क्या एक सास का खोखला अभिमान उसकी अपनी ही बेटी की इज्जत को दांव पर लगा सकता है? और क्या एक बहू, जिसे हमेशा ताने मिले हों, उसी घर की लाज बचाने के लिए अपनी ढाल आगे कर सकती है?
नेहा अपनी सास, सुभद्रा देवी की बातें सुनकर चुप रही। वह जानती थी कि कुछ भी कह ले, माँ जी को अपनी ही बात ऊपर रखने की पुरानी आदत है। चाहे गलती पूरी तरह से उनकी ही क्यों न हो, अपनी गलती मानना उनके स्वभाव में था ही नहीं। सच कहें तो अब नेहा को बुरा भी नहीं लगता था, या शायद उसने यह मान लेना सीख लिया था कि सास की किसी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए, क्योंकि बहस करने से घर की शांति ही भंग होती है। वह चुपचाप कपड़ों की तह लगाती रही।
थोड़ी देर बाद, जब सुभद्रा देवी का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ, तो नेहा ने बहुत ही धीमे और संयत स्वर में पूछा, “माँ जी! आपने ननद जी (मीनल) के भात में जाने के लिए सारी तैयारी कर ली ना? कल सुबह ही हमें निकलना है।”
सुभद्रा देवी ने अपनी चिनकती हुई आवाज़ में जवाब दिया, “मुझे मत सिखाओ कि क्या तैयारी करनी है और क्या नहीं। मैंने अपने बाल धूप में सफेद नहीं किए हैं। मीनल मेरी इकलौती बेटी है, उसके ससुराल वालों के लिए जो भी लिया है, सोच-समझ कर ही लिया है। तुम आजकल की लड़कियों को लगता है कि तुम ही सब जानती हो।”
नेहा ने एक गहरी साँस ली। बात दरअसल मीनल के ससुराल में होने वाले ‘भात’ (मायके वालों की तरफ से दिए जाने वाले शगुन और उपहार) के कार्यक्रम की थी। मीनल की शादी एक बहुत ही रसूखदार और संपन्न परिवार में हुई थी। उसके सास-ससुर शहर के नामी लोग थे और उनके यहाँ हर छोटे-बड़े आयोजन में दिखावा और रुतबा बहुत मायने रखता था। नेहा ने एक दिन पहले देखा था कि सुभद्रा देवी ने शगुन में देने के लिए जो साड़ियाँ और कपड़े खरीदे थे, वे बहुत ही सस्ते और सिंथेटिक थे। उन पर बस चमक-दमक ज्यादा थी। सुभद्रा देवी का तर्क था कि “मीनल के ससुराल वाले सिर्फ चमक देखते हैं, उन्हें क्या पता कपड़ा कितने का है। सेल में सस्ते मिल गए, तो मैंने ले लिए। वैसे भी इतना पैसा लुटाने का क्या फायदा?”
नेहा ने तब भी टोकने की कोशिश की थी कि “माँ जी, दीदी के ससुराल वाले कपड़े की परख रखते हैं। अगर उन्हें ये सस्ते कपड़े दिए गए, तो दीदी को ताने सुनने पड़ेंगे।” लेकिन सुभद्रा देवी ने यह कहकर उसे चुप करा दिया था कि वह उनके पैसों पर हुक्म न चलाए।
अगली सुबह, पूरा परिवार मीनल के ससुराल पहुँच गया। मीनल का घर किसी महल से कम नहीं था। भात के आयोजन के लिए एक बड़ा सा हॉल सजाया गया था, जिसमें मीनल के ससुराल पक्ष के तमाम रसूखदार रिश्तेदार मौजूद थे। मीनल अपनी माँ और भाभी को देखकर बहुत खुश हुई, लेकिन उसकी आँखों में एक अनजाना सा डर भी था। वह जानती थी कि उसकी सास बहुत ही सख्त मिजाज और हैसियत को तौलने वाली महिला हैं।
आयोजन शुरू हुआ। परंपरा के अनुसार, हॉल के बीचों-बीच एक बड़ा सा मखमली कालीन बिछाया गया, जहाँ मायके से लाए गए उपहारों को सबके सामने खोलकर दिखाया जाना था। यह एक ऐसी रस्म थी जहाँ मायके वालों की इज्जत का सरेआम मुआयना होता था। सुभद्रा देवी बड़े ही गर्व से सीना ताने आगे बढ़ीं और उन्होंने अपने साथ लाए हुए बड़े-बड़े बैग खोलने शुरू किए।
जैसे ही पहली साड़ी बाहर निकली, हॉल में मौजूद कुछ महिलाओं की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई, पर वो चमक खुशी की नहीं, बल्कि व्यंग्य की थी। मीनल की सास, राजेश्वरी देवी ने आगे बढ़कर उस साड़ी के कपड़े को अपनी उँगलियों से छुआ। साड़ी लाल रंग की थी, जिस पर बहुत सारा चमकीला गोटा-पट्टी का काम था, लेकिन उसका कपड़ा इतना खुरदुरा और हल्का था कि कोई भी पारखी एक नजर में उसकी असलियत बता सकता था।
राजेश्वरी देवी के चेहरे पर एक तिरस्कार भरी मुस्कान आ गई। उन्होंने साड़ी को वापस कालीन पर ऐसे फेंका जैसे कोई कचरा हो। पूरा हॉल शांत हो गया।
“समधिन जी,” राजेश्वरी देवी की आवाज़ में एक ठंडी चुभन थी, “मैंने सुना था कि आप लोग अपनी बेटी से बहुत प्यार करते हैं। लेकिन यह क्या? हमारे यहाँ तो घर में काम करने वाली बाइयाँ भी ऐसे सिंथेटिक और सस्ते कपड़े नहीं पहनतीं। क्या हमारी मीनल का मोल आपके लिए बस इन्हीं चंद रुपयों का रह गया है? या आप हमारे परिवार की हैसियत का सरेआम मजाक उड़ाने आई हैं?”
