को हमेशा पढ़ाई के लिए डांटने पर दुख हुआ। उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उस दिन के बाद उसने प्रियंक को पढ़ाई के लिए डांटना छोड़ दिया। उसके मन में एक अपराधबोध आ गया, कि मैंने कभी अपने बच्चे का बचपन नहीं देखा और उसे पढ़ाई के लिए डांटती मारती रही।
अब प्रियंक बड़ी क्लास में आ गया तो खुद ही पढ़ लेता था। लेकिन वो बहुत होशियार बच्चा था। हमेशा अच्छे अंक लाता था। दसवीं बॉर्ड में उसने टॉप किया। बारहवीं बॉर्ड में भी स्कूल टॉप किया।
उसने इंजिनियरिंग किया और उसका गूगल में प्लेसमेंट हो गया।
वो बड़े होने पर बचपन में पढ़ाई के लिए अपनी माँ की डांट और पिटाई भूल गया था लेकिन नेहल जब भी अपने बेटे की सफलता देखती है तो उसकी आँखों में आँसू आ जाते है।
“मेरा बच्चा इतने बड़े बड़े प्रोजेक्ट बनाता है। पूरी दुनिया जिस सॉफ्टवेयर पर चलती है उस सॉफ्टवेयर को चलाता है और उसे मैंने बचपन में सी और डी के लिए कितना मारा!!! वो सी और डी तो बिना मारे भी उसे थोड़ा बड़े होने पर समझ आ ही जाते। जिस मैथ्स के एडिशन और सब्सट्रक्शन के लिए डांटा जबकि वो बीमार था, वो एडिशन और सब्सट्रक्शन इसके सॉफ्टवेयर के आगे कुछ नहीं है। जिस इतिहास के नंबर के लिए इसे डांटा वो इतिहास अब इसे क्या काम आता है!” सोचते हुए कई बार वो रो देती है।
प्रियंक का बचपन का मासूम रोते हुए चेहरा उसकी आँखों के आगे आ जाता है और वो रोने लग जाती है।
“मैने अपने बेटे को बचपन में जितना प्यार दुलार देना चाहिए था उतना नहीं दिया सिर्फ काउंटिंग और एबीसीडी के पीछे..!!” वो कई बार इस अपराधबोध से भर जाती है।
तभी उसे आवाज आई, “चटाक!”
उसने देखा उसकी बहू अपने बेटे यानि उसके पोते को मार रही है,
“तुमको कितनी बार समझाया है कि पी का मुँह राइट में होता है और क्यू का लेफ्ट में…फिर भी हमेशा उल्टा लिखते हो!”
नेहल ने दौड़ कर अपने पोते को गोद में उठा लिया।
“नहीं बहू!! पी और क्यू उल्टे हो गए तो दुनिया उल्टी नहीं हो जाएगी। आगे जा कर ये इससे भी बड़े बड़े लेक्चर पढ़ेगा। ये पी और क्यू तो बहुत बेसिक चीज है जो इसे आ ही जाएगी। लेकिन इस पढ़ाई के लिए इसका बचपन मत खत्म करो। वरना मेरी तरह तुमको भी इसका बचपन खत्म करने का अपराधबोध जिंदगी भर सालता रहेगा।”
बहू थोड़ा कुछ समझ पाई, थोड़ा कुछ नहीं समझ पाई लेकिन नेहल की आँखों में आए आँसुओ ने उसे सब समझा दिया।
#अपराधबोध
रेखा जैन
अहमदाबाद, गुजरात