इस *अपराध बोध* को अपने मन से निकाल दो तुम मां, तुम्हारी कोई गलती नहीं थी, ऋषि अपनी मां शांता देवी को सांत्वना देते हुए बोला। लेकिन बेटा… बेटा अगर…अगर मैने वो फैसला ना लिया होता तो आज यह नहीं होता।
*2 साल बाद*
ऋषि और उसकी मां अब दूसरी जगह शिफ्ट हो गए थे, पर कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा था। शांता देवी जो पहले बहुत खुश रहती थी और सबकी मदद करती थी अब बस अपने कमरे के कोने में आलू की बोरी की तरह चुप होकर रहती है और घर के बाहर तो दूर किसी से भी मिलना पसंद नहीं करती।
मुख्य दरवाजे पर अचानक से किसी ने घंटी बजाते हुए घर के सन्नाटे को खत्म किया, ऋषि ने जैसे ही दरवाजा खोला उसके माथे से पसीना आने लगा और वो हक्का बक्का रह गया। सामने पुलिस कड़ी थी।
ऋषि ने अपने आप को संभालते हुए बोला “इंस्पेक्टर साहब आप यहाँ? कैसे आना हुआ?”
इंस्पेक्टर साहब कुछ बोले उससे पहले शांता देवी आई और बस एक ही साँस में बोली “मैने बुलाया है इन्हें”
ऋषि एक दम से, हल्का सा घबराते हुए बोला “पर क्यों माँ”
शांता देवी जो 2 सालों से शांत थी वो एक दम से आग बबूला होके बोली “ये तू भी जानता है कि इंस्पेक्टर साहब यहाँ क्यों आये है, और अब मैं चुप नहीं रहने वाली।”
बाहर कड़कती बिजली और बारिश ऐसे हो रही थी जैसे शांता देवी की दबी हुई भावनाएं बाहर आ गई हो।
शांता देवी धीमे स्वर में बोली “इंस्पेक्टर साहब आप अंदर आये, मुझे आपसे 2 साल पहले हुए हादसे के बारे में कुछ बताना है, जो मैं उस समय नहीं बता पाई थी। और इसका बोझ लेके मुझसे और नहीं जिया जाएगा।
इंस्पेक्टर साहब से यब सुनकर चौंक से गये और बोले “ऐसी कौनसी बात थी जो आप उस समय नहीं बता पाए थे और अब बताना चाहते है?”
पूरे घर में सन्नाटा सा होगया था बस बाहर हो रही बारिश की आवाज़ आ रही थी तभी शांता देवी ने एक लंबी और गहरी साँस ली और बोली “इंस्पेक्टर साहब जैसा कि आप जानते है, मेरी बेटी रूही ने आत्महत्या कर ली थी और अब वो इस दुनिया में नहीं है।
शांता देवी अपने अश्रु को रोकते हुए और हकलाते हुए बोली वो…वो…सिर्फ प्यार के पीछे आत्महत्या नहीं थी, उसकी कोई और वजह थी।
अचानक से बाहर जोड़ से बिजली गिरी और उस मौसम के अंधेरे में इंस्पेक्टर साहब की आँखें दिख रही थी जैसे चौक सी गई थी ये सच सुनकर।
अपने आप को होश में वापिस लातें हुए बोले “ये आप क्या कह रही है? जरा विस्तार में बताएं।”
*हादसा वाला दिन*
अरे ऋषि जल्दी जल्दी सजावट पूरी कर फिर जाके रूही को भी कॉलेज से लेकर आ, समय नहीं है, टेंशन में उसकी मां ने बोला। ऋषि बोला तुम इतनी टेंशन मत लो मां, देखना सब अच्छा होगा और समय से भी हो जाएगा।
ऋषि कॉलेज बस आया ही था कि उसको रूही दिखी और अपनी बहन को देखते ही बोला “रूही चल जल्दी चल मा घर पर रहा देख रही है”। रूही अपने भाई ऋषि को उदास और हक जमाते हुए बोली “कितनी जल्दी है आपको, मुझे बधाई तो दो पहले”
दरअसल कॉलेज में रूही के परीक्षा का रिजल्ट आया था और उसने पूरे कॉलेज में टॉप किया था।
ऋषि ने तुरंत बोला “तू घर तो चल पहले” रूही अपने भाई की बात मान कर बैठ गई।
घर पर आते ही उसकी मां ने उसका आरती की थाली के साथ स्वागत किया और उसे ढेर सारी बधाई दी, साथ ही में ऋषि ने उसके हाथों में तौफा देकर उसे बधाई थी।
रूही यह सब देख के भावुक हो गई और अपनी मां को सीने से लगा लिया। उसकी मां की आँखें नम सी हो गई और बोली “चल रूही जल्दी से त्यार हो जा, तेरे लिए आज पार्टी रखी है, मेहमान भी आते होंगे।”
