अपने तो अपने होते है – विमला गुगलानी

   कैनेडा में रात के दो बजे का समय, हरवंश को भारत से उसके खास मित्र जीवन का फोन आया। दिन भर के थके मांदे हरवंश का बिल्कुल मन नहीं था फोन पिक करने का लेकिन उसे लगा कि कोई खास ही बात होगी नहीं तो जीवन को भलीभातिं मालूम है ये समय हरवंश को फोन करने का नहीं। 

    मोबाईल लेकर वो दूसरे कमरे में चला गया और नींद में हैलो बोला, अभी वो कुछ कहने ही जा रहा था कि जीवन ने जल्दी जल्दी बोलते हुए कहा कि उसके भाई देवधर की जान खतरे में है। कुछ दिन पहले एक दुर्घटना में वह बुरी तरह घायल हो गया था। बच तो वह गया

लेकिन बहुत खून बह गया और डाक्टर यह भी कह रहे है कि किसी अपने बहन भाई या परिवार के सदस्य की जरूरत है, मैं ज्यादा तो नहीं समझ पाया लेकिन मेरे दोस्त, तूं जल्दी से कुछ कर और हो सके तो आ जा।

    यह सुनकर हरवंश की नींद भी उड़ गई और होश भी खो गए। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करे।जीवन ने उसे मैसेज करके डाक्टर का नं और कुछ और जानकारी भी भेजी थी। हरवंश ने जल्दी से हस्पताल के नं पर पैसे ट्रांसफर किए और लेपटाप खोलकर टिकट बुक करने लगा, दो दिन बाद की टिकट मिली। 

      हरवंश की पत्नी नैनसी और बेटी दुआ आराम से सो रहे थे। लेकिन हरवंश की आंखों में नींद कहा। उसी कमरे में पड़ी कुर्सी पर पैर रखकर वो सोफे पर ढ़ेर हो गया । आंखे बंद करने की कोशिश की लेकिन आंसू थे कि बंद आंखों से भी निकल कर लगातार बहे जा रहे थे। दस साल पहले की और बचपन की सारी यादें आखों के सामने ऐसे घूम रही थी जैसे कल की ही बात हो।

     हरवंश और देवधर सगे भाई, देवधर बड़ा था और हरवंश दो साल छोटा। गांव के स्कूल मास्टर के बेटे, उसी सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। मध्यम वर्गीय परिवार , अपना कच्चा पक्का सा घर और विरासत में मिली कुछ जमीन भी थी। पुश्तैनी गांव था तो  दूर पास के रिश्तेदार भी आसपास ही रहते थे।

परिवार में पढ़ाई का रिवाज उन दिनों कम ही था लेकिन पिताजी को पढ़ाई का शौक था, वो चाहते थे कि दोनों भाई खूब पढ़े लेकिन चाहने से सब पूरा नहीं होता। देवधर ने बारहवीं के बाद पढ़ने से मना कर दिया लेकिन हरवंश पढ़ने के लिए शहर चला गया। 

       देवधर ने जमीन की देखरेख के साथ प्रापर्टी का काम भी शुरू कर दिया, जो कि अभी खास चला नहीं लेकिन देवधर काफी मेहनत कर रहा था। दोनों भाईयों में बचपन से ही बहुत प्यार था। उमर में ज्यादा अंतर न होने के बावजूद भी हरवंश देवधर की बहुत इज्ज़त करता और उसकी हर बात मानता था,लेकिन भाग्य को यह सब मंजूर नहीं था।

सौदामनी नाम की साथ के एक छोटे गांव की लड़की ग्यारवीं में उनके स्कूल में पढ़ने लगी। दिन तो बचपन के थे मगर ये उम्र कुछ ऐसी थी। हरवंश को वो बहुत अच्छी लगती। देवधर तब बारहवीं कर चुका था। सौदामनी और हरवंश की एक ही क्लास थी परंतु सैक्शन और विषय अलग थे।

     पढ़ाई में दोनों होशियार थे, कई बार दोनों ने डिबेटस में हिस्सा भी लिया और थोड़ी बहुत बातचीत होती। वैसे भी शहरों और गांवों का माहौल अलग ही होता है। बारहवीं के बाद हरवंश शहर चला गया और देवधर वहीं काम पर लग गया।

माता पिता को भी सहारा था। सौदामनी के मामा का घर देवधर के गांव में ही था। सौदामनी नहीं जानती थी कि हरवंश और देवधर भाई है। हरवंश और सौदामनी की थोड़ी बहुत दोस्ती फेसबुक वगैरह पर रही लेकिन प्यार मुहब्बत जैसी कोई बात नहीं थी। 

