अंतिम प्रार्थना – रीमा साहू

*क्या प्रेम का मतलब सिर्फ थामे रखना है या कभी-कभी मुक्त कर देना ही सबसे बड़ा प्रेम है? पढ़िए एक ऐसी पत्नी की दास्तां जिसने अपने पति के लिए वो दुआ मांगी जिसे मांगने में रूह कांप जाती है।*

आज शाम को भी ऐसा ही हुआ था। विनोद अचानक हिंसक हो गए थे। उन्होंने अपने हाथ की नली (IV Drip) खींच ली थी। खून बहने लगा था। सुधा ने जैसे-तैसे पट्टी बांधी थी। उनकी आँखों में जो भय और पीड़ा थी, वह सुधा से देखी नहीं गई। ऐसा लग रहा था जैसे वह अपनी ही देह के कारागार में छटपटा रहे हैं।

 खिड़की के बाहर हो रही मूसलाधार बारिश और कमरे के भीतर पसरा सन्नाटा, दोनों ही सुधा के मन में चल रहे तूफ़ान से होड़ लगा रहे थे। रात के दो बज चुके थे। सामने वाले पलंग पर करवट बदलकर लेटे हुए विनोद जी की सांसों की घरघराहट बता रही थी कि उन्हें बड़ी मुश्किल से नींद आई है। सुधा ने अपनी चश्मे की कमानी ठीक की और अपनी सूजी हुई आँखों को हथेलियों से रगड़ा। पिछले तीन सालों से ‘नींद’ शब्द सुधा के शब्दकोश से जैसे गायब ही हो गया था।

विनोद जी, जो कभी शहर के नामी शास्त्रीय गायक हुआ करते थे, जिनकी आवाज़ में सरस्वती का वास माना जाता था, आज अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) के अंतिम चरण में थे। यह बीमारी सिर्फ यादें नहीं मिटाती, यह इंसान के वजूद को खुरच-खुरच कर मिटा देती है।

सुधा अपनी आराम कुर्सी पर पीछे की ओर झुकी। शरीर जवाब दे रहा था। घुटनों का दर्द अब असहनीय होता जा रहा था, लेकिन मन का दर्द उस शारीरिक पीड़ा से कहीं ज्यादा गहरा था। उसकी नज़र कमरे के कोने में रखे उस पुराने हारमोनियम पर पड़ी, जिस पर अब धूल की एक महीन परत जम गई थी। उस हारमोनियम को देखते ही सुधा अतीत के गलियारों में बह गई।

बात चालीस साल पुरानी थी। बनारस के घाट पर सजी एक संगीत महफिल में सुधा ने पहली बार विनोद को गाते हुए सुना था। ‘राग यमन’ की बंदिश जब विनोद के गले से निकली थी, तो सुधा सुध-बुध खो बैठी थी। वह एक संपन्न व्यापारी की बेटी थी और विनोद एक साधारण संगीत शिक्षक। लेकिन सुरों के उस मिलन ने दो दिलों को एक कर दिया था। परिवार के विरोध के बावजूद सुधा ने विनोद का हाथ थामा था।

विदाई के वक्त माँ ने कहा था, “सुधा, कलाकार का जीवन फकीरी का होता है। बहुत धैर्य चाहिए होगा। कभी उसका साथ मत छोड़ना, क्योंकि सुर बिखरते हैं तो संगीत शोर बन जाता है।”

सुधा ने माँ की बात को अपने आँचल में बांध लिया था। शादी के शुरुआती साल संघर्ष भरे थे, लेकिन प्रेम से सराबोर थे। छोटा सा किराए का मकान था, लेकिन शाम होते ही वह संगीत के मंदिर में बदल जाता। विनोद रियाज़ करते और सुधा तानपूरा लेकर उनका साथ देती। घर में अक्सर शिष्यों का आना-जाना लगा रहता। सुधा सबके लिए चाय बनाती, नाश्ता परोसती और विनोद की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखती। विनोद अक्सर कहते, “सुधा, तुम मेरी अर्धांगिनी नहीं, मेरी ‘सम’ हो। जैसे संगीत में ‘सम’ पर आकर ही सुकून मिलता है, वैसे ही मेरे जीवन का ठहराव तुम हो।”

वक्त अपनी रफ़्तार से बढ़ा। बेटा ‘निशान्त’ और बेटी ‘अवनि’ का जन्म हुआ। विनोद की ख्याति बढ़ने लगी। देश-विदेश में कार्यक्रम होने लगे। घर में लक्ष्मी का आगमन हुआ। बच्चे बड़े होकर अपनी-अपनी दुनिया में सेटल हो गए। निशान्त अमेरिका चला गया और अवनि पुणे में ब्याही गई। घर फिर से दो लोगों का रह गया—विनोद और सुधा।

रिटायरमेंट के बाद विनोद ने संगीत सिखाना कम कर दिया था, लेकिन उनका रियाज़ जारी था। सब कुछ कितना शांत और सुखद था। लेकिन फिर… फिर वह मनहूस दिन आया।

तीन साल पहले की बात है। विनोद शाम की सैर पर निकले थे और रास्ता भूल गए। तीन घंटे बाद पुलिस उन्हें घर छोड़कर गई। वह डरे हुए थे, किसी बच्चे की तरह सहमे हुए। डॉक्टर ने जांच के बाद जो शब्द कहे, वे सुधा के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे—”अल्जाइमर। धीरे-धीरे ये सब कुछ भूल जाएंगे। आपको भी… खुद को भी।”

सुधा ने ठान लिया था कि वह विनोद को बिखरने नहीं देगी। लेकिन बीमारी किसी संकल्प को नहीं मानती। विनोद धीरे-धीरे बदलने लगे। पहले चाबियाँ रख कर भूले, फिर खाना खाना भूले। फिर एक दिन ऐसा आया जब उन्होंने हारमोनियम की तरफ देखा और पूछा, “ये लकड़ी का डिब्बा यहाँ किसने रखा है?”

उस दिन सुधा पहली बार बाथरूम में नल चलाकर फूट-फूट कर रोई थी। जिस साज़ में उनकी आत्मा बसती थी, उसे वो ‘लकड़ी का डिब्बा’ कह रहे थे।

हालात बदतर होते गए। विनोद अब उग्र हो जाते थे। कभी-कभी सुधा को पहचानते नहीं थे। चिल्लाते, “तुम कौन हो? मेरे घर से निकलो! मेरी सुधा कहाँ है?”

सुधा उन्हें शांत करने की कोशिश करती, “विनोद जी, मैं ही सुधा हूँ, आपकी पत्नी।”

“झूठ! मेरी सुधा जवान है, उसके बाल काले हैं। तुम तो बूढ़ी हो। तुम चोर हो!” और वे सामान फेंकने लगते।

सुधा ने अपने शरीर पर कई खरोंचें सही थीं, कई बार धक्के खाए थे। लेकिन उसने उफ़ तक नहीं की। निशान्त ने अमेरिका से कहा, “माँ, पापा को किसी केयर होम में शिफ्ट कर देते हैं। तुम अकेले नहीं संभाल पाओगी।”

सुधा ने साफ़ मना कर दिया, “जब तक मेरी सांस है, इनका हाथ किसी और के हाथ में नहीं दूँगी।”

लेकिन पिछले छह महीनों ने सुधा को तोड़ दिया था। विनोद अब पूरी तरह बिस्तर पर थे। उन्हें न भूख का पता चलता, न प्यास का। नित्य कर्म भी बिस्तर पर ही होता। सुधा, जो खुद गठिया (Arthritis) से जूझ रही थी, 65 साल की उम्र में एक बच्चे की तरह उनकी सेवा कर रही थी। डायपर बदलना, नहलाना, जबरदस्ती खाना खिलाना।

विनोद की आँखों में अब एक खालीपन था। वो बस छत को घूरते रहते। कभी-कभी अचानक रोने लगते, एक अजीब सी हुूक निकलती उनके गले से, जैसे कोई फंसा हुआ सुर आज़ाद होना चाहता हो। वो तड़पते, अपने ही बालों को नोचते। डॉक्टर ने कहा था, “ये अपने ही दिमाग की भूलभुलैया में कैद हैं। ये बाहर आना चाहते हैं, पर रास्ता नहीं मिल रहा। इनका कष्ट हम और आप समझ भी नहीं सकते।”

