ऐसी किस्मत कहॉ – संजय सिंह

राजीव घर पर अकेला था। रात के तकरीबन 10:00 बज रहे थे। नींद का नामों निशान नहीं था। चारों तरफ सन्नाटा था। कोई भी काम करने का राजीव का मन नहीं हो रहा था। आज वह बहुत ही परेशान था। राजीव का भला पूरा  परिवार था। जिसमें एक बेटा और एक बेटी थी। जिनका पालन पोषण राजीव की पत्नी बहुत ही खूबी के साथ कर रही थी ।

राजीव अपनी पत्नी और अपने बच्चों से नौकरी के कारण काफी दूर था। कुछ समय पहले ही राजीव की माता का देहांत हुआ था ।राजीव बचपन से ही अपनी मां के साथ जुड़ा हुआ था। यूं कह सकते हैं कि वह पूर्ण रूप से अपनी मां का लाडला था। पिता काफी पहले से इस संसार को अलविदा कह कर जा चुके थे।

राजीव का एकमात्र सहारा उसकी मां थी। जिससे वह अपनी पत्नी से भी बढ़कर अपने मन की बात कहता था ।आज राजीव उस दिन को याद करता है। जिस दिन उसकी मां इस संसार को छोड़कर सदा सदा के लिए चली गई थी और बदकिस्मती से आज वह दिन था।

राजीव सुबह से ही आज के दिन का पल-पल याद कर रहा था कि किस प्रकार से वह अपनी मां से बातें कर रहा था परंतु उसे यह ज्ञात नहीं था कि कुछ समय बाद उसकी मां दुनिया से सदा सदा के लिए चली जाएगी ।राजीव जब अपनी मां के विषय में सोचता तो उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं

और वह सिर्फ यही कहता कि मां जहां भी है क्या आप मुझे याद करती होगी ?उसे मेरी याद आती होगी? जिस प्रकार से मैं उससे मिलने के लिए तड़पता हूं। क्या वह भी तड़पती होगी? परंतु इन सवालों का जवाब कोई ना देता ।इसी कशमकश में वह अपनी मां के साथ बिताए हुए उन पुराने सुनहरी पलों को याद करता

और ईश्वर से कामना करता कि काश ऐसा हो सकता कि वह पल फिर से लौट आते।  एक तरफ उसका मन कहता की जो चला गया है ।वह कभी भी वापस नहीं आता। माता-पिता के जाने के बाद राजीव पर धीरे-धीरे सारी जिम्मेवारियां पढ़ने लगी। राजीव अपने आसपास के मित्रों को देखता और सोचता कि वह बहुत ही किस्मत वाले हैं

जो उनके माता-पिता उनके साथ हैं ।मैंने ऐसा कौन सा कर्म किया? जिस कारण आज मुझे अपने माता-पिता से के बिना यह जीवन काटना पड़ रहा है। माता-पिता के बिना यह संसार सुना है ।यह खुशियां बेमानी है। वह नौकरी से जब भी छुट्टी लेकर घर आता।

तो मन में सिर्फ यही होता कि वह घर जाकर क्या करेगा? माता-पिता तो उसे नहीं दिखाई देंगे। सिर्फ उनकी यादें ही उसके साथ होगी ।उसकी मन वहां जाने को नहीं करता परंतु जब वह अपनी  नौकरी में काम कर रहा होता ।तो उसका मन वहां भी नहीं लगता।  उसकी स्थिति उस कीड़े की भांति हो गई थी ।

जो ऐसी लकड़ी के मध्य फंस चुका था। जिसके दोनों सिरों में आग लगी थी और वह जिस तरफ जाता। उसे उस तरफ  दुख ही दुख नजर आते । राजीव जानता था कि उसने अपनी जिंदगी में बहुत ही बहुमूल्य माता-पिता रूपी दौलत को सदा के लिए को दिया है ।वह जो मर्जी कर ले परंतु अब वह उसे बहुमूल्य दौलत को पुनः प्राप्त नहीं कर सकता ।

इस संसार में इंसान सब कुछ प्राप्त कर सकता है परंतु जो माता-पिता  इस संसार को छोड़कर चले जाते हैं। कोई कितना भी प्रयास कर लें।उन्हें पुनः प्राप्त नहीं कर सकता। घर पर जाकर माता-पिता से संबंधित हर वह चीज जो उनके साथ जुड़ी हुई थी ।वह उसे उनकी याद दिलाती और वह फफक -फफक कर रोता। कभी-कभी मन को समझाकर यह सोचता

कि अब उसे जिम्मेवारी निभानी है और सख्त मिजाज बनना है ।कमजोर नहीं बनना है परंतु वह मन को कितना भी समझाएं ।जब माता-पिता का चेहरा उसकी आंखों के सामने आता तो वह बिल्कुल ही कमजोर महसूस करता।

किसी के माता-पिता को देखता तो मन ही मन रोता और बस यही कहता। काश! मेरे माता-पिता कुछ और समय के लिए मेरे साथ जीवन जीते ।फिर मन में आता कि मेरी ऐसी किस्मत कहा ?और उसी पल आंखों से झम- झमाझमॴसू बहने लगते। धन्यवाद। 

लेखक: संजय सिंह

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