कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ के साथ ही, बाहर बज रही शहनाई और मेहमानों का शोर एकदम से मद्धम पड़ गया। सन्नाटा… एक ऐसा भारी और बोझिल सन्नाटा जो किसी तूफ़ान के बाद आता है।
मैं, मीरा, लाल जोड़े में सजी, पलंग के एक कोने पर बैठी थी। मेरे हाथों की मेहंदी का रंग गहरा था, लेकिन मेरे चेहरे का रंग सफ़ेद पड़ चुका था। यह वह रात थी जिसके सपने हर लड़की अपनी किशोरावस्था से बुनती है—सुहागरात। लेकिन मेरे लिए? मेरे लिए यह एक ‘समझौते की रात’ थी।
कमरे की हवा में आज भी मोगरे की वही महक थी जो मेरी बड़ी बहन, अवनी दीदी को पसंद थी। यह कमरा, यह बिस्तर, यह अलमारी और खिड़की पर टंगा वह विंड-चाइम… सब कुछ अवनी दीदी का था। यहाँ तक कि वह इंसान भी, जो खिड़की की तरफ पीठ करके खड़ा था—राघव। मेरे जीजाजी… और अब, मेरे पति।
“पानी पियोगी?”
राघव की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया। वह मुड़े नहीं थे, बस खिड़की के बाहर देख रहे थे। शायद उनमें मेरी ओर देखने की हिम्मत नहीं थी, या शायद वह मेरी जगह अवनी दीदी को खोजने की कोशिश कर रहे थे।
“नहीं,” मेरी आवाज़ मेरे गले में ही अटक गई।
राघव मुड़े। उनकी आँखों में थकान और एक अजीब सी लाचारी थी। उन्होंने शेरवानी की बटन खोली और सोफे पर बैठ गए। हमारे बीच दस कदम की दूरी थी, लेकिन यह दूरी मीलों लंबी लग रही थी।
“मीरा,” उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “मैं जानता हूँ कि यह तुम्हारे लिए कितना मुश्किल है। शायद मेरे लिए भी उतना ही है। समाज ने, माँ-बाबूजी ने, और हालात ने हमें इस कमरे में बंद तो कर दिया है, लेकिन…” वह रुके, शब्द खोजते हुए। “लेकिन मैं नहीं चाहता कि तुम घुटन महसूस करो।”
मैं चुप रही। क्या कहती? कि मैंने अपना पी.एच.डी. का फॉर्म फाड़ दिया? कि मैंने उस लड़के को मना कर दिया जिसे मैं कॉलेज में पसंद करती थी? सिर्फ़ इसलिए क्योंकि तीन साल का ‘आरव’ अपनी माँ को ढूंढते हुए रोता था और उसे चुप कराने का हुनर सिर्फ़ मेरी गोद में था?
समर्पण… लोग इसे महानता कहते हैं। माँ कहती थीं, “मीरा, तू तो देवी है। अपनी बहन का घर संभाल लेगी।” लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि देवी बनने के लिए इंसान को अपनी इच्छाओं की बलि देनी पड़ती है।
राघव ने मेज़ पर रखे पानी के जग से ग्लास भरा और एक सांस में पी गए।
“देखो मीरा,” राघव ने मेरी आँखों में सीधे देखा। उस नज़र में वासना नहीं थी, एक याचना थी। “हम दोनों जानते हैं कि हम यहाँ क्यों हैं। आरव के लिए। मैं झूठ नहीं बोलूंगा, मैं आज भी अवनी से प्यार करता हूँ। और मैं यह भी जानता हूँ कि तुमने मुझसे शादी सिर्फ़ फ़र्ज़ के लिए की है, प्यार के लिए नहीं।”
मेरे कंधों का बोझ थोड़ा हल्का हुआ। कम से कम यहाँ झूठ का पर्दा नहीं था।
“तो…” मैंने पहली बार नज़रें उठाईं, “तो अब आगे क्या?”
