“सुनो विकास, रिटायरमेंट के बाद अब प्रोविडेंट फंड का जो पैसा आया है, उसे मैंने फिक्स्ड डिपॉजिट में डाल दिया है। ब्याज से और मेरी पेंशन से घर का राशन और बिजली का बिल तो निकल जाएगा, लेकिन अब ऊपर के खर्चे, जैसे—गाड़ी की सर्विसिंग, इंटरनेट का बिल, और कभी-कभार की दवा-दारू… मैं चाहता हूँ कि अब तुम और नेहा संभाल लो।”
हरीशंकर जी ने शाम की चाय की चुस्की लेते हुए बड़े ही संकोच के साथ अपने बेटे विकास के सामने यह प्रस्ताव रखा।
विकास ने अपने लैपटॉप से नज़र हटाई और माथे पर शिकन लाते हुए बोला, “पापा, आप भी न! अभी तो आप रिटायर हुए हैं और अभी से हिसाब-किताब लेकर बैठ गए। मेरी सैलरी तो आपको पता ही है, उसमें से होम लोन की ईएमआई जाती है, फिर गाड़ी की ईएमआई, और नेहा को भी अपनी पर्सनल शॉपिंग के लिए चाहिए होता है। हम तो सोच रहे थे कि आपकी पीएफ के पैसों से हम घर का रिनोवेशन करवा लेते। यह पुराना फर्श अब अच्छा नहीं लगता।”
रसोई से पकोड़े लाती हुई निर्मला देवी के कदम यह सुनकर ठिठक गए। उन्होंने पति की ओर देखा। हरीशंकर जी का चेहरा बुझ सा गया था।
“बेटा, रिनोवेशन ज़रूरी नहीं है, घर चलाना ज़रूरी है। और पीएफ का पैसा मेरे बुढ़ापे की लाठी है, उसे मैं दीवारों पर नहीं लगा सकता,” हरीशंकर जी ने समझाने की कोशिश की।
नेहा, जो सोफे पर बैठकर अपने फोन में व्यस्त थी, बीच में बोल पड़ी, “पापा जी, आप लोग तो वैसे भी घर पर ही रहते हैं। खर्चा ही क्या है आप लोगों का? दो टाइम का खाना और टीवी। हम लोग बाहर निकलते हैं, हमें स्टेटस मेंटेन करना पड़ता है। हमारे दोस्तों के घर देखिए, कितने मॉडर्न हैं। और आप हैं कि पेंशन के पैसों को भी तिजोरी में दबाकर रखना चाहते हैं।”
विकास ने बात को वहीं खत्म करते हुए कहा, “खैर छोड़िए पापा, देखेंगे जब ज़रूरत होगी। अभी तो आप मैनेज करिए। और हाँ, अगले महीने हम नैनीताल घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो थोड़ा हाथ तंग ही रहेगा।”
हरीशंकर जी चुप हो गए। निर्मला देवी ने चुपचाप पकोड़े मेज़ पर रख दिए। उस शाम घर में एक अजीब सी खामोशी पसर गई।
हरीशंकर जी और निर्मला देवी ने अपनी पूरी जवानी विकास को पढ़ाने-लिखाने और उसे काबिल बनाने में खपा दी थी। हरीशंकर जी ने अपनी सरकारी नौकरी में कभी रिश्वत नहीं ली, हमेशा सादगी से रहे ताकि बेटे को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ा सकें। निर्मला देवी ने कभी अच्छी साड़ी की ज़िद नहीं की ताकि बेटे की ट्यूशन फीस भरी जा सके। और आज, जब वे जीवन की सांध्य बेला में थे, उन्हें अपने ही घर में एक बोझ की तरह महसूस कराया जा रहा था।
अगले कुछ हफ्तों में हालात और बदतर होते गए।
रिटायरमेंट के बाद हरीशंकर जी का ज़्यादातर वक्त घर पर ही बीतता था। उन्होंने महसूस किया कि घर का माहौल वह नहीं था जैसा वे सोचते थे। सुबह नौ बजे विकास और नेहा ऑफिस चले जाते। जाने से पहले नेहा अक्सर फरमान सुना जाती— “मम्मी जी, आज शाम को मेरे कुछ कलीग्स आ रहे हैं, तो खाने में शाही पनीर और नान बना लीजिएगा। बाहर का खाना अनहाइजीनिक होता है।”
निर्माला देवी, जिनके घुटनों में गठिया का दर्द रहता था, दिन भर रसोई में खटती रहतीं। हरीशंकर जी कभी सब्जी काट देते, कभी बर्तन पोंछ देते। उन्हें लगता था कि वे अपने ही घर में नौकर बन गए हैं।
एक दिन बिजली का बिल आया—आठ हज़ार रुपये। विकास ने बिल टेबल पर पटकते हुए कहा, “पापा, यह क्या है? आठ हज़ार का बिल? आप लोग दिन भर एसी चलाते हैं क्या? हम तो ऑफिस में रहते हैं, बिजली तो आप ही लोग इस्तेमाल करते हैं। प्लीज, थोड़ा ध्यान रखिए। मेरी सैलरी का बड़ा हिस्सा तो बिल भरने में ही चला जा रहा है।”
हरीशंकर जी ने बिल उठाया। “बेटा, हम तो सिर्फ पंखा चलाते हैं। एसी तो तुम्हारे और नेहा के कमरे में ही चलता है, और वो भी रात भर। गीज़र भी तुम लोग ही घंटों चलाते हो।”
“ओहो पापा! अब आप गिनवाएंगे?” नेहा ने तल्खी से कहा। “हम दिन भर मेहनत करके आते हैं, क्या हमें चैन से सोने का भी हक़ नहीं है? आप लोग तो घर पर आराम ही करते हैं।”
उस रात हरीशंकर जी को नींद नहीं आई। वे देर तक छत पर टहलते रहे। निर्मला देवी उनके पास आईं।
“क्या सोच रहे हैं?”
