अनाम रिश्ता – बालेश्वर गुप्ता 

  मुन्ना-मुन्ना, अरे आज तू चाय पीने नहीं गया, क्या हुआ तुझे,तेरी तबीयत तो ठीक है ना?

          कुछ नहीं आंटी, ऐसे ही सर  दर्द कर रहा था,उठने को मन ही नही कर रहा था. 

        देख मैं तेरे लिये चाय और टोस्ट ले आयी हूं. तू चाय पी ले मुन्ना,मैं तुझे सेरिडान की गोली ला कर देती हूँ,उससे तेरा सर दर्द खत्म हो जायेगा. नहीं तो दोपहर बाद मैं तुझे डॉक्टर के पास ले चलूँगी. 

       कोई नहीं, आंटी  मैं ठीक हो जाऊंगा, आप चिंता न करे. कोई दोस्त आयेगा तो उसके साथ डाक्टर के यहां चला जाऊँगा. 

      क्यूँ, क्या मैं कहीं चली गयी, मैं लेके चलूँगी तुझे डॉक्टर के पास.

      70 वर्षीय जोगिंदर सिंह जी का उदयपुर में ट्रांसपोर्ट का बिजनैस था,मेरठ में उनका अपना मकान था.पता नहीं क्यों उन्हें अपने को व्यस्त रखने की लत जैसी थी.65 वर्षीय पत्नि जसबीर कौर मेरठ में अकेली रहती थी. मन लगा रहे इसलिये वे अपने घर के एक पोरसन को किराये पर चढ़ा देती थीं. मैं तब विद्यार्थी था,मैंने उस घर में एक कमरा जो ऊपर था, किराये पर ले लिया था. घर से बाहर जाने के लिये घर के चौक को पार करके जाना पड़ता था.स्वाभाविक रूप से दिन में तीन चार बार आंटी जी से आमना सामना हो जाता था, मैं अपनी आदत के अनुसार उन्हें नमस्ते कर लेता. उनकी भाव भंगिमा से लगता, इससे उन्हें प्रसन्नता मिलती थी. मेरी दिनचर्या थी प्रात:8 बजे के लगभग मैं बाहर सड़क पर चाय वाले की दुकान पर नाश्ता करने जाता, दोपहर में होटल पर खाना खाने,शाम को चाय पीने के बाद उधर से ही अपनी सायकालीन कक्षा के लिये कालेज जाता और बाद में होटल पर खाना खाकर ही वापस अपने कमरे पर आता था. छुट्टियों में अक्सर अपने गाँव चला जाता था, कभी-कभी नहीं भी जाता था. 

     एक बार जब मैं छुट्टियों में घर नहीं गया तो एक दिन मैं आंटी जी के पास बैठ गया. मैं बोला आंटी जी आज तो मैं आपसे बातचीत के लिये ही रुका हूँ. इतना सुनना था कि उनकी प्रसन्नता छुपाये नही रही थी. मैं उस दिन पहली बार उनके पास लगभग दो घंटे बैठा रहा. उन्होंने मेरे परिवार के बारे में जानकारी ली तथा अपने परिवार के बारे में भी स्वयं ही बताया. पति जोगिंदर सिंह उदयपुर में अपने बिजनैस में थे, कभी कभार पाँच-सात दिन रह कर चले जाते हैं  ,दो बेटे हैं  दोनों बहुत अच्छी पोजीशन में अपना अपना जॉब कर रहे थे. फिर एक दम जोर से हँस पड़ी.मैंने आश्चर्य से उनकी ओर देखा. क्योंकि बातचीत में हंसने का कोई प्रसंग नहीं था. आंटी हँसते हुए बोली और मुन्ना मैं भी तो यहाँ जॉब ही कर रहीं हूँ. मुझे फिर आश्चर्य हुआ. भला आंटी जी कौनसा जॉब कर रहीं हैं?आंटी जी बोली इस घर की रखवाली कर रहीं हूँ, मुन्ना देख कितना अच्छा जॉब है, अकेली एंप्लॉइ हूँ, इस कम्पनी की. कभी-कभी इंस्पेक्शन के लिये मालिक लोग आते रहते हैं. एक बार फिर वे हँस पड़ी. उनकी हँसी मेरे मन को अंदर तक चीर गयी. उन्होंने आज मेरा नया नामकरण भी कर दिया था-मुन्ना. मैं समझ रहा था इस उम्र में पति और दो दो बेटे होते हुए भी वे नितांत अकेली थी.मेरे पास कोई समाधान नहीं था. 

        इस घटना के बाद इतना अवश्य हुआ,आंटी जी मुझ पर अपना पूरा स्नेह लुटाने लगी थी.मेरा वो पूरा ध्यान रखती. मैंने भी उनका भरसक सहयोग करना प्रारंभ कर दिया था. परिस्थिती वश हम दोनों में एक अनाम भावनात्मक रिश्ता बन गया था. मुझे आंटी जी में माँ का प्यार झलकता और शायद वे भी मुझे बेटे के रूप में देखने लगी थी. मैं सामने होता तो मुन्ना मुन्ना कहती ना अघाती.मेरे लिये कभी कुछ कभी कुछ बना कर प्यार से खिलाती. उस दिन मैं तबीयत खराब होने के कारण अपने कमरे से नीचे नहीं आया तो आंटी जी खुद मेरे लिये चाय नाश्ता लेकर ही मेरे कमरे में आ गयी थी.

       उनके स्नेह को देख मेरी आँखों में आंसू आ गये. साक्षात स्नेहमयी माँ मेरे सामने खड़ी थी.

एक बार वे अपने पति के पास उदयपुर 10-15 दिनों के लिये चली गयी. मुझे अब आंटी जी के साथ रहने की आदत सी हो गयी थी, पर मैं उन्हें रोक तो नही सकता था.जाने से पूर्व वे मुझे पूरे घर की चाबियां सौंप गयी. मैंने मना किया,पर वे बोली अरे मुन्ना जब मैं यहाँ नहीं रहूंगी तो बता जरा,घर का ध्यान कौन रखेगा भला. मैं टुकर टुकर उनको देखता रह गया. मैं तो उनका मात्र किरायेदार ही तो था,फिर इतना विश्वास.आंटी जी चली गयी, उनके बिना घर सूना हो गया था. सुबह सुबह कभी-कभी लगता आंटी जी बोल रहीं हैं, मुन्ना अभी उठा नहीं, देख मैं तेरे लिये आज गोभी का पराठा बनाकर लायी हूं, चल जल्दी उठ.मैं हड़बड़ा कर उठ जाता. पर आंटी जी वहाँ कहाँ थी. 

        15 दिनो बाद आंटी जी वापस आ गयी, सीधे मेरे कमरे में आकर मुझे मुन्ना मुन्ना कहते हुए अपने से चिपटा लिया. आंटी जी ने बताया कि बड़े बेटे मोहिंदर का रिश्ता तय कर दिया है. बड़े घर की लड़की है, मुन्ना देख सब तुझे ही सम्भालना है. आंटी जी आप बिल्कुल भी चिंता न करे, आप बताती रहना, मैं सब व्यवस्था कर लूंगा. मैं उनके बेटो से कभी मिला नहीं था. वे शादी के तीन दिन पहले ही आये. उनका तौर तरीका,बोल चाल सब आधुनिक था,मैं ग्रामीण पृष्ठभूमि का था  इसलिये उनके बीच मैं अपने को असहज महसूस कर रहा था, दूसरे  उनका व्यवहार उनके सीधे तौर पर कुछ न कहने पर भी अपने प्रति अपने को सुपीरियर समझने का अहसास करा रहा था. फिर भी मैंने अपना सहयोग जारी रखा. आंटी जी का प्रबल आग्रह बारात में चलने का था,मेरी उलझन यह थी कि एक बार भी उनके बेटो ने औपचारिकता निभाने तक के लिये भी मुझे बारात में चलने के लिये नहीं कहा. मैं समझ नहीं पा रहा था, क्या करूं?मैंने एक उपाय सोच लिया, बारात जाने से पहले दिन मैंने आंटी जी से कहा आंटी जी अभी अभी ख़बर आयी है, मेरे पिताजी की तबीयत खराब हो गयी है, मुझे उनके पास अभी जाना होगा. वे मना भी नहीं  कर सकती थी और मेरा बारात में न जा पाना उन्हें अच्छा भी नहीं लग रहा था. 

      दो दिन मैं अपने गाँव रहकर वापस आ गया,आंटी जी के अधिकतर मेहमान जा चुके थे, इक्का दुक्का ही शेष रह गये थे. सब चौक में ही बैठे थे,आंटी जी शायद अंदर थी,मैंने सब को नमस्ते की और ऊपर अपने कमरे में चला आया. मुझे धक्का सा लगा कि आंटी जी के बेटो और पति ने एक बार भी मेरे पिता के स्वास्थ्य के विषय में जानकारी लेने का प्रयास तक नही किया. 

       आंटी जी ने मेरे कमरे की लाइट जलते देख एकदम ऊपर आ गयी. अरे मुन्ना तू कब आया, मुझे तो पता ही नहीं चला,मुन्ना बारात में तेरी कमी खल रही थी, मुन्ना बता ना, तेरे पिता कैसे  हैं?देख तू होटल मत जाना, मैं तेरे लिये खाना लाती हूँ. मैं उनका मुख  देखता रह गया. कितनी निश्चल सरल स्नेहिल थी आंटी जी. इतना स्नेह तो कभी मेरी माँ ने भी नहीं जताया था. 

