“तुम दोनों की शक्ल देखकर लग रहा है, बात कुछ बिगड़ी है,” आंगन में तुलसी को पानी देते-देते शारदा देवी की आवाज़ आई। उनकी उम्र अस्सी के आसपास थी,
पर आँखों में वही चमक और शब्दों में वही वजन। पास ही बैठी बहू कृति रोटी सेंक रही थी और दामाद-पोती की जोड़ी—नव्या और आर्यन—चुपचाप एक-दूसरे से नजरें चुरा रहे थे। चूल्हे की आँच की तरह घर में भी एक हल्की-सी गर्माहट फैल रही थी, पर वह प्यार वाली नहीं, तकरार वाली।
शारदा देवी ने अपने हाथ पोंछे, चारपाई पर बैठीं और दोनों को इशारे से पास बुला लिया। “देखो, मैं पूछूंगी नहीं कि क्या हुआ। कुछ बातें पति-पत्नी के बीच ही अच्छी लगती हैं। पर बड़े होने के नाते समझाना मेरा धर्म है, तो सुन लो… दो अलग लोग हो, तो सोच भी अलग होगी। यह जरूरी नहीं कि
तुम जो सोचो, वही सामने वाला भी सोचे। छोटी-मोटी तकरार हर रिश्ते में होती है। रूठना-मनाना नहीं होगा तो मिठास कहाँ से आएगी? लेकिन मनमुटाव हद से ज्यादा नहीं होना चाहिए। वरना खटास जम जाती है और फिर रिश्ते में वही स्वाद रह जाता है जो जली हुई रोटी का होता है—दिखती तो रोटी है, पर गले से उतरती नहीं।”
नव्या ने सिर झुका लिया। आर्यन ने भी नजरें नीचे कर लीं। शारदा देवी ने मुस्कुराकर कहा, “और हाँ, अंग्रेज़ी का एक छोटा सा शब्द है—सॉरी। उसके लिए किसी बड़े मंच की जरूरत नहीं। बस दिल बड़ा होना चाहिए। सॉरी बोलो और कमाल देखो।”
कृति ने धीमे से हँस दिया, जैसे उसे याद आ गया हो कि कभी उसने भी यही सलाह सुनकर अपने घर में बहस खत्म की थी। नव्या और आर्यन दोनों के चेहरे पर भी हल्की सी झेंप आई। दोनों मन ही मन सोच रहे थे—‘अरे वाह, दादी ने तो बिगड़ती बात संभाल ली।’ पर सच ये था कि बात सिर्फ “सॉरी” की नहीं थी। भीतर कुछ दबा हुआ था, जो इतने दिनों से धीरे-धीरे उभर रहा था।
नव्या को अपने ससुराल आए अभी डेढ़ साल ही हुआ था। शहर की नौकरी, किराए का छोटा फ्लैट, और वहाँ हर महीने का बजट—सब संभालते हुए वह अपने रिश्तों को भी संभालने की कोशिश करती थी। आर्यन एक प्राइवेट कंपनी में था। वह जिम्मेदार था, पर कभी-कभी उसकी जिम्मेदारी “कृति” के परिवार और “रिश्तेदारों” तक ज्यादा फैल जाती थी। नव्या की परेशानी यह थी कि आर्यन अपने हर फैसले में “सबको खुश” करने की कोशिश करता, पर सबसे आखिर में वह खुद और नव्या रह जाते।
झगड़ा भी उसी बात पर हुआ था। आर्यन ने बिना बताए अपने पिता को पैसे भेज दिए थे—फिर भी नव्या ने शिकायत नहीं की होती, अगर वह उसे पहले बता देता। पर आर्यन ने बस इतना कहा था, “माँ ने कहा था जरूरत है।” और नव्या का दिल वहीं चुभ गया था। उसे लगा जैसे उसकी राय, उसकी मेहनत, उसकी प्राथमिकता—सब दूसरे नंबर पर है।
आज छुट्टी पर वे गांव आए थे। दादी के घर में दीवारें मिट्टी की थीं, पर अपनापन पक्की ईंटों से ज्यादा मजबूत था। शारदा देवी की बातें सुनकर दोनों शांत तो हो गए, पर नव्या की आँखों में अब भी कुछ नमी थी। वह उठकर भीतर चली गई। आर्यन उसके पीछे जाने लगा, पर शारदा देवी ने उसे हाथ से रोक दिया। “अभी नहीं। पहले खुद से पूछ—तू सही है या बस तू ‘पति’ है इसलिए तुझे सही होना चाहिए?”
