अनकहा इश्क – संध्या त्रिपाठी : Moral Stories in Hindi

     पूछ लो अपनी लाडली से…. शादी करनी भी है या नहीं….  

तेज आवाज में , लगभग चीखने वाले अंदाज में तीज प्रताप सिंह ने अपनी पत्नी अनुराधा से कहा…।

    अनुराधा ने डरते हुए धीरे बोलने का आग्रह किया….पर आवाज इतनी तेज थी कि अपने कमरे में बैठी बिटिया स्वर्णिमा के कानों में भी इसकी गूंज गई….. थोड़ी सी सहम सी गई थी स्वर्णिमा…..

बड़ी हिम्मत दिखाकर अनुराधा ने तेज प्रताप  जी से कहा…..आप स्वर्णिमा को दोष क्यों देते हैं …यदि बार-बार शादी लग-लग के कट जा रही है तो उसमें स्वर्णिमा का क्या दोष है…?

  ज्यादा तरफदारी करने की जरूरत नहीं है तुम्हें अनुराधा…… 

तुम मां बेटी मुझे बेवकूफ समझते हो क्या…? 

ये तीसरी बार थी जब स्वर्णिमा की शादी कैंसिल हो रही है…..सारी बातें तय हो जाती है…. जब भी स्वर्णिमा लड़के से मिलती है या फोन पर बातें होती है , तब कुछ ही दिनों में शादी टूट जाती है….!

 देखो अनुराधा… मैं एक लड़की का बाप हूं …बार-बार मुझे नीचा दिखाया जाता है… शादी कैंसिल करके….कभी कोई बहाना कभी कोई बहाना ….अब मैं थक गया हूं अनुराधा ….इस बार तेज प्रताप सिंह भी थोड़े भावुक थे…!

     अनुराधा एक बार स्वर्णिमा के भी मन की बात जान लो…. उसके मन में क्या चल रहा है  , वो चाहती क्या है…तुम तो मां हो ना उसकी….

    उसे कोई लड़का पसंद तो नहीं…यदि ऐसा कुछ है भी तो कर ले ना भाई अपनी मर्जी से शादी…. बसा ले अपना घर…. पूरी तरह टूट चुके थे तेज प्रताप सिंह…!

  अब तक स्वर्णिमा सारी बातें सुन रही थी…..अपने आंसू  पोछते हुए बाहर आई ….बिना कुछ बोले तेज प्रताप सिंह के कंधे पर हाथ डाल सीने से चिपक कर रोते हुए बोली ….पापा… प्लीज पापा ….लग जाएगी मेरी शादी… हो जाएगी शादी पापा …आप दुखी ना हो…।

लाख छिपाने की कोशिश की तेज प्रताप ने पर अपने आंसू रोक नहीं पाए… बिना कुछ बोले बाहर निकल गए…!

    शाम को बागान में बैठकर वातानुकूलित माहौल में आज अनुराधा ने स्वर्णिमा से खुलकर बात करने की सोची…

    देख बेटा ….आज मैं तेरी मां नहीं… एक दोस्त की हैसियत से पूछ रही हूं.. तू शादी तो करना चाहती है ना…?

 क्या तुझे कोई लड़का पसंद है…? स्वर्णिमा ऐसे सीधे प्रश्नों के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी….!

उसे पहले तो थोड़ी  असहजता महसूस हुई ….फिर धैर्य रखते हुए उसने कहा… मम्मी आप भी पापा के समान मुझ पर शक कर रही है…?

    मैं जानती हूं मम्मी…. आप अभी मुझसे सहेली , दोस्त बनकर सारा कुछ पूछ लेंगी और मैं भी आपको दोस्त मानकर सब कुछ बता भी दूंगी …पर निर्णय तो आप एक अभिभावक बनकर ही करेंगी ना….।

माना मैंने कुछ गलतियां की है….

गलतियां…?  क्या गलतियां हुई है तुझसे स्वर्णिमा ….न जाने किस डर से शंकित होते हुए अनुराधा ने घबरा कर पूछा …..आखिर अनुराधा दोस्त जरूर बन रही थी पर दिल तो मां का ही था ना….

  मम्मी वो क्या है ना …अभी तक मुझे समझ में ही नहीं आया कि मुझे कैसा जीवनसाथी चाहिए ….जिन भी लड़कों से मैं मिली उनमें मुझे वो चीज नहीं दिखाई  दी, जो मुझे चाहिए थी…. इसीलिए मैंने धीरे से उन लड़कों को खुद ही मना कर दिया था ….कहा था… प्लीज मेरी हेल्प कीजिए …आप ही शादी से मना कर दें …..और ये सब बातें मेरे घर पर पता नहीं चलना चाहिए कि शादी के लिए मैंने मना किया है…. वो लड़के समझ  रहे थे… शायद मेरा कोई बॉयफ्रेंड है….  उन लोगों ने मेरी बात मानकर मेरी मदद की…!