आज शाम को भी ऐसा ही हुआ था। विनोद अचानक हिंसक हो गए थे। उन्होंने अपने हाथ की नली (IV Drip) खींच ली थी। खून बहने लगा था। सुधा ने जैसे-तैसे पट्टी बांधी थी। उनकी आँखों में जो भय और पीड़ा थी, वह सुधा से देखी नहीं गई। ऐसा लग रहा था जैसे वह अपनी ही देह के कारागार में छटपटा रहे हैं।

सुधा ने घड़ी देखी। रात के तीन बजने वाले थे। उसने धीरे से उठकर विनोद के माथे पर हाथ रखा। बुखार तो नहीं था, पर माथा ठंडा पड़ा था। वह चेहरा, जिसे देखकर कभी सुधा का दिन शुरू होता था, आज उस पर झुर्रियों और विस्मृति का जाल बिछा था।

सुधा लड़खड़ाते कदमों से घर के छोटे से पूजा घर में गई। दीये की लौ फड़फड़ा रही थी। उसने हाथ जोड़े, लेकिन आज उसके होंठों पर पति की लंबी उम्र की दुआ नहीं थी। आज एक पत्नी का प्रेम एक अलग ही परीक्षा से गुज़र रहा था।

उसने कान्हा की मूर्ति को देखा और रुंधे गले से बोली, “हे केशव! मैंने हमेशा इनकी सलामती मांगी। मैंने सात जन्मों का साथ माँगा। लेकिन अब… अब मेरी हिम्मत टूट रही है। नहीं, सेवा करने से नहीं थक रही मैं, पर इनका ये तिल-तिल कर मरना मुझसे देखा नहीं जाता। वो इंसान जो सुरों का बादशाह था, आज अपनी आवाज़ भी भूल गया है। वो इंसान जो स्वाभिमान की मूरत था, आज अपनी नज़रों में लाचार है।”

सुधा की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। “लोग कहते हैं कि पत्नी को यमराज से भी लड़ जाना चाहिए पति के प्राणों के लिए। सावित्री भी लड़ी थी। पर केशव, क्या सावित्री ने अपने सत्यवान को ऐसे तड़पते देखा था? अगर प्रेम का मतलब थामना है, तो कभी-कभी प्रेम का मतलब मुक्त करना भी तो होता है।”

उसने एक गहरी सांस ली, जैसे अपने जीवन का सबसे भारी निर्णय ले रही हो।

“प्रभु, अगर इनके ठीक होने की कोई भी गुंजाइश नहीं है, अगर इनका शेष जीवन सिर्फ़ ये अन्धकार और पीड़ा ही है, तो मैं… मैं अपने सुहाग की भीख नहीं मांगती। मैं इनकी ‘मुक्ति’ मांगती हूँ। इन्हें इस कष्ट से आज़ाद कर दो। इनकी आत्मा उस संगीत में विलीन हो जाए जहाँ कोई भूल नहीं होती, जहाँ कोई दर्द नहीं होता। मैं विधवा होने का कलंक माथे पर लगा लूँगी, पर इनका ये नरक जैसा जीवन अब और नहीं देखा जाता।”

सुधा वहीँ जमीन पर सिर रखकर बहुत देर तक रोती रही। एक पत्नी का अपनी मांग के सिंदूर को मिटाने की प्रार्थना करना—इससे बड़ा त्याग और इससे बड़ी पीड़ा दुनिया में और क्या हो सकती थी?

तभी बेडरूम से एक आवाज़ आई। बहुत धीमी, बहुत कमज़ोर।

“सु… धा…”

सुधा बिजली की गति से दौड़ी। उसने देखा विनोद की आँखें खुली थीं। और चमत्कारिक रूप से, उन आँखों में आज वह खालीपन नहीं था। वहां एक पहचान थी, एक चमक थी जो सालों से गायब थी। अल्जाइमर के मरीज़ों में अक्सर अंत समय में एक पल के लिए चेतना लौटती है, जिसे ‘Terminal Lucidity’ कहते हैं।

सुधा उनके करीब गई। “मैं यहीं हूँ, विनोद जी। मैं यहीं हूँ।”

विनोद ने बहुत मुश्किल से अपना कांपता हुआ हाथ उठाया और सुधा के गाल को छूने की कोशिश की। उनकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी, पर शब्द साफ़ थे।

“थक… गई… ना… तुम?”