ये शब्द किसी तेज़ाब की तरह सुभद्रा देवी के कानों में पड़े। उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उन्होंने चारों तरफ देखा। हॉल में मौजूद हर रिश्तेदार आपस में कानाफूसी कर रहा था। मीनल का चेहरा शर्म से पीला पड़ गया था और उसकी आँखों में आँसू छलकने को बेताब थे। सुभद्रा देवी के होंठ काँपने लगे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या जवाब दें। उनका वो सारा अहंकार, जो घर की चारदीवारी में नेहा पर बरसता था, आज इस भरी महफ़िल में चकनाचूर हो गया था। उन्हें एहसास हुआ कि चंद रुपये बचाने के चक्कर में उन्होंने अपनी ही बेटी की इज्जत दांव पर लगा दी है।
उस खौफनाक सन्नाटे में, जहाँ सुभद्रा देवी को लग रहा था कि अब जमीन फटे और वो उसमें समा जाएं, अचानक पीछे से एक बहुत ही मधुर और सधी हुई आवाज़ आई।
“माफ़ कीजिएगा मौसी जी…”
यह नेहा थी। वह मुस्कुराते हुए आगे आई। उसके हाथों में दो बहुत ही सुंदर, पारदर्शी और शाही पैकिंग वाले बैग थे। उसने बड़े ही आराम से उन बैग्स को राजेश्वरी देवी के सामने रखा।
“मौसी जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। दरअसल, वो बैग जो माँ जी ने अभी खोले हैं, वो तो हमने रास्ते में पड़ने वाले एक अनाथालय की महिलाओं को दान देने के लिए रखे थे। वो बैग गलती से शगुन वाले सामान के साथ इधर आ गए।” नेहा ने बिना पलक झपकाए एक ऐसा झूठ बोला जिसने पूरे माहौल का रुख ही पलट दिया।
सुभद्रा देवी और मीनल दोनों हैरानी से नेहा को देख रही थीं।
नेहा ने अपने हाथों से वो नए बैग खोले। अंदर से शुद्ध बनारसी सिल्क की बेहद कीमती और खूबसूरत साड़ियाँ निकलीं। उनकी चमक और कढ़ाई चीख-चीख कर उनकी गुणवत्ता और कीमत बयां कर रही थी। इसके साथ ही, पुरुषों के लिए शुद्ध खादी सिल्क के कुर्ते भी थे।
“माँ जी ने दीदी और आप सभी के लिए ये खास साड़ियाँ बनारस के पुराने कारीगरों से ऑर्डर देकर मंगवाई हैं,” नेहा ने एक साड़ी राजेश्वरी देवी के हाथों में थमाते हुए कहा। “माँ जी कल रात से ही कह रही थीं कि मेरी मीनल के ससुराल वालों के लिए कोई साधारण चीज़ नहीं चलेगी। आप खुद ही देखिए, क्या माँ जी की पसंद में कोई कमी है?”
