सावित्री जी निहारिका की बात सुनकर सन्न रह गईं। उनके पास अपनी बेटी के इस कड़वे सच का कोई जवाब नहीं था। उन्होंने बस एक लंबी ठंडी आह भरी और कपड़ों की तह लगाने लगीं। लेकिन उस दिन निहारिका के अंदर एक चिंगारी सुलग उठी थी। उसे समझ आ गया था कि समाज ने औरतों को हमेशा एक भ्रम में रखा है।
उन्हें शादी के नाम पर एक घर का लालच दिया जाता है, जो असल में उनका होता ही नहीं है। निहारिका ने तय कर लिया कि वह अब किसी ‘मिस्टर’ का इंतजार नहीं करेगी जो उसे एक घर दे, बल्कि वह खुद अपना घर बनाएगी। एक ऐसा घर जो सिर्फ और सिर्फ उसके नाम से जाना जाएगा।
रात के ग्यारह बज चुके थे। शहर की सड़कों पर गाड़ियों का शोर अब कुछ थम सा गया था, लेकिन बारहवीं मंजिल पर स्थित उस फ्लैट की बालकनी में खड़ी निहारिका के मन का शोर शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। उसने अपने हाथ में पकड़े कॉफी के मग से एक घूंट लिया और सामने फैली गुड़गांव की जगमगाती स्काईलाइन को देखने लगी।
बत्तीस साल की निहारिका एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट थी। उसकी जिंदगी उस रफ्तार से दौड़ रही थी, जिसका सपना उसने कभी अपने छोटे से शहर बनारस में देखा था।
निहारिका की चाहत कोई बहुत बड़ी या आसमान से तारे तोड़ लाने वाली नहीं थी। जब वह पच्चीस-छब्बीस की थी, तब हर सामान्य लड़की की तरह उसने भी एक हमसफ़र का सपना देखा था। वह बस इतना चाहती थी कि उसका जीवनसाथी कम से कम उसके जितना या उससे थोड़ा अधिक पढ़ा-लिखा हो,
एक अच्छी नौकरी करता हो और उसके सपनों का सम्मान करता हो। यह एक बेहद जायज और सामान्य सी चाहत थी। लेकिन कहते हैं न, जिंदगी कोई बॉलीवुड फिल्म नहीं है जहाँ हर कहानी के अंत में हीरो मिल ही जाए। कभी-कभी जमीं तो कभी आसमाँ मिलता है, लेकिन सब कुछ एक साथ कहाँ मिलता है।
अरेंज मैरिज के बाज़ार में निहारिका की उच्च शिक्षा और अच्छी खासी तनख्वाह ही उसके लिए एक दीवार बन गई। जो लड़के उससे कम कमाते थे, उनका ईगो आड़े आ जाता था और जो ज्यादा कमाते थे, उन्हें एक ऐसी पत्नी चाहिए थी जो घर संभाले, उनके करियर को प्राथमिकता दे और खुद पीछे रहे।
निहारिका ने समझौता नहीं किया। उसने किसी ऐसे इंसान के साथ पूरी जिंदगी बिताने का रिस्क नहीं लिया जो उसकी उड़ान से डरता हो। सिंगल रहते हुए उसने अपना पूरा ध्यान अपनी प्रोफेशनल लाइफ पर लगा दिया। वह तरक्की की सीढ़ियां चढ़ती गई। लेकिन इस बड़ी सफलता के साथ एक बड़ा खालीपन भी उसकी जिंदगी में दाखिल हो गया था। बड़े शहर के अपने अलग ही रंग होते हैं। यहाँ भीड़ बहुत है, लेकिन अपनापन नदारद है। निहारिका का ऑफिस में बिजी शेड्यूल होता था। लेट इवनिंग जब वह थक-हारकर अपने किराए के क्वार्टर में लौटती, तो उसके स्वागत के लिए कोई इंसान नहीं, बल्कि एक गहरा सन्नाटा मौजूद होता था। ऐसे में वह सोफे पर गिर सी जाती और टीवी ऑन कर लेती। कभी हॉटस्टार, कभी नेटफ्लिक्स तो कभी अमेज़न प्राइम पर वह विदेशी सीरीज और देसी कंटेंट में खुद को डुबो देती। यही उसका वीकेंड था और यही उसकी सामाजिक जिंदगी। लोगों से उसका ज्यादा मिलना-जुलना नहीं होता था, क्योंकि मेट्रो सिटी का कल्चर उसके बनारस वाले कल्चर से बिल्कुल अलग था। यहाँ हर कोई अपने फ्लैट के बंद दरवाजों के पीछे अपनी एक अलग दुनिया बसाए हुए था।