  तू ऐसा कैसे कर सकती है स्वर्णिमा…..अरे मेरा तो छोड़ …अपने पापा की तो सोची होती ….फिर तुझे पहले ही मना कर देना चाहिए कि मुझे शादी नहीं करना ये बहाने बाजी क्यों…?  आखिर क्यों…?

    तूने अपने ही घर में धोखाधड़ी का खेल खेल बेटा….. ठीक है पर तुमने ये खेल खेला क्यों ..?

इसके पीछे कुछ तो कारण होगा…

कहीं तुझे कोई लड़का पसंद तो नहीं…?

 और तू डर भय के कारण बता नहीं पा रही हो…..ऐसा है क्या बेटा…?

एक बार फिर से अनुराधा किसी अनहोनी आशंका से भयभीत लग रही थी…. पर वो आज स्वर्णिमा के मन में चल रहे सच्चाई को जान ही लेना चाहती थी…।

  अरे मां पागल है क्या…?

तू इतना डरती क्यों है मां …?

ऐसा कुछ नहीं है …आ पास में आ… तुझे कुछ बताती हूं….

स्वर्णिमा ने अपनी कुर्सी अनुराधा के और पास सरका दिया और धीरे से बताना शुरू किया…

 मां तू तो जानती है ना ….हम लोग बचपन में सारे मोहल्ले वाले साथ में खेलते थे…..उसमें जो आशीष था ना…

 हां बेटा ….आशीष को जानती हूं ….पर वह कहां गया कुछ पता नहीं…. तेरे कांटेक्ट में है क्या …?

अरे नहीं मां …नहीं है ना कांटेक्ट में…. यही तो बात है ….अब  अनुराधा ने थोड़ी राहत की सांस ली…. तब स्वर्णिमा ने आगे बताना शुरू किया….

एक दिन…..

एक बात बता  आशीष….जब भी हम टिप प्रेस (लुका छुपी )खेलते हैं तो.. तू मुझे देख कर भी अनदेखा कर देता है… क्यों …?  मुझे पहला टिप (चोर) क्यों नहीं बनाता …?

आज मैं जानबूझकर तेरे सामने आ गई थी ….सोची देखती हूं तु  मुझे पहला टिप (चोर) बनाता है या नहीं ….?

पर आज भी तु मुझे छोड़ दिया …कितने दिनों से मेरे मन में ये सवाल आ रहे थे आज मैंने सोचा तुझसे पूछ ही लूं….!

अरे बस ऐसे ही….कह कर आशीष ने बात बदल दी और दूसरे साथियों को खेल को आगे बढ़ाते हुए खोजने में लग गया…।

   एक ही मोहल्ले में रहने वाले सारे बच्चे शाम को साथ में खेला करते थे… नवमी कक्षा में पढ़ने वाली… शांत ,सुशील और समझदार स्वर्णिमा एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखती थी…जबकि आशीष एक प्रतिष्ठित ऑफिसर का एकलौता पुत्र था…!

    जैसे ही परीक्षाएं समाप्त हुई सभी बच्चे खेलने को उत्सुक थे….पर मध्यम वर्गीय परिवार की कुछ मर्यादाएं  थीं…. फिर उच्च वर्ग और सामान्य वर्ग के बीच की दीवार …..

चूंकि बच्चे अब बड़े हो रहे थे …इसलिए अभिभावक भी लिंग के अनुसार खेलने की इजाजत देना चाह रहे थे …..स्वर्णिमा के घर में स्पष्ट शब्दों में कहा गया..

बेटा …अब तुम बड़ी हो गई हो कुछ सीमाएं हैं …जिन्हें पालन करना पड़ेगा… इस तरह रोज मिलने वाले बच्चे अब कभी-कभी मिलने लगे…।

कुछ बचपन वाला लगाव ….. लगाव ही रहकर रह गया…. पर कुछ बातें बिना बोले ही समझ में आ जाती हैं.. आशीष के साथ खेलना स्वर्णिम को अच्छा लगता था…आशीष काफी शर्मिला और संकोची बालक था…

कभी-कभी स्वर्णिमा सोचती…कैसा बुद्धू है …बाहर पढ़ने जाने वाला है…. एक बार अपने दिल की बात बोल ही दिया होता….!

समय बीतता गया 12वीं का रिजल्ट आया…. सुबह-सुबह आशीष अपने एक दोस्त के साथ अख़बार लेकर स्वर्णिमा के घर पहुंचा… कॉलबेल बजते ही स्वर्णिमा के पापा निकले…

 अंकल नमस्ते… स्वर्णिमा का रोल नंबर बताइए ना रिजल्ट आ गया…

    बेटा स्वर्णिमा …देख तेरा रिजल्ट आ गया….दौड़ी दौड़ी स्वर्णिमा  आई….प्रथम श्रेणी में उर्त्तीण की खबर आशीष ने ही सुनाया ….शर्मिला आशीष सिर्फ कंग्रॅजुलेशंस बोला …और स्वर्णिमा के पापा का पैर छू कर वापस चला गया था…. फिर धीरे-धीरे मिलना जुलना कम होता गया या कहे बिल्कुल बंद हो गया ….न जाने आशीष अब कहां है…?

  अब जब मेरी शादी की बात होती है ना मां…..तो मुझे होने वाले पति में आशीष की तलाश होती है…. 

ओह ….तो तुझे अभी भी आशीष का इंतजार है…. देख बेटा ….किशोर अवस्था में आकर्षण होना स्वाभाविक है ….उस समय का लगाव …समय , परिस्थिति और माहौल ….ख्वाबों वाला होता है ….जो हकीकत से दूर ….बहुत दूर होता है ….और उस समय उसने तुझसे कुछ कहा  भी नहीं …..शायद उसके मन में तेरे लिए रिस्पेक्ट हो… एक दोस्त वाला प्यार हो ….जिसे तू कुछ और ही समझ बैठी …और  ये भी हो सकता है कि अब वो तुझे भूल भी गया हो…।

   देख बेटा …अब तू बड़ी हो गई है समझदार है…कल्पना , ख्वाब  सपनों की दुनिया और यथार्थ में अंतर तुझे अच्छे से पता है…।

  मां बेटी की बातें हो ही रही थी …तभी तेज प्रताप जी वहां आ गए… एक खाली कुर्सी पर बैठ गए… इसी समय तेज प्रताप जी के फोन की घंटी बजी… उधर से क्या बोला गया ये तो सुनाई नहीं दिया….पर इधर से तेज प्रताप जी ने कहा… अरे नहीं , अब घर वालों के विचार बदल गए हैं …अभी शादी ही नहीं करनी है….!

  पापा …बुला लीजिए ना ….मैं मिलने को तैयार हूं… 

पर ये लोग हैं कौन…?

अचानक  स्वर्णिमा के जवाब ने तेज प्रताप और अनुराधा की सारी चिंताएं पल भर में ही दूर कर दी …..खुश होते हुए तेज प्रताप सिंह ने बताना शुरू किया ….यही तो पास में रहते हैं यह लोग …..लड़के के पिता का फोन था… कह रहे थे शायद आकाश (लड़का) आपकी लड़की को पसंद करता है…!

 कहीं तेरी पसंद यही तो नहीं…. इस बार खुशी के मौके पर बिटिया से मजाक करने में खुद को नहीं रोक पाए थे तेज प्रताप सिंह जी…।

पूरी तैयारी के साथ देखने दिखाने का कार्यक्रम संपन्न हुआ…. स्वर्णिमा (लड़के) आकाश से मिलने अकेले बागान में गई…

आकाश ने पहल की…

कुछ बोलिए भी… 

स्वर्णिमा ने कहा ….आपको मेरे बारे में जो भी पूछना है पूछ ले…

 मुझे सब पता है …आप पिछले तीन लड़कों को मना कर चुकी हैं शादी के लिए… बहाने बनाकर ….

मैं जब आपको देखने आ रहा था तो कुछ लोगों ने मुझे मना भी किया था…।

क्या..? फिर आप क्यों आए मुझे देखने…?

क्योंकि मैं आपकी बात नहीं मानना चाहता….और आपके अभिभावकों को बता देता कि आपने शादी के लिए मना किया है….  मैं समझ चुका हूं कुछ तो बात है जो आप अपने घर में बताना नहीं चाह रही हैं …..और हर बार धोखा देती आ रही है …..तो इस बार मैं आपके झूठ का पर्दाफाश करने के उद्देश्य से यहां आया हूं ….!

एक्चुअल में बेचारे आपके पैरेंट्स पर मुझे दया आ गई…!

अब बोलिए शादी करेंगी ना मुझसे…

आकाश के इस तरह के बर्ताव  की  स्वर्णिमा को बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी….एक पल के लिए तो वह घबरा ही गई…. बाप रे …ऐसे आदमी के साथ शादी …?  उसके बर्ताव से ही उसे नफरत होने लगी थी…।

पर रहते हैं ना …मरता क्या नहीं करता…. इस बार दोनों ओर से फंस चुकी थी स्वर्णिमा….

स्वर्णिमा की घबराहट और असमंजस की स्थिति को भांपते हुए आकाश ने पास आकर धीरे से कहा….

 अरे घबराइए नहीं स्वर्णिमा जी….

मैं आपका दुश्मन नहीं हूं ….मैं जानता हूं , आपका कुछ सच है और घर में बताने की आपकी हिम्मत नहीं है …इस बीच बेचारे अंकल आंटी पीस रहे हैं ….मैंने सोचा अब मैं ही इसका हल निकालूंगा …आपका पति बनकर… आपको आपके प्यार से मिलवाने में मदद करूंगा …आपके सारे  अरमानों , ख्वाबों ,ख्वाहिशों का भागीदार तो नहीं पर मददगार जरूर बनूंगा….!

    क्या …?आप मेरे लिए ये सब करेंगे… पर क्यों..?

 अपनी जिंदगी मेरे लिए दान पर क्यों लगाएंगे भला…?

हां स्वर्णिमा जी… मैंने अपने अनकहे इश्क के साथ आपके अनकहे इश्क को ढूंढ लिया है….

आपका अनकहा इश्क… मैं…? 

मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है… स्वर्णिमा की बेचैनी देखकर आकाश ने सीधे-सीधे कहा…

आशीष जूनियर था मेरा….

अभी कुछ बताने की जरूरत है..? आशीष का नाम सुनते ही स्वर्णिमा की उत्सुकता बढ़ गई …..

कहां है आशीष …?

बेंगलुरु में ….बेंगलुरु में जॉब करता है…

 मैं भी वही था ….उसकी एक प्यारी सी बिटिया है ….उसकी पत्नी कीर्ति भी उसी के कंपनी में जॉब करती है…।

 क्या आशीष की शादी हो गई…?

हां स्वर्णिमा पता नहीं ईश्वर का कैसा खेल था… मैं जिसे चाहता था वो किसी और को ….और वो जिसे चाहती थी… वो उसे सिर्फ एक दोस्त… बहुत अच्छी वाली …प्यारी वाली …समझता था…

 देखिए आकाश ….पहेली मत बुझाइए… सच सच बताइए …बात क्या है ….?

देखो स्वर्णिमा , आशीष समझ चुका था तुम्हारे प्रति उसके लगाव को ….तुमने उसको प्यार समझ लिया ….

    जिस दिन वह 12वीं का रिजल्ट लेकर   आशीष तुम्हारे घर गया था… उस दिन खुशी से आपने उसका हाथ पकड़ कर …आशीष तुम बहुत अच्छे हो ….कहा था…. फिर झेंप गई थी आप… वो उसी समय समझ चुका था… पर वो तो तुम्हें बहुत अच्छा बल्कि सबसे अच्छा दोस्त मानता था…

शायद इसीलिए उसने तुमसे दूरी भी बनाई थी…!

 पर तुम लड़कियां भी ना… 

कुछ मजाक के लहजे में कहते हुए आकाश ने माहौल को थोड़ा हल्का बनाने की कोशिश की ….

ये सब बातें आपको कैसे पता…?

 क्योंकि मेरा अनकहा इश्क ही मेरे इश्क की परछाई की तरह होता था…!

रुको यार साफ-साफ बताता हूं…

एक दिन मैंने आशीष से मिलकर सच जानने की कोशिश की…. तब सारी बातें पता चली… उस समय उसकी कीर्ति के साथ सगाई होने वाली थी वो बहुत खुश था..। 

अब स्वर्णिमा..जो अभी तक आकाश को नफरत भरी नजरों से देख रही थी… वो अब धीरे-धीरे प्यार में बदलता जा रहा था …. कितना सच और कितना धैर्य रखा आकाश ने मेरे लिए… ऐसा सोच कर स्वर्णिमा के दिल मेंआकाश के लिए नफरत की दीवार ढह चुकी थी…!

नीचे दोनों परिवार के अभिभावको को आकाश और स्वर्णिमा  का बेसब्री से इंतजार था….दोनों की सहमति होने पर माहौल खुशी में बदल गया….. मिठाइयां एक दूसरे को खिलाई गई…. खुशी भरे लम्हे में तेज प्रताप ने कहा…. बगल में छोरा और नगर में ढिंढोरा…. सभी लोग हंस पड़े…।

(स्वरचित ,सर्वाधिकार सुरक्षित और अप्रकाशित  रचना )

साप्ताहिक विषय : # नफरत की दीवार 

संध्या त्रिपाठी

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