मम्मी मैंने तो अब के बैकलेस गाउन ही लेना है, लहंगा-चोली तो मामा जी के घर वाली शादी में ही पहना था।
जब से मौसी जी के बेटे निखिल की सगाई की तारीख निर्धारित हुई है,ऐसा लगता है घर में शौपिंग का मौसम आ गया हो। फोन पर भी अगर बात होती थी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ खरीदारी की। प्रणव जब भी घर में आता तो मम्मी एक ही बात कहती, देख तू हर जगह वही सूट पहनता है
जो मीना की शादी में सिलवाया था, आफिस से आते हुए अपने लिए तू भी अच्छे कपड़े ले लेना । रिंग सेरेमनी भी वो लोग फाइव स्टार होटल में कर रहे हैं, खुद ही सोच ले।
अरे प्रणव, सुनियो बेटा !आफिस से आते हुए मुझे भी साथ ले लियो, रायल स्टोर पर रेडीमेड गारमेंट्स की भी सेल लगी हुई है , एक नया कोट तो मैं भी ले ही लेता हूं पापा बोले । और क्या ,”अच्छे कपड़े पहने हुए हो तो आत्म विश्वास अलग ही होता है” मम्मी ने बात आगे बढाई। हां भागवान! ,”तुम्हारा तो आत्म विश्वास बढ़ेगा ही “नया सैट जो लिया है,पर मेरी जेब से पूछो, । चलो ना पापा!देर हो रही है, प्रणव बोला ,और दोनों बाहर निकल गए।
मम्मी पैसे दे देना, ” मुझे भी मीरा के साथ कपड़े लेने जाना है “, मानसी ने कहा। मीरा ,मानसी के मामा की लड़की थी। अब इन दोनों लड़कियों की भी शादी की उम्र थी। दोनों की ही माएं नहीं चाहतीं थीं कि उनके बच्चे किसी से भी कमतर दिखें।
शादी वाले दिन
————– अब निकल भी घर से, कल तो पूरा दिन ही ब्यूटीशियन के लगाया था,और अबभी सुबह से ही तैयार हो रही है, “पता नहीं क्या कर रही है? पापा चिल्ला रहे थे।पापा, तैयार तो अभी तक मम्मी भी नहीं हुई है। मानसी बोली”बस पापा ऐसे ही मानसी को कुछ कुछ बोले जा रहे थे,।”प्रणव बोला। अरे भई ! हमारी फैमिली ही सबसे सुंदर लगेगी, पर पहले ,”समय पर तो पहुंच लो”। “चलो सब बाहर निकलो ” मुझे ताला लगाना है” पापा बोले। सारे रास्ते सब का ध्यान अपने कपडों पर ही था, कहीं सिलवटें ना पढ़ जाएं।
आधे घंटे में ही सब होटल में पहुंच गए।पूरा हाल खचाखच भरा था। वहां की सजावट भी विलक्षण ही थी। मौसी से औपचारिक मुलाकात के बाद मानसी तो मीरा और बाकि बहनों के साथ व्यस्त हो गई , पापा और मम्मी भी सबसे औपचारिक मुलाकातें करने में लगे थे। जिन के भी बच्चे शादी लायक़ थे उन माता-पिताओं की पारखी नज़र पार्टी में आए हर बच्चों को तोल रहीं थीं।प्रणव ने भी अपने कपड़ों को देखा। मान्यवर, से खरीदे कपड़ों में वह भी अलग ही दिख रहा था। सब ही एक से बढ़कर एक सुंदर लग रहे थी।
डी.जे की धुन पर थिरकते कदमों में, एक के बाद एक रंग की नई से नई ड्रैस, खनकती नकली हंसी, गहनों की चमक,”ऐसा लग रहा था” ,सब किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेनेवाले हों। इतनी चमक से आंखें भी चौंधिया रहीं थीं। सब ही खुद को बहुत खूबसूरत समझ रहे थे।
तभी पीछे कुछ शोरगुल सुनकर सबकी निगाहें पीछे को दौड़ी। वहां दो गनमैन के साथ पुलिस युनिफोर्म में एक लड़की, सधे कदमों से चेहरे पर मुस्कराहट लिए, स्टेज़ की और बड़ी जा रही थी। सब की निगाहें उस पर टिकी थीं। आते ही वह पहले मासी से गले मिली, और फिर स्टेज़ पर उनकी बेटी से।आत्मविश्वास से भरपूर हंसी बिखेरती हुई ,वो बोली “बहन अभी मुझे मीटिंग में जाना है”, तेरी रिंग सेरेमनी तक तो नहीं रूक पाउंगी, पर चल घर पर मिलते हैं। अच्छा जीजू बाय। स्टेज से नीचे उतरते हुए मासी से बोली,सब ठीक है ना,” कोई प्रौब्लम चाची? नहीं नहीं, कोई नहीं, मासी बोली। सब उन दोनों को देख रहे थे, तभी मासी ने उसका परिचय कराया। ये मेरी जेठानी की बेटी है ,”रेखा”।आई.पी.एस. क्लिअर करके हमारे ही इलाके की डी.एस. पी. है। उसने मुस्कुराते हुए सब की और देखा और सबको नमस्ते करते हुए वह बाहर को निकल गई। पीछे पीछे दोनों गनमैन भी उसके साथ निकल गए। दूर तक उसकी लाल बत्ती के साइरन की आवाज डी.जे. की आवाज को भी मंदा कर रही थी। उसकी यूनिफॉर्म का रंग,” हर रंग की ड्रेस को फीका कर गया”। पार्टी में आई हुई सब से सुंदर लड़की पार्टी छोड़ कर जा चुकी थी। अब सबको समझ आ रहा था की असली खूबसूरती शरीर नहीं मन और तुम्हारी काबिलियत होती है।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा