अपमान का घूंट – हेमलता गुप्ता 

अरे जब बाप ही ऐसा हो, तो बेटी तो ऐसी होगी ही ना, ससुर जी जरा सख्त होते हुए बोले… पहली बार ससुराल आए पिता की बेज्जती होते देख, बेटी ने सास ससुर को सिखाया ऐसा सबक कि उनके होश उड़ गए….

शहर के सबसे पॉश इलाके ‘सिविल लाइन्स’ में स्थित मल्होत्रा मेंशन आज रोशनी से नहाया हुआ था। मौका था घर के छोटे पोते, आरव के पांचवें जन्मदिन का। लॉन में महंगी गाड़ियों का जमावड़ा था, वेटर शैम्पेन और स्टार्टर्स लेकर घूम रहे थे, और शहर के नामचीन लोग एक-दूसरे की झूठी तारीफों में मशगूल थे।

इस भीड़भाड़ और चकाचौंध के बीच, घर की बहू, नंदिनी, रसोई से लेकर मेहमानों की खातिरदारी तक, हर ज़िम्मेदारी बखूबी निभा रही थी। नंदिनी एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) थी, लेकिन घर में उसका रूतबा एक ‘आज्ञाकारी बहू’ से ज़्यादा कुछ नहीं था। उसके ससुर, मिस्टर बलराज मल्होत्रा, शहर के बड़े बिल्डर थे और उन्हें अपने पैसे और रुतबे पर ज़रूरत से ज़्यादा घमंड था। नंदिनी के पति, विक्रांत, अपने पिता की परछाई थे—पैसे उड़ाने में माहिर और रिश्तों को तौलने में कच्चे।

तभी गेट पर एक ऑटो रिक्शा आकर रुका। उसमें से एक बुजुर्ग उतरे। उन्होंने साधारण सा धोती-कुर्ता पहन रखा था और हाथ में एक कपड़े का थैला था। वे नंदिनी के पिता, मास्टर दीनानाथ थे। एक रिटायर्ड स्कूल टीचर, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी ईमानदारी और सादगी में बिता दी थी।

गार्ड ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन तभी नंदिनी की नज़र पड़ गई। वह दौड़कर गेट पर गई।

“पापा! आप आ गए?” नंदिनी ने झुककर पिता के पैर छुए।

दीनानाथ जी ने मुस्कुराते हुए बेटी के सिर पर हाथ रखा। “जीती रहो बेटा। आरव कहाँ है? देख, मैं उसके लिए क्या लाया हूँ।”

नंदिनी पिता को लेकर अंदर हॉल में आई। हॉल में एसी की ठंडक थी और महंगे इत्र की खुशबू। दीनानाथ जी की साधारण वेशभूषा वहां मौजूद डिज़ाइनर सूट और साड़ियों के बीच एकदम अलग लग रही थी।

मिस्टर बलराज सोफे पर बैठे अपने दोस्तों के साथ व्हिस्की का ग्लास टकरा रहे थे। दीनानाथ जी को देखते ही उनके चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। उन्होंने उठने की ज़हमत नहीं उठाई।

“अरे समधी जी! आइए, आइए,” बलराज जी ने बैठे-बैठे ही आवाज़ दी। “हमें लगा आप रास्ता भूल गए होंगे। ऑटो वाले ने अंदर आने दिया? आजकल ये गार्ड्स ग़रीब दिखने वालों को जल्दी घुसने नहीं देते।”

दीनानाथ जी ने अपमान का घूंट पी लिया और मुस्कुराए। “अरे नहीं समधी जी, नंदिनी आ गई थी।”

वे आरव के पास गए, जो ढेरों महंगे खिलौनों—रिमोट वाली कार, वीडियो गेम्स, रोबोट्स—के बीच बैठा था।

“जन्मदिन मुबारक हो मेरे बच्चे,” दीनानाथ जी ने आरव को गोद में नहीं उठाया क्योंकि उनके कपड़े धूल भरे थे, बस उसके गाल सहलाए।

उन्होंने अपने थैले से एक डिब्बा निकाला। वह गत्ते का पुराना सा डिब्बा था।

आरव ने उसे खोला। अंदर लकड़ी का बना एक सुंदर सा ‘घोड़ा’ था, जो चाबी भरने पर चलता था। यह दीनानाथ जी ने खुद अपने हाथों से लकड़ी तराश कर बनाया था।

