अपने लिए जीना भी जरूरी है – मीता राकेश 

  रात के ग्यारह बज चुके थे। रसोई की सिंक में बर्तनों का एक पहाड़ खड़ा था और डाइनिंग टेबल पर बिखरे हुए जूठे प्लेट इस बात की गवाही दे रहे थे कि आज घर में दावत थी।

वंदना ने एक गहरी सांस ली और अपनी कमर पर हाथ रखकर उसे सीधा करने की कोशिश की। पिछले चार घंटों से वह लगातार खड़ी थी। आज उसके पति, सुमित के कुछ पुराने दोस्त और उनके परिवार खाने पर आए थे। मेन्यू में शाही पनीर, दाल मखनी, पुलाव और तीन तरह की रोटियाँ थीं। सब कुछ वंदना ने अकेले बनाया था। सास, सुमित्रा जी, सोफे पर बैठकर मेहमानों से बातें कर रही थीं और बीच-बीच में रसोई की तरफ आवाज़ लगा देती थीं—”बहू, रायता कम पड़ गया है,” या “बहू, रोटियाँ गरम ही लाना।”

जब तक आखिरी मेहमान गया, वंदना के पैरों में सूजन आ चुकी थी। उसने जल्दी-जल्दी टेबल साफ़ की और अपने लिए खाना खाने बैठी। जब उसने कैसरोल खोला, तो देखा कि उसमें सिर्फ एक सूखी रोटी और थोड़ी सी दाल की खुरचन बची थी। शाही पनीर का डोंगा एकदम साफ़ था, जैसे किसी ने उसे चाट लिया हो। पुलाव का एक दाना भी नहीं बचा था।

वंदना ने एक पल के लिए उस खाली डोंगे को देखा। भूख से उसकी आंतें कुलबुला रही थीं। उसे उम्मीद थी कि सुमित या सुमित्रा जी ने शायद उसके लिए थोड़ा खाना अलग निकाल कर रखा होगा, जैसा कि एक परिवार में होता है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था।

तभी सुमित पानी पीने के लिए रसोई में आया। उसने वंदना को खाली डोंगे को घूरते हुए देखा। बजाय इसके कि उसे अफ़सोस होता या वह पूछता कि तुमने खाया या नहीं, उसने लापरवाही से कहा, “अरे, पनीर खत्म हो गया? देखो वंदना, तुम्हें अंदाज़ा होना चाहिए था कि कितने लोग हैं। और वैसे भी, तुम परोसते वक्त ध्यान क्यों नहीं रखती? इनको पता चलता है तो कहते हैं सबको ऐसे मत परोसा करो कि तुम्हारे लिए कुछ बचे ही ना। पहले अपना हिस्सा निकाल लिया करो। अब भूखे पेट सोने की क्या ज़रूरत है?”

वंदना ने सुमित की आँखों में देखा। वहां चिंता नहीं, एक तरह का उलाहना था। जैसे खाना कम पड़ना या वंदना का भूखा रहना भी वंदना की ही ‘मैनेजमेंट’ की गलती हो।

तभी सुमित्रा जी भी अपनी दवा लेने आ गईं। उन्होंने भी वही सुर अलापा, “अरे, तो क्या हो गया? सासू मां देखकर कहती हैं दुबारा बना लो मैंने हाथ थोड़े ही पकड़ा है। आटा रखा है फ्रिज में, दो परांठे सेक ले अपने लिए। कौन सी बड़ी बात है?”

वंदना की आँखों में आंसू तैरने लगे। बड़ी बात? बड़ी बात यह नहीं थी कि खाना खत्म हो गया था। बड़ी बात यह थी कि सुबह छह बजे से रात के ग्यारह बजे तक मशीन की तरह खटने के बाद, जब उसका शरीर टूटने लगा था, तब उससे उम्मीद की जा रही थी कि वह दुबारा बनाने की हिम्मत जुटाए। किसी ने यह नहीं कहा कि “बहू, तुम बैठो, मैं दो परांठे सेक देती हूँ,” या सुमित ने यह नहीं कहा कि “चलो, हम ऑनलाइन कुछ मंगा लेते हैं।”

“मेरा पेट भरा है,” वंदना ने झूठ बोला और पानी पीकर अपने कमरे में चली गई। वह जानती थी कि अगर वह बहस करेगी तो बात का बतंगड़ बन जाएगा।

उस रात वंदना को नींद नहीं आई। भूखे पेट और अपमानित मन ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया। यह सिर्फ आज की बात नहीं थी। यह उसकी ज़िंदगी का पैटर्न बन चुका था। वह सबके लिए करती थी—अपनी नींद, अपनी भूख, अपने शौक, सब कुछ काटकर वह परिवार की थाली में परोस देती थी। और बदले में उसे क्या मिलता था? यह ताना कि उसने अपने लिए क्यों नहीं बचाया?