आर्यन ठिठक गया। दादी ने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया। “मैंने अपने जीवन में बहुत रिश्ते देखे हैं। कुछ पैसे के कारण टूटे, कुछ अहं के कारण, और कुछ… चुप्पी के कारण। बेटा, कई बार आदमी सोचता है कि पैसे भेजकर जिम्मेदारी निभा दी। पर असली जिम्मेदारी होती है अपने घर में भी सम्मान बनाए रखना। पत्नी घर की साझेदार है—उसे ‘बताकर’ करना भी प्यार की जिम्मेदारी है।”
आर्यन की गर्दन झुक गई। “दादी, मैं गलत था,” उसने धीमे से कहा।
शारदा देवी ने एक गहरी सांस ली। “और बेटी भी गलत नहीं होती हर बार, पर कभी-कभी उसका तरीका गलत हो जाता है। तुम दोनों आज ही तय कर लो—किसी के लिए नहीं, अपने लिए रिश्ता निभाना है।”
शाम को गांव की बिजली चली गई। आंगन में दिया जलाया गया। दाल की खुशबू और मिट्टी की सोंधी महक में नव्या चारपाई पर बैठी थी। आर्यन चुपचाप उसके सामने आकर बैठ गया। दोनों के बीच कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर आर्यन ने कहा, “नव्या… सॉरी। मैंने तुम्हें बिना बताए वो पैसे भेज दिए। मुझे लगा, मैं सही कर रहा हूं। पर सच यह है कि मैं तुम्हें साथ लेकर नहीं चला। और तुम्हें ऐसा महसूस कराया जैसे तुम्हारी कोई अहमियत नहीं। मुझे माफ कर दो।”
नव्या की आँखें भर आईं। वह गुस्से में नहीं थी, वह बस आहत थी। उसने भी धीरे से कहा, “मैं भी सॉरी… मैंने बात को ऐसे बढ़ा दिया जैसे तुम्हारी माँ या तुम्हारा परिवार बोझ है। मैं ऐसा नहीं सोचती। मुझे बस… ये डर लगने लगा था कि हम कहीं अपनी जिंदगी में पीछे न रह जाएँ।”
आर्यन ने उसके हाथ पकड़ लिए। “हम एक टीम हैं। और टीम में छुपाकर कोई खेल नहीं होता। आज से जो भी होगा, हम दोनों मिलकर तय करेंगे।”
नव्या ने सिर हिलाया, पर उसके मन में एक सवाल अब भी था। “और अगर तुम्हें कभी फिर लगा कि घर वालों की जरूरत ज्यादा है तो?”
आर्यन ने बिना झिझक कहा, “तो भी मैं तुम्हें बताऊंगा। और अगर तुम कहोगी कि अभी नहीं, तो मैं माँ-पापा को भी प्यार से समझाऊंगा। उन्हें भी तो समझना चाहिए कि हमारा भी घर है।”
उसी वक्त कृति पास आ गई। उसने नव्या के सिर पर हाथ फेरा। “बेटा, मुझे पता है तुमने क्या महसूस किया। मैं भी इस घर में बहू बनकर आई थी। ससुराल में ‘हम’ बनना आसान नहीं होता। पर कोशिश दोनों तरफ से हो तो रिश्ते अपने आप मजबूत हो जाते हैं।”
नव्या ने पहली बार महसूस किया कि उसकी सास सिर्फ नियमों की रखवाली नहीं करती, बल्कि रिश्तों की भी। वह बोली, “मम्मी जी, मुझे डर लगता है कि मैं कहीं गलत न बन जाऊँ।”
कृति हँस दी। “गलत बनना बुरा नहीं, गलत में अड़ जाना बुरा है।”
रात को शारदा देवी ने दोनों को अपने पास बुलाया। उनके सामने एक पुरानी डिब्बी रखी थी। “ये देखो,” उन्होंने ढक्कन खोला। अंदर छोटे-छोटे कागजों में कुछ लिखा था। नव्या ने एक पर्ची निकाली। उस पर लिखा था—“सुनना सीखो, बोलना अपने आप सुधर जाएगा।”
दूसरी पर्ची पर था—“अहंकार का इलाज ‘पहली पहल’ है।”
तीसरी पर—“रिश्ता तब नहीं टूटता जब गलती हो, रिश्ता तब टूटता है जब ‘अपनी गलती’ स्वीकारने का साहस नहीं होता।”
नव्या ने दादी की तरफ देखा। “दादी, ये क्या है?”
शारदा देवी मुस्कुरा दीं। “मेरी जिंदगी की सीख। मैंने अपने झगड़ों, अपने दुखों, अपने अनुभवों को पर्चियों में बाँध लिया। ताकि जब घर में कोई आग लगे, तो ये पानी बन जाए।”
आर्यन चौंक गया। “दादी, आपके भी झगड़े होते थे?”
शारदा देवी ने ठहाका लगाया। “अरे, बहुत होते थे! तुम्हारे दादाजी तो ऐसे थे कि एक बार नाराज हो जाएँ तो दो दिन बोलते ही नहीं थे। और मैं भी कम नहीं थी। पर फिर क्या हुआ? मैंने एक दिन अपनी गलती मानकर कहा—‘चलो, जो हुआ सो हुआ।’ बस, उसी दिन समझ आया कि जीतकर भी हार सकते हैं, और झुककर भी रिश्ता जीत सकते हैं।”
नव्या और आर्यन दोनों के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। दादी ने गंभीर होकर कहा, “एक बात और याद रखना—सॉरी बोलने से कोई छोटा नहीं होता। जो सॉरी नहीं बोल पाता, वही भीतर से छोटा होता है।”
अगले दिन गांव में छोटी सी पूजा थी। नव्या ने साड़ी पहनकर, चूड़ियाँ खनकाते हुए, दादी के साथ रसोई में काम किया। अब उसे “रीति-रिवाज” बोझ नहीं लग रहे थे, क्योंकि उसके पीछे अपनापन था। कृति ने उसे सिखाया कि कैसे मसाले भूनने से खुशबू अलग आती है, और दादी ने सिखाया कि कैसे रिश्तों में “तड़का” प्यार का लगाना चाहिए, तानों का नहीं।
गांव की औरतें चौपाल पर बातें कर रही थीं। कोई बोली, “कृति बहू बड़ी समझदार है।” दूसरी बोली, “और उसकी बहू नव्या भी… देखो कितना मान रखती है।”
नव्या ने दूर से यह सुना, तो उसके मन में एक नई गर्माहट हुई। उसे लगा जैसे उसने कोई परीक्षा पास कर ली हो। आर्यन ने पास आकर धीमे से कहा, “देखा? दादी का ‘अनुभव का मसाला’ काम आ गया।”
नव्या मुस्कुरा दी। “हाँ… और सॉरी का कमाल भी।”
साल बीतते गए। शारदा देवी और उनके पति अब इस दुनिया में नहीं रहे। गांव वाला पुश्तैनी घर अब भी खड़ा था, जैसे उनकी यादें दीवारों में बस गई हों। कृति और उनके पति वहीं रहते थे। नव्या और आर्यन नौकरी के शहर में रहते थे, पर गांव की परंपराएँ उन्होंने दिल में रखीं। नव्या आज भी दादी की पर्चियों वाला डिब्बा संभालकर रखती थी। कभी घर में बहस बढ़ती, तो वह चुपके से एक पर्ची निकाल लेती और आर्यन के सामने रख देती। कई बार सिर्फ एक वाक्य ही काफी होता।
एक दिन उनके घर उनकी छोटी बेटी का जन्म हुआ। नव्या ने बच्ची का नाम रखा—“दामिनी।” आर्यन ने पूछा, “ये नाम क्यों?”
नव्या ने हँसकर कहा, “क्योंकि दादी कहा करती थीं—कभी-कभी रिश्तों में बिजली गिरती है, पर अगर दिल साफ हो तो वही बिजली रोशनी भी बन जाती है।”
आर्यन ने उसके माथे पर हाथ रखा। “और रोशनी का दिया… कभी बुझने नहीं देंगे।”
नव्या की आँखें चमक उठीं। उसे एहसास हुआ कि दादी-नानी की बातें सिर्फ पुराने जमाने की कहानी नहीं होतीं। वे अनुभव के बीज होते हैं। अगर उन्हें समय पर बो दिया जाए, तो रिश्तों का पेड़ हमेशा हरा रहता है।
और सच यही था—दादी का अनुभव, माँ का स्नेह, और पति-पत्नी की समझदारी… यही वह मसाला था, जिसने उनके रिश्तों का जायका हमेशा मीठा बनाए रखा।
लेखिका : गरिमा चौधरी