उदयपुर के भव्य ‘द लीला पैलेस’ होटल को दुल्हन की तरह सजाया गया था। यह सिर्फ एक शादी नहीं थी, बल्कि शहर के दो सबसे प्रतिष्ठित व्यापारिक घरानों—सिंघानिया और खन्ना परिवार—का मिलन था। हर तरफ विदेशी फूलों की सजावट, झूमते हुए क्रिस्टल शैंडलियर और शहनाई की गूंज थी। मेहमानों की लिस्ट में शहर के मेयर से लेकर बड़े-बड़े उद्योगपति शामिल थे।
गायत्री देवी, सिंघानिया परिवार की मालकिन, अपनी बनारसी साड़ी और हीरे के हार में किसी महारानी से कम नहीं लग रही थीं। उनकी नज़रें बार-बार मुख्य द्वार की ओर जा रही थीं। आज ‘संगीत’ की रस्म थी और यह शाम उनके लिए बेहद खास थी। उनकी इकलौती बहू, समायरा, आज पहली बार औपचारिक रूप से समाज के सामने आने वाली थी।
गायत्री देवी ने समायरा के लिए सब्यसाची का डिज़ाइन किया हुआ एक बेहद भारी और कीमती मरून रंग का लहंगा पसंद किया था। उन्होंने हफ़्तों पहले ही समायरा को हिदायत दे दी थी, “देखो बेटा, हमारे खानदान की इज़्ज़त बहुत मायने रखती है। मीडिया वाले भी होंगे। तुम्हें एकदम राजसी दिखना है। कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”
घड़ी की सुई आठ बजा रही थी। मेहमान आ चुके थे। वेटर चांदी की तश्तरियों में स्टार्टर्स घुमा रहे थे। कानाफूसी शुरू हो गई थी—”अरे, दुल्हन कहाँ है? अभी तक तैयार नहीं हुई?”
गायत्री देवी की बेचैनी बढ़ रही थी। उन्होंने अपने बेटे, विवान, को इशारा किया। विवान अभी कुछ कहने ही वाला था कि हॉल के विशाल दरवाज़े खुले।
सबकी नज़रें वहां टिक गईं।
लेकिन अगले ही पल, गायत्री देवी के चेहरे का रंग उड़ गया। उनके हाथ से जूस का गिलास लगभग छूटते-छूटते बचा।
दरवाज़े पर समायरा खड़ी थी। लेकिन उसने वो मरून लहंगा नहीं पहना था। न ही उसके गले में वो भारी जड़ाऊ हार था जो गायत्री देवी ने पुश्तैनी तिजोरी से निकालकर दिया था।
समायरा ने एक बेहद साधारण, हल्के गुलाबी रंग का लखनवी सूट पहना हुआ था। उसके कान में छोटे-छोटे टॉप्स थे और चेहरे पर नाममात्र का मेकअप। वह बेहद खूबसूरत लग रही थी, लेकिन इस चकाचौंध भरी पार्टी के हिसाब से वह बिलकुल ‘बेमेल’ और ‘साधारण’ दिख रही थी। किसी एंगल से वह करोड़पति घर की बहू नहीं, बल्कि कोई कॉलेज जाने वाली लड़की लग रही थी।
हॉल में सन्नाटा छा गया। जो औरतें अभी तक समायरा के डिज़ाइनर लहंगे की चर्चा कर रही थीं, अब एक-दूसरे को कोहनी मारकर इशारे करने लगीं।
“ये क्या पहन लिया इसने?”
“क्या सिंघानिया परिवार की हालत इतनी पतली हो गई है?”