कुछ महीने पहले दीवाली की छुट्टियों में जब निहारिका अपने घर बनारस गई थी, तो एक घटना ने उसकी सोच की दिशा ही बदल दी। बनारस का उनका पुश्तैनी घर बहुत बड़ा था। घर के बाहर एक बड़ी सी संगमरमर की पट्टिका लगी थी जिस पर मोटे अक्षरों में लिखा था- “राम निवास”। राम निवास यानी निहारिका के दादा जी का नाम। उस घर में निहारिका की दादी ने अपनी जिंदगी के साठ साल गुजारे थे। उसकी माँ ने अपने जीवन के पैंतीस वसंत उस घर के आंगन में बिता दिए थे। घर की एक-एक ईंट को उन दोनों औरतों ने अपने खून-पसीने और ममता से सींचा था। लेकिन उस घर पर उनका कोई नाम नहीं था।
त्योहार की साफ-सफाई चल रही थी। निहारिका की माँ, सावित्री जी, अपनी साड़ियों की अलमारी साफ कर रही थीं। निहारिका उनके पास ही बैठी थी। बातों ही बातों में सावित्री जी ने एक बार फिर निहारिका की शादी का राग छेड़ दिया। “बेटा, अब बहुत हो गया तेरा यह करियर-करियर। अब शादी कर ले। आखिर कब तक उस पराए शहर में किराए के मकानों में धक्के खाती रहेगी? लड़की का अपना एक घर होना बहुत जरूरी है निहारू। बिना घर के औरत का क्या वजूद?”
निहारिका ने गहरी सांस ली और अपनी माँ की आँखों में देखते हुए पूछा, “माँ, आप कहती हो औरत का अपना घर होना चाहिए। आप मुझे बताओ, क्या यह घर आपका है?”
सावित्री जी एकदम से चौंक गईं। उन्होंने झेंपते हुए कहा, “कैसी बात कर रही है? तेरे पापा का घर है, तो मेरा ही हुआ न! इस घर की मालकिन हूँ मैं।”
निहारिका मुस्कुराई, लेकिन उस मुस्कान में एक दर्द था। “नहीं माँ, यह घर आपका नहीं है। यह घर पहले दादा जी का था, अब पापा का है, और कल को भैया का हो जाएगा। आप इस घर की मालकिन नहीं, सिर्फ एक केयरटेकर हो। कभी बाहर जाकर उस नेमप्लेट को देखना। वहाँ लिखा है ‘राम निवास’। चिट्ठियां आती हैं तो ‘मिसेज राम नारायण’ या ‘मिसेज रमेश’ के नाम से आती हैं। मोहल्ले में यह घर ‘शर्मा जी के मकान’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ तक कि पीछे वाली गली में जो झुग्गी है, लोग उसे भी ‘रमुआ की झुग्गी’ कहते हैं। क्या दादी का, आपका, या उस झुग्गी वाली काकी का अपना कोई नाम नहीं है? औरत का अपना घर कभी होता ही नहीं माँ। वो बस आदमी के नाम से जाने जाने वाले घरों में एक किराएदार की तरह अपनी उम्र गुजार देती है।”
सावित्री जी निहारिका की बात सुनकर सन्न रह गईं। उनके पास अपनी बेटी के इस कड़वे सच का कोई जवाब नहीं था। उन्होंने बस एक लंबी ठंडी आह भरी और कपड़ों की तह लगाने लगीं। लेकिन उस दिन निहारिका के अंदर एक चिंगारी सुलग उठी थी। उसे समझ आ गया था कि समाज ने औरतों को हमेशा एक भ्रम में रखा है। उन्हें शादी के नाम पर एक घर का लालच दिया जाता है, जो असल में उनका होता ही नहीं है। निहारिका ने तय कर लिया कि वह अब किसी ‘मिस्टर’ का इंतजार नहीं करेगी जो उसे एक घर दे, बल्कि वह खुद अपना घर बनाएगी। एक ऐसा घर जो सिर्फ और सिर्फ उसके नाम से जाना जाएगा।
गुड़गांव लौटकर निहारिका ने अपने इस सपने पर काम करना शुरू कर दिया। उसने प्रॉपर्टी डीलर्स से संपर्क किया। जब वह अकेले साइट विजिट के लिए जाती, तो लोग उसे अजीब नजरों से देखते। एक दिन एक ब्रोकर ने उससे पूछ ही लिया, “मैडम, आप फ्लैट देख रही हैं, पर रजिस्ट्री किसके नाम पर होगी? हस्बैंड के नाम पर या जॉइंट?”
