अपराधबोध – सीमा सिंघी 

सुनंदाजी की नजर जैसे ही अपनी बहू मीरा की थाली पर पड़ी । वो थाली की ओर देखते हुए तुरंत कड़क आवाज में कहने लगी। देखो बहू मेरे लिए तुमने शाम के लिए  गट्टे की सब्जी रख दी है ना ?? क्योंकि गट्टे की सब्जी मुझे बहुत पसंद है। अपनी सासू मां की कड़क आवाज सुनकर मीरा का पहला कौर वहीं की वहीं रुक गया।

उसने तुरंत रसोई में जाकर गट्टे की सब्जी वापस पतीले में निकाल दी और एक अचार का टुकड़ा ले आई और उसी के साथ खाने लगी। रोटी अचार खाते हुए उसकी आंखों के किनारे बिल्कुल नम हो चुके थे। उसने जैसे तैसे आधी रोटी खाई और बाकी की कौवे को डालकर रसोई का काम निपटाने लगी।

मीरा जब से इस घर में ब्याह कर आई थी। तब से उसकी सास का उसके साथ यही रवैया था। सुबह होते ही उसे जल्दी उठा देना, दिन भर काम करवाना और खाने को ठीक से ना देना। यहां तक की कहीं जाने पर भी समय से बांधकर भेजना।

मीरा ने अपने मायके में अपनी भाभियों के प्रति अपनी मां का ऐसा रवैया कभी देखा नहीं था। वह बार-बार यह सोचने को मजबूर हो जाती कि इंसान तो वही है मगर उनके स्वभाव में इतने सारे बदलाव शायद जन्म से ही मिले संस्कारों की वजह से होता होगा क्योंकि उसके सासू मां का हर समय गुस्सा करना, उलहाने देना, जरूरत से ज्यादा काम करवाना सिर्फ अपने ओहदे का फायदा उठाकर उसके प्रति उनकी क्रूरता ही तो दर्शाती थी। 

यह बात अलग है जो इंसान ऐसा रवैया या ऐसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है । वह अपना चेहरा कभी आईने में देखता ही नहीं कि वह कितनों की जिंदगी में जहर घोल रहा है और कितनों की बददुआ ले रहा है।

मगर ठीक इसके विपरीत मीरा के ससुर जी श्री मोहन जी हमेशा मीरा को आशीर्वाद देते नहीं थकते थे, मन के भी अति सरल थे। वे अक्सर अपनी पत्नी सुनंदा जी से कहते । सुनंदा तुम आज जिस तरह मीरा के साथ व्यवहार कर रही हो । वो बिल्कुल भी सही नहीं है । देखो तुम उसे अपने बेटे हरीश की पत्नि बनाकर लाई हो, कोई काम वाली बाई नहीं। 

जरा याद करो, तुमने मेरी मां का कितना सम्मान किया। जबकि वह तो बहुत भली थी। तुम्हें कितना प्यार करती थी,फिर भी तुम वहां नहीं रह पाई। मैं वो सब बहुत अच्छी तरह जानता हूं। तुम्हारी वजह से मैं कितनी जल्दी गांव छोड़कर इस शहर में आ बसा था । 

सोचो अगर तुम्हारा बेटा हरीश भी मेरी तरह अपनी पत्नी को लेकर आज दूसरी जगह जाकर बस जाए तो तुम और मैं अकेले ही रह जाएंगे। यह तो तुम्हारी बहु बहुत भली है जो हमें छोड़कर दूसरा घर नहीं बसाया और हां यह जो तुम्हारी बेटियां तुम्हारे कान भरती है ना तुम्हारी बहू के प्रति। 

मैं वो सब  भी जानता हूं सुनंदा। मैं यह भी जानता हूं तुम्हारी बेटियों ने अपनी सासू मां की कितनी सेवा की है और कितना सम्मान किया है और हां यह बात मेरी हमेशा याद रखना । जिस घर में बेटियां दखल देती है। 

वह घर कभी नहीं सुधरता ।

 देखो सुनंदा मैं नहीं जानता जिंदगी में आगे क्या होने वाला है मगर यह सच है हम जैसे कर्म करते हैं, ईश्वर हमें वैसे ही परिणाम देते हैं ।

मगर सुनंदा जी को अपने पति श्री मोहन जी की ऐसी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वो तुरंत बोल उठती। देखो जी हम औरतों के बीच आप ना बोलो तो ही सही है क्योंकि आप नहीं जानते अगर नई बहू की लगाम मैं अपने हाथ में नहीं रखूंगी तो कल को वह मेरे हाथ से निकल भी सकती है ।

 आप मेरी बेटियों पर यूं ही दोष रोपण ना किया करो। वह तो मन की भली है, मेरी फिकर है । तभी तो मुझे राय देती है । अपनी पत्नी की ऐसी बातें सुनकर श्री मोहन जी चुप हो जाते क्योंकि वह जान चुके थे कि अब सुनंदा कभी नहीं बदलने वाली है ।