        कुछ देर बाद मुझे नीचे कुछ अप्रत्याशित सी आवाज सुनाई दी. उत्सुकता वश  मैंने जो अस्पष्ट सा सुना और समझा वह था आंटी जी मेरा खाना लाना चाहती थी तो साथ में वे मुझसे मिलाने अपनी बहू को भी लाना चाहती थी  जिसका विरोध उनका बेटा ही कर रहा था. आंटी जी कह रही थी अरे मुन्ना तुम्हारा भाई ही है. पर किसी ने उनकी भावनाओं पर ध्यान नही दिया. वे अनमनी सी आकर मेरे कमरे में खाना रखकर तुरंत चली गयी. मैं उनकी मनोदशा समझ रहा था, पर कुछ कर नही सकता था. 

     अब मैं अपने पुराने रूटीन में आ गया था, सुबह चाय पीने, दोपहर खाना खाने  तथा शाम को कालेज जाने को कमरे से उतरता. आंटी जी दिखाई नहीं दे रही थी, उनके विषय में किसी से पूछने की हिम्मत नही हो रही थी. तीन दिनो बाद बेटो और उनके पति के जाने की तैयारियां होने लगी. 

        अगले दिन उनका बड़ा बेटा कहीं विदेश हनीमून के लिये चला गया और छोटा बेटा चेन्नई चला गया. जोगिंदर जी आंगन में दिखाई दिये थे  वे क्यों नहीं गये, मुझे जानकारी नहीं थी. आँगन में मैं बार बार इसलिये झाँक रहा था, कि आंटी जी दिखाई नहीं दे रही थी. 

     रात्रि में मेरे कमरे के दरवाजे को जोर जोर से खट खटाने की आवाज से मेरी आंखे खुल गयी, दरवाजा खोलने पर मैंने सामने जोगिंदर जी को खडे पाया. उनकी बदहवासी को देख मैं घबरा गया.अंकल जी क्या हुआ, सब ठीक तो है. मुझे कुछ नही हुआ है, बेटा देख तो जसबीर को क्या हो गया है?मैं तुरंत नीचे की ओर भागा कमरे में देखा आंटी जी बेसुध पड़ी थी,मैं पड़ौस में रह रहे डॉक्टर को बुला लाया,जांच करने के बाद डॉक्टर ने बोल दिया कि वे नहीं रही,शायद हार्ट फेल हो गया था. मैं तो खड़े का खड़े रह गया. पुरानी उनकी यादें, उनका पुत्रवत स्नेह आँखों के सामने तैरने लगा था. 

     अगले दिन अंकल बोले बेटा कोई नहीं आयेगा तुझे ही इसका अंतिम संस्कार करना है. 15 दिन अभी साथ रही हर समय मेरा मुन्ना मेरा मुन्ना की रट ही लगाती रहती थी. पर क्या करे अपने बेटे तो बड़े हो गये हैं, वे मुन्ना को समझ ही नहीं  पाए और अपनी माँ को खो बैठे. अंतिम संस्कार की सब व्यवस्था मैंने कर दी, कुछ रिश्तेदार जो नजदीक रहते थे, आ गये थे. चिता पर लेटी आंटी जी इतनी सौम्य लग रही थी मानो कोई देवी हो. चिता में अग्नि देने के लिये सब  जोगिंदर जी की ओर देख रहे थे क्योंकि दोनों बेटों में तो कोई था नही.एकाएक जोगिंदर जी बोले जसबीर की चिता में अग्नि हमारा मुन्ना लगाएगा,मेरी जसबीर का मुन्ना,हमारा तीसरा बेटा. मैं अवाक हो सबका मुहँ देख रहा था, जोगिंदर जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझे चिता की ओर ले जाने लगे. आंटी जी को चिता पर देख मैं चित्कार कर उठा,मेरे मुहँ से अनायास ही निकल पड़ा, माँ तुम मुझे क्यूँ छोड़ गयी. 

      दो चिता एक साथ जल रही थी,एक मेरी आंटी-नहीं मेरी माँ की  तो दूसरी चिता मेरे दिल में जल रही थी जिसने मां का प्यार दिया नया नाम दिया मुन्ना, और मैं अभागा जीते जी उन्हें आंटी ही कहता रहा, एक बार भी मां न कह सका. 

     वर्षो बीत गये, पर उस स्नेह शील मां की याद अब भी मन में ज्यों की त्यों बसी है.

(मौलिक)

लेखक : बालेश्वर गुप्ता 

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