सुमेधा का सब्र का बांध टूट गया। वह चिल्लाई, “रोज़! रोज़ यही सुनती हूँ मैं रवि। माँ की हालत खराब है, माँ को दवाई देनी है, माँ को नेबुलाइज़र लगाना है। **24 घंटे जब अपनी माँ की ही सेवा करनी थी, तो तुमने मुझसे शादी ही क्यों की?**
कमरे में सूटकेस बंद करने की तेज़ आवाज़ ने रात के सन्नाटे को चीर दिया। वह आवाज़ सिर्फ ज़िप बंद करने की नहीं थी, बल्कि एक रिश्ते के दरवाज़े बंद होने की थी।
“बस, बहुत हो गया! अब और नहीं सहा जाता मुझसे।”
सुमेधा की आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ में एक अजीब सी कठोरता थी। सामने खड़े रवि की नज़रें झुकी हुई थीं। उसके चेहरे पर थकान की गहरी लकीरें थीं, और आँखों के नीचे काले घेरे साफ बता रहे थे कि वह कई रातों से ठीक से सोया नहीं है।
“सुमेधा, प्लीज… समझने की कोशिश करो। माँ की हालत आज बहुत खराब है,” रवि ने धीमी आवाज़ में कहने की कोशिश की।
सुमेधा का सब्र का बांध टूट गया। वह चिल्लाई, “रोज़! रोज़ यही सुनती हूँ मैं रवि। माँ की हालत खराब है, माँ को दवाई देनी है, माँ को नेबुलाइज़र लगाना है। **24 घंटे जब अपनी माँ की ही सेवा करनी थी, तो तुमने मुझसे शादी ही क्यों की?** क्या मैं यहाँ सिर्फ दीवार पर टंगी तस्वीर बनने आई हूँ? या कोई एक्स्ट्रा नर्स हूँ जिसकी ज़रूरत तब पड़ती है जब तुम थक जाओ?”
रवि चुप रहा। उसके पास सुमेधा के सवालों का कोई जवाब नहीं था, या शायद जवाब देने की हिम्मत नहीं थी।
सुमेधा और रवि की शादी को अभी सिर्फ आठ महीने हुए थे। सुमेधा एक खुशमिजाज़, सपने देखने वाली लड़की थी। उसने सोचा था शादी के बाद वह और रवि घूमेंगे, नई दुनिया देखेंगे। रवि एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और सुमेधा एक बैंक में काम करती थी। रिश्ता बहुत धूमधाम से हुआ था। लेकिन सुमेधा को यह अंदाज़ा नहीं था कि रवि की दुनिया “रवि और सुमेधा” तक सीमित नहीं थी, उसकी धुरी उसकी माँ, कावेरी देवी थीं।
कावेरी देवी पिछले तीन सालों से पैरालिसिस (लकवा) और शुरुआती डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) से जूझ रही थीं। वे बिस्तर पर थीं। रवि उनका इकलौता बेटा था। पिता के गुजरने के बाद रवि ने ही माँ को संभाला था।
शादी के शुरुआती दिनों में सुमेधा ने इसे रवि का बड़प्पन माना। उसे गर्व होता था कि उसका पति “श्रवण कुमार” जैसा है। लेकिन धीरे-धीरे यह बड़प्पन सुमेधा के लिए पिंजरा बन गया। उनका हनीमून कैंसिल हो गया क्योंकि माँ की तबीयत बिगड़ गई। वीकेंड पर बाहर जाना कैंसिल हो जाता क्योंकि आया (Nurs) छुट्टी पर होती थी।
आज शाम, सुमेधा का जन्मदिन था। रवि ने वादा किया था कि वे डिनर पर जाएंगे। सुमेधा ने अपनी पसंदीदा लाल साड़ी पहनी थी। वह सात बजे से तैयार बैठी थी। आठ बजे रवि आया, लेकिन आते ही माँ के कमरे में चला गया। माँ को दौरे पड़ रहे थे। रवि उन्हें संभालने में लग गया। नौ बजे, दस बजे… ग्यारह बज गए। रवि कमरे से बाहर नहीं आया।
सुमेधा ने जब जाकर देखा, तो रवि माँ के पैरों के पास बैठा उन्हें सहला रहा था। माँ सो चुकी थीं, पर रवि वहीं बैठा था। सुमेधा का अस्तित्व, उसका जन्मदिन, उसकी लाल साड़ी—सब उस बंद कमरे की दवाइयों की गंध में कहीं खो गया था। और तब सुमेधा ने अपना सूटकेस निकालने का फैसला किया।
“मैं कल सुबह अपनी मम्मी के घर जा रही हूँ, रवि। मुझे तलाक चाहिए। मैं इस घुटन में नहीं जी सकती जहाँ मेरे पति के पास मेरे लिए दो मिनट भी नहीं हैं,” सुमेधा ने अपना फैसला सुना दिया।