यूं ही दिन महीने वर्ष बीतते गए। अब सुनंदा जी अस्वस्थ रहने लगी थी, चलने फिरने में भी असमर्थ हो गई थी। कई ऐसी बीमारियों ने उन्हें घेर लिया, जिससे वह खुद को बहुत ही असहाय जैसा महसूस करती थी, एक जगह ही बिस्तर पर लेटे-लेटे अब उनका समय कटना बहुत मुश्किल हो गया था और बदन में पीड़ा थी वह अलग। 

श्री मोहन जी भी इस दुनिया से चले गए थे। वो पति के बगैर अकेली हो गई थी मगर उनका व्यवहार नहीं बदला। हरीश तो वैसे भी रोज दुकान के लिए निकल जाता था। 

कुछ वक्त और गुजरा अब बिस्तर पर लेटे-लेटे अकेले में अपनी बहू मीरा के साथ किए गए बुरे व्यवहार को याद कर करके पछताते रहती । पति श्री मोहन जी की कही हुई बातें भी अब खूब याद आने लगी। 

वह सोचने लगती । उनके पति ठीक ही तो कहा करते थे। मैंने अपने जीवन में अपनी बहू को इतनी तकलीफें दी । आज ईश्वर वही मुझे दे रहा है,अर्थात जैसा दो, वैसा लो। 

अब मीरा भी धीरे धीरे बुढ़ापे की ओर बढ़ रही थी । वह अपनी सास की देखभाल जैसे तैसे ही कर पाती थी । घर पर और कोई था भी नहीं क्योंकि मीरा के कोई संतान तो हुई ही नहीं थी। 

आज दो दिनों से उसके बुखार जो चढ़ी। वह उतरने का नाम ही नहीं ले रही थी । सुनंदा जी मीरा की ऐसी हालत देखकर खुद अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे रो पड़ी और कहने लगी।

मुझे माफ कर दे मीरा, जब से तू इस घर की बहू बनकर आई। मैंने एक दिन भी तुझे सुख नहीं दिया। तुझे अपनी बहू कम काम वाली बाई ज्यादा समझा। आज तुम्हारी ऐसी हालत की सौ प्रतिशत जिम्मेदार मैं हूं। 

मैंने हमेशा तुम्हें उलहाने दिए। घर में बड़े होने का फायदा उठाकर जीवन भर तुझे सताती रही मगर अब मैं अच्छी तरह समझ गई हूं पराए घर की कन्या का जीवन इस तरह बर्बाद नहीं करना चाहिए जैसा मैंने तेरा किया है । 

तुम्हारे ससुरजी हमेशा मुझे समझाते थे मगर मैंने उनकी एक न सुनी अगर उस दिन तुम्हारे ससुर जी की सुन लेती तो आज तुम्हारी हालत ऐसी ना होती।

 तुम्हारे होठों की हंसी कभी कम ना होती। मैंने खुद को तो मालकिन समझ लिया मगर तुम्हें गृह लक्ष्मी का सम्मान देना भूल ही गई । जितना यह घर मेरा था उतना ही तेरा भी तो था।  तुमने कभी मुझे कहा क्यों नहीं, क्यों सहती रही।

 भगवान मेरे प्राण ले ले पर तुझे स्वस्थ कर दे। मुझे इस तरह तेरा जीवन बर्बाद करने का कोई हक न था। तु मुझे क्षमा कर दे कहते कहते सुनंदा जी फिर रो पड़ी।

मीरा अपनी सासू मां की ऐसी बातें सुनकर अपने बिस्तर से जैसे तैसे उठकर आई और कहने लगी। मां मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है हां जब मैं इस घर में  नई नई बहू बनकर आई थी। 

तब आपका ढेर सारा प्यार, आशीर्वाद पाने को जी ललचाते रहता था । उस वक्त बहुत मेरा मन करता था, खुशी के पल जीऊं। हरीश के साथ कहीं घूमने जाऊं,जी भर कर खाऊं। मगर  आपसे यह सब कुछ भी नहीं मिला तो धीरे-धीरे मैंने अपने मन को मार लिया और अब तो मेरा मन सच कहूं तो कुछ भी ऐसा नहीं चाहता है। 

मुझे यह जिंदगी बहुत बोझ लगने लगी है। मैंने आपसे बहुत बार कहने की कोशिश की पर आप सुनने को कभी तैयार ही नहीं होती थी।

 खैर अब आप अपने मन पर यह अपराध बोध ना ले क्योंकि जो बीत गया वो अब वापस कभी लौट नहीं सकता। आपने आज इस बात को समझा। 

यही मेरे लिए बहुत है क्योंकि मैंने अपने मायके से यही संस्कार पाए हैं कि हमेशा बड़ों का लिहाज करना यह बात अलग है कि आपने उस लिहाज का फायदा उठाकर मेरे हिस्से का सम्मान और प्यार देना,मेरी तकलीफों को समझना भूल ही गई कहते हुए अपनी सासू मां के करीब ही लेट गई और फिर अपनी आंखें मूंद ली और मन ही मन सोचने लगी। 

चलो आज इतने बरसों बाद ही सही पर सासू मां अपने अपराध बोध को महसूस तो कर पाई।

स्वरचित 

सीमा सिंघी 

गोलाघाट असम

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