अरुण एक पढ़ा लिखा नौजवान था। अच्छी खासी नौकरी सरकारी विभाग में करता था ।परंतु इस नौकरी और पैसे ने उसको घमंड से पूरी तरह भर दिया था ।उसके विचार घमंड से पूर्व पूरी तरह भरे हुए थे। उसके माता-पिता उसे हमेशा साधारण व्यक्तित्व अपनाने को कहते थे।
परंतु वह अहंकार में इतना डूब चुका था कि उनकी बात को मजाक में डाल दिया करता था ।उसके माता-पिता ने एक बार उससे कहा कि अरुण अब तुम्हारी उम्र शादी की हो गई है। हम तुम्हारे लिए एक अच्छी सी लड़की देखकर तुम्हारा रिश्ता तय करने जा रहे हैं।
तुम यह बताओ कि तुम्हें कैसी लड़की चाहिए। इस पर अरुण अहंकार से परिपूर्ण शब्दावली में कहता है कि आप मेरे लिए ऐसी लड़की ढूंढीए जो जन्नत कि हूर हो । जिसे जो भी देखे बस देखता ही रह जाए। माता-पिता इस पर कहते कि बेटा लड़की को केवल उसके रूप रंग से ही पहचानना नहीं चाहिए बल्कि उसका मन कैसा है ?
इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए ।ताकि वह जीवन भर तुम्हारा साथ दे सके और परिवार को अच्छे से चला सके। इस पर अरुण उन्हें कहता कि वह आपका जमाना था ।आज हमारा जमाना है। अरुण की इन बातों को माता-पिता हल्के में लेते हैं और एक समय ऐसा आया ।जब अरुण के माता-पिता ने उसके लिए एक लड़की जो अच्छे खानदान से थी और संस्कारी थी ।
उसका चुनाव किया और अरुण को कहा कि वह इस लड़की से शादी करेगा। परंतु जब अरुण ने उस लड़की को देखा तो उसने अहंकार से जवाब दिया कि यह लड़की देखने में अच्छी नहीं है ।इसलिए वह इस लड़की से शादी नहीं करेगा ।इस पर उसके माता-पिता काफी दुखी हुए और लड़की वालों को मना करना पड़ा।
अभी माता-पिता अरुण के लिए और लड़की तलाश कर रही रहे थे कि अरुण ने एकाएक उन्हें कहा कि उसने एक ऐसी लड़की ढूंढी है जो शायद आप कभी नहीं ढूंढ सकते। वह देखने में इतनी खूबसूरत है ।मानो कोई परी ही हो। अरुण के माता-पिता ने इसका विरोध नहीं किया और यह कहा कि आपने जिंदगी काटनी है ।
अगर आपको वह लड़की पसंद है तो हम इसमें किसी प्रकार से मना नहीं कर सकते। अब अरुण की शादी उसी लड़की से करवा दी गई। जिसे अरुण बहुत पसंद कर रहा था ।अरुण की शादी हो गई और वह लड़की अरूण की पत्नी बनकर घर पर आ गई। देखने में वह लड़की बहुत ही सुंदर थी।
अरुण के माता-पिता ने यही उम्मीद की कि वह हमारे बेटे तथा हमारी सेवा करेगी और परिवार को भली भांति आगे बढ़ाएगी ।समय बीतता गया और अरुण के माता-पिता देख रहे थे कि अरुण की पत्नी हर समय अपने बनावट श्रृंगार में ही व्यस्त रहती है।
घर के कामों में उसका बिल्कुल भी मन नहीं लगता है। माता-पिता उनके लिए खाना बनाते। उनके कपड़े धोते और अन्य काम पूरे करते हैं। परंतु अरुण इस बात का कभी विरोध नहीं करता और हमेशा माता-पिता को ही आंखें दिखाता ।समय बीतता गया और अरुण के माता-पिता अब बूढ़े हो गए ।
अब उनसे अरुण के लिए खाना नहीं बनता था ।ना ही उसके कपड़े धो सकते थे। परंतु अरुण को जब छुट्टी होती तो अरुण अपने कपड़े स्वयं धोता और यहां तक की कई बार पत्नी के कपड़े भी धोता। परंतु पत्नी पर इसका कोई असर ना होता। वह अपने श्रृंगार में ही खुश रहती। माता-पिता कई बार भूखे ही रह जाते हैं।
परंतु अरुण की पत्नी अरुण के द्वारा बनाए गए खाने को खाकर आराम करती। एक समय ऐसा आया कि अरुण बहुत बीमार हो गया ।उसकी पत्नी उसकी देखभाल न करके अपने माता-पिता के घर चली जाती है और कहती है कि उसे यह सब नहीं होता ।
जब वह अरुण से कह जाती है कि जिस समय आप ठीक हो जाओगे तो मुझे बुला लेना। अरुण कुछ नहीं कहता और देखता है कि उसके माता-पिता बूढ़े होकर भी उसका पूर्ण रूप से ध्यान रख रहे हैं। अरुण की माता अरुण के पिता का पूरा ध्यान रखती और साथ-साथ में अरुण का भी ध्यान रखने की कोशिश करती।
एक समय ऐसा आ गया कि अरुण बिल्कुल ठीक-ठाक हो गया। परंतु अरुण के माता-पिता की मृत्यु हो गई और अरुण एकदम अकेला हो गया ।अरुण की पत्नी घर पर आ गई। अब हाल यह था कि अरुण में अपनी नौकरी पर जाना होता तो वह सारे घर के काम करके और पत्नी के लिए खाना वगैरा बनाकर जाता।
शाम को तक कर आता तो जैसा काम घर में छोड़कर गया था वैसा ही पड़ा होता। वह जलता कुंडता हुआ वह काम करता ।अगर वह पत्नी को कुछ बोलता तो वह सिर पर घर उठा लेती है और जोर-जोर से रोने लगती ।इस पर अरुण चुप हो जाता । अरुण की दशा बहुत खराब हो गई अरुण फिर से बीमार हो गया।
यह सब देखकर उसकी पत्नी ने अरुण से कहा कि वह यह सब नहीं कर सकती। उसे बीमार व्यक्ति की सेवा नहीं होती। अगर वह नौकरानी रख ले तो ठीक है नहीं तो वह यहां से चली जाएगी ।इस पर अरुण उसे जवाब देता है कि वह चली जाए ।अरुण की पत्नी अरुण को इस हालत में छोड़कर वहां से चली जाती है।
अरुण का शरीर काफी कमजोर हो गया था। वह पानी का गिलास तक स्वयं नहीं ले सकता था। उसे अपने माता-पिता की वह बात याद आ रही थी कि सुंदरता केवल शरीर ही में नहीं होती बल्कि मन भी सुंदर होना चाहिए अर्थात खूबसूरती शरीर में नहीं मन में होनी चाहिए ।
अरुण के पास आप पछतावे के अलावा कुछ नहीं था। क्योंकि अरुण अपने माता-पिता को खो चुका था। अब उसकी पत्नी भी उसे छोड़कर जा चुकी थी।
अरुण अकेला कमरे में बिस्तर पर लेटा हुआ था। विचार करते-करते अचानक उसकी सांस रुक गई और वह सदा सदा के लिए संसार से गुजर गया। आखिरकार माता-पिता कि वह बात सच हो गई कि खूबसूरती शरीर में नहीं बल्कि मन में होती है ।
धन्यवाद। लेखक: संजय सिंह।
#असली खूबसूरती शरीर नहीं मन होता है