राघव ने एक तकिया उठाया और सोफे पर लेट गए। “आगे वही, जो हम पिछले छह महीनों से कर रहे थे। तुम आरव की मासी थीं, अब कागज़ों पर माँ हो। मैं उसका पिता हूँ। हम दोनों ‘पार्टनर्स’ हैं—आरव की परवरिश के प्रोजेक्ट में। इस कमरे के दरवाज़े के बाहर हम पति-पत्नी होंगे दुनिया के लिए, लेकिन इस कमरे के अंदर… हम बस दो दोस्त रहेंगे। जब तक… जब तक तुम खुद इस रिश्ते को कोई और नाम न देना चाहो।”
उन्होंने करवट बदली और बत्ती बुझा दी। “सो जाओ मीरा। कल सुबह आरव जल्दी उठ जाएगा। उसे स्कूल के लिए तैयार करना है।”
अंधेरे में, मैं पलंग पर लेटी छत को घूरती रही। जिस सुहागरात का मुझे डर था, वह इतनी सादगी और इज़्ज़त के साथ गुज़र जाएगी, मैंने सोचा नहीं था। उस रात मेरे शरीर को तो नहीं छुआ गया, लेकिन मेरी आत्मा को एक तसल्ली मिली कि मैंने जिस इंसान के लिए अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाई है, वह कम से कम एक भला आदमी है।
लेकिन असली संघर्ष तो अगली सुबह से शुरू हुआ।
शादी के शुरुआती दिन किसी नाटक के मंचन जैसे थे। मुझे साड़ी पहननी पड़ती थी, मांग में सिंदूर भरना पड़ता था और गले में भारी मंगलसूत्र लटकाना पड़ता था। जब भी मैं आइने में देखती, मुझे अपना चेहरा नहीं, अवनी दीदी का चेहरा दिखता था। ऐसा लगता था जैसे मैं किसी और का किरदार निभा रही हूँ।
आरव खुश था। उसे समझ नहीं आया था कि मासी अब माँ बन गई है, उसे बस इतना पता था कि अब मासी रात को भी यहीं रहती है, अपने घर नहीं जाती।
एक दिन, मैं रसोई में थी। अवनी दीदी को खाना बनाने का बहुत शौक था। वह तरह-तरह के पकवान बनाती थीं। मुझे खाना बनाना सिर्फ़ ज़रूरत भर का आता था। मेरा शौक किताबें पढ़ना और पेंटिंग करना था।
सास जी (जो अब मेरी भी सास थीं) रसोई में आईं। उन्होंने कढ़ाई में बन रही सब्ज़ी को सूंघा और नाक सिकोड़ी।
“मीरा, इसमें हींग नहीं डाली? अवनी तो हमेशा हींग का तड़का लगाती थी। उसके हाथ के खाने में जो स्वाद था… खैर, तुम अभी नई हो, सीख जाओगी।”
वह चली गईं, लेकिन वो तुलना मेरे दिल में चुभ गई। यह सिर्फ़ एक बार नहीं, बार-बार होता था।
“अवनी कपड़े ऐसे तह करती थी।”
“अवनी शाम को तुलसी के पास दीया जलाना कभी नहीं भूलती थी।”
“अवनी राघव की शर्ट खुद प्रेस करती थी।”
मैं मीरा थी, लेकिन हर कोई मुझमें अवनी को ढूंढ रहा था। मैं धीरे-धीरे खुद को मिटाती जा रही थी। मैंने अपने पेंटिंग ब्रश अलमारी के सबसे ऊपरी रैक पर फेंक दिए थे। किताबें रद्दी की तरह कोने में पड़ी थीं। मैं एक ‘आदर्श दूसरी पत्नी’ और ‘आदर्श माँ’ बनने की होड़ में दौड़ रही थी, एक ऐसी रेस जिसका कोई अंत नहीं था।