रूही अपनी माँ की आज्ञा मान कर कमरे में त्यार होने चली गई।
कुछ देर बाद मेहमान भी आना शुरू होगये और रूही भी त्यार होके नीचे आ रही थी। शांता देवी, रूही को देखते ही काला टीका लगाती है और कहती है मेरी बेटी को किसी की बुरी नज़र न लगे।
*आज का दिन*
शांता देवी रोते हुए बोली किसे पता था…किसे पता था कि मेरी बच्ची के ऊपर पहले से ही किसी की गंदी नज़र थी।
*हादसे की रात*
रूही…रूही कहा जा रही है बेटा? पीछे से शांता देवी ने टोकते हुए आवाज़ लगाई।
रूही पीछे मुड़कर बोली “मां मैं बस बाहर जा रही हू, मेरे एक दोस्त मुझसे मिलने आया है और फिर उसकी फ्लाइट भी है।”
शांता देवी का मन बेचैन सा हो रहा था पर अपनी बेटी की मुस्कान के आगे उन्होंने हां कर दी और बोली जल्दी आना बात करके।
किसे पता था कि वो वापिस नहीं आएगी। दो घंटे होने को चले थे रूही अब तक वापिस नहीं आई थी, अब तो मेहमान भी जाने लगे थे। तभी उनके फोन पर घंटी बजी और उस घर में उनके दिल की धक धक ही सुनाई दे रही थी। जब उन्होंने फोन उठाया, उधर से एक आदमी ने बोला “ये आपकी बेटी हॉस्पिटल में है, हालत बहुत नाजुक है, हमें ये नाले के पास दिखी थी।”
शांता देवी की तो जैसे दुनिया ही रुक गई थी जब उनको पता चला उनकी रूह रूही हॉस्पिटल में है।
वो चिल्लाते हुए ऋषि को बुलाती है और बोली “जल्दी चल ऋषि तेरी बहन हॉस्पिटल में हैं।”
उधर हॉस्पिटल में आते ही शांता देवी रोते हुए बोली मेरी बेटी…बेटी रूही कहा है? कैसे है वो?
डॉक्टर ने उनको अपने कैबिन में बुलाया और उनको धीमे स्वर में बोले “आपकी बेटी के साथ किसी ने बलात्कार किया है और वो अभी ज्यादा होश में नहीं है।”
यह सुनते ही शांता देवी सन्न रह गई जैसे किसी ने उनके ऊपर किसी ने ईंट फेंक दी हो।
ऋषि अपने आंसू को रोकते हुए और अपनी मां को संभालते हुए बोला, तुम फिकर मत करो मां हमारी रूही बहादुर है, वो बहुत जल्दी ठीक हो जाएगी।
कुछ हफ्तों बाद रूही की हालत में सुधार तो हो रहा था पर रूही का मन अब जीने का नहीं करता था। वो एक जिंदा लाश जैसे बन चुकी थी।
मां…मां तुम बहुत अच्छी हो, मैं बहुत खुश नसीब हू कि मुझे आप जैसे माँ मिली, अचानक से भावुक रूही बोली अपनी माँ को।
शांता देवी को लगा उनकी बेटी अब बोलने लगी है पर वो गलत थी।
उस रात रूही ने बालकनी से कूद कर आत्महत्या कर ली।
*आज का दिन*
इंस्पेक्टर साहब मेरी वजह से मेरी बेटी के साथ यह सब हुआ, काश…काश मैने उसको जाने न दिया होता उस दिन.. शांता देवी रोते रोते बोली और उनकी आँखें सूज सी गई थी।
इस *अपराध बोध* को अपने मन से निकाल दो तुम मां, तुम्हारी कोई गलती नहीं थी, ऋषि अपनी मां शांता देवी को सांत्वना देते हुए बोला। लेकिन बेटा… बेटा अगर…अगर मैने वो फैसला ना लिया होता तो आज यह नहीं होता।
आपने इतनी बड़ी बात पहले क्यों नहीं बताई? आश्चर्यजनक इंस्पेक्टर साहब ने पूछा।
ऋषि के चलते मैने यह बात नहीं बताई, उसकी तभी ही नई जॉब लगी थी और कोई शादी भी नहीं करता उससे अगर यह खबर बाहर फैल जाती। पर मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था शांता देवी नजरें झुकाए यह सब बोल रही थी।
इससे पहले कोई कुछ बोलता शांता देवी बोली मैं ही अपनी बेटी रूही की अपराधी हूँ और उसी शण उन्होंने जहर पी लिया और तत्काल दम तोड़ दिया।
अब बाहर का मौसम साफ हो गया था जैसे शांता देवी इस बड़े बोझ से आजाद हो गई थी।
इंस्पेक्टर साहब ने ऋषि को रूही और शांता देवी के लिए खेद हुआ और गुनेगारों को पकड़ने का वादा करके वो वहा से चले गये। ऋषि वहां सुबक सुबक कर बस रोता रहा।
लेखिका
तोषिका