सुमित्रा जी ने एक निवाला खाया और प्लेट सरका दी। “ये क्या बनाया है? इसमें न घी है न मेवा। हमारे यहाँ खाना शाही होता है। तुम्हें तो बस दाल-रोटी ही बनानी आती होगी। तुम्हारे बाप ने सिखाया ही क्या है?”
शहर के पॉश इलाके में बने ‘विला नंबर 40’ के बाहर आज अलग ही रौनक थी। गेंदे और गुलाब के फूलों से सजा मुख्य द्वार, शहनाई की गूंज और मेहमानों की कतार। आर्यन अपनी दुल्हन निधि को लेकर गृह-प्रवेश कर रहा था। निधि, जो एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार से थी, इस चकाचौंध को देखकर थोड़ी सहमी हुई थी, पर आर्यन का मज़बूत हाथ थामे उसे एक सुकून का अहसास हो रहा था।
दरवाजे पर सुमित्रा देवी खड़ी थीं। बनारसी साड़ी, गले में हीरो का हार और चेहरे पर एक ऐसा रूतबा जो किसी महारानी से कम न था। सुमित्रा देवी, आर्यन की माँ। उनके भाई शहर के नामी बिल्डर थे और सुमित्रा जी का पूरा जीवन उन्हीं के पैसों और रूतबे की छाँव में बीता था।
“आरती की थाली लाओ,” सुमित्रा जी ने कड़क आवाज़ में कहा। उनकी आवाज़ में खुशी से ज्यादा एक आदेश था।
निधि ने झुककर पैर छुए। सुमित्रा जी ने सिर पर हाथ तो रखा, लेकिन उनकी नज़रें निधि की सादगी और उसके परिवार द्वारा दिए गए शगुन के लिफाफे पर टिकी थीं, जो उनकी हैसियत के हिसाब से बहुत मामूली था।
“खैर, आ जाओ अंदर,” सुमित्रा जी ने बुदबुदाते हुए कहा, “वैसे उम्मीद तो नहीं थी कि आर्यन तुम्हारी पसंद पर मुहर लगाएगा, पर अब क्या कर सकते हैं।”
निधि का दिल बैठ गया, पर उसने आर्यन की तरफ देखा जिसने आँखों ही आँखों में उसे ढांढस बंधाया।
ये कहानी आज की नहीं थी। इस घर की नींव में एक बहुत पुराना दर्द दफन था, जिसे आर्यन कभी नहीं भूला था।
बीस साल पहले, इसी घर में आर्यन के पिता, विवेक, जिन्दा थे। विवेक एक साधारण सरकारी नौकरी करते थे। बेहद शांत, सुलझे हुए और स्वाभिमानी इंसान। लेकिन उनकी शादी सुमित्रा से हुई, जो रईस खानदान की बेटी थीं। शादी के पहले दिन से ही सुमित्रा ने विवेक को यह एहसास कराना शुरू कर दिया था कि वो और उनका परिवार सुमित्रा के स्तर का नहीं है।
आर्यन को वो दिन याद था। वो तब दस साल का था। विवेक ऑफिस से थके-हारे आए थे।
“सुमित्रा, एक कप चाय मिलेगी?” विवेक ने पूछा था।
“नौकरानी नहीं हूँ मैं,” सुमित्रा ने अपने भाई से फोन पर बात करते हुए जवाब दिया था, “तुम्हारे घर में एसी तक नहीं था, मेरे भाई ने लगवाया है। और तुम मुझसे चाय मांग रहे हो? खुद बना लो।”
विवेक चुपचाप रसोई में चले गए थे। यह रोज की कहानी थी। सुमित्रा बात-बात पर अपना सामान पैक करतीं और अपने भाई को बुला लेतीं।
“भैया, मुझे ले जाओ। इस दो कौड़ी के घर में मेरा दम घुटता है,” वो चिल्लाती थीं।
विवेक गिड़गिड़ाते, “सुमित्रा, मत जाओ। लोग क्या कहेंगे? बच्चे पर क्या असर पड़ेगा?”
