अहंकार एक पति का – डॉ पारुल अग्रवाल

कमरे के भीतर से कांच के टूटने की एक तेज और कर्कश आवाज़ आई, जिसके बाद सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा जो शोर से भी ज्यादा डरावना होता है। बाहर बरामदे में बैठे रिटायर्ड प्रोफेसर दीनानाथ जी के हाथ से अखबार गिर गया। उनकी पत्नी, सुमति देवी, जो तुलसी में जल चढ़ा रही थीं, उनका कलश हाथ से छटक गया।

दोनों एक-दूसरे को देखे बिना ही समझ गए कि अंदर क्या हो रहा है। यह पिछले छह महीनों की कहानी थी, लेकिन आज हवा में कुछ अलग ही तनाव था।

अंदर, कमरे के बीचों-बीच फर्श पर लैपटॉप के टुकड़े बिखरे पड़े थे। स्क्रीन बुरी तरह चटक चुकी थी, जैसे किसी ने उसे पूरी ताकत से दीवार पर दे मारा हो। कोने में खड़ी वंदना सिसक नहीं रही थी, बल्कि पत्थर हो चुकी थी। उसकी आँखों में आंसू नहीं, एक गहरा शून्य था। उसके सामने उसका पति, विकास, हाफ रहा था। उसका चेहरा गुस्से और ईर्ष्या से तमतमाया हुआ था।

“मैने कहा न, तुम उस प्रमोशन को स्वीकार नहीं करोगी!” विकास चिल्लाया, उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी कंपन थी—वह कंपन जो एक पुरुष के अहंकार के टूटने पर पैदा होती है। “तुम मुझसे ज्यादा कमाओगी? मेरी टीम को लीड करोगी? समाज में मेरी क्या इज्जत रह जाएगी? लोग कहेंगे कि विकास अपनी बीवी की कमाई पर पलता है?”

वंदना ने टूटे हुए लैपटॉप की ओर देखा। उसमें उसकी सालों की मेहनत, प्रोजेक्ट्स और वह प्रेजेंटेशन थी जो उसे कल बोर्ड मीटिंग में देनी थी।

“विकास,” वंदना की आवाज़ बहुत धीमी थी, पर उसमें कांच जैसी धार थी। “यह सिर्फ प्रमोशन नहीं है, यह मेरी पहचान है। और रही बात इज्जत की, तो इज्जत काबिलियत से मिलती है, पद से नहीं। मैंने तुमसे कभी मुकाबला नहीं किया।”

“जुबान लड़ाती है?” विकास ने आगे बढ़कर वंदना के कंधे को जोर से झकझोरा। “मैंने तुम्हें काम करने की इजाजत दी, यही मेरी गलती थी। माँ सही कहती थीं, औरतों को ज्यादा पंख नहीं देने चाहिए। आज ही अपना रेजीग्नेशन (इस्तीफा) टाइप करो, वरना इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है।”

वंदना लड़खड़ा गई। उसने दीवार का सहारा लिया।

तभी दरवाजे पर एक परछाई उभरी। सुमति देवी खड़ी थीं। उनकी आँखों में हमेशा रहने वाला डर आज गायब था। उनके पीछे दीनानाथ जी खड़े थे, उनकी लाठी जमीन पर टिक-टिक करती हुई आगे बढ़ी।

“विकास!” दीनानाथ जी की आवाज़ कड़कड़ायी। यह वो आवाज़ नहीं थी जो अक्सर खांसी के बीच दबी रहती थी। यह उस पिता की आवाज़ थी जिसने कभी अपने बेटे को संस्कार दिए थे।

विकास मुड़ा, “पापा, आप बीच में मत आइये। यह पति-पत्नी का मामला है। यह औरत मेरे सिर पर चढ़ रही है। इसे अपनी हद में रहना सीखना होगा।”

सुमति देवी धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उन्होंने वंदना के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा। वंदना, जो अब तक पत्थर थी, सास का स्पर्श पाते ही पिघल गई और उनके गले लगकर रो पड़ी।

“हद?” सुमति देवी ने बेटे की आँखों में सीधे देखते हुए पूछा। “हद तो तुमने आज पार कर दी बेटा। यह लैपटॉप नहीं तोड़ा तुमने, तुमने अपनी पत्नी का विश्वास तोड़ा है। और किस बात का गुरूर है तुम्हें? कि तुम मर्द हो? मर्द वो नहीं होता जो औरत की तरक्की से डरे, मर्द वो होता है जो उसकी उड़ान में हवा बने।”

विकास हक्का-बक्का रह गया। उसकी माँ, जो हमेशा ‘बेटा-बेटा’ करती नहीं थकती थीं, आज उसके खिलाफ खड़ी थीं?

“माँ, आप नहीं समझतीं,” विकास ने झुंझलाते हुए कहा। “ऑफिस में सब मेरा मज़ाक उड़ाएंगे। यह मेरी जूनियर थी, अब मेरी बॉस बनेगी। मैं यह अपमान नहीं सह सकता।”

दीनानाथ जी ने अपनी लाठी से टूटे हुए लैपटॉप के टुकड़ों को एक तरफ किया और वंदना के सामने खड़े हो गए, जैसे कोई ढाल हो।

“अपमान?” दीनानाथ जी हंसे, एक सूखी और व्यंग्यात्मक हंसी। “अपमान यह नहीं है कि तुम्हारी पत्नी तुमसे आगे निकल गई। अपमान यह है कि तुमने अपनी नाकामी का बदला उसकी मेहनत से लिया। तुमने जिस शिक्षा और संस्कारों का आज प्रदर्शन किया है, उससे मेरा सिर शर्म से झुक गया है।”

विकास गुस्से में पैर पटकने लगा। “तो आप क्या चाहते हैं? मैं इसकी गुलामी करूँ? अगर यह इस घर में रहेगी, तो मेरी शर्तों पर रहेगी। इसे नौकरी छोड़नी होगी। नहीं तो…”

“नहीं तो क्या?” वंदना ने पहली बार सिर उठाया। “नहीं तो तुम मुझे मारोगे? घर से निकाल दोगे?”

विकास ने हाथ उठाया ही था कि दीनानाथ जी ने उसका हाथ हवा में ही थाम लिया। 70 साल के बूढ़े हाथों में आज गजब की ताकत थी। उन्होंने विकास का हाथ झटक दिया।

“खबरदार जो उस पर हाथ उठाया,” दीनानाथ जी दहाड़े। “यह घर मेरा है विकास। ईंट-पत्थर मैंने जोड़े हैं। और इस घर का नियम है—यहाँ प्रतिभा का सम्मान होता है, अहंकार का नहीं। वंदना कहीं नहीं जाएगी। अगर किसी को इस घर की तरक्की और खुशहाली से दिक्कत है, तो वो यह घर छोड़ सकता है।”

पूरा कमरा सन्न रह गया। विकास को विश्वास नहीं हो रहा था कि उसके पिता उसे घर से जाने के लिए कह रहे हैं, वो भी बहू के लिए।

“पापा? आप अपने सगे बेटे को निकाल रहे हैं?” विकास की आवाज़ में अविश्वास था।

“सगा वो होता है विकास, जो मन से जुड़ा हो,” सुमति देवी ने कहा। “पिछले पाँच सालों में वंदना ने इस घर को, हम बूढ़े मां-बाप को और तुम्हारी हर छोटी-बड़ी जरूरत को अपना समझा। जब तुम्हें टाइफाइड हुआ था, तो यह ऑफिस से आकर रात भर तुम्हारे सिरहाने बैठती थी। तब तुम्हें इसका बड़ा पद याद नहीं आया? तब तुम्हें इसकी कमाई से आई दवाइयां बुरी नहीं लगीं? आज जब इसे चमकने का मौका मिला है, तो तुम काली परछाई बनकर खड़े हो गए?”

वंदना अभी भी रो रही थी, लेकिन अब उसे अकेलापन महसूस नहीं हो रहा था।

दीनानाथ जी अपनी अलमारी की तरफ गए और एक फाइल निकालकर लाए। उन्होंने उसे मेज पर रखा।

“सुनो विकास,” उन्होंने शांत स्वर में कहा। “मैंने वसीयत नहीं लिखी थी क्योंकि मुझे लगता था कि मेरा बेटा मेरा वारिस है। लेकिन वारिस संपत्ति का नहीं, संस्कारों का होना चाहिए। आज मैं वंदना को अपनी बेटी घोषित करता हूँ। अगर तुम इसके साथ इज्जत से रह सकते हो, अपनी ईर्ष्या को दरवाजे के बाहर छोड़कर इसके पति बन सकते हो, तो ठीक है। वरना, वो सामने दरवाजा है।”

विकास का अहंकार उसे झुकने नहीं दे रहा था, लेकिन पिता की सख्ती ने उसे डरा दिया था। वह जानता था कि दीनानाथ जी जो कहते हैं, वो करते हैं। वह पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर निकल गया और अपनी कार लेकर चला गया।

कमरे में अब शांति थी, लेकिन यह शांति तूफ़ान के बाद वाली शांति नहीं थी, बल्कि एक नई शुरुआत की शांति थी।

वंदना ने झुककर दीनानाथ जी के पैर छुए। “पापाजी, आपने मेरे लिए अपने बेटे को…”

दीनानाथ जी ने उसे उठाया और गले लगा लिया। “पगली, मैंने बेटे को नहीं खोया, मैंने आज एक बेटी को पाया है। और रही बात उस नालायक की, तो उसे सुधरने के लिए थोड़ा वक्त और थोड़ा एकांत चाहिए। जब उसे अपनी गलती का एहसास होगा, वो लौट आएगा। लेकिन तब तक, हम तुम्हारी उड़ान नहीं रोकेंगे।”

सुमति देवी ने अपनी अलमारी से एक नया लैपटॉप बैग निकाला। “यह लो। यह विकास के लिए लिया था मैंने उसके जन्मदिन पर, सरप्राइज देने के लिए। पर आज इसकी असली हकदार तुम हो। इसमें वो सब नहीं होगा जो तुमने खोया है, पर इसमें वो भविष्य लिखा जा सकता है जो तुम चाहती हो।”

वंदना ने उस बैग को सीने से लगा लिया। उसे लगा कि उसने अपना डेटा खो दिया, पर उसने अपना परिवार पा लिया।

रात के खाने पर विकास की कुर्सी खाली थी। वंदना उदास थी।

“खाना खाओ बेटा,” सुमति देवी ने वंदना की थाली में रोटी रखते हुए कहा।

“माँजी, विकास ने कुछ नहीं खाया होगा,” वंदना ने धीरे से कहा।

दीनानाथ जी मुस्कुराए। “देखो सुमति, यही फर्क है। वो बाहर जाकर दोस्तों के साथ शराब पीकर अपनी कुंठा निकाल रहा होगा, और यह यहाँ बैठकर उसकी चिंता कर रही है। जिस दिन विकास यह समझ जाएगा कि उसे ‘बॉस’ से नहीं, एक ‘साथी’ से मुकाबला करना छोड़ना है, उस दिन वो जीत जाएगा।”

अगली सुबह, वंदना तैयार होकर नीचे आई। उसकी आँखों में एक नई चमक थी। वह जानती थी कि बाहर की दुनिया से लड़ना आसान है, अगर घर के अंदर फौज आपके साथ खड़ी हो।

दरवाजे पर विकास खड़ा था। रात भर कार में सोने और सोचने के बाद, उसका चेहरा उतर चुका था। उसकी अकड़ ढीली पड़ चुकी थी। उसने देखा कि वंदना के हाथ में नया लैपटॉप बैग है और उसके माता-पिता उसे आशीर्वाद देकर विदा कर रहे हैं।

विकास ने वंदना का रास्ता नहीं रोका। वह बस सिर झुकाकर एक तरफ हट गया।

वंदना रुकी। उसने विकास की ओर देखा। “मीटिंग शाम को खत्म होगी। अगर तुम चाहो, तो हम डिनर पर जा सकते हैं… सेलिब्रेट करने।”

विकास ने चौंककर वंदना को देखा। इतना सब होने के बाद भी उसने हाथ बढ़ाया था? उस पल विकास को अपनी लघुता का एहसास हुआ। उसे समझ आया कि वंदना उससे सिर्फ पद में बड़ी नहीं थी, दिल में भी बहुत बड़ी थी।

दीनानाथ जी ने पीछे से देखा और अपनी पत्नी से कहा, “दरवाजा खुला रहने दो सुमति। मुझे लगता है हमारा बेटा आज वापस आ रहा है।”

वंदना ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और आगे बढ़ गई। पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि वह जानती थी कि उसके पहियों के नीचे की सड़क चाहे कितनी भी उबड़-खाबड़ हो, उसका ‘घर’ अब एक मजबूत किले की तरह उसके पीछे खड़ा है।

  दीनानाथ और सुमति ने साबित कर दिया कि बुजुर्ग होना और आधुनिक होना दो अलग बातें नहीं हैं। सही का साथ देना ही असली आधुनिकता है।

मूल लेखिका : डॉ पारुल अग्रवाल

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