“शायद मॉडर्न बनने के चक्कर में इसे ट्रेडिशनल कपड़ों की समझ नहीं है।”
ये भनभनाहट गायत्री देवी के कानों तक पिघले हुए सीसे की तरह पहुँच रही थी। उनका बस चलता तो वे वहीं ज़मीन में गड़ जातीं। विवान भी अपनी पत्नी को देखकर हैरान था, लेकिन उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि सवाल था।
समायरा धीरे-धीरे चलते हुए मंच की ओर आई। उसकी चाल में घबराहट नहीं, बल्कि एक अजीब सा ठहराव था। उसने आकर गायत्री देवी के पैर छुए।
गायत्री देवी ने आशीर्वाद देने के लिए हाथ तो उठाया, लेकिन उनके चेहरे पर एक कठोर तनाव था। उन्होंने आस-पास देखा। मेहमान उन्हें ही देख रहे थे। उन्होंने जबरदस्ती की मुस्कान चेहरे पर चिपकाई और समायरा का हाथ पकड़कर उसे भीड़ से थोड़ा दूर, एक कोने में ले गईं जहाँ संगीत का शोर थोड़ा कम था।
एकांत मिलते ही गायत्री देवी का सब्र का बांध टूट गया। उनकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे।
“ये क्या तमाशा है समायरा?” गायत्री देवी ने दांत पीसते हुए, दबी हुई लेकिन बेहद सख्त आवाज़ में कहा। “मैंने तुम्हें कहा था न कि आज की शाम हमारे लिए कितनी ज़रूरी है? वो लहंगा… वो लाखों का लहंगा कहाँ है? और ये… ये क्या पहनकर आ गई हो तुम? लखनवी सूट? क्या हम किसी कीर्तन में आए हैं? या तुम्हें लगा कि यह तुम्हारी कोई कॉलेज की फेयरवेल पार्टी है?”
समायरा ने सिर झुका लिया। “मम्मीजी, वो…”
“चुप रहो!” गायत्री देवी ने उसे बोलने का मौका नहीं दिया। “तुम्हें अंदाज़ा भी है कि बाहर लोग क्या बातें बना रहे हैं? सब कह रहे हैं कि गायत्री देवी की बहू को कपड़े पहनने का सलीका नहीं है। मेरी नाक कटवा दी तुमने। मुझे लगा था तुम समझदार हो, हमारी प्रतिष्ठा का ख्याल रखोगी। लेकिन तुम तो… तुम तो जानबूझकर मेरी बेइज्जती करवाना चाहती थी, है न? ताकि साबित कर सको कि तुम अपनी मर्जी की मालिक हो?”
समायरा की आँखों में आंसू तैरने लगे, लेकिन उसने उन्हें गिरने नहीं दिया। “मम्मीजी, मेरी बात तो सुनिए। वजह थी…”
“क्या वजह हो सकती है?” गायत्री देवी ने उसे झिड़का। “क्या लहंगा फिट नहीं आया? तो दर्जी को बुला लेतीं। क्या वो भारी था? तो बर्दाश्त कर लेतीं। हम औरतें खानदान की इज़्ज़त के लिए क्या-क्या नहीं सहतीं, और तुम से एक लहंगा नहीं संभाला गया? अब चलो, चुपचाप जाकर किसी बहाने से स्टेज के पीछे छिप जाओ। मैं कह दूँगी तुम्हारी तबीयत खराब है। मैं तुम्हें इस हुलिए में मीडिया के सामने नहीं ले जा सकती।”
तभी पीछे से एक भारी और गूंजती हुई आवाज़ आई।
“वो कहीं नहीं जाएगी गायत्री। वो यहीं रहेगी, मेरे पास।”
गायत्री देवी और समायरा, दोनों ने मुड़कर देखा। वहां व्हीलचेयर पर बैठे, घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य, गायत्री देवी के ससुर और विवान के दादाजी, ‘बाबासाहब’ थे। उनके साथ उनका अटेंडेंट नहीं था, बल्कि वे खुद व्हीलचेयर को धकेलते हुए आए थे।
बाबासाहब पिछले दो सालों से डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) और पार्किंसंस से जूझ रहे थे। वे अक्सर लोगों को पहचानना बंद कर देते थे और भीड़भाड़ में उन्हें पैनिक अटैक (घबराहट के दौरे) आते थे। इसलिए उन्हें ज़्यादातर पार्टियों से दूर, उनके कमरे में ही रखा जाता था। आज भी तय हुआ था कि वे कमरे में आराम करेंगे।
गायत्री देवी उन्हें वहां देखकर हड़बड़ा गईं। “बाउजी? आप यहाँ? आपको तो कमरे में होना चाहिए था। नर्स कहाँ है?”
“नर्स नहीं है,” बाबासाहब ने अपनी कांपती हुई उंगली से समायरा की तरफ इशारा किया। “ये है मेरी नर्स। ये है मेरी असली बहू।”
गायत्री देवी को कुछ समझ नहीं आया।
बाबासाहब ने समायरा का हाथ अपने हाथ में लिया। उनका हाथ कांप रहा था, लेकिन पकड़ मज़बूत थी।
“गायत्री,” बाबासाहब ने अपनी बहू (गायत्री) को संबोधित किया। “तुम इसे डांट रही हो क्योंकि इसने सूट पहना है? क्या तुमने यह पूछा कि इसने वो लहंगा क्यों नहीं पहना?”