रवि ने एक गहरी सांस ली। उसने सुमेधा को रोकने की कोशिश नहीं की। उसने बस इतना कहा, “जैसी तुम्हारी मर्जी। शायद मैं एक अच्छा पति नहीं बन पाया। तुम सो जाओ, मैं हॉल में सो जाऊंगा।”
रवि बाहर चला गया। सुमेधा बिस्तर पर गिरकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसे रवि से नफरत नहीं थी, उसे अपनी किस्मत पर रोना आ रहा था। उसे रवि से प्यार था, लेकिन वह उस प्यार में अपना हिस्सा चाहती थी, जो उसे मिल नहीं रहा था।
अगली सुबह, सुमेधा की आँख देर से खुली। घर में अजीब सी शांति थी। रोज़ सुबह-सुबह रवि की भागदौड़ की आवाज़ आती थी—मिक्सर चलने की, कुकर की सीटी की। लेकिन आज सन्नाटा था।
सुमेधा बाहर निकली। उसने देखा कि रवि सोफे पर ही बैठा हुआ है, सिर को हाथों में थामे।
“क्या हुआ? चाय नहीं बनी आज?” सुमेधा ने रूखेपन से पूछा, हालांकि वह जाने के लिए तैयार थी।
रवि ने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं। “माँ… माँ नहीं रहीं, सुमेधा।”
सुमेधा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “क्या?”
“रात को… शायद साइलेंट अटैक आया। मैं… मैं उन्हें बचा नहीं पाया,” रवि की आवाज़ टूट गई। वह रोया नहीं, बस पत्थर हो गया था।
अगले कुछ दिन घर में कोहराम मचा रहा। रिश्तेदार आए, अंतिम संस्कार हुआ। सुमेधा अपना सूटकेस भूल गई। इंसानियत के नाते वह रवि के साथ खड़ी रही। उसने देखा कि रवि मशीनी तरीके से सारी रस्में निभा रहा था, लेकिन उसकी रूह जैसे जिस्म छोड़ चुकी थी।
तेरहवीं के बाद, जब सारे रिश्तेदार चले गए, घर फिर से खाली हो गया। सुमेधा रसोई में चाय बना रही थी। उसे लगा अब तो उसे चले जाना चाहिए। माँ जी चली गईं, लेकिन रवि के साथ उसके रिश्ते की खटास तो वहीं थी। रवि ने उन दिनों में भी सुमेधा से कोई खास बात नहीं की थी।
शाम को सुमेधा कावेरी देवी के कमरे में गई। उसे उस कमरे की सफाई करनी थी। दवाइयों की शीशियाँ, गंदे कपड़े, और वह व्हीलचेयर—सब वहां वैसा ही था। सुमेधा को अजीब सा भारीपन महसूस हुआ। उसने अलमारी खोली ताकि पुराने कपड़े हटा सके।
कपड़ों के ढेर के नीचे, एक पुरानी डायरी और कुछ ऑडियो कैसेट्स मिले। डायरी के ऊपर कांपते हाथों से लिखा था—*”मेरे बेटे की होने वाली दुल्हन के नाम।”*
सुमेधा का दिल ज़ोर से धड़का। उसने डायरी खोली। तारीख तीन साल पुरानी थी, जब कावेरी देवी को अपनी बीमारी का पता चला था, लेकिन वे पूरी तरह बिस्तर पर नहीं थीं।
*पन्ना 1:*
“बेटा, मैं तुम्हें नहीं जानती, तुम्हारा नाम क्या होगा, कैसी दिखती होगी। लेकिन मैं जानती हूँ कि मेरा रवि तुम्हें बहुत प्यार करेगा। रवि… वो ऊपर से सख्त दिखता है, पर अंदर से मोम है। मुझे डर है… डॉक्टर कहते हैं कि मैं धीरे-धीरे सब भूल जाऊंगी। मैं अपने बेटे को भी भूल जाऊंगी। मुझे डर इस बात का नहीं कि मैं मर जाऊंगी, डर इस बात का है कि मेरी बीमारी मेरे बेटे की जवानी खा जाएगी।”
सुमेधा के हाथ कांपने लगे। वह वहीं फर्श पर बैठ गई और पन्ने पलटने लगी।
*पन्ना 15:*
“आज रवि ने शादी के लिए मना कर दिया। कहता है, ‘माँ, तुम्हारी सेवा कौन करेगा?’ पागल लड़का। उसे समझ नहीं आ रहा कि मुझे नर्स नहीं, उसके लिए एक साथी चाहिए। मैंने उससे कसम ली है कि वह शादी करेगा। मैं नहीं चाहती कि मेरे जाने के बाद वह इस खाली घर में अकेला रह जाए। मैं उसके लिए बोझ बन गई हूँ। हे भगवान, मुझे उठा क्यों नहीं लेते?”