“निर्मला, हमने शायद परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ी, लेकिन शायद हम उन्हें ज़िम्मेदारी का एहसास कराना भूल गए। हम सोचते थे कि वो हमारा बुढ़ापा संवारेंगे, लेकिन वो तो हमारी बची-खुची ज़िंदगी भी निचोड़ लेना चाहते हैं। आज बिजली का बिल अखर रहा है, कल हमारी दवाइयां अखरेंगी।”
निर्माला देवी ने डबडबाई आँखों से कहा, “तो क्या करें? अपना ही खून है। लड़ तो नहीं सकते।”
हरीशंकर जी ने एक गहरी साँस ली। उनकी आँखों में अब बेचारगी नहीं, बल्कि एक दृढ़ निश्चय था। “नहीं निर्मला, लड़ना नहीं है। बस उन्हें आईना दिखाना है। और सबसे बड़ी बात, हमें अपना आत्मसम्मान वापस पाना है।”
अगले दिन सुबह, नाश्ते की मेज़ पर हरीशंकर जी ने एक फाइल रखी। विकास और नेहा तैयार होकर नाश्ता कर रहे थे।
“विकास, नेहा, दो मिनट रुकना। कुछ ज़रूरी बात करनी है,” हरीशंकर जी ने शांत स्वर में कहा।
“जल्दी बोलिए पापा, हमें देर हो रही है,” विकास ने घड़ी देखते हुए कहा।
हरीशंकर जी ने फाइल खोली। उसमें घर के खर्चों का पूरा ब्यौरा था।
“देखो बच्चों,” हरीशंकर जी ने शुरू किया, “कल रात मैंने और तुम्हारी माँ ने बहुत सोचा। तुम लोगों की बातें सही हैं। महँगाई बहुत बढ़ गई है और तुम लोगों की अपनी ज़रूरतें और सपने हैं। हमारे वजह से तुम्हारे ‘स्टेटस’ और ‘लाइफस्टाइल’ में कमी आए, यह हम नहीं चाहते।”
विकास और नेहा ने एक-दूसरे को देखा, शायद वे खुश थे कि पापा मान गए।
“इसलिए,” हरीशंकर जी ने आगे कहा, “हमने एक फैसला लिया है। यह घर, जो मेरे नाम पर है, बहुत बड़ा है। तीन बेडरूम, बड़ा हॉल… इसकी साफ-सफाई और मेंटेनेंस का खर्चा बहुत है। और बिजली का बिल भी ज़्यादा आता है। हम दो बूढ़े लोगों को इतनी जगह की क्या ज़रूरत?”
“तो?” नेहा ने उत्सुकता से पूछा।
“तो हमने तय किया है कि हम यह घर किराये पर दे देंगे,” हरीशंकर जी ने बम फोड़ा। “इस इलाके में ऐसे फर्निश्ड घर का किराया कम से कम चालीस हज़ार रुपये महीना है। उस किराये से हमारी दवा, राशन और बाकी खर्चे आराम से निकल जाएंगे।”
विकास के हाथ से टोस्ट छूट गया। “किराये पर? लेकिन पापा, हम कहाँ रहेंगे?”
