एक अनकही सच्चाई – आरती देवी

दिल्ली जैसे महानगर की सुबह हमेशा एक भागदौड़ के साथ शुरू होती है। लोकल ट्रेन की सीटी, मेट्रो की उद्घोषणाएं और सड़कों पर रेंगता हुआ ट्रैफिक, यही इस शहर की धड़कन है। मैं भी इसी धड़कन का एक हिस्सा हूँ। एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हुए मैंने इस शहर की रफ्तार को अपना लिया था। लेकिन मेरी जिंदगी में अचानक एक ठहराव तब आया जब मेरी माँ लकवाग्रस्त हो गईं। ऑफिस और माँ की देखभाल के बीच मेरा जीवन एक पेंडुलम की तरह झूलने लगा। माँ के लिए एक ऐसी अटेंडेंट की तलाश थी जो न केवल उनकी शारीरिक देखभाल कर सके, बल्कि उनके चिड़चिड़े हो चुके स्वभाव को भी प्यार से संभाल सके। कई एजेंसियों के चक्कर काटने के बाद, मेरी मुलाकात पल्लवी से हुई।

पल्लवी उम्र में बमुश्किल तेईस या चौबीस साल की रही होगी। साधारण सी सूती कुर्ती, माथे पर एक छोटी सी बिंदी, सांवला सलोना रंग और आँखों में एक ऐसी गहरी चमक जो किसी को भी प्रभावित कर दे। एजेंसी वाले ने बताया था कि पल्लवी बहुत मेहनती है। जब वह पहली बार मेरे घर आई, तो उसकी झिझक और सादगी देखकर मुझे लगा कि शायद यह शहर के माहौल में ढल नहीं पाएगी। लेकिन पहले ही दिन से उसने मेरे घर और मेरी माँ को जिस तरह से संभाला, उसने मेरे सारे संदेह दूर कर दिए। 

माँ को समय पर दवा देना, स्पंज करना, उनके बिस्तर की चादरें बदलना और सबसे बड़ी बात, उनके साथ बैठकर मीठी-मीठी बातें करना—पल्लवी सब कुछ इतनी कुशलता से करती थी जैसे वह कोई बहुत ही प्रशिक्षित मेडिकल प्रोफेशनल हो। उसकी अंग्रेजी और दवाओं की जानकारी देखकर मैं अक्सर हैरान रह जाती थी। एक दिन जब डॉक्टर माँ का चेकअप करने आए, तो पल्लवी ने जिस मेडिकल टर्मिनोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए माँ की ब्लड प्रेशर और शुगर की रिपोर्ट समझाई, डॉक्टर भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। 

उस रात जब माँ सो गईं, तो मैं अपनी बालकनी में चाय पी रही थी। पल्लवी भी अपना काम खत्म करके रसोई से बाहर आई। मैंने उसे अपने पास बुलाया और एक कप चाय उसे भी दी। 

“पल्लवी, तुम कहाँ की रहने वाली हो? और तुमने यह मेडिकल की इतनी अच्छी जानकारी कहाँ से हासिल की?” मैंने बहुत ही सहजता से पूछा। 

चाय का कप थामे पल्लवी की आँखें अचानक एक अजीब सी उदासी से घिर गईं। उसने एक गहरी सांस ली और शहर की उन अनगिनत टिमटिमाती रोशनियों को देखते हुए बोली, “दीदी, मैं गोरखपुर के पास एक छोटे से गाँव की रहने वाली हूँ। मेरे बाबूजी एक बहुत साधारण किसान हैं। हम तीन बहनें हैं और मैं सबसे बड़ी हूँ। बाबूजी ने हमेशा कहा था कि बेटियाँ बोझ नहीं होतीं, वे तो घर का मान होती हैं। उन्होंने अपनी एक बीघा जमीन गिरवी रखकर मुझे नर्सिंग का कोर्स करवाया था। मैंने अपनी क्लास में टॉप किया था दीदी।”

मैं उसे ध्यान से सुन रही थी। उसकी बातों में उसके बाबूजी का गर्व और उसके गाँव की मिट्टी की महक साफ़ महसूस हो रही थी। 

“तो फिर तुम यहाँ इस एजेंसी के ज़रिए घरों में अटेंडेंट का काम क्यों कर रही हो? तुम्हें तो किसी अच्छे अस्पताल में होना चाहिए था,” मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई थी। 

पल्लवी के होंठ थोड़ा सा कांपे। उसने अपनी आँखों में तैर आए आंसुओं को बड़ी मुश्किल से रोका और फिर वह सच बताया, जिसने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया। 

“दीदी, गाँव में एक प्लेसमेंट वाला आया था। उसने बाबूजी को बड़े-बड़े सपने दिखाए थे। उसने कहा था कि दिल्ली के एक बहुत बड़े और नामी अस्पताल में स्टाफ नर्स की सीधी भर्ती हो रही है। उसने मेरी मार्कशीट देखी और बोला कि मुझे तीस हजार रुपये महीने की नौकरी मिलेगी। बाबूजी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उन्होंने पूरे गाँव में मिठाई बाँट दी थी कि उनकी पल्लवी अब दिल्ली के बड़े अस्पताल में ‘अफसर नर्स’ बन गई है। गाँव की हर लड़की मेरी तरह बनने के सपने देखने लगी थी।”

पल्लवी थोड़ा रुकी, उसने चाय का एक घूंट लिया, लेकिन वह चाय शायद उसके आंसुओं से ज्यादा कड़वी नहीं थी। 

“जब मैं यहाँ दिल्ली आई, तो स्टेशन पर मुझे उसी आदमी ने रिसीव किया। वह मुझे एक छोटी सी कोठरी जैसे ऑफिस में ले गया। उसने कहा कि अस्पताल में जॉइनिंग की प्रक्रिया पूरी करने के लिए मेरे असली सर्टिफिकेट्स और मार्कशीट उसे जमा करने होंगे। मैंने गाँव की सीधी लड़की समझकर उस पर भरोसा कर लिया और अपने सारे असली कागजात उसे दे दिए। दो दिन बाद जब मैंने उससे जॉइनिंग के बारे में पूछा, तो उसका रंग ही बदल गया। उसने साफ कह दिया कि कोई अस्पताल की नौकरी नहीं है। उसने मुझे एक मरीज के घर चौबीस घंटे की अटेंडेंट के काम पर भेज दिया। जब मैंने विरोध किया और अपने कागजात वापस मांगे, तो उसने धमकी दी कि अगर मैंने पुलिस के पास जाने की कोशिश की तो वह मेरे कागजात जला देगा और मुझे झूठे केस में फंसा देगा।”

मैं सन्न रह गई। एक पढ़ी-लिखी, होनहार लड़की को किस तरह इस शहर के गिद्धों ने अपने जाल में फंसा लिया था। 

“तुम्हें तीस हजार का वादा किया गया था, तो अब तुम्हें क्या मिल रहा है?” मैंने भारी मन से पूछा। 

पल्लवी ने एक फीकी सी मुस्कान के साथ जवाब दिया, “दीदी, वादा तीस हजार का था। जिस मरीज के घर मुझे भेजा गया, वे लोग एजेंसी को पच्चीस हजार रुपये महीने देते थे, लेकिन एजेंसी वाले मेरे हाथ में काट-पीटकर मात्र बारह हजार रुपये थमा देते थे। जब मैंने उनसे कहा कि मेरा हक इससे ज्यादा है, तो उन्होंने कहा कि गाँव लौट जाओ। लेकिन मैं कैसे लौट जाती?”

पल्लवी की आँखों में अब आँसू छलक आए थे। “दीदी, वो कह रही थी घर में सबको कैसे बताऊँगी कि मैं किसी बड़े अस्पताल में अफसर नर्स नहीं हूँ, बल्कि निजी घरों में झाड़ू-पोंछा और मरीजों के डायपर बदलने वाली एक साधारण अटेंडेंट का काम कर रही हूँ। बाबूजी को क्या मुँह दिखाऊँगी? उन्होंने तो अपनी ज़मीन दांव पर लगा दी है। अगर उन्हें पता चला कि उनकी बेटी के साथ इतना बड़ा धोखा हुआ है, तो शायद वे सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे।”

मुझे उसके हर शब्द में उस ग्रामीण परिवेश की मर्यादा, पिता का सम्मान और एक बेटी की बेबसी साफ नजर आ रही थी। 

“मैं बाबूजी को हर महीने दस हजार रुपये भेज देती हूँ, ताकि वे अपनी जमीन का कर्ज उतार सकें। मैं उनसे फोन पर झूठ बोलती हूँ कि मैं एक बहुत बड़े अस्पताल के आईसीयू वार्ड में ड्यूटी करती हूँ। जब भी वे पूछते हैं कि मैं कभी घर क्यों नहीं आती, तो मैं कह देती हूँ कि अस्पताल में बहुत मरीजों की भीड़ है और मुझे छुट्टी नहीं मिल रही। दीदी, मुझे झूठ बोलने में बहुत तकलीफ होती है, लेकिन अगर मेरा झूठ मेरे बाबूजी की आँखों का गर्व बनाए रख सकता है, तो मैं यह पाप करने को भी तैयार हूँ।”

मैंने पल्लवी का हाथ अपने हाथों में ले लिया। उसके हाथ काम कर-करके सख्त हो चुके थे, लेकिन उसका मन अब भी किसी पारदर्शी शीशे की तरह साफ था। 

अचानक पल्लवी ने अपने आँसू पोंछे। उसकी आँखों में जो बेबसी थी, वह अचानक एक दृढ़ निश्चय में बदल गई। उसने अपना सिर उठाया और एक बहुत ही मजबूत आवाज़ में कहा, “लेकिन दीदी, मैं हार नहीं मानूँगी। इन लोगों ने मेरे कागजात छीने हैं, मेरा हौसला नहीं। मैं रोज़ रात को जब आंटी जी सो जाती हैं, तो अपने मोबाइल पर एम्स (AIIMS) की नर्सिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी करती हूँ। मैंने ऑनलाइन फॉर्म भर दिया है। मुझे पता है कि मैं एक दिन यह परीक्षा जरूर निकालूँगी। जिस दिन मेरा सरकारी रिजल्ट आएगा, उस दिन मैं पुलिस को भी साथ लेकर जाऊँगी और अपने कागजात भी वापस लूँगी। मैं अपनी किस्मत को इस बारह हजार की गुलामी में सड़ने नहीं दूँगी।”