          सौदामनी ने प्राईवेट ही ग्रेजुएशन कर ली तो घर वालों ने शादी की तैयारियां शुरू कर दी। हरवंश की बातों से सौदामनी को कुछ अहसास तो हो गया परंतु अपने परिवार की मर्यादा का उसे ध्यान था। उसके परिवार में शादी ब्याह घर वालों की मर्जी से ही होते थे।

सौदामनी के मामा और देवधर के पापा की जानकारी थी। हुआ कुछ ऐसा कि सौदामनी का रिश्ता देवधर के लिए आया। भले ही देवधर की पढ़ाई कम थी परंतु उसका काम और मास्टर जी के परिवार की बहुत इज्जत थी। 

       बात हरवंश तक भी पहुंची, वह बड़ा खुश हुआ लेकिन उसे पता नहीं था कि सौदामनी ही उसकी होने वाली भाभी है। रोके पर वो आ नहीं पाया क्योंकि उसके पैपर चल रहे थे।

जब उस तक फोटो पहुंचे तो वो सौदामनी को देखकर हैरान रह गया। पैपर देकर जब वो घर पहुचां तो उसने बिना किसी लागलपेट के सब के सामने कह दिया कि सौदामनी तो उसकी पंसद है। लेकिन अब क्या हो सकता था। 

    देवधर की कोई बात न टालने वाला हरवंश इस बात पर अड़ गया कि सौदामनी अगर इस घर में आएगी तो उसकी दुल्हन बनकर। देवधर इस शादी के लिए मना कर दे। बात बिगड़ती देखकर सौदामनी के मामा से बात की तो बात सौदामनी तक पहुंची। जब उसे पता चला तो उसने हरवंश से शादी करने से साफ इन्कार कर दिया। मंगनी हो चुकी थी। इसी बात से हरवंश इतना तमतमाया की वापिस शहर चल गया।शादी पर भी नहीं आया।

         पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। जल्दी ही उसे नौकरी मिल गई और दो साल बाद वो विदेश चला गया। घर वालों ने बहुत कोशिश कि लेकिन वो फिर गांव नहीं आया। वो भाई जिनकी एक दूसरे में जान बसती थी, जैसे शत्रु हो गए।देवधर ने तो कुछ नहीं कहा लेकिन हरवंश को लगता था

कि सारी गल्ती देवधर की है। इसी गम से मां तो चल बसी और पिताजी ने ऐच्छिक रिटायरमैंट ले कर ऐसा बिस्तर पकड़ा कि अपने घर तक ही सीमित रह गए। पल पल की खबर हरवंश को अपने जिगरी दोस्त जीवन से मिलती थी।

जीवन ने भी हरवंश को समझाया था कि यह सब संयोग है, देवधर की कोई गल्ती नहीं लेकिन हरवंश नहीं माना और उसने साफ कह दिया कि अगर वो उसका दोस्त है तो इस बात को यहीं खत्म कर दे। 

    बेचारा जीवन भी क्या करता। बिचौलिए की तरह वो हरवंश की खबर उसके पिता तक जरूर पहुचांता वो भी हरवंश को बिना बताए।यहां देवधर का काम ठीक सा था, दो बेटे हो गए थे,

पिताजी की बीमारी और सारे घर की जिम्मेवारी। पिताजी की पैंशन का बहुत सहारा था। लेकिन देवधर की दुर्घटना से सब बिखर गया। पैसा तो लगा सो लगा लेकिन उसको बचाने के लिए किसी अपने की जरूरत थी। पिताजी बूढ़े थे और बच्चे अभी छोटे थे तो सहारा हरवंश का ही था।

          सोच सोच में ही सुबह हो गई। नैनसी को सब बताकर वह भारत के लिए रवाना हो गया और सब भूलकर वो दिन रात भाई और परिवार के साथ रहा। पैसे की मदद के साथ साथ उसके शरीर के टुकड़े की भी जरूरत पड़ी, जो कि उसने खुशी खुशी दिया, जिससे उसके शरीर को भी कुछ फर्क नहीं पड़ा।

  साईंस ने कितनी भी तरक्की कर ली हो लेकिन खून के इलावा और भी बहुत सी जरूरते है जो  नहीं बना सका , वो इन्सान ही और वो भी मिलान होने पर इनसान दे सकता है।मास्टर जी भी पुत्र को मिलकर काफी ठीक हो गए। हरवंश ने सौदामनी से दिल से माफी मांगी और भाई के गले लग कर रोया। 

     परिवार सहित फिर आने का वायदा करके वो भरे मन से रवाना हुआ। किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि हरवंश लौटकर आएगा लेकिन अपने तो अपने ही होते है।

विमला गुगलानी

चंडीगढ़

वाक्य– भाई जैसा मित्र नहीं ना भाई जैसा शत्रु।

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