असीम प्रेम की अनूठी दास्तान – निधि सहाय

पार्टी के बीच में अचानक काव्या की नज़र एक ऐसे चेहरे पर पड़ी जिसे उसने पिछले कई सालों से नहीं देखा था। वह समीर था। समीर, काव्या के साथ कॉलेज में पढ़ता था। वह हमेशा शांत रहता था, क्लास में सबसे पीछे बैठता था और अपनी किताबों में खोया रहता था। लेकिन वह अक्सर छुप-छुप कर काव्या को देखा करता था। कॉलेज खत्म होने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए विदेश चला गया था और पूरे तीन साल बाद आज लौटा था।

सीढ़ियों से उतरती हुई काव्या की चहचहाती आवाज़ गूंजी, “पापा! मेरा ब्लू वाला फोल्डर कहाँ है? आज क्लाइंट के साथ बहुत बड़ी मीटिंग है।” काव्या एक बेहद प्रतिभाशाली, खूबसूरत और होनहार आर्किटेक्ट थी। उसकी मुस्कान में वो जादू था जो किसी भी उदास चेहरे को खिला दे। कॉलेज के दिनों से ही हर कोई काव्या की बुद्धिमत्ता और उसकी चंचलता का दीवाना था।

रामनाथ जी ने फोल्डर उसे थमाते हुए कहा, “बेटा, आज मत जा। पता नहीं क्यों, सुबह से मेरा मन बहुत अजीब सा हो रहा है। सीने में एक अनजानी सी घबराहट है। ऐसा लग रहा है जैसे कुछ ठीक नहीं है। आज तू घर से काम कर ले।”

काव्या ने हंसते हुए अपने पिता के गालों को छुआ और बोली, “ओह मेरे प्यारे पापा! आप भी न, बिना बात के इतना परेशान हो जाते हैं। आज का प्रेजेंटेशन मेरे करियर के लिए बहुत ज़रूरी है। आप बस आशीर्वाद दीजिए, मैं शाम तक जल्दी लौट आऊंगी।” काव्या ने अपनी गाड़ी की चाबी उठाई और हमेशा की तरह हवा के झोंके की तरह घर से निकल गई। रामनाथ जी दरवाजे पर खड़े उसे तब तक देखते रहे जब तक उसकी गाड़ी आँखों से ओझल नहीं हो गई। उनका मन अब भी किसी अनहोनी की आशंका से कांप रहा था।

और कुछ ही घंटों बाद, वह मनहूस खबर आ ही गई। रामनाथ जी के फोन की घंटी बजी और दूसरी तरफ से आई आवाज़ ने उनके पैरों तले ज़मीन खिसका दी। हाईवे पर एक बेकाबू ट्रक ने काव्या की गाड़ी को भयानक टक्कर मार दी थी। फोन करने वाले ने बताया कि उसे गंभीर हालत में शहर के सबसे बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

रामनाथ जी और उनकी पत्नी निर्मला बदहवास हालत में अस्पताल पहुँचे। अस्पताल के उस ठंडे और सफेद गलियारे में रामनाथ जी ज़मीन पर बैठ गए और फूट-फूट कर रोने लगे। “काश! काश मैंने आज अपनी बच्ची को ज़बरदस्ती रोक लिया होता। मेरा दिल गवाही नहीं दे रहा था, फिर भी मैंने उसे जाने दिया।” वे खुद को कोस रहे थे। निर्मला जी अपने आंसू पीकर अपने पति को संभालने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन अंदर से वह भी पूरी तरह टूट चुकी थीं।

तभी ऑपरेशन थियेटर का दरवाज़ा खुला और मुख्य सर्जन बाहर आए। उनके चेहरे की गंभीरता देखकर रामनाथ जी की सांसें अटक गईं। डॉक्टर ने भारी आवाज़ में कहा, “देखिए, हमने आपकी बेटी की जान तो बचा ली है, लेकिन एक बहुत ही दुखद खबर है। दुर्घटना में उनके पैरों की नसें और हड्डियां पूरी तरह कुचल गई थीं। ज़हर पूरे शरीर में फैलने का खतरा था। उनकी जान बचाने के लिए… हमें उनके दोनों पैर घुटनों के नीचे से काटने पड़े।”