सुमेधा की आँखों से आंसू गिरने लगे। वह आगे पढ़ती गई।
*आखिरी पन्ना (लिखावट बहुत टेढ़ी-मेढ़ी थी, शायद बीमारी बढ़ने के बाद लिखा गया था):*
“मेरे बेटे की बहू… मुझे माफ़ कर देना। मैं जानती हूँ, रवि तुम्हें वो वक्त नहीं दे पा रहा होगा जिसकी तुम हक़दार हो। वो मुझे लेकर बहुत डरा हुआ है। उसे लगता है कि अगर उसने एक पल भी नज़र हटाई, तो मैं उसे छोड़कर चली जाऊंगी। वो मुझसे प्यार नहीं करता, वो ‘प्रायश्चित’ कर रहा है। उसके पिता के जाने के वक्त वो पास नहीं था, इसलिए अब वो मुझे खोने से डरता है।
बेटा, उससे नफरत मत करना। वो एक अच्छा पति बनेगा, बस उसे मेरे जाने के बाद थोड़ा संभाल लेना। उसका दिल बहुत नाज़ुक है। मैंने उसे हमेशा कहा कि अपनी पत्नी को घुमाना, उसे खुश रखना… पर मेरी बीमारी ने उसके पैरों में बेड़ियाँ डाल दीं। मेरी वजह से तुम दोनों की ज़िंदगी रुक गई है। मुझे माफ़ करना…”
डायरी के पन्ने आंसुओं से भीग गए थे। सुमेधा को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसका दिल मुट्ठी में भींच लिया हो। वह जिसे रवि की ‘बेरुखी’ समझ रही थी, वह असल में एक बेटे का ‘डर’ और ‘पछतावा’ था। रवि ने शादी अपनी माँ की सेवा के लिए नहीं की थी, बल्कि माँ की ज़िद और कसम की वजह से की थी ताकि माँ के जाने के बाद वह अकेला न रह जाए।
सुमेधा ने डायरी सीने से लगा ली। उसे वो रात याद आई जब रवि ने कहा था, “माँ की हालत खराब है।” उस वक्त रवि की आँखों में जो डर था, सुमेधा उसे देख ही नहीं पाई थी। वह अपनी साड़ी और डिनर डेट में उलझी रही, जबकि उसका पति मौत से लड़ रहा था।
तभी कमरे के दरवाज़े पर आहट हुई। रवि खड़ा था। वह बहुत कमज़ोर लग रहा था।
“तुम अभी तक गई नहीं?” रवि ने धीमी आवाज़ में पूछा। “मैंने ड्राइवर को बोल दिया है, वो तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आएगा। तुम आज़ाद हो सुमेधा। माँ चली गईं, अब तुम्हें मेरी सेवा या मेरे पागलपन को झेलने की ज़रूरत नहीं।”
सुमेधा उठी। उसने अपनी आँखों के आंसू पोंछे। वह धीरे-धीरे रवि के पास गई।
रवि ने नज़रें फेर लीं। “जाओ सुमेधा, प्लीज। मैं नहीं चाहता तुम मुझ जैसे इंसान के साथ अपनी ज़िंदगी बर्बाद करो जो तुम्हें जन्मदिन पर एक डिनर भी नहीं दे सका।”
सुमेधा ने रवि का हाथ पकड़ लिया। रवि चौंक गया। उसने सुमेधा की तरफ देखा।
“रवि, मुझे माफ़ कर दो,” सुमेधा सिसक पड़ी। “मैं… मैं बहुत स्वार्थी हो गई थी। मैंने सिर्फ अपना दर्द देखा, तुम्हारा संघर्ष नहीं देखा। मैंने यह नहीं देखा कि तुम किस दौर से गुज़र रहे थे।”
“नहीं सुमेधा, गलती मेरी है,” रवि ने अपना हाथ छुड़ाना चाहा।
“नहीं,” सुमेधा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। “गलती हम दोनों की थी। हम दोनों हालातों से हार रहे थे। तुमने अपना दर्द बांटा नहीं, और मैंने उसे समझने की कोशिश नहीं की। रवि, माँ जी ने यह डायरी मेरे लिए लिखी थी। वो चाहती थीं कि हम साथ रहें। वो जानती थीं कि तुम अंदर से कितने अकेले हो।”
रवि की नज़र डायरी पर पड़ी और वह टूट गया। वह घुटनों के बल बैठ गया और बच्चों की तरह रोने लगा। “सुमेधा, मैं उन्हें बचा नहीं पाया… मैं उन्हें बचा नहीं पाया… मैंने अपना सब कुछ लगा दिया, फिर भी वो चली गईं।”