निहारिका ने बड़े गर्व से जवाब दिया, “रजिस्ट्री मेरे नाम पर होगी। मैं अकेले ही इसे खरीद रही हूँ।” ब्रोकर की आँखों में जो अचरज था, वह निहारिका को समाज की उसी संकीर्ण सोच का आईना लग रहा था।
महीनों की भागदौड़, बैंक के चक्कर, होम लोन के अप्रूवल और अनगिनत रातों की नींद कुर्बान करने के बाद, आखिरकार निहारिका ने गोल्फ कोर्स रोड पर एक खूबसूरत थ्री बीएचके फ्लैट खरीद लिया। उस फ्लैट को सजाने में निहारिका ने अपनी जान लगा दी। पर्दों के रंग से लेकर बालकनी के पौधों तक, हर एक चीज उसने खुद चुनी। यह सिर्फ ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं था; यह उसकी आजादी, उसकी मेहनत और उसके वजूद का प्रतीक था।
गृह प्रवेश के दिन निहारिका ने अपने माता-पिता और भाई को बनारस से बुलवाया। सावित्री जी और रमेश जी जब कैब से उतरकर निहारिका की सोसायटी में पहुंचे, तो वहां की भव्यता देखकर हैरान रह गए। लिफ्ट से बारहवीं मंजिल पर पहुँचकर जब वे निहारिका के फ्लैट के दरवाजे पर आए, तो निहारिका मुस्कुराते हुए आरती की थाल लिए खड़ी थी। लेकिन सावित्री जी की नजर आरती की थाल पर नहीं, बल्कि दरवाजे के पास लगी उस खूबसूरत, लकड़ी की हाथ से तराशी गई नेमप्लेट पर टिक गई।
उस नेमप्लेट पर किसी आदमी का नाम नहीं था। उस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था— “निहारिका”। बस एक शब्द। बिना किसी ‘मिस’ या ‘मिसेज’ के।
सावित्री जी के हाथ कांपने लगे। उन्होंने धीरे से उस नेमप्लेट को छुआ और उनकी आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। रमेश जी ने भी भारी आँखों से अपनी बेटी को देखा। आज उनकी बेटी ने वह कर दिखाया था जो सदियों से उनके परिवार की किसी औरत ने नहीं किया था। सावित्री जी ने निहारिका को गले लगा लिया और रोते हुए बोलीं, “तूने सच कहा था निहारू… मेरा अपना कोई घर नहीं था। लेकिन आज, इस दरवाजे पर तेरा नाम देखकर मुझे लग रहा है जैसे पीढ़ियों से चली आ रही हमारी गुमनामी को आज एक पहचान मिल गई है। यह सिर्फ तेरा घर नहीं है बेटा, यह हर उस औरत की जीत है जिसने हमेशा दूसरे के नाम के घर में अपनी जिंदगी बिता दी।”
निहारिका के भी आंसू छलक पड़े, लेकिन यह आंसू अकेलेपन के नहीं, बल्कि पूर्णता के थे। आज जब वह रात में बालकनी में खड़ी होकर शहर को देख रही थी, तो उसे अपने अकेलेपन से कोई शिकायत नहीं थी। उसे समझ आ गया था कि जिंदगी में हमसफर का होना जरूरी है, लेकिन अगर वो न मिले, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपकी जिंदगी रुक जाए। उसने खुद को ही अपना हमसफर बना लिया था। अब जब वह काम से थककर लौटती है, तो वह किसी पराए किराए के मकान में नहीं, बल्कि ‘अपने’ घर में कदम रखती है। दीवारें अब उसे काटने को नहीं दौड़तीं, बल्कि सुकून देती हैं। निहारिका ने साबित कर दिया था कि एक औरत को घर बसाने के लिए किसी आदमी की जरूरत नहीं होती; उसे बस अपने इरादों को मजबूत करने की जरूरत होती है।
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लेखक : अनंत मारवाड़ी