मिस्टर बलराज ने जोर से ठहाका लगाया। “वाह! क्या गिफ्ट है! समधी जी, 21वीं सदी में लकड़ी का घोड़ा? यहाँ मेरा पोता आईपैड चलाता है और आप उसे यह… यह क्या है? इसे तो वो हाथ भी नहीं लगाएगा।”

वहाँ मौजूद मेहमान भी दबी हंसी हंसने लगे।

दीनानाथ जी सहम गए। “वो… मुझे लगा बच्चों को हाथ से बनी चीज़ें पसंद आती हैं। इसमें प्लास्टिक नहीं है, सुरक्षित है।”

“सुरक्षित?” बलराज जी ने मुंह बनाया। “इसे ‘कंजूसी’ कहते हैं मास्टर जी। अरे, अगर पैसे नहीं थे तो हमसे मांग लेते। हम भिजवा देते कुछ अच्छा गिफ्ट। दामाद के घर आ रहे थे, कुछ तो स्टैंडर्ड का ख्याल रखते।”

नंदिनी का चेहरा गुस्से से लाल होने लगा था, लेकिन वह चुप रही। उसे लगा बात यहीं ख़त्म हो जाएगी।

लेकिन बलराज जी का अहंकार आज सातवें आसमान पर था। उन्होंने नंदिनी की सास, मिसेस शालिनी, की तरफ देखकर कहा, “देखा शालिनी? मैं तुमसे कहता था न कि खानदान देखकर रिश्ता करना चाहिए। मास्टर की बेटी है, इसीलिए तो नंदिनी भी ऐसी ही है। घर में इतना पैसा है, फिर भी नौकरों की तरह खटती रहती है। एक रुपया खर्च करने में इसकी जान निकलती है। अरे, जब बाप ही ऐसा कंजूस और छोटी सोच का हो, तो बेटी तो ऐसी होगी ही ना! खून का असर है भाई, खून का असर।”

यह वाक्य नंदिनी के कानों में पिघला हुआ सीसा बनकर उतरा। उसके पिता का अपमान? और वो भी उसके सामने? और सिर्फ़ गरीबी या सादगी के कारण?

नंदिनी, जो अभी मेहमानों को केक सर्व कर रही थी, ने प्लेट वहीं टेबल पर जोर से पटकी। आवाज़ इतनी तेज़ थी कि हॉल में सन्नाटा छा गया। डीजे का संगीत भी धीमा पड़ गया।

नंदिनी धीरे-धीरे चलकर अपने ससुर के सामने आई। उसकी आँखों में अब वह लिहाज नहीं था जो पिछले तीन सालों से था।

“क्या कहा आपने पापाजी?” नंदिनी की आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें तूफ़ान जैसी गूंज थी। “जरा फिर से कहियेगा।”

बलराज जी चौंक गए। “क्या मतलब? मैंने ग़लत क्या कहा? तुम्हारा बाप फटेहाल आया है, लकड़ी का खिलौना लाया है, तो सच ही तो है। जैसी परवरिश, वैसे लक्षण।”

नंदिनी ने अपने पिता का हाथ थाम लिया, जो अपमान से सिकुड़ रहे थे। उसने पिता को सोफे पर बिठाया, जहाँ बलराज जी बैठे थे, और खुद खड़ी हो गई।

“आपने बिल्कुल सही कहा पापाजी,” नंदिनी ने पूरे हॉल को संबोधित करते हुए कहा। “जब बाप ऐसा होता है, तो बेटी ऐसी ही होती है। और आज मैं आपको बताती हूँ कि ‘ऐसी’ होने का मतलब क्या है।”

विक्रांत ने आगे बढ़कर नंदिनी का हाथ पकड़ने की कोशिश की। “नंदिनी, तमाशा मत करो। डैड नशे में हैं।”

नंदिनी ने विक्रांत का हाथ झटक दिया। “दूर रहो विक्रांत। आज बात संस्कारों की है, और तुम बीच में नहीं आओगे।”