उसकी आँखों की वो चमक बता रही थी कि उसने हालातों से लड़ने का फैसला कर लिया है। वह कोई बेचारी नहीं थी; वह एक योद्धा थी जो एक हारे हुए युद्ध को भी अपने जज़्बे से जीतने का माद्दा रखती थी। उस रात पल्लवी तो सोने चली गई, लेकिन मेरी नींद उड़ चुकी थी। मैं बालकनी में खड़ी दिल्ली की ऊंची-ऊंची इमारतों को देख रही थी। ये इमारतें कितनी चमकीली थीं, लेकिन इनकी नींव में पल्लवी जैसी न जाने कितनी होनहार लड़कियों के टूटे हुए सपने और उनके अनकहे दर्द दबे हुए थे। 

हमारे गाँवों की प्रतिभाशाली बेटियां, कितनी मेहनत और लगन से कुछ कर गुजरने के हसीन सपने लेकर इन बड़े शहरों में आती हैं। वे सोचती हैं कि शहर उनकी कला, उनकी शिक्षा और उनकी मेहनत को एक नया मुकाम देगा। लेकिन यहाँ उन्हें क्या मिलता है? मात्र एक मृगमरीचिका। रेगिस्तान की उस रेत की तरह जो दूर से पानी जैसी चमकती है, लेकिन पास जाने पर सिर्फ प्यास और धोखा ही हाथ लगता है। बड़े-बड़े वादे करने वाले दलाल, झूठे प्लेसमेंट एजेंट और इस शहर की वह क्रूर व्यवस्था जो एक गरीब और असहाय लड़की को नोच खाने के लिए तैयार बैठी रहती है।

लेकिन पल्लवी उन लड़कियों में से नहीं थी जो इस मृगमरीचिका में अपनी प्यास से दम तोड़ दें। उसने रेगिस्तान में भी अपना कुआं खोदने की ठान ली थी। 

अगले दिन जब मैं ऑफिस जाने के लिए निकल रही थी, तो पल्लवी माँ के बालों में तेल मालिश कर रही थी। माँ के चेहरे पर एक असीम सुकून था। मैंने पल्लवी को देखा और मुझे उसमें एक केयरटेकर नहीं, बल्कि एक भविष्य की बेहतरीन नर्स नज़र आई। मैंने अपना पर्स खोला, अपना विजिटिंग कार्ड निकाला और उसके पास गई।

“पल्लवी, यह मेरा नंबर है। इसे हमेशा अपने पास रखना। मैं कोई बहुत बड़ी इंसान तो नहीं हूँ, लेकिन मेरी कंपनी के लीगल एडवाइजर बहुत अच्छे हैं। जिस दिन तुम चाहोगी, हम उस एजेंसी वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाएंगे। तुम्हारे असली कागजात उसे लौटाने ही होंगे। तुम अकेली नहीं हो, यह बात हमेशा याद रखना।”

पल्लवी ने कार्ड अपने हाथ में लिया और उसकी आँखों में एक सच्ची कृतज्ञता और सम्मान की भावना थी। उसने बस इतना कहा, “धन्यवाद दीदी। बस मेरा एग्जाम हो जाने दीजिए, फिर मैं उन लोगों को नहीं छोड़ूंगी।”

मैं ऑफिस के लिए निकल गई, लेकिन पल्लवी की वह बात मैं आज तक नहीं भूली हूँ। उसकी वह आवाज़ मेरे कानों में आज भी गूंजती है—”दीदी, मैं हार नहीं मानूँगी।” 

शहर की इस भीड़-भाड़ में हम अक्सर उन चेहरों को नजरअंदाज कर देते हैं जो हमारी सुख-सुविधाओं के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा चुके होते हैं। हमारे घरों में काम करने वाली मेड, हमारे बच्चों की केयरटेकर, हमारे बुजुर्गों की अटेंडेंट—इनमें से न जाने कितनों के सीने में ऐसे ही टूटे हुए सपने और एक पिता का कर्ज धड़क रहा होता है। ये कहानियाँ अखबारों की सुर्खियां नहीं बनतीं, लेकिन ये हमारे समाज का वो कड़वा सच हैं जिन्हें हम रोज़ देखते हैं, पर महसूस नहीं करते। पल्लवी का संघर्ष मुझे यह सिखा गया कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अगर आपके भीतर अपनी नियति को बदलने की जिद है, तो कोई भी मृगमरीचिका आपके रास्तों को हमेशा के लिए भटका नहीं सकती। 

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लेखिका : आरती देवी

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