यह सुनना था कि निर्मला जी वहीं बेहोश होकर गिर पड़ीं और रामनाथ जी की चीख निकल गई। काव्या, जो पूरे घर में हिरनी की तरह कुलांचे भरती थी, जिसे नृत्य का इतना शौक था, जो अपने सपनों की इमारतें खड़ी करने के लिए मीलों दौड़ने का हौसला रखती थी… अब वह कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाएगी।

होश आने पर जब काव्या को इस बात का पता चला, तो वह जैसे एक जीवित लाश बन गई। उसने रोना, बोलना, खाना-पीना सब छोड़ दिया। वह बस शून्य में घूरती रहती। जिस लड़की की एक झलक पाने के लिए यूनिवर्सिटी में लड़कों की कतारें लग जाती थीं, जिस लड़की की खूबसूरती और आत्मविश्वास के चर्चे हर जगह होते थे, आज वह खुद को आईने में देखने से भी कतराने लगी थी। शारीरिक चोट से ज़्यादा वह मानसिक रूप से विकलांग महसूस कर रही थी। उसे लगने लगा था कि उसकी ज़िंदगी अब खत्म हो चुकी है और वह हमेशा के लिए अपने माता-पिता पर एक बोझ बन गई है।

लेकिन कहते हैं न, जब इंसान पूरी तरह टूट जाता है, तब उसे सिर्फ और सिर्फ अपनों का प्यार ही जोड़ सकता है। इंसान कभी भी खुद को अपनी नज़रों से नहीं आंकता, वह खुद को उस नज़र से देखता है जो उसके चाहने वाले उसे दिखाते हैं। रामनाथ और निर्मला जी ने अपनी बेटी को इस अंधेरे से बाहर निकालने की ठान ली। उन्होंने घर के हर कोने को व्हीलचेयर के अनुकूल बनवा दिया। वे काव्या के लिए उसकी बैसाखी नहीं, बल्कि उसके नए पैर बन गए।

निर्मला जी रोज़ सुबह उसे तैयार करतीं, उसके बाल संवारतीं और कहतीं, “मेरी बच्ची की पहचान उसके पैरों से नहीं, उसके खूबसूरत दिमाग और उसके साफ दिल से है।” रामनाथ जी ने उसके कमरे में ही एक शानदार आर्किटेक्चर स्टूडियो बनवा दिया। उन्होंने दिन-रात अपनी बेटी के आत्मविश्वास को सींचा। माता-पिता के इस असीम प्यार, त्याग और सकारात्मक ऊर्जा ने अंततः अपना असर दिखाया। काव्या उस गहरे अवसाद से बाहर आने लगी। उसने समझ लिया कि शरीर का एक हिस्सा जाने से ज़िंदगी नहीं रुकती। उसने फिर से अपने लैपटॉप पर डिज़ाइन बनाने शुरू कर दिए। वह व्हीलचेयर पर बैठकर भी पहले से ज़्यादा ऊर्जावान और खुश रहने लगी। उसकी वह पुरानी खिलखिलाहट घर में फिर से गूंजने लगी थी।

समय अपनी गति से बीतता रहा। आज काव्या का 25वां जन्मदिन था। यह दिन इसलिए भी बेहद खास था क्योंकि आज ही के दिन काव्या द्वारा व्हीलचेयर पर बैठकर डिज़ाइन की गई एक बहुत बड़ी कमर्शियल बिल्डिंग का उद्घाटन भी हुआ था। घर के लॉन को बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया था। काव्या के सभी पुराने दोस्त, रिश्तेदार और उसके ऑफिस के लोग वहां मौजूद थे। काव्या एक खूबसूरत लाल रंग की ड्रेस पहने अपनी व्हीलचेयर पर बैठी थी और मेहमानों का मुस्कुराकर स्वागत कर रही थी। उसके चेहरे का नूर आज भी वैसा ही था, बल्कि उसके आत्मविश्वास ने उसे और भी ज़्यादा आकर्षक बना दिया था।