नंदिनी ने अपनी सास और ससुर की आँखों में आँखें डालीं।

“आप कहते हैं मेरे पिता कंजूस हैं? हाँ, हैं वो कंजूस। क्योंकि उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई कभी अय्याशियों में नहीं उड़ाई। उन्होंने पाई-पाई बचाकर मुझे और मेरे भाई को पढ़ाया, हमें काबिल बनाया। यह जो लकड़ी का घोड़ा आपको ‘कचरा’ लग रहा है न, इसे बनाने में उन्होंने अपनी रातों की नींद और हफ़्तों की मेहनत लगाई है। यह बाज़ार में नहीं मिलता, यह प्रेम की फैक्ट्री में बनता है। लेकिन अफ़सोस, आप लोग ‘कीमत’ जानते हैं, ‘मूल्य’ (Value) नहीं।”

बलराज जी गुस्से से खड़े हो गए। “जुबान लड़ाती है? भूल गई कि तू मल्होत्रा खानदान की बहू है? तेरा यह मास्टर बाप मेरी प्रॉपर्टी के एक कोने को भी नहीं खरीद सकता।”

“प्रॉपर्टी?” नंदिनी हंसी, एक कड़वी और व्यंग्यात्मक हंसी। “कौन सी प्रॉपर्टी पापाजी? वो, जो बैंक के पास गिरवी पड़ी है?”

हॉल में फुसफुसाहट शुरू हो गई। बलराज जी का चेहरा पीला पड़ गया।

“चुप रहो नंदिनी!” बलराज जी चिल्लाए।

“क्यों चुप रहूँ?” नंदिनी ने अब आवाज़ ऊंची कर ली। “आज बात निकली है तो दूर तक जाएगी। आप सबको मेरी ‘कंजूसी’ का ताना देते हैं न? आप कहते हैं न कि बाप के असर के कारण मैं पैसे खर्च नहीं करती? तो सुनिए सब लोग…”

नंदिनी ने पास रखी एक फाइल उठाई (जो वह ऑफिस से लाई थी)।

“पिछले दो सालों से ‘मल्होत्रा बिल्डर्स’ दिवालिया होने की कगार पर है। आपके बेटे विक्रांत ने जुए और सट्टे में करोड़ों उड़ा दिए। आपने, ससुर जी, अपनी झूठी शान बनाए रखने के लिए बाज़ार से इतना कर्ज़ लिया कि आज यह घर नीलाम होने वाला था। वो मैं थी… मास्टर दीनानाथ की बेटी… जिसने अपनी सीए (CA) की अक्ल लगाकर, अपनी सैलरी का एक-एक पैसा लगाकर और घर के फालतू खर्चों (जिन्हें आप कंजूसी कहते हैं) को रोककर आपकी किश्तें भरीं।”

मिसेस शालिनी घबरा गईं। “नंदिनी, घर की बात बाहर…”

“घर की बात?” नंदिनी ने उन्हें रोका। “जब मेरे पिता की बेइज्जती सरेआम हो रही थी, तब यह घर की बात नहीं थी? जब मेरे संस्कारों पर उंगली उठाई गई, तब आपको शर्म नहीं आई?”

नंदिनी ने बलराज जी की ओर देखा।

“हाँ, मैं अपने बाप जैसी हूँ। इसीलिए जब आप लोग डूब रहे थे, तो मैं भागी नहीं। मैंने ज़िम्मेदारी उठाई। अगर मैं आप जैसी होती, या आपके बेटे जैसी होती, तो अब तक यह घर छोड़कर जा चुकी होती और आप लोग सड़क पर होते। मेरे पिता ने मुझे सिखाया है कि मुसीबत में परिवार का साथ नहीं छोड़ते, चाहे परिवार वाले कितना भी अपमान करें। इसे ‘संस्कार’ कहते हैं पापाजी, जो पैसों से नहीं खरीदे जा सकते।”

दीनानाथ जी की आँखों से आंसू बह रहे थे। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी बेटी उनके सम्मान के लिए दुर्गा बन जाएगी।