सुधा के सब्र का बांध टूट गया। उसने उनका हाथ पकड़कर चूम लिया। “नहीं, मैं नहीं थकी। आप बस ठीक हो जाइये।”

विनोद ने बहुत हल्का सा मुस्कुराने का प्रयास किया। “राग… यमन… गाओगी?”

सुधा का गला रुंधा हुआ था, पर वह अपने पति की (शायद आखिरी) इच्छा कैसे टाल सकती थी? उसने अपनी सिसकियों को गले में दबाया और बेहद धीमी, कंपकपाती आवाज़ में गुनगुनाना शुरू किया…

*”ए री आली पिया बिन…”*

जैसे-जैसे सुर हवा में तैरे, विनोद के चेहरे की तनी हुई नसें ढीली पड़ने लगीं। जो बेचैनी, जो दर्द उनके चेहरे पर पिछले तीन सालों से चिपका हुआ था, वह धीरे-धीरे पिघलने लगा। उनकी आँखों में एक असीम शांति उतर आई। उन्होंने सुधा की आँखों में देखा—वही प्रेम था जो बनारस के घाट पर था।

सुधा गाती रही, आंसुओं के बीच सुर साधती रही। विनोद की सांसें अब धीमी हो रही थीं। उन्होंने एक गहरी सांस ली, जैसे बरसों बाद उन्हें खुली हवा मिली हो। उनकी पलकें धीरे-धीरे मूंदने लगीं। हाथ की पकड़, जो सुधा की हथेली पर थी, वह ढीली पड़ गई।

गीत पूरा नहीं हुआ था, पर संगीतकार अपनी अनंत यात्रा पर निकल चुका था।

सुधा ने गाना बंद कर दिया। कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया, लेकिन यह सन्नाटा डरावना नहीं था। यह सन्नाटा शांति का था। बारिश भी अब थम चुकी थी। सुबह की पहली किरण खिड़की से अंदर झांक रही थी और सीधे उस हारमोनियम पर पड़ रही थी।

सुधा ने विनोद के सीने पर सिर रख दिया। वह रो नहीं रही थी। एक अजीब सा खालीपन था, पर साथ ही एक तसल्ली भी थी। उसकी प्रार्थना स्वीकार हो गई थी। उसके प्रेमी, उसके पति को उस कैद से आज़ादी मिल गई थी जिसमें उसका शरीर और मन फंसा हुआ था।

उसने उठकर विनोद के पैरों को छूकर प्रणाम किया। फिर खिड़की खोल दी। ठंडी हवा का झोंका अंदर आया। सुधा ने आसमान की तरफ देखा और बुदबुदाई, “अब आप खुल कर गा सकते हैं। वहां कोई सुर नहीं भूलेगा।”

समाज उसे शायद कहेगा कि पति की मौत पर वह शांत क्यों है, लेकिन सिर्फ़ एक पत्नी ही जानती है कि जब प्रेम हद से गुज़र जाता है, तो वह अपने प्रिय को अपनी बाँहों में कैद करने की ज़िद नहीं करता, बल्कि उसे दर्द से मुक्त करने का साहस दिखाता है।

सुधा ने हारमोनियम से धूल पोंछी। अब उसे अकेले ही सुर साधने थे, उस दिन के इंतज़ार में जब वह दोबारा उस पार उनसे मिलेगी और उनकी ‘सम’ बनेगी।

दोस्तो, अल्जाइमर या लकवा जैसी लाइलाज बीमारी जब किसी हंसते-खेलते इंसान को ज़िंदा लाश बना देती है, तो उसके परिवार पर क्या गुजरती है, यह सिर्फ़ वही जानते हैं। सुधा का निर्णय निष्ठुरता नहीं, बल्कि ममता और प्रेम की पराकाष्ठा थी। क्या आप सुधा की जगह होते तो ऐसा ही सोचते?

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मूल लेखिका : रीमा साहू

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