पार्टी के बीच में अचानक काव्या की नज़र एक ऐसे चेहरे पर पड़ी जिसे उसने पिछले कई सालों से नहीं देखा था। वह समीर था। समीर, काव्या के साथ कॉलेज में पढ़ता था। वह हमेशा शांत रहता था, क्लास में सबसे पीछे बैठता था और अपनी किताबों में खोया रहता था। लेकिन वह अक्सर छुप-छुप कर काव्या को देखा करता था। कॉलेज खत्म होने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए विदेश चला गया था और पूरे तीन साल बाद आज लौटा था।

समीर भीड़ को चीरता हुआ धीरे-धीरे काव्या के पास आया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और गहरी भावनाएं थीं। काव्या ने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया, “समीर! तुम यहाँ? कितने सालों बाद देखे हो। कैसे हो?”

समीर काव्या के सामने घुटनों के बल बैठ गया, ताकि उसकी आँखें सीधे काव्या की आँखों से मिल सकें। उसने काव्या का हाथ अपने हाथों में लिया। काव्या थोड़ी असहज हुई, लेकिन समीर की आँखों में मौजूद सच्चाई ने उसे रोक लिया।

समीर ने कांपती हुई आवाज़ में कहना शुरू किया, “काव्या, मैं आज यहाँ सिर्फ तुम्हें जन्मदिन की बधाई देने नहीं आया हूँ। मैं आज वो कहने आया हूँ जो मुझे बहुत पहले कह देना चाहिए था, लेकिन मैं डरता था। काव्या… मैं तुम्हें पिछले पांच सालों से बेइंतहा प्यार करता हूँ। कॉलेज के दिनों में जब तुम पूरी यूनिवर्सिटी की धड़कन हुआ करती थी, तब मुझे लगता था कि मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ। इसलिए मैंने कभी अपने प्यार का इज़हार करने की हिम्मत नहीं की। लेकिन आज… आज तुम्हें यहाँ इस तरह देखकर, तुम्हारी इस हिम्मत और तुम्हारे इस हौसले को देखकर मेरा वो प्यार एक गहरी इबादत में बदल गया है।”

काव्या की आँखें भर आईं। उसने अपनी व्हीलचेयर की तरफ इशारा करते हुए रूंधे गले से कहा, “समीर, क्या तुम देख रहे हो मैं किस हालत में हूँ? मेरे पैर नहीं हैं। मैं अब वो काव्या नहीं हूँ जिसे तुमने कॉलेज में देखा था। मैं एक विकलांग लड़की हूँ।”

समीर ने बहुत ही कोमलता से उसके आंसुओं को पोंछा और एक दृढ़ मुस्कान के साथ बोला, “काव्या, इंसान पैरों से नहीं, अपनी आत्मा से चलता है। मुझे प्यार तुम्हारे पैरों से नहीं, तुम्हारी उस रूह से था जो आज भी वैसी ही खूबसूरत है। बल्कि आज तुम मेरे लिए दुनिया की सबसे मज़बूत और पूर्ण इंसान हो। मैं तुमसे हमदर्दी नहीं कर रहा हूँ काव्या, मैं उस लड़की से अपने प्यार की भीख मांग रहा हूँ जो मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गई है। अगर तुम्हें मेरा यह इज़हार बुरा लगे, तो मुझे माफ कर देना, लेकिन प्लीज़… अपनी यह खूबसूरत दोस्ती मुझसे कभी मत छीनना। क्या तुम इस अधूरी सी लगने वाली ज़िंदगी में मेरे साथ एक पूरा आसमान उड़ने का मौका दोगी?”

काव्या के माता-पिता दूर खड़े यह सब देख रहे थे और उनकी आँखों से खुशी के आंसू बह रहे थे। आज उन्होंने महसूस किया कि सच्चा प्यार शारीरिक कमियों का मोहताज नहीं होता। काव्या ने समीर के हाथों को कसकर पकड़ लिया और उसकी उस ‘हां’ ने उस रात को हमेशा के लिए एक खूबसूरत मुकाम दे दिया।

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लेखिका : निधि सहाय

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