विवेक के माता-पिता, यानी आर्यन के दादा-दादी, भी अपने बेटे का अपमान होते देख अंदर ही अंदर घुटते रहते थे। अंततः उन्होंने बेटे के घर आना छोड़ दिया था।
फिर वो काली सुबह आई थी। विवेक को सीने में भारीपन महसूस हुआ। उन्होंने सुमित्रा को आवाज़ दी। सुमित्रा उस वक्त अपनी किसी किटी पार्टी के लिए तैयार हो रही थीं।
“अरे, नाटक मत करो,” सुमित्रा ने पल्लू ठीक करते हुए कहा था, “तुम्हें बस मेरा बाहर जाना पसंद नहीं। मैं जा रही हूँ।”
विवेक सोफे पर गिर पड़े। आर्यन दौड़कर आया, “पापा! पापा!”
जब तक डॉक्टर आए, विवेक जा चुके थे।
विवेक की मौत के बाद, सुमित्रा के भाइयों ने सारा इल्जाम विवेक के परिवार पर मढ़ दिया। सुमित्रा ने भी एक आँसू नहीं बहाया, बल्कि उल्टा विवेक के माता-पिता से कहा, “तुम्हारे बेटे ने मुझे सुख नहीं दिया, टेंशन में गया है।”
दादा-दादी ने आर्यन को आखिरी बार देखा और कहा, “इस औरत ने हमारे बेटे को खा लिया। अब इस पोते में भी हमें उसी का अहंकार दिखता है। हम जा रहे हैं।”
आर्यन अनाथ होकर भी अनाथ नहीं था, और सनाथ होकर भी अकेला था। उसने अपनी माँ को देखा, जिसे पति की मौत का गम नहीं, बल्कि इस बात की चिंता थी कि अब प्रॉपर्टी किसके नाम होगी।
वक्त का पहिया घूमा। आर्यन बड़ा हुआ। उसने अपनी माँ के भाइयों के टुकड़ों पर पलने की बजाय अपनी मेहनत से स्कॉलरशिप ली, पढ़ाई की और एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट बना। उसने यह घर अपनी कमाई से खरीदा था, ताकि वो अपनी माँ को यह दिखा सके कि बिना किसी के अहसान के भी जिया जा सकता है।
और आज, निधि उस घर की बहू बनकर आई थी।
शादी के एक हफ्ते बाद ही घर का माहौल बदलने लगा।
निधि रसोई में खाना बना रही थी। सुमित्रा जी डाइनिंग टेबल पर बैठीं अपने भाई से फोन पर बात कर रही थीं।
“हाँ भैया, क्या बताऊँ। आर्यन की पसंद है। न रंग ढंग, न तौर-तरीके। मेरे मायके में तो नौकर भी इससे अच्छे कपड़े पहनते हैं।”
निधि ने सब सुन लिया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने खाना परोसा।
सुमित्रा जी ने एक निवाला खाया और प्लेट सरका दी। “ये क्या बनाया है? इसमें न घी है न मेवा। हमारे यहाँ खाना शाही होता है। तुम्हें तो बस दाल-रोटी ही बनानी आती होगी। तुम्हारे बाप ने सिखाया ही क्या है?”
निधि रोते हुए कमरे में भागी। आर्यन ऑफिस से लौटा तो उसने निधि को सिसकते हुए पाया।
“क्या हुआ निधि?”
