अधूरी लकीरों का सफर – नमिता पंडित

“अगर, मगर और काश… इन शब्दों में जिंदगी नहीं जी जाती राघव। मैं मानती हूं कि हमने अपने सबसे अच्छे साल तकलीफों में गुजारे। मैंने अपने मायके का सुख हमेशा के लिए खो दिया और तुमने अपने शुरुआती संघर्षों में वो सुकून नहीं पाया जो एक नौजवान को मिलना चाहिए। लेकिन आज हम कहां हैं?

आज हम साथ हैं। ये जो ढलती हुई शाम है ना, इसे देखो… ये कितनी खूबसूरत है।” सुजाता ने नदी के पार डूबते सूरज की लालिमा की तरफ इशारा किया।

नदी के किनारे बने उस शांत घाट पर शाम का धुंधलका धीरे-धीरे गहरा रहा था। पानी की लहरों से टकराकर लौटती ठंडी हवा भी आज राघवेंद्र के मन में उठ रहे बवंडर को शांत नहीं कर पा रही थी। घाट की सबसे आखिरी सीढ़ी पर बैठे राघवेंद्र ने अपने दोनों हाथों से चेहरा छुपा रखा था

और उनके चौड़े कंधों के बीच एक अजीब सी कंपन थी। वह खामोशी से रो रहे थे। उनकी उंगलियों के पोरों से होते हुए आंसुओं की बूंदें सीढ़ियों के पत्थर पर गिरकर एक गहरा निशान छोड़ रही थीं। तभी उनके कांपते कंधों पर एक बेहद कोमल और परिचित स्पर्श हुआ।

राघवेंद्र ने धीरे से चेहरा उठाया। सामने सुनहरी किनारी वाली सूती साड़ी पहने सुजाता खड़ी थीं। उनके चेहरे पर उम्र की लकीरें जरूर उभर आई थीं, लेकिन आंखों में आज भी वही असीम शांति और गहराई थी जो पच्चीस साल पहले हुआ करती थी। सुजाता ने बिना कुछ कहे राघवेंद्र के पास सीढ़ी पर जगह बना ली और उनके बड़े, खुरदरे हाथों को अपनी हथेलियों के बीच ले लिया।

“राघव… तुम फिर से अतीत के उन पन्नों को पलट रहे हो जो हमने बरसों पहले हमेशा के लिए बंद कर दिए थे? जो हुआ, वह हमारी किस्मत का एक कड़वा अध्याय था। तुम आज भी उस बात के लिए खुद को सजा क्यों दे रहे हो?” सुजाता की मखमली लेकिन दृढ़ आवाज ने राघवेंद्र के भीतर के शोर को थोड़ा थामने की कोशिश की।

राघवेंद्र की आंखें लाल थीं और उनमें एक ऐसा अपराधबोध तैर रहा था जो शायद उम्र भर उनका पीछा करने वाला था। “मैं खुद को कैसे माफ कर दूं सुजाता? कैसे भूल जाऊं वो सब जो तुम्हारे अपनों ने तुम्हारे साथ किया? और वो भी मेरी वजह से! अगर उस रात मैंने तुम्हें घर से भागने का वह पागलपन भरा सुझाव न दिया होता, तो तुम्हारी जिंदगी उन खौफनाक दौर से न गुजरती। तुम्हारे ही परिवार वालों ने तुम्हें एक कमरे में जानवरों की तरह कैद कर दिया। समाज में तुम्हें चरित्रहीन साबित करने की कोशिश की। तुम पर जो शारीरिक और मानसिक जुल्म हुए, उसकी वजह सिर्फ और सिर्फ मैं था।”

राघवेंद्र की आवाज रुंध गई थी। पच्चीस साल पहले का वह मंजर आज भी उनके जेहन में किसी डरावनी फिल्म की तरह ताजा था। वे दोनों कॉलेज के दिनों में एक-दूसरे को दिल दे बैठे थे। राघवेंद्र एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार का महत्वकांक्षी लड़का था और सुजाता शहर के सबसे रसूखदार और जमींदार परिवार की इकलौती बेटी। उनके प्यार की भनक जब सुजाता के परिवार को लगी, तो जैसे उनके घर में भूचाल आ गया। सुजाता के पिता और भाइयों के लिए यह उनकी ‘मूंछ’ और ‘खानदान की इज्जत’ का सवाल था। जब सुजाता का घर से निकलना बंद कर दिया गया और उसकी जबरन शादी कहीं और तय कर दी गई, तब राघवेंद्र ने उसे शहर छोड़कर भागने का रास्ता सुझाया था।

रात के अंधेरे में दोनों रेलवे स्टेशन पहुंचे ही थे कि सुजाता के भाइयों ने उन्हें पकड़ लिया। राघवेंद्र को इतनी बेरहमी से पीटा गया कि वह हफ्तों तक अस्पताल में मौत से लड़ता रहा। लेकिन सुजाता के हिस्से जो सजा आई, वह मौत से भी बदतर थी। उसे घसीटते हुए घर ले जाया गया। महीनों तक उसे एक अंधेरे कमरे में रखा गया। बाहर दुनिया वालों से कह दिया गया कि लड़की की दिमागी हालत ठीक नहीं है। जब सुजाता ने उस जबरन थोपी जा रही शादी से इनकार किया, तो उसके चरित्र पर ऐसे लांछन लगाए गए कि उसकी रूह तक कांप उठी।