सुमेधा भी उसके पास बैठ गई और उसे अपने गले लगा लिया। “तुमने बहुत किया रवि। किसी बेटे ने आज तक इतना नहीं किया होगा जितना तुमने किया। तुम श्रवण कुमार हो। माँ जी सुकून से गई हैं क्योंकि उनका बेटा उनके पास था।”
उस रात, उस खाली घर में दो टूटे हुए दिल एक-दूसरे को जोड़ रहे थे।
अगले कुछ हफ़्तों में, सुमेधा ने रवि को उस गहरे अवसाद से बाहर निकाला। उसने अपना सूटकेस वापस अलमारी के ऊपर रख दिया। रवि अभी भी शांत रहता था, लेकिन अब वह अकेला नहीं था। शाम को जब वह ऑफिस से आता, तो सुमेधा उसके साथ बैठती, बातें करती।
एक शाम, रवि घर आया तो उसके हाथ में एक लिफाफा था।
“यह क्या है?” सुमेधा ने पूछा।
“शिमला के टिकेट्स,” रवि ने फीकी मुस्कान के साथ कहा। “हमारा हनीमून पेंडिंग था न? और… तुम्हारा बर्थडे गिफ्ट भी उधार था। चलो, माँ की अस्थियाँ विसर्जित कर दी हैं, अब उनकी आखिरी इच्छा भी पूरी कर दूँ—कि हम दोनों अपनी ज़िंदगी जियें।”
सुमेधा की आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए।
“लेकिन रवि, एक शर्त है,” सुमेधा ने कहा।
“क्या?”
“हम वहां सिर्फ घूमेंगे नहीं। हम वहां जाकर खूब बातें करेंगे। तुम अपने मन का हर बोझ, हर डर मुझे बताओगे। अब कोई पर्दा नहीं, कोई खामोशी नहीं। 24 घंटे हम एक-दूसरे की सेवा नहीं, बल्कि एक-दूसरे का ‘साथ’ निभाएंगे।”
रवि ने सुमेधा का हाथ चूमा। “वादा रहा।”
कावेरी देवी की तस्वीर दीवार पर टंगी थी, और उस पर चढ़ी माला के पीछे, उनकी मुस्कान आज और भी जीवंत लग रही थी। उनका बेटा अब अकेला नहीं था। उनका घर अब सिर्फ ईंट-पत्थरों का मकान नहीं, बल्कि प्यार का आशियाना बन रहा था।
सुमेधा को अपना जवाब मिल गया था। रवि ने उससे शादी इसलिए नहीं की थी कि उसे सेवा करवानी थी, बल्कि इसलिए की थी क्योंकि उसकी रूह को एक हमसफ़र की तलाश थी, जो तूफ़ान थमने के बाद उसका हाथ थाम सके। और सुमेधा ने ठान लिया था कि वह वो हमसफ़र बनकर दिखाएगी।
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**कहानी का सार:**
रिश्तों में अक्सर हम वह देखते हैं जो हमें दिखाई देता है—बेरुखी, समय की कमी, चिड़चिड़ापन। लेकिन हम वह नहीं देख पाते जो छिपा होता है—ज़िम्मेदारी का बोझ, किसी को खोने का डर, और खामोश आंसू। पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ़ सुख का साथी बनना नहीं है, बल्कि एक-दूसरे के दुःख को, बिना कहे पढ़ लेना ही सच्चा प्रेम है।
**अंत में आपके लिए एक सवाल:**
क्या सुमेधा का रुकना सही था? क्या हम आज के दौर में इतने धैर्यवान हैं कि अपने जीवनसाथी के अनकहे दर्द को समझ सकें? अपनी राय कमेंट में जरूर दीजियेगा।
**”अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ, आपकी आँखों को नम किया, तो प्लीज इसे लाइक करें और एक प्यारा सा कमेंट छोड़ें। अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें ताकि रिश्तों की अहमियत सब समझ सकें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो ऐसे ही दिल छू लेने वाली और मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करना न भूलें। आपका एक शेयर किसी रिश्ते को टूटने से बचा सकता है। धन्यवाद!”**
मूल लेखिका : निभा राजीव