“कुछ नहीं आर्यन,” निधि ने बात छिपाने की कोशिश की, “बस घर की याद आ रही है।”
आर्यन समझ गया। यह वही सिसकियाँ थीं जो उसने बचपन में अपने पिता के कमरे से सुनी थीं।
अगले दिन रविवार था। नाश्ते की मेज पर तनाव साफ़ था।
“निधि,” सुमित्रा जी ने कड़क कर कहा, “कल मेरे भाई की एनिवर्सरी पार्टी है। वो वाली साड़ी मत पहनना जो तुम्हारी माँ ने दी है। मेरी दी हुई कांजीवरम पहनना। मैं नहीं चाहती कि मेरी नाक कटे।”
“माँ जी,” निधि ने हिम्मत जुटाई, “वो साड़ी मेरी माँ ने बड़े प्यार से दी है, मैं वही पहनूँगी।”
सुमित्रा जी का पारा चढ़ गया। “ज़बान लड़ाती है? इस घर में रहना है तो मेरे हिसाब से चलना होगा। वरना…”
“वरना क्या माँ?” आर्यन ने अखबार नीचे रखते हुए पूछा। उसकी आवाज़ बेहद शांत थी, तूफान से पहले वाली शांति।
“वरना मैं अभी अपने भैया को बुलाऊँगी और यह घर छोड़कर चली जाऊँगी!” सुमित्रा जी ने अपना पुराना, आजमाया हुआ ब्रह्मास्त्र चलाया। “देखती हूँ मेरे बिना तुम दोनों कैसे रहते हो। सारी अक्ल ठिकाने आ जाएगी।”
सुमित्रा जी उठीं और अपने कमरे की तरफ बढ़ीं सूटकेस निकालने के लिए। उन्हें पूरा यकीन था कि अभी आर्यन दौड़कर आएगा, उनके पैरों में गिरेगा और कहेगा—’माँ मत जाओ, निधि को जो करना है करे, आप मत जाओ।’ ठीक वैसे ही, जैसे विवेक किया करते थे।
पाँच मिनट बीते। दस मिनट बीते। कोई नहीं आया।
सुमित्रा जी ने जानबूझकर ज़ोर-ज़ोर से अलमारी खोली, कपड़े पटके। फिर भी कोई नहीं आया।
हैरान होकर वो अपना बैग लेकर ड्राइंग रूम में आईं।
आर्यन सोफे पर बैठा था और निधि के हाथ में पानी का गिलास था।
“मैं जा रही हूँ!” सुमित्रा जी ने ऊँची आवाज़ में घोषणा की। “मेरे भाई की गाड़ी आ रही है।”
आर्यन अपनी जगह से उठा। वो धीरे-धीरे अपनी माँ के पास गया।
“ठीक है माँ,” आर्यन ने कहा।
सुमित्रा जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “क्या?”
“मैंने कहा, ठीक है माँ। मामा जी की गाड़ी बाहर आ गई है, मैं सामान रखवा देता हूँ।”
सुमित्रा जी की आँखों में अविश्वास था। “तू… तू मुझे जाने के लिए कह रहा है? अपनी माँ को? इस दो दिन की लड़की के लिए?”
आर्यन हँसा। एक बहुत ही दर्दनाक हँसी।
“नहीं माँ। मैं तुम्हें इस लड़की के लिए नहीं, बल्कि अपने पिता के लिए जाने को कह रहा हूँ।”
सुमित्रा सन्न रह गईं। “पिता?”
“हाँ, पापा,” आर्यन की आँखों से अंगारे बरसने लगे, “आपको याद है वो दिन? पापा के सीने में दर्द हो रहा था, और आप आईने के सामने खड़ी होकर लिपस्टिक लगा रही थीं। पापा गिड़गिड़ा रहे थे कि मत जाओ, पर आपको अपनी किटी पार्टी और अपने भाई का घर ज्यादा प्यारा था। पापा ने उस दिन दम तोड़ दिया, माँ। वो हार्ट अटैक से नहीं मरे थे, वो आपकी बेरुखी और रोज-रोज की धमकियों से मरे थे। उन्होंने घुट-घुट कर जान दी क्योंकि वो आपसे प्यार करते थे और आप उनके प्यार को उनकी कमजोरी समझ बैठी थीं।”
पूरा कमरा आर्यन की आवाज़ से गूंज रहा था। निधि सहम कर एक कोने में खड़ी थी।
“मैं बचपन से देखता आया हूँ, माँ। कैसे आप नानाजी के पैसों का रौब पापा पर झाड़ती थीं। कैसे आप उनकी मर्दानगी, उनके आत्मसम्मान को रोज अपने सैंडल के नीचे कुचलती थीं। और नतीजा क्या हुआ? मैं अनाथ हो गया। दादा-दादी ने मुझसे मुँह मोड़ लिया क्योंकि मैं आपका बेटा था। मैं पूरी जिंदगी एक ऐसे बोझ के नीचे दबा रहा जो मेरा था ही नहीं।”
आर्यन ने एक कदम और आगे बढ़ाया।
“मैं विवेक नहीं हूँ, माँ। मैं आर्यन हूँ। मैंने पापा की लाचारी देखी है, और उसी दिन कसम खाई थी कि मैं अपनी पत्नी के साथ वो नहीं होने दूँगा जो पापा के साथ हुआ। निधि मेरी पत्नी है, कोई गुलाम नहीं। उसका परिवार गरीब हो सकता है, लेकिन उनका दिल आपके ‘शाही खानदान’ से बहुत बड़ा है। अगर आपको यहाँ रहना है, तो एक माँ बनकर रहना होगा, मालकिन बनकर नहीं। और अगर आपको लगता है कि मामा जी का घर ही आपका असली घर है… तो दरवाज़ा खुला है।”
सुमित्रा जी पत्थर की मूरत बनी खड़ी थीं। जिस बेटे को उन्होंने अपनी उंगलियों पर नचाने का सपना देखा था, वो आज उनके सामने एक पहाड़ बनकर खड़ा था। उन्हें अचानक विवेक का चेहरा याद आया—उसकी भीगी हुई आँखें, उसका जुड़ा हुआ हाथ। आज वही आँखें आर्यन के चेहरे पर थीं, बस उनमें लाचारी की जगह आग थी।
बाहर गाड़ी का हॉर्न बजा।
“जाइये माँ,” आर्यन ने कहा, “मामा जी इंतज़ार कर रहे हैं।”
सुमित्रा जी ने एक बार अपने बेटे को देखा, फिर बहू को। उन्हें पहली बार अपने आलीशान वजूद में एक गहरी दरार दिखाई दी। उन्हें समझ आ गया कि अगर वो आज इस चौखट से बाहर गईं, तो फिर कभी वापस नहीं आ पाएंगी। वो भाइयों के घर रानी बनकर तो रह सकती थीं, लेकिन एक माँ का सम्मान और बुढ़ापे का सहारा हमेशा के लिए खो देंगी।
उनका अहंकार, जो दशकों से उनका कवच था, आज चकनाचूर हो गया था। सुमित्रा जी के हाथ से बैग छूट गया। वो वहीं फर्श पर बैठ गईं और फूट-फूट कर रोने लगीं।
“मुझे माफ़ कर दे बेटा… मुझे माफ़ कर दे विवेक…” उनके मुँह से पहली बार अपने पति का नाम सम्मान और पछतावे के साथ निकला।
निधि, जो अब तक चुप थी, दौड़कर आई और सुमित्रा जी के पास बैठ गई। उसने अपने पल्लू से उनके आँसू पोंछे।
“उठिए माँ जी,” निधि ने मृदु स्वर में कहा, “पानी पीजिये।”
आर्यन ने मुँह फेर लिया, उसकी आँखों में भी नमी थी। उसने अपनी माँ को बेघर करने के लिए यह सब नहीं कहा था, बल्कि उस घर को बचाने के लिए कहा था जो नफरत की आग में जलने वाला था।
उस दिन सुमित्रा जी मायके नहीं गईं। उन्होंने अपनी कांजीवरम साड़ी अलमारी में रख दी और शाम को निधि द्वारा दी गई सूती साड़ी पहनी। जब वो बाहर आईं, तो आर्यन ने देखा—उसमें उसे अपनी ‘अहंकारी माँ’ नहीं, बल्कि एक ‘सुधरी हुई माँ’ दिखाई दी।
रात को खाने की मेज पर सुमित्रा जी ने निधि के हाथ की बनी दाल खाई।
“नमक थोड़ा कम है,” सुमित्रा जी ने कहा, और फिर मुस्कुराते हुए जोड़ा, “पर स्वाद बिल्कुल वैसा है जैसा विवेक को पसंद था।”
आर्यन ने चौंक कर माँ को देखा। बीस साल बाद, इस घर की दीवारों ने राहत की सांस ली थी। विवेक की तस्वीर पर चढ़ा हार शायद थोड़ा हिल गया था, मानो हवा के झोंके ने नहीं, बल्कि एक आत्मा की तृप्ति ने उसे स्पर्श किया हो।
दोस्तों, रिश्तों में पैसा, रुतबा और अहंकार ज़हर का काम करते हैं। अक्सर हम अपने मायके या दौलत के नशे में अपने जीवनसाथी की भावनाओं को कुचल देते हैं, यह भूलकर कि जिस दिन सब्र का बांध टूटता है, उस दिन माफ़ी की गुंजाइश भी नहीं बचती। घर ईंटों से नहीं, एक-दूसरे के सम्मान से टिकते हैं। बच्चों के सामने आप जैसा व्यवहार करेंगे, कल वही व्यवहार आपके सामने लौटकर आएगा।
क्या आर्यन ने अपनी माँ को आईना दिखाकर सही किया? अपनी राय कमेंट में ज़रूर लिखें।
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