सुजाता ने राघवेंद्र के गालों पर बहते आंसुओं को अपने पल्लू से पोछा और उनके कंधे पर अपना सिर रख दिया। “राघव, तुम क्यों भूल जाते हो कि वो फैसला सिर्फ तुम्हारा नहीं था? भागने की रजामंदी मेरी भी थी। मैं जानती थी कि मेरे परिवार की सोच क्या है, फिर भी मैंने वो जोखिम उठाया क्योंकि मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। कसूर तुम्हारा नहीं, इस समाज की उस सड़ी-गली मानसिकता का है जो झूठी शान के लिए अपनी ही बेटियों का गला घोंटने से नहीं हिचकती।”

नदी के उस पार मंदिरों में संध्या आरती की घंटियां बजने लगी थीं। पानी की सतह पर दीयों की रोशनी झिलमिला रही थी। सुजाता की नजरें उन लहरों पर टिकी थीं, जैसे वे भी अपने अतीत के उन गहरे पानी में उतर गई हों।

“वो दिन वाकई बहुत डरावने थे राघव,” सुजाता की आवाज अचानक बहुत धीमी हो गई। “कमरे के उस अंधेरे में मुझे लगता था कि शायद मैं सच में पागल हो जाऊंगी। मेरे अपने भाई, जिन्होंने मुझे बचपन में उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, वे मुझे इस नजर से देखते थे जैसे मैंने कोई जघन्य अपराध कर दिया हो। उन्होंने मुझे भूखा रखा, मुझे ताने मारे। लेकिन जानते हो राघव, उस घने अंधेरे में भी मुझे एक ही चीज रोशनी देती थी, और वो था तुम्हारा प्यार। मुझे पता था कि तुम जिंदा हो और एक दिन मुझे इस नर्क से निकालने जरूर आओगे।”

राघवेंद्र ने सुजाता का हाथ और कसकर पकड़ लिया। उन्हें याद आया कि कैसे अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद, सुजाता के परिवार के खौफ से उनके खुद के माता-पिता ने उन्हें शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। लेकिन राघवेंद्र ने हार नहीं मानी थी। उन्होंने एक दूसरे शहर में जाकर दिन-रात एक कर दिया। अपनी पढ़ाई पूरी की, नौकरी हासिल की और जब वे अपने पैरों पर पूरी तरह खड़े हो गए, तो सात साल बाद वे वापस लौटे। सुजाता तब तक उसी घर में एक जिंदा लाश की तरह रह रही थी। घरवालों ने उसे समाज की नजरों से छिपा दिया था। लेकिन राघवेंद्र ने कानून और पुलिस की मदद से सुजाता को उस कैद से आजाद कराया था।

“हमने अपनी जवानी के वो सात खूबसूरत साल खो दिए सुजाता,” राघवेंद्र ने ठंडी आह भरते हुए कहा। “वो साल जो हमें एक साथ बिताने चाहिए थे, हंसते-खेलते, अपने सपने बुनते हुए। उन सालों को मैं कभी वापस नहीं ला सकता। मुझे हमेशा यही लगता है कि अगर हमारे माता-पिता ने सिर्फ हमारी खुशी देखी होती, समाज की झूठी नाक की चिंता न की होती, तो शायद आज हमारी कहानी कुछ और ही होती।”

सुजाता ने मुस्कुराते हुए अपना सिर उठाया और राघवेंद्र की आंखों में सीधा देखा। उस मुस्कान में इतनी ऊर्जा थी कि राघवेंद्र का सारा दर्द जैसे पिघलने लगा।

“अगर, मगर और काश… इन शब्दों में जिंदगी नहीं जी जाती राघव। मैं मानती हूं कि हमने अपने सबसे अच्छे साल तकलीफों में गुजारे। मैंने अपने मायके का सुख हमेशा के लिए खो दिया और तुमने अपने शुरुआती संघर्षों में वो सुकून नहीं पाया जो एक नौजवान को मिलना चाहिए। लेकिन आज हम कहां हैं? आज हम साथ हैं। ये जो ढलती हुई शाम है ना, इसे देखो… ये कितनी खूबसूरत है।” सुजाता ने नदी के पार डूबते सूरज की लालिमा की तरफ इशारा किया।

“हमारी सुबह भले ही तूफानों से घिरी रही हो, लेकिन हमारी शाम बहुत शांत और खूबसूरत है। जो साल हमने खो दिए, हम उन्हें आने वाले वक्त में जी लेंगे। हम आज साथ हैं, यही मेरी सबसे बड़ी जीत है। मेरे परिवार ने मुझे मिटाने की कोशिश की, समाज ने हमें अलग करने की हर मुमकिन साजिश रची, लेकिन वे हमारे प्यार को नहीं मार पाए। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं, तो मुझे अपने उन सात सालों के दर्द पर अफसोस नहीं होता, बल्कि फक