राजेश्वरी देवी ने जब उस शुद्ध रेशम को छुआ, तो उनके चेहरे का तिरस्कार तुरंत एक संतुष्ट मुस्कान में बदल गया। वह साड़ियाँ सचमुच बहुत कीमती और शानदार थीं। हॉल में कानाफूसी कर रहे रिश्तेदारों के चेहरे भी बदल गए।
“अरे वाह! यह तो बहुत ही बेहतरीन कपड़ा है। समधिन जी, आप तो सच में बहुत अच्छी पारखी हैं। मुझे लगा कि शायद आपने हमारे लिए वही सस्ते कपड़े लाए हैं। मुझे गलत समझने के लिए माफ़ कीजिएगा,” राजेश्वरी देवी ने सुभद्रा देवी से कहा।
सुभद्रा देवी ने हकलाते हुए बस इतना कहा, “हूँ… हाँ… वो… वो तो दान के लिए थे।”
मीनल ने राहत की एक बहुत बड़ी साँस ली और उसकी आँखों से कृतज्ञता के आँसू बह निकले। उसने अपनी भाभी नेहा को ऐसे देखा जैसे कोई डूबता हुआ इंसान अपने भगवान को देखता है। भात का कार्यक्रम बहुत ही शान और सम्मान के साथ संपन्न हुआ। नेहा ने अपनी सूझबूझ और हाजिरजवाबी से सिर्फ अपनी सास को ही नहीं, बल्कि उस पूरे परिवार की लाज बचा ली थी।
रात को जब वे सब वापस अपने घर लौटे, तो घर में एक अजीब सी शांति थी। सुभद्रा देवी अपने कमरे में चुपचाप बैठी थीं। उनकी वो हमेशा ऊँची रहने वाली आवाज़ आज कहीं खो गई थी। नेहा उनके लिए रात का दूध लेकर कमरे में गई। उसने दूध का गिलास टेबल पर रखा और मुड़कर जाने लगी।
“नेहा…” सुभद्रा देवी की आवाज़ में एक ऐसा कंपन था जो नेहा ने पहले कभी नहीं सुना था।
नेहा रुकी और पलटी। “जी माँ जी?”
सुभद्रा देवी अपनी जगह से उठीं और नेहा के पास आकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखों में आँसू थे। उन्होंने नेहा के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
“वो रेशमी साड़ियाँ… जो तूने वहाँ निकालीं… वो कहाँ से आईं?” सुभद्रा देवी ने रुंधे हुए गले से पूछा।
नेहा ने नजरें झुका कर कहा, “माँ जी, वो साड़ियाँ मैंने पिछले छह महीनों से अपनी सैलरी से पैसे बचाकर अपनी शादी की सालगिरह के लिए खरीदी थीं। लेकिन जब मैंने कल देखा कि आप दीदी के लिए क्या ले जा रही हैं, तो मुझे डर था कि कहीं दीदी को ताने न सुनने पड़ें। इसलिए मैं चुपचाप वो साड़ियाँ भी अपने साथ बैग में रख लाई थी।”
यह सुनते ही सुभद्रा देवी फूट-फूट कर रोने लगीं। जो औरत आज तक किसी के सामने नहीं झुकी थी, वह आज अपनी बहू के सामने अपने घुटनों पर बैठ जाना चाहती थी।
“मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची,” सुभद्रा देवी ने नेहा को कसकर गले लगा लिया। “मैं हमेशा अपने अहंकार में अंधी रही। मैंने तुझे हमेशा बेगानी समझा, हर बात पर ताने मारे, और अपने झूठे गुरूर को ही सब कुछ मानती रही। आज मैंने अपनी ही बेटी की इज्जत को मिट्टी में मिला दिया था। अगर आज तूने अपनी कीमती साड़ियाँ और अपनी समझदारी आगे न की होती, तो मैं जीते जी किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं बचती। तूने मुझे मेरी उस बेइज्जती से बचा लिया, जिसकी मैं असल में हकदार थी। तू मेरी बहू नहीं, तू तो इस घर की असली रक्षक है।”
नेहा ने अपनी सास को संभाला और उनके आँसू पोंछे। “माँ जी, आप मेरी भी तो माँ हैं। और दीदी मेरी बहन जैसी हैं। अगर परिवार पर कोई बात आए, तो क्या मैं चुप खड़ी तमाशा देखती? परिवार तो एक-दूसरे की कमियों को ढकने का ही नाम है ना।”
उस रात सुभद्रा देवी को यह समझ आ गया था कि रिश्ते हुक्म चलाने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे का सम्मान करने और मुश्किल वक्त में ढाल बनने से चलते हैं। जो बहू उनके तानों को चुपचाप पी जाती थी, असल में उसकी उस चुप्पी में कोई कमजोरी नहीं, बल्कि इस घर को जोड़े रखने की एक बहुत बड़ी ताकत छिपी थी। उस दिन के बाद से, सुभद्रा देवी का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। उनके अहंकार की वो सारी सिलवटें नेहा के निस्वार्थ प्रेम और मर्यादा के रेशमी धागों ने हमेशा के लिए मिटा दी थीं।
एक छोटा सा सवाल आप सभी से: क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में कई बार चुप रहकर किसी की गलती को ढक लेना, बहस करके उसे हराने से ज्यादा बड़ी जीत होती है? क्या आपने भी कभी अपने परिवार की लाज बचाने के लिए कोई ऐसा खामोश त्याग किया है?
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