राघव अपने काम में व्यस्त हो गए थे। हमारा रिश्ता वही था जो पहली रात तय हुआ था—आरव के माता-पिता। हम बात करते थे, तो सिर्फ़ घर के खर्चों की, आरव की स्कूल फीस की, या राशन की। हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं था, लेकिन कोई संवाद भी नहीं था। एक अजीब सी ठंडी शांति थी।
एक साल बीत गया।
आरव का जन्मदिन था। घर में छोटी सी पार्टी रखी गई थी। मैंने अवनी दीदी की तरह चॉकलेट केक बनाने की कोशिश की, लेकिन वह थोड़ा जल गया। मेहमानों में कानाफूसी शुरू हो गई।
“सौतेली माँ है न, सगी माँ जैसा प्यार कहाँ से आएगा?” किसी ने धीमे स्वर में कहा, लेकिन मैंने सुन लिया।
मैं मुस्कराती रही, सबको केक परोसती रही। लेकिन अंदर ही अंदर मैं टूट रही थी। रात को जब सब चले गए और आरव सो गया, तो मैं छत पर चली गई।
वहाँ अंधेरे में खड़ी मैं रोने लगी। सिसकियाँ मेरे गले से फूट पड़ीं। मैंने क्या नहीं किया? अपनी जवानी, अपने सपने, अपनी पहचान—सब कुछ होम कर दिया। फिर भी मैं ‘कम’ थी। फिर भी मैं ‘सौतेली’ थी।
“मीरा?”
पीछे से राघव की आवाज़ आई। मैंने जल्दी से आंसू पोंछे और मुड़ने लगी।
“नहीं, मत छुपाओ,” राघव पास आए। उन्होंने पहली बार मेरा हाथ पकड़ा। उनका स्पर्श गर्म था। “मैं तुम्हें पार्टी में देख रहा था। और मैंने वह बात भी सुनी जो बुआ जी ने कही थी।”
“मुझे फर्क नहीं पड़ता,” मैंने झूठ बोला।
“फर्क पड़ता है, मीरा। और पड़ना भी चाहिए,” राघव ने सख्ती से कहा। “तुम कब तक अवनी की परछाई बनकर जिओगी? तुम अवनी नहीं हो। तुम मीरा हो। और मैं नहीं चाहता कि तुम अवनी बनो।”
“लेकिन सबको वही चाहिए,” मैं चिल्लाई। मेरा साल भर का गुबार बाहर आ गया। “सबको अवनी चाहिए। आपको भी, मम्मी जी को भी, आरव को भी। मैं तो बस एक विकल्प हूँ, एक रिप्लेसमेंट!”
राघव ने मेरे दोनों कंधे पकड़कर मुझे झकझोरा।
“पागल हो तुम? किसने कहा मुझे अवनी चाहिए? अवनी जा चुकी है मीरा, और वह कभी वापस नहीं आएगी। यह सच मैं स्वीकार कर चुका हूँ। लेकिन तुम? तुम ज़िंदा हो, और मैं तुम्हें अपनी आँखों के सामने तिल-तिल कर मरते हुए देख रहा हूँ। मैंने शादी मीरा से की थी, उस ज़िंदादिल लड़की से जो कैनवास पर रंग भरती थी। वो लड़की कहाँ गई?”
मैं सन्न रह गई।
“कल चलो मेरे साथ,” राघव ने कहा।
“कहाँ?”
“जहाँ तुम्हें जाना चाहिए।”
अगली सुबह, राघव मुझे शहर की एक आर्ट गैलरी में ले गए। वहां एक पेंटिंग प्रदर्शनी लगी थी।
“यहाँ क्यों?” मैंने पूछा।
“मैंने तुम्हारा पोर्टफोलियो यहाँ के क्यूरेटर को भेजा था,” राघव ने बताया। “उन्हें तुम्हारा काम पसंद आया है। वे तुम्हें यहाँ बतौर आर्ट टीचर और एग्जिबिटर रखना चाहते हैं।”
मेरी आँखें फटी रह गईं। “लेकिन घर? आरव? माँ जी?”
“घर हम दोनों का है, तो ज़िम्मेदारी भी दोनों की है,” राघव ने मेरा हाथ थाम लिया। “माँ जी को मैं समझा दूँगा। और आरव? आरव को एक खुश माँ की ज़रूरत है, एक ‘परफेक्ट’ माँ की नहीं। अगर तुम खुश नहीं रहोगी, तो उसे खुशी कैसे दोगी?”