वंदना एक फ्रीलांस ग्राफिक डिज़ाइनर थी। शादी से पहले वह अपने काम को लेकर बहुत जुनूनी थी। लेकिन शादी के बाद, घर की जिम्मेदारियों के तले उसका लैपटॉप धूल फांकने लगा था। जब भी वह काम करने बैठती, कोई न कोई आवाज़ आ जाती—”वंदना चाय,” “वंदना नाश्ता,” “वंदना मेहमान आ रहे हैं।” वह अपना काम छोड़कर दौड़ पड़ती। नतीजा यह हुआ कि उसके क्लाइंट्स छूट गए, उसके प्रोजेक्ट्स अधूरे रह गए।

और जब वह सुमित से कहती कि उसे अपने करियर के लिए वक्त नहीं मिल रहा, तो सुमित यही कहता, “तो मैंने कब रोका है? तुम टाइम मैनेज नहीं कर पातीं। तुम घर के कामों में इतना वक्त लगा देती हो कि अपने लिए कुछ बचता ही नहीं।”

सुमित्रा जी भी यही कहतीं, “अरे, हम तो कहते हैं काम करो। पर घर तो देखना ही पड़ेगा ना। मैंने हाथ थोड़े ही पकड़े हैं तुम्हारे।”

आज की घटना ने वंदना को एक आईना दिखा दिया था। वे लोग सही कह रहे थे। वे उसका हाथ नहीं पकड़ रहे थे, वे बस उसे सहारा नहीं दे रहे थे। और वह मूर्खों की तरह इंतज़ार कर रही थी कि कोई उसे थाली में सजाकर उसका ‘हक’ और ‘समय’ देगा।

अगली सुबह वंदना जल्दी उठी। लेकिन आज उसने रसोई का रुख नहीं किया। उसने अपना योग मैट निकाला और बालकनी में कसरत करने लगी।

सुमित्रा जी उठीं और चाय न पाकर बड़बड़ाती हुई रसोई में गईं। वहां सन्नाटा था।

“बहू! अरे वंदना! आज चाय नहीं बनी?”

वंदना बालकनी से ही बोली, “मम्मीजी, मैं योग कर रही हूँ। पंद्रह मिनट में आऊंगी।”

सुमित्रा जी हैरान रह गईं। आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ था। वे गुस्से में बुदबुदाईं और खुद चाय बनाने लगीं। जब सुमित उठा और उसे मोज़े नहीं मिले, तो उसने आवाज़ लगाई, “वंदना, मेरे मोज़े कहाँ हैं?”

वंदना ने अंदर आकर शांत स्वर में कहा, “दराज़ में हैं सुमित। ढूंढ लो। मैं अभी नाश्ता बनाने जा रही हूँ।”

उस दिन नाश्ते की टेबल पर माहौल थोड़ा तनावपूर्ण था। वंदना ने सबके लिए पोहा बनाया था। उसने सबसे पहले एक प्लेट में अपने लिए पोहा निकाला और इत्मीनान से कुर्सी पर बैठकर खाने लगी।

सुमित और सुमित्रा जी उसे देख रहे थे। हमेशा वंदना सबको खिलाने के बाद, अंत में खड़ी-खड़ी जो बचता था, वह खाती थी।

“तुम… तुम पहले खाने बैठ गईं?” सुमित ने पूछ ही लिया।

वंदना ने चम्मच मुंह में डाला, चबाया और फिर मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ सुमित। कल रात तुमने ही तो समझाया था। ‘सबको ऐसे मत परोसा करो कि तुम्हारे लिए कुछ बचे ही ना।’ तो मैंने सोचा, शुरुआत खुद से ही करनी चाहिए। अगर मैं अपनी प्लेट पहले नहीं भरूंगी, तो दुनिया मुझे भूखा ही सुला देगी।”

सुमित के पास इसका कोई जवाब नहीं था। बात तो उसी की थी, बस अमल वंदना ने अपने तरीके से किया था।

दिन बीतते गए और वंदना ने धीरे-धीरे अपने जीवन की ‘थाली’ में बदलाव करना शुरू कर दिया। अब जब उसके काम का समय होता, तो वह अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लेती।

एक शाम सुमित्रा जी की सहेलियाँ आने वाली थीं। सुमित्रा जी ने आदत के अनुसार कहा, “बहू, शाम को पकोड़े और समोसे बना लेना। और हां, गुलाब जामुन भी।”

वंदना अपने लैपटॉप पर एक नए प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। उसने स्क्रीन से नज़रें हटाए बिना कहा, “मम्मीजी, आज मेरी डेडलाइन है। मैं शाम को रसोई में नहीं आ पाऊंगी। आप मंगा लीजिए या फिर महाराज जी (रसोइया) को बुला लीजिए।”

सुमित्रा जी का पारा चढ़ गया। “यह क्या तरीका है? घर आए मेहमानों को बाज़ार का खिलाएंगे? बहू होकर इतना भी नहीं कर सकती?”

