पिछले कुछ वर्षों से विनय जी का मन रह-रहकर व्याकुल हो उठता है।उनके दिल में एक टीस-सी उठती रहती है -“काश!अपनी ग़लती का पश्चाताप करने का अवसर मिल जाता,तो अपराध-बोध से मुक्ति मिल जाती!”
विनय जी को पता है कि अब उन्हें पश्चाताप का अवसर कभी नहीं मिलेगा।एक छटपटाहट सदा के लिए उनके दिल में कैद होकर रह गई है। छुट्टी का दिन है,उनकी पत्नी मीना बच्चों के साथ घूमने गई है, तबीयत खराब होने के बहाने से वे घर में अकेले रह गए हैं।आज उनकी माॅं की दूसरी पुण्यतिथि है। उन्होंने अनाथालय जाकर बच्चों को खाना खिलाया,उनकी जरूरतों के हिसाब से सामान दिया, फिर भी उनकी आत्मा को शांति नहीं मिली।घर आकर चुपचाप माॅं की तस्वीर के आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गए।उनकी ऑंखों से लगातार पश्चाताप स्वरुप अश्रु बह रहे थे । माॅं की तस्वीर को एक बार फिर अश्रुपूरित नयनों से देखकर कुर्सी पर आकर बैठ गए।
घर में किसी के न होने से सन्नाटा पसरा हुआ था।वह खुद कुछ देर एकाकी पल बिताना चाहते थे, परन्तु एकाकी पल पाकर अतीत के पन्नों की फड़फड़ाहट कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी।न चाहते हुए भी उन्हें माॅं की याद बहुत सताने लगी।जो बालक एक पल के लिए भी माॅं का ऑंचल नहीं छोड़ता था,वही बड़े होने पर धीरे-धीरे माॅं से कैसे दूर होता चला गया? उन्हें आज भी याद है कि अचानक से हृदयाघात से उनके पिता की मृत्यु हो गई थी।उस समय उनकी उम्र दस साल और उनकी बहन की उम्र आठ साल थी।माॅं तो इस आकस्मिक आघात से वेदना की महोदधि में आपादमस्तक डूब चुकी थी।कुछ दिनों तक उनकी मौसी रमा ने उनकी देख-भाल की। रमा ने उन्हें समझाते हुए कहा था -“बहन!यह कटु सत्य है कि एकाकी स्त्रियों को बहुत कुछ झेलना पड़ता है, असंख्य दंश झेलने पड़ते हैं।मुझे पता है कि तुम्हारी सारी उमंगें ,सारे सुख तिरोहित हो गए हैं, परन्तु तुम्हें बच्चों की खातिर जिंदगी जीनी होगी।उनका ढ़ाल बनकर उन्हें जमाने की बुरी नजरों से बचाना होगा!”
बहन की बातें सुनकर उनकी माॅं बिलख पड़ी और उस दिन ऑंसुओं के साथ उनकी संपूर्ण अव्यक्त व्यथा भी बह निकली । वह बच्चों की खातिर धीरे-धीरे नियति के कुठाराघात से उबरने लगी।
माॅं की स्नेहमयी छवि एक समय उनकी जिंदगी में धूमिल हो चुकी थी,इस कारण बार-बार माॅं के बुलाने पर भी जाने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर देते थे।अब महसूस होता है कि माॅं एक बार मिलकर अपने दिल की बात सुनाना चाहती थी,जिसका मौका उन्हें नहीं मिला।न जाने कितनी बातें मन की मन में ही रह गईं होंगी,जो वे अब महसूस कर रहें हैं।उस समय महसूस किया होता,तो आज यह अपराध-बोध उन्हें नहीं सताता!बचपन से ही वे माॅं के साथ साऍं की तरह लगे रहते थे। बच्चों की जिन्दगी सॅंवारने की जंग माॅं खुद अकेली लड़ती रहीं।जब वे सरकारी अफसर बन गए,तो दुर्दिन खत्म होने की खुशी में माॅं की ऑंखों में ऑंसू आ गए थे।माॅं दोनों बच्चों को गले लगाकर ममता के समंदर में डूबने-इतराने लगी।
विनय जी के मन में जहाॅं एक ओर माॅं को अंतिम समय में अपने पास न रखने का अपराध-बोध है,तो एक छोटी-सी तसल्ली भी उनके मन में है।छोटी बहन की शादी के समय उन्होंने माॅं की एक-एक इच्छाओं और भावनाओं का ख्याल रखा।बहन की शादी के बाद माॅं के चेहरे का सुकून याद कर आज भी उनके होंठ मुस्करा उठे।
नौकरी लगने के बाद से ही विनय जी की माॅं की ऑंखों में जिजिविषा दिखने लगी थी।सब कुछ अच्छा चलने लगा, परन्तु उनकी शादी के बाद से ही समस्या शुरू हो गई।अब इस उम्र में विनय जी अपने साथ रखकर माॅं को जिंदगी के बचे हुए चंद लम्हों को खुशियों से भर देना चाहते थे, परन्तु उनकी पत्नी को उनकी माॅं की उपस्थिति नागवार गुजरती।
पत्नी की बातों में आकर उन्होंने दिल पर कठोर पत्थर रखकर माॅं को गाॅंव छोड़ दिया। बीच-बीच में माॅं से मिलने जाया करते थे।बिना कोई शिकवा- शिकायत के माॅं अपने आशीर्वाद से उनकी झोलियाॅं भर देती।उनकी मनपसंद चीजें बनाती। पिछली बार जब वे माॅं से मिलने गए थे,तो माॅं कुछ अशक्त थी।उस समय एक बार भी उन्हें माॅं को अपने पास शहर ले आने का ख्याल नहीं आया।आज उन्हें एहसास हो रहा है कि पत्नी का ऐसा भी क्या डर जो जन्मदात्री के कष्टों से विमुख कर दें!पत्नी को इसका कारण न मानकर आज वे खुद को डरपोक मानते हैं।अगर उनमें साहस होता तो उनकी पत्नी किसी भी हाल में उन्हें जन्मदात्री से अलग नहीं कर पाती।आज उन्हें समझ में आ रहा है कि सचमुच अगर बेटा अपने माता-पिता को उपेक्षित न समझें ,तो बहू कभी भी सास-ससुर की अवहेलना नहीं कर सकती है।
कुछ दिनों से माॅं बार-बार उन्हें गाॅंव आने को कह रही थी, परन्तु काम की अधिकता का बहाना बनाकर टालते जा रहे थे। आखिरकार उनको माॅं के पार्थिव शरीर के ही दर्शन हुए। वे माॅं की याद में भाव-विह्वल हो उठे।उसी समय काॅलबेल की आवाज से उनकी चेतना भंग हुई।दरवाजा खोलते ही पत्नी उनकी भावनाओं को समझ गई।उसने कहा -“विनय! मुझे माफ कर दो।उस समय मैं तुम्हारी और माॅं जी की भावनाओं को न समझ सकी। मैं भी अपने व्यवहार के कारण अपराध-बोध से ग्रसित हो जाती हूॅं।हम बहुऍं माॅं-बेटे के रिश्तों की गहराई को नहीं समझ पाती हैं! “
विनय जी पत्नी की बातों का कोई जबाव न देकर बेटी को गले से लगा लेते हैं,मानो अपनी माॅं के सुखद स्पर्श के एहसास को ढ़ूॅंढ़ रहे हों!
समाप्त।
लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)