उस पल, उस आर्ट गैलरी के बीचों-बीच, मुझे लगा कि मेरी शादी अब हुई है। असली शादी। जहाँ दो लोग एक-दूसरे को पूरा करते हैं, न कि एक-दूसरे की कमियां निकालते हैं।
“राघव, आप…” मेरी आँखों में आंसू थे।
“मीरा,” राघव ने मेरी आँखों में देखा, और इस बार उस नज़र में सिर्फ दोस्ती नहीं थी, उसमें एक नई शुरुआत की चमक थी। “मैंने अवनी को खोया है, मैं तुम्हें नहीं खोना चाहता। न एक दोस्त के रूप में, न एक पत्नी के रूप में। चलो, अपनी पहचान वापस लाओ।”
उस दिन के बाद, ‘शांति-निवास’ की तस्वीर बदलने लगी।
मैंने फिर से पेंटिंग शुरू की। शुरुआत में सास जी ने नाक-भौं सिकोड़ी, लेकिन जब उन्होंने देखा कि मैं खुश हूँ और उस खुशी से घर का माहौल कितना हल्का हो गया है, तो वे भी चुप हो गईं। मैंने अवनी दीदी की तरह बनना छोड़ दिया। मैंने हींग वाली दाल की जगह अपनी पसंद की मखनी दाल बनाई। और हैरानी की बात यह थी कि आरव ने उंगलियां चाटकर खाई।
धीरे-धीरे, आरव ने मुझे ‘बड़ी माँ’ कहना छोड़कर ‘माँ’ कहना शुरू कर दिया। यह किसी दबाव में नहीं, बल्कि उस प्यार की वजह से था जो अब नैसर्गिक था, बोझिल नहीं।
और राघव?
हम अब भी सोफे पर बैठकर चाय पीते थे, लेकिन अब बातें राशन की नहीं होती थीं। अब हम कला, राजनीति, और अपने दिन भर के किस्सों पर बात करते थे। वह दूरी जो सुहागरात की रात हमारे बीच थी, वह अब मिट चुकी थी। हमने एक-दूसरे को प्यार करना नहीं सीखा था, बल्कि हमने एक-दूसरे के साथ ‘जीना’ सीख लिया था, और शायद यही प्यार का सबसे परिपक्व रूप था।
एक रात, मैं अपनी एक नई पेंटिंग पूरी करके हटी। राघव मेरे पीछे खड़े थे। पेंटिंग में एक बड़ा सा बरगद का पेड़ था जिसकी जड़ें गहरी थीं, और उस पर नई कोपलें फूट रही थीं।
“यह क्या है?” राघव ने पूछा।
“यह हम हैं,” मैंने मुस्कुराते हुए कहा। “जड़ें अतीत में हैं, यादों में हैं… लेकिन यह नई पत्तियां, यह हमारा आज है।”
राघव ने मुझे पीछे से गले लगा लिया। उन्होंने मेरे बालों को चूमा। “शुक्रिया मीरा। मेरे घर को मकान बनने से बचाने के लिए नहीं, बल्कि मुझे ज़िंदगी में वापस लाने के लिए।”
उस रात, समर्पण का अर्थ बदल गया था। मैंने अपनी ज़िंदगी ‘त्यागी’ नहीं थी, बल्कि मैंने उसे एक नए सांचे में ढाला था। मैंने खोया कुछ नहीं था, बस एक अलग रास्ते से सब कुछ पा लिया था। मैं अवनी दीदी की जगह नहीं ले पाई, लेकिन मैंने अपनी एक अलग जगह बना ली थी—राघव के दिल में, आरव की ज़िंदगी में, और सबसे बढ़कर, अपनी खुद की नज़रों में।
कहानी वही थी, पात्र वही थे, लेकिन अब यह कहानी ‘त्याग’ की नहीं, ‘नवनिर्माण’ की थी।