हरीशंकर जी ने इत्मीनान से चश्मा ठीक किया। “तुम लोग? अरे बेटा, तुम लोग तो इंडिपेंडेंट हो, अच्छी नौकरी करते हो। तुम लोग तो कब से कह रहे थे कि तुम्हें अपनी ‘स्पेस’ चाहिए, पुराने ख्यालातों वाले माँ-बाप के साथ एडजस्ट करना मुश्किल हो रहा है। तुम लोग अपना अलग फ्लैट ले लो। या फिर…”
हरीशंकर जी रुके और उन्होंने एक कागज़ निकाला।
“या फिर, अगर तुम्हें इसी घर में रहना है, तो हम इस घर को दो हिस्सों में बाँट देते हैं। हम अपने लिए पीछे वाला छोटा कमरा और रसोई रख लेंगे। बाकी का पूरा घर—दो बेडरूम, हॉल, और मेन किचन—तुम लोग किराये पर ले लो।”
“किराये पर?” नेहा चिल्लाई। “पापा, आप अपने ही बेटे-बहू से किराया मांगेंगे? दुनिया क्या कहेगी?”
“दुनिया की छोड़ो बहू,” निर्मला देवी पहली बार बोलीं, और उनकी आवाज़ में गज़ब की सख्ती थी। “दुनिया तो तब भी बातें बनाएगी जब तुम लोग हमें बोझ समझकर ताने देते हो। और रही बात किराये की, तो इसे ‘किराया’ मत समझो। इसे ‘कंट्रीब्यूशन’ समझो। देखो, मार्केट रेट चालीस हज़ार है। तुम लोग तीस हज़ार दे देना। इसमें बिजली का बिल तुम लोग खुद भरोगे। खाना तुम लोग अपना अलग बनाओगे, क्योंकि मेरे घुटनों में अब इतनी ताकत नहीं कि पार्टी का खाना बना सकूं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। विकास को विश्वास नहीं हो रहा था कि यह वही पिता हैं जो कल तक बिजली के बिल पर डांट सुन रहे थे।
“पापा, यह इमोशनल ब्लैकमेल है,” विकास ने गुस्से में कहा।
“नहीं बेटा, यह ‘प्रैक्टिकल सॉल्यूशन’ है,” हरीशंकर जी ने मुस्कुराते हुए कहा। “तुमने ही तो कहा था कि हिसाब-किताब ज़रूरी है। तो यह रहा हिसाब। मेरी पेंशन और पीएफ का ब्याज मेरे और निर्मला के लिए है। यह घर मेरी संपत्ति (Asset) है। अब तक यह ‘लायबिलिटी’ बना हुआ था, अब मैं इसे ‘एसेट’ की तरह इस्तेमाल करूँगा। अगर तुम तीस हज़ार नहीं दे सकते, तो कोई बात नहीं। शर्मा जी का बेटा बैंक मैनेजर है, वो पैंतीस हज़ार देने को तैयार है। मैंने उससे बात कर ली है। तुम लोग अगले महीने की पहली तारीख तक फैसला कर लो, या तो शिफ्ट हो जाओ या रेंट एग्रीमेंट साइन कर लो।”
विकास और नेहा सन्न रह गए। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनके सीधे-सादे माता-पिता ऐसा कदम उठाएंगे। वे गुस्से में ऑफिस चले गए।
पूरे दिन ऑफिस में विकास का मन नहीं लगा। उसने और नेहा ने मिलकर हिसाब लगाया। अगर वे बाहर फ्लैट लेते हैं, तो इस पॉश इलाके में कम से कम पच्चीस हज़ार किराया होगा। फिर नौकरानी, रसोइया (क्योंकि निर्मला जी अब खाना नहीं बनाएंगी), बिजली, पानी, इंटरनेट… कुल मिलाकर खर्चा पचास हज़ार के पार जा रहा था। और सबसे बड़ी बात, घर का बना-बनाया खाना, धुले कपड़े, और सुरक्षित घर—यह सब सुविधाएँ खत्म।
शाम को जब वे घर लौटे, तो घर का नज़ारा बदला हुआ था।
रसोई में ताला लगा था। ड्राइंग रूम में निर्मला देवी और हरीशंकर जी आराम से चाय पी रहे थे और लूडो खेल रहे थे।
“मम्मी, चाय?” विकास ने आदत के अनुसार पूछा।
“बेटा, गैस का सिलेंडर खत्म होने वाला था, तो हमने सोचा हम इंडक्शन पर अपनी चाय बना लें। तुम लोग ऑनलाइन ऑर्डर कर लो या बाहर से पी लो,” निर्मला देवी ने बिना नज़र उठाए कहा।
भूख से बेहाल और थकान से चूर नेहा और विकास को उस दिन पहली बार आटे-दाल का भाव पता चला। उन्होंने ऑनलाइन खाना मंगवाया, जो महँगा भी था और बेस्वाद भी। कपड़े धोने की मशीन चलाने गए तो हरीशंकर जी ने याद दिलाया, “बिजली का बिल याद है न?”