वंदना उठी और सुमित्रा जी के पास गई। उसने बहुत ही अदब से कहा, “मम्मीजी, आपको याद है? आप कहती थीं, ‘मैंने हाथ थोड़े ही पकड़े हैं, काम कर लो।’ आज मैं वही कर रही हूँ। मैं अपना काम कर रही हूँ। अगर मैं अभी पकोड़े तलने गई, तो मेरे करियर के लिए फिर से ‘कुछ नहीं बचेगा’। और अब मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है कि अपना भविष्य खराब करके, फिर से शून्य से शुरुआत करूँ।”

सुमित्रा जी वंदना का यह नया रूप देखकर दंग थीं। यह विद्रोह नहीं था, यह आत्म-सम्मान की बहाली थी। वंदना ने चीखना-चिल्लाना नहीं सीखा था, उसने बस ‘ना’ कहना सीख लिया था।

शुरुआत में घर में बहुत क्लेश हुआ। सुमित ने उसे स्वार्थी कहा, सुमित्रा जी ने उसे कामचोर कहा। लेकिन वंदना टस से मस नहीं हुई। वह घर के काम करती, लेकिन अपनी शर्तों पर। वह अब ‘बची-कुची’ ज़िंदगी नहीं जी रही थी।

दो महीने बाद, वंदना को एक बड़ी पब्लिशिंग हाउस से कॉन्ट्रैक्ट मिला। उसकी डिज़ाइन्स को बहुत सराहा गया था। जिस दिन उसे पहला चेक मिला, उसने पूरे परिवार को डिनर पर बाहर ले जाने का फैसला किया।

रेस्तरां में सब बैठे थे। सुमित वंदना की सफलता से थोड़ा खुश और थोड़ा शर्मिंदा भी था। उसने देखा कि वंदना अब वह सहमी हुई, थकी हुई औरत नहीं थी। उसके चेहरे पर एक चमक थी, आत्मविश्वास था।

खाना ऑर्डर किया गया। जब वेटर ने खाना परोसा, तो सुमित ने आदतन सबसे पहले अपनी प्लेट आगे की। लेकिन फिर वह रुका। उसने डोंगा उठाया और सबसे पहले वंदना की प्लेट में खाना डाला।

“यह क्या?” वंदना ने हंसते हुए पूछा।

“कुछ नहीं,” सुमित ने नज़रें चुराते हुए कहा। “बस यह सुनिश्चित कर रहा हूँ कि इस बार तुम्हारे लिए सबसे पहले बचे, न कि सबसे आखिर में।”

सुमित्रा जी भी यह देख रही थीं। शायद उन्हें भी समझ आ गया था कि जिस बहू को वे दबाने की कोशिश कर रही थीं, वह दबने वाली नहीं थी। और सच तो यह था कि वंदना के खुश रहने से घर का माहौल भी हल्का हो गया था। अब वंदना चिड़चिड़ी नहीं रहती थी, क्योंकि वह ‘खाली पेट’ नहीं जी रही थी—न भोजन के मामले में, न भावनाओं के मामले में।

घर लौटते वक्त वंदना ने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा। उसे वह रात याद आई जब वह सूखी रोटी और दाल देखकर रोई थी। उस रात उसे लगा था कि वह बेचारी है। लेकिन आज उसे समझ आया कि वह रात उसके जीवन का टर्निंग पॉइंट थी।

दूसरों को परोसना सेवा है, लेकिन खुद को खाली कर देना मूर्खता है। यह पाठ उसे किसी किताब ने नहीं, बल्कि उस एक खाली डोंगे ने सिखाया था।

वंदना ने मन ही मन उस रात का शुक्रिया अदा किया। उसने सीख लिया था कि जीवन की दावत में, अपनी कुर्सी सबसे पहले खुद खींचनी पड़ती है, कोई और आपके लिए सीट रिज़र्व नहीं रखता। और जब आप अपनी कद्र करते हैं, तभी दुनिया—और आपका परिवार—भी आपको ‘बचे हुए’ की तरह नहीं, बल्कि ‘खास’ की तरह ट्रीट करता है।

अब वंदना की थाली कभी खाली नहीं रहती थी—न खाने से, न सपनों से।

लेखिका : मीता राकेश 

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