गायत्री देवी चुप रहीं।
बाबासाहब ने बताना शुरू किया।
“शाम को, जब तुम सब तैयार होने और मेकअप करवाने में व्यस्त थे, तब मेरे कमरे की नर्स को अचानक जाना पड़ा। उसे घर से कोई इमरजेंसी कॉल आया था। मैं कमरे में अकेला था। मुझे प्यास लगी थी। मैंने पानी उठाने की कोशिश की, लेकिन हाथ कांपने की वजह से जग गिर गया। कांच टूट गया और पानी पूरे फर्श पर फ़ैल गया। मैं घबरा गया। मुझे लगा मैं डूब रहा हूँ। मुझे पैनिक अटैक आने लगा। मैं ज़मीन पर गिर गया। मेरे हाथ और पैर में कांच चुभ गए थे। मैं चीख रहा था, लेकिन डीजे की आवाज़ में किसी ने नहीं सुना।”
गायत्री देवी के चेहरे का रंग सफ़ेद पड़ गया। उन्हें इस बात की भनक तक नहीं थी।
बाबासाहब ने आगे कहा, “सिर्फ़ एक इंसान ने सुना। समायरा। यह अपने कमरे से तैयार होकर निकल रही थी। इसने उस भारी लहंगे और जेवरों में मुझे देखा। यह दौड़कर मेरे पास आई। फर्श पर पानी और कांच था। वो लहंगा… वो भारी-भरकम लहंगा कांच में फंस रहा था, उसे चलने नहीं दे रहा था। और मैं… मैं घबराहट में हाथ-पांव मार रहा था। मैंने इसके कपड़े गंदे कर दिए, मैंने इसके लहंगे पर उल्टी कर दी थी घबराहट में।”
समायरा ने धीरे से बाबासाहब के कंधे पर हाथ रखा, जैसे उन्हें शांत कर रही हो।
“इस लड़की ने…” बाबासाहब की आवाज़ भर्रा गई। “इसने एक पल भी अपने कपड़ों की परवाह नहीं की। इसने वो लाखों का लहंगा वहीं कैंची से काट दिया क्योंकि वो मेरे घावों पर पट्टी करने में अड़चन डाल रहा था। इसने मुझे उठाया, साफ़ किया, मेरे घाव पर मरहम लगाया और मुझे सुलाने लगी। जब मैंने ज़िद्द की कि मुझे डर लग रहा है, तो इसने वो गंदे कपड़े बदले, यह साधारण सा सूट पहना और मुझे अपने साथ यहाँ ले आई ताकि मैं अकेला महसूस न करूँ।”
हॉल के उस कोने में अब सन्नाटा नहीं था, बल्कि एक पवित्र खामोशी थी। विवान, जो पीछे खड़ा सब सुन रहा था, उसकी आँखों में अपनी पत्नी के लिए गर्व के आंसू थे।
गायत्री देवी स्तब्ध थीं। उन्हें वो दृश्य याद आया जब उन्होंने समायरा को डांटा था—“क्या वजह हो सकती है? लहंगा भारी था?”
हाँ, लहंगा भारी था। लेकिन समायरा का ‘फर्ज़’ उस लहंगे से कहीं ज़्यादा भारी था।
बाबासाहब ने गायत्री देवी की आँखों में देखा। “गायत्री, तुम कह रही थी कि लोग कानाफूसी कर रहे हैं? तुम कह रही थी कि इसने सूट पहनकर नाक कटवा दी? इज़्ज़त कपड़ों से नहीं, कर्मों से होती है। आज अगर यह तैयार होने में या उस लहंगे को बचाने में लगी रहती, तो शायद मैं कमरे में मरा पड़ा होता। तब क्या करती तुम अपनी इस इज़्ज़त और शान-ओ-शौकत का?”
गायत्री देवी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनका अहंकार, उनका सामाजिक दिखावा, उनकी ‘लोग क्या कहेंगे’ वाली सोच—सब उस साधारण से लखनवी सूट के आगे बौने नज़र आने लगे।
जिस बहू को वे ‘साधारण’ समझकर छिपाना चाहती थीं, उसने आज वो काम किया था जो शायद ही कोई ‘डिज़ाइनर बहू’ कर पाती। उसने सुंदरता को नहीं, सेवा को चुना था।
गायत्री देवी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। वे आगे बढ़ीं। उन्होंने समायरा के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए। वे हाथ, जिनमें मेहंदी लगी थी और शायद कांच उठाने की वजह से कहीं-कहीं खरोंच भी थी।
“मुझे माफ़ कर दे बेटा,” गायत्री देवी की आवाज़ कांप रही थी। “मैं… मैं अंधी हो गई थी। मुझे लगा कि चमक-दमक ही सब कुछ है। मैं भूल गई थी कि असली जेवर तो इंसान के संस्कार होते हैं। तूने आज मेरी नाक नहीं कटवाई, तूने मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।”
समायरा ने मुस्कुराते हुए अपनी सास के आंसू पोंछे। “मम्मीजी, प्लीज़ रोइये मत। आपने ही तो कहा था कि इस घर की इज़्ज़त मेरी ज़िम्मेदारी है। बाबासाहब इस घर की नींव हैं। अगर नींव ही तक़लीफ़ में होती, तो इमारत की सजावट का क्या मोल?”
गायत्री देवी ने समायरा को गले लगा लिया। उन्होंने महसूस किया कि आज तक उन्होंने जितनी भी महंगी साड़ियाँ पहनी थीं, वे सब इस साधारण सूट के आगे फीकी थीं।
गायत्री देवी ने समायरा का हाथ पकड़ा और उसे कोने से निकालकर हॉल के बीचों-बीच ले गईं, जहाँ सारे मेहमान और मीडिया वाले खड़े थे।
उन्होंने माइक हाथ में लिया। संगीत बंद हो गया।
“देवियों और सज्जनों,” गायत्री देवी की आवाज़ पूरे हॉल में गूंजी। “आप सब शायद सोच रहे होंगे कि मेरी बहू ने आज अपनी शादी के संगीत में इतना साधारण सूट क्यों पहना है? शायद कुछ लोग इसे फूहड़ता या कंजूसी समझ रहे होंगे।”
मेहमान हैरान होकर देख रहे थे।
“लेकिन मैं आपको बताना चाहती हूँ,” गायत्री देवी ने गर्व से समायरा की ओर इशारा किया, “कि यह सूट साधारण ज़रूर है, लेकिन इसे पहनने वाली ‘असाधारण’ है। आज मेरी बहू ने जो पहना है, वो ‘सेवा’ और ‘समर्पण’ का लिबास है। इसने आज एक लहंगा नहीं, बल्कि अपनी सास का गुरूर और अपने ससुर की जान बचाई है।”
गायत्री देवी ने पूरी घटना संक्षेप में बताई। जब उन्होंने बात ख़त्म की, तो हॉल में सन्नाटा था। और फिर, अचानक, तालियों की गड़गड़ाहट शुरू हुई। यह तालियां विनम्र थीं, इज़्ज़त से भरी थीं।
वही औरतें जो कुछ देर पहले कानाफूसी कर रही थीं, अब समायरा को प्रशंसा भरी नज़रों से देख रही थीं। मेयर साहब खुद आगे आए और बोले, “सिंघानिया जी, आपकी किस्मत बहुत अच्छी है। हीरा तो यह बहू है, बाकी सब तो कांच के टुकड़े हैं।”
विवान मंच पर आया और उसने समायरा का हाथ थाम लिया। उसने धीरे से कहा, “तुम आज दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत लग रही हो।”
समायरा ने बाबासाहब की तरफ देखा जो व्हीलचेयर पर बैठे मुस्कुरा रहे थे। उनके चेहरे पर सुकून था।
उस रात, उस भव्य होटल में हज़ारों रंग-बिरंगे लहंगे और शेरवानियां थीं, लेकिन सबका ध्यान उस हल्के गुलाबी सूट पर था। क्योंकि उस सूट में लिपटी थी एक ऐसी कहानी, जिसने सबको सिखा दिया था कि ससुराल में इज़्ज़त ‘दिखावे’ से नहीं, बल्कि ‘निभाने’ से मिलती है।
गायत्री देवी ने उस रात एक सबक सीखा—रिश्ते रेशम के धागों से नहीं, बल्कि प्रेम और परवाह के धागों से बुने जाते हैं। और कभी-कभी, सबसे साधारण दिखने वाली चीज़ ही सबसे कीमती होती है।
मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश