अंजलि नहीं रही – के आर अमित

हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों में बसा छोटा सा गांव जो देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ। इसी गांव के एक साधारण परिवार की बेटी थी अंजलि मेहनती शांत स्वभाव की आँखों में सपने और दिल में कुछ कर गुजरने की आग। कॉलेज में दाख़िला उसके लिए सिर्फ़ पढ़ाई नहीं था बल्कि उनका सपना था कि अपने माता पिता को कुछ बनकर दिखाएगी और उनका नाम रोशन करवाएगी मगर होनी के आगे किसकी चल सकती है।

कॉलेज का पहला दिन उसके लिए उत्सव जैसा था। नई किताबें नया बैग और माँ के हाथ का परांठा सब कुछ जैसे सुनहरे भविष्य की राह पर पहला कदम। अंजलि का मासूम से चेहरा हर किसी को आकर्षित करता था उसकी सादगी और भोलापन उसकी खूबसूरती पर चार चांद लगाते थे। सुनहरे भविष्य की उम्मीद लेकर जाने वाली अंजलि नहीं जानती थी कि इसी कॉलेज की दीवारों के भीतर उसकी ज़िंदगी का सबसे अंधेरा अध्याय लिखा जाने वाला था।

पहले ही हफ्ते तीन सीनियर लड़कियों ने उसे घेर लिया। नाम पूछने से शुरू हुई रैगिंग धीरे-धीरे अपमान में बदल गई। कभी कपड़ों पर तंज कभी जाति-परिवार पर कटाक्ष कभी सबके सामने बेइज्जती और हद तो तब हो गई जब उसके बाल काट दिए गए और कहा ज्यादा उड़ मत यहाँ हर किसी को जमीन पर लाना आता है। 

एक सीनियर की हँसी आज भी अंजलि के कानों में तेजाब की तरह चुभती थी। उसने सोचा कुछ दिन की बात है सब ठीक हो जाएगा। एक दिन उसने अपने घर मे इस बारे में बात की कि उसे उसकी जाति के कारण अपमानित किया जाता है अगले दिन पिता अपनी बेटी को लेकर प्रिंसिपल के पास गए भी मगर प्रिंसिपल ने दोवारा ऐसा नही होगा का आश्वासन दिया हमारे कॉलेज में ऐसा नही होता है जैसी कहानियां सुनाई और बापिस भेज दिया।

 वो पुलिस में गया तो पुलिस वालों ने कहा मि ये सब तो चलता ही है कॉलेज में इसमें नया क्या है जब हम पड़ते थे हमारे सीनियर भी रैगिंग करते थे कुछ दिन में सब ठीक हो जाएगा जो और पढ़ाई पर ध्यान दो। जैसा प्रोफेसर कहते हैं बैस करो।

लेकिन रैगिंग का ज़हर सिर्फ़ क्लासरूम तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया पर मज़ाक हॉस्टल के गलियारों में फुसफुसाहट और लेक्चर के दौरान जानबूझकर नीचा दिखाना हर दिन उसकी आत्मा पर चोट करता रहा। इसी बीच एक प्रोफेसर की नज़र अंजलि पर पड़ी। शुरुआत में सहानुभूति फिर बेवजह बुलावे और उसके बाद डर पैदा करने वाले शब्द तुम्हारे नंबर मेरे हाथ में हैं। 

कुछ ही महीनों में अंजलि को कुछ विषयों में फेल कर दिया गया। वह हैरान थी जिसने पूरी रात जागकर पढ़ाई की वही फेल कैसे। जब उसने सवाल किया तो वही प्रोफेसर कमरे का दरवाज़ा बंद कर बोला पास होना है तो समझदार बनो।   अंजलि टूट गई उसने इंकार किया उसके बाद मानसिक यातनाएँ बढ़ गईं क्लास में अपमान धमकियाँ और फेल होने का डर। रैगिंग करने वाली सीनियर लड़कियाँ भी उसी प्रोफेसर के इशारों पर उसकी ज़िंदगी और मुश्किल बनाती रहीं।

एक दिन प्रोफेसर ने उसे किताब लेकर अपने ऑफिस में बुलाया और अपने हाथों से उसके गालों और प्राइवेट पार्ट्स को छूने लगा अश्लिल हरकतें करने लगा अंजलि ने जब विरोध किया तो उसने कहा किसको बताएगी पुलिस को प्रिंसिपल को या किसी मंत्री को? कोई मेरा कुछ नही बिगाड़  सकता मेरी पहुंच ऊपर तक है और तुम्हारा बाप दिहाड़ी लगाएगा या कोर्ट कचहरी के चक्कर। अंजलि अपना हाथ छुड़ाकर बाहर आ गई और दोवारा कभी अकेले प्रोफेसर के रूम में नही गई।

मगर प्रोफेसर और वो सीनियर लड़कियां उसे बार बार जलील करते वो लड़कियां उसे जानबूझकर अहसास करवाती की वो प्रोफेसर के साथ गलत है जबकि अंजलि ने कभी कुछ गलत नही किया था। प्रोफेसर भी उसे किसी न किसी बहाने छूने की कोशिश करता।

बाप की गरीबी और अपनी इज्जत को ध्यान में रखते हुए अंजलि ने कभी ये बात अपने घर मे नही बताई अंदर ही अंदर घुटती रही।धीरे धीरे अंजलि डिप्रेशन में चली गई। उसकी हँसी खो गई आँखों के नीचे गहरे साये उतर आए। माँ ने पूछा तो बस इतना कहा कुछ नही मम्मा सब ठीक है पढ़ाई का दवाब है बस। एक दिन वह बेहोश होकर गिर पड़ी।

डॉक्टर ने साफ़ कहा लड़की गंभीर मानसिक तनाव में है। तब उसने अपने घरवालों को प्रोफेसर की हरकतों के बारे और सीनियर के रबैये के बार मे बताया उसके पिता अगले ही दिन फिर पुलिस स्टेशन गए मगर पुलिस ने फिर ये कहकर टाल दिया कि लड़की अभी बीमार है उसकी देखभाल करो जब ठीक हो जाएगी तब उसके बयान लेने आएंगे। जो ज़िंदगी भर दूसरों के घरों में पेंटिंग करके गुज़ारा करते आए थे बेटी को लेकर हर अस्पताल के चक्कर काटने लगे। दो महीने में उन्होंने खेत बेच दिए माँ के गहने गिरवी रख दिए यहाँ तक कि रिश्तेदारों से उधार लिया।

हर रात पिता उसकी हथेली पकड़कर कहते बेटा तू ठीक हो जाएगा तेरा बाप ज़िंदा है तू फिक्र मत कर हम उस कॉलेज में कभी नही जाएंगे मैं तुम्हारा एडमिशन दूसरे कॉलेज में करवाऊंगा। मगर जब उसकी तबियत नही सुधरी तो उन्होंने खुद उसके बयान की वीडियो बनाने की सोची क्योंकि पुलिस बयान लेने के लिए टॉयर नही थी।

अस्पताल में ज़िंदगी और मौत की लड़ाई के बीच उसने काँपते होंठों से उसने डाइंग डिक्लेरेशन दिया कॉलेज रैगिंग प्रोफेसर का नाम सब कुछ। उसकी आवाज़ कांप रही थी धीमी थी पर शब्द पत्थर जैसे भारी। वो बोली कि अब मैं कैसे बताऊं मां कहती है पापा को बाहर भेज दूं तो कहती है कि नही पापा को क्यों भेजना फिर वो कांपते हाथों से बताती है कि प्रोफेसर उसे कहाँ कहाँ छूने की कोशिश करता और कैसे डराता कैसे उसकी सीनियर उसके साथ दुर्व्यवहार करतीं।

उसकी वीडियो वायरल होते ही न सिर्फ हिमाचल बल्कि पूरे देश के लोगों का कलेजा फट गया हर कोई अंजलि के लिए इंसाफ की मांग करने लगा धीरे धीरे सरकार दवाब में आई और एसआईटी गठित की। लड़की डिप्रेशन में थी कॉलेज का प्रिंसिपल मीडिया के सामने उल-जलूल बयान देता रहा हमारे कॉलेज की छवि खराब की जा रही है प्रोफेसर निर्दोष हैं। यह व्यक्तिगत मामला है। लड़की ने फीस नही दी है। यहां तक कि कॉलेज की लेडी प्रोफेसर भी अध्यापक के पक्ष में बयान दे रहीं थी किसी ने ये नही कहा कि चाहे जो भी गुनहगार हो उसे सजा मिले।

न कोई गिरफ्तारी न कोई ठोस कार्रवाई। फिर एक दिन सोशल मीडिया पे खबर आई कि “अंजलि नही रही” बस अब समाज जागा सामाजिक संगठन सड़कों पर उतर आए। मोमबत्तियाँ जलीं पोस्टर उठे अंजलि को इंसाफ दो। आख़िरकार दबाव में एसआईटी की  जाँच आगे बढ़ी तो परतें खुलने लगीं। पता चला कॉलेज में लड़कियों को जानबूझकर कुछ विषयों में फेल किया जाता था। पास करने के बदले शारीरिक शोषण होता था। 

रैगिंग सिर्फ़ डराने का औज़ार थी। इस रैकेट में कुछ प्रोफेसर प्रिंसिपल पुलिस के बड़े अधिकारी और रसूखदार नेता शामिल थे। सिस्टम की जड़ें सड़ चुकी थीं। मुक़दमे चले साल गुज़रे गवाह टूटे बदले डरे। अंजलि का पिता हर तारीख़ पर कोर्ट पहुँचता फटे जूते काँपते हाथ लेकिन आँखों में अडिग उम्मीद। कई सालों बाद फैसला आया दोषियों को सज़ा हुई 

कॉलेज की मान्यता रद्द हुई कुछ बड़े नाम पहली बार सलाखों के पीछे पहुँचे। कोर्ट रूम में पिता फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने आसमान की ओर देखकर कहा बिटिया आज तेरा बाप जीत कर हार गया काश तू ये बात हमे पहले बता देती। अंजलि तो लौटकर नहीं आई, पर उसकी कहानी ने कई बेटियों को बचा लिया। हिमाचल की वही पहाड़ियाँ आज भी खामोश हैं, पर हवा में एक नाम अब भी गूंजता है।

                के आर अमित

         अम्ब ऊना हिमाचल प्रदेश

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