दो दिन तक यह ‘कोल्ड वॉर’ चला। तीसरे दिन विकास और नेहा की अकड़ ढीली पड़ गई। उन्हें समझ आ गया कि वे जिसे ‘बोझ’ समझ रहे थे, दरअसल वही उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ‘सहूलियत’ (Luxury) थी। वे माता-पिता पर नहीं, बल्कि माता-पिता की दी हुई सुविधाओं पर पल रहे थे।
रविवार की सुबह, विकास और नेहा, हरीशंकर जी के पास आए। उनके हाथ में तीस हज़ार रुपये नहीं, बल्कि माफ़ीनामा था।
“पापा, मम्मी… हमें माफ़ कर दीजिये,” विकास ने सिर झुकाकर कहा। “हमने बैठकर हिसाब लगाया तो समझ आया कि हम कितने बड़े भ्रम में थे। आप लोग हमसे कुछ नहीं मांग रहे थे, बल्कि हमें ही पाल रहे थे। बाहर की दुनिया बहुत महँगी है, और अपनों का प्यार अनमोल है।”
नेहा भी रो पड़ी। “मम्मी जी, मुझे माफ़ कर दीजिये। मैंने आपको रसोइया समझा, जबकि आप अन्नपूर्णा थीं। हम किराया नहीं देंगे… हम ज़िम्मेदारी लेंगे। आज से घर का पूरा खर्चा—राशन, बिजली, दवा—सब हम उठाएंगे। आप अपनी पेंशन अपने शौक पर खर्च कीजिये।”
हरीशंकर जी ने निर्मला की ओर देखा और एक विजयी मुस्कान पास की। लेकिन वे पिघले नहीं। वे जानते थे कि आदतें इतनी जल्दी नहीं बदलतीं।
“भावुक मत हो बच्चों,” हरीशंकर जी ने गंभीर स्वर में कहा। “माफ़ी ठीक है, लेकिन नियम अब भी बदलेंगे। मैं किराया नहीं लूँगा, लेकिन घर का खर्च अब पूरी तरह तुम्हारे हाथ में होगा। मैं हर महीने अपनी पेंशन से सिर्फ अपने और तुम्हारी माँ के निजी खर्चे उठाऊँगा। और हाँ, निर्मला अब सिर्फ अपनी मर्जी का काम करेगी। अगर उसे खाना बनाने का मन है तो बनाएगी, नहीं तो तुम लोग अपना इंतज़ाम खुद करोगे या कुक रखोगे। मंजूर है?”
“मंजूर है पापा,” विकास और नेहा ने एक स्वर में कहा।
उस शाम घर का माहौल बदल गया। नेहा ने खुद रसोई में जाकर चाय बनाई। विकास ने पापा के पास बैठकर उनके रिटायरमेंट प्लान के बारे में पूछा।
हरीशंकर जी ने अपने पीएफ के पैसों से रिनोवेशन नहीं करवाया, बल्कि अपने और निर्मला के लिए ‘चार धाम यात्रा’ की बुकिंग करवाई।
जब वे यात्रा पर जाने के लिए घर से निकल रहे थे, तो विकास ने पापा के पैर छुए और कहा, “पापा, आपने सही कहा था। रिनोवेशन दीवारों का नहीं, सोच का होना ज़रूरी था।”
हरीशंकर जी ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा। “बेटा, माँ-बाप पेड़ की तरह होते हैं। वे छाया देते हैं, लेकिन अगर तुम उनकी जड़ों को ही काटोगे, तो धूप तुम्हें ही लगेगी। खुश रहो, और ज़िम्मेदारी निभाना सीखो।”
गाड़ी चल पड़ी। हरीशंकर जी और निर्मला देवी के चेहरे पर एक सुकून था—आत्मसम्मान का सुकून। उन्होंने अपने बच्चों को खोया नहीं था, बल्कि उन्हें एक बेहतर इंसान बना दिया था। और यह सब हुआ था उस एक साहसिक फैसले की वजह से, जिसने साबित कर दिया कि रिटायरमेंट का मतलब ‘रिटायर’ होना नहीं, बल्कि ज़िंदगी की नई शर्तों को ‘री-हायर’ (Re-hire) करना होता है।
लेखिका : गरिमा चौधरी
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