नंदिनी ने एक और कड़वा सच उजागर किया।

“और यह पार्टी? यह जो लाखों रुपये फूंक रहे हैं आप? यह पैसा कहाँ से आया? यह पैसा मैंने आरव की पढ़ाई के लिए फिक्स डिपाजिट (FD) में रखा था, जिसे विक्रांत ने मेरे जाली दस्तखत करके तुड़वा लिया। सिर्फ़ इसलिए ताकि आप समाज में अपनी झूठी नाक ऊंची रख सकें।”

पूरी महफ़िल स्तब्ध थी। जो लोग बलराज जी की वाह-वाही कर रहे थे, अब उन्हें हिकारत भरी नज़रों से देख रहे थे। बलराज जी, जो अभी तक शेर बने बैठे थे, अब भीगी बिल्ली की तरह नज़रें चुरा रहे थे। उनकी पोल खुल चुकी थी। उनकी सारी हेकड़ी, उनका सारा पैसा, सब एक भ्रम था जो नंदिनी की मेहनत पर टिका था।

नंदिनी अपने पिता के पास गई और उनका थैला उठाया।

“पापा, चलिए यहाँ से। यह जगह आपके लायक नहीं है। यहाँ लोग प्लास्टिक के खिलौनों से खेलते हैं और प्लास्टिक की मुस्कान पहनते हैं। आपके लकड़ी के घोड़े की कीमत समझने के लिए दिल चाहिए, जो यहाँ किसी के पास नहीं है।”

वह आरव के पास गई और उसे चूमा। “बेटा, यह घोड़ा नानाजी का आशीर्वाद है। इसे संभाल कर रखना।”

फिर वह बलराज जी की ओर मुड़ी।

“मैं आज और अभी यह घर छोड़ रही हूँ। लेकिन जाने से पहले एक आखिरी बात। आपने कहा था न, ‘बाप ऐसा है तो बेटी ऐसी होगी’? मुझे गर्व है कि मैं ऐसी हूँ। लेकिन ज़रा अपने बेटे विक्रांत को देखिये। बाप ऐसा था, इसीलिए बेटा चोर और जुआरी निकला। परवरिश का असर दोनों तरफ हुआ है ससुर जी, बस फ़र्क यह है कि मेरे पिता की गरीबी ने मुझे ‘सोना’ बनाया और आपकी अमीरी ने आपके बेटे को ‘राख’ बना दिया।”

नंदिनी ने पिता का हाथ पकड़ा और मुख्य द्वार की ओर बढ़ गई।

पीछे से विक्रांत दौड़ा। “नंदिनी, रुको! तुम चली जाओगी तो यह सब कौन संभालेगा? बैंक वाले, लेनदार… मैं बर्बाद हो जाऊंगा!”

नंदिनी रुकी नहीं। उसने मुड़कर भी नहीं देखा।

बलराज जी सोफे पर धम्म से गिर पड़े। उन्हें महसूस हो रहा था कि आज उन्होंने सिर्फ़ एक बहू नहीं खोई, बल्कि अपनी इज़्ज़त, अपना घर और अपनी ढाल—सब कुछ खो दिया। उन्होंने एक “साधारण मास्टर” का अपमान करने के चक्कर में अपना “असाधारण अहंकार” तुड़वा लिया था।

हॉल में सन्नाटा था। मेहमान धीरे-धीरे खिसकने लगे। मेज़ पर रखा वह लकड़ी का घोड़ा, उन महंगी शराब की बोतलों और रिमोट वाली कारों के बीच, अपनी सादगी में भी सबसे ज़्यादा शाही और कीमती लग रहा था। क्योंकि वह जीत का प्रतीक था—सच्चाई और स्वाभिमान की जीत का।

बाहर, नंदिनी ने अपने पिता के कंधे पर सिर रख दिया।

“पापा, ऑटो बुलाऊं?”

दीनानाथ जी ने आंसू पोंछते हुए कहा, “नहीं बेटा, पैदल चलेंगे। आज मेरा सीना इतना चौड़ा हो गया है कि लगता है आसमान छू लूँगा। मुझे नहीं पता था कि मेरी सादगी मेरी बेटी की सबसे बड़ी ताकत बन जाएगी।”

बाप और बेटी उस अंधेरी सड़क पर आगे बढ़ गए, लेकिन उनका आत्मसम्मान सूरज की तरह चमक रहा था।

मूल लेखिका  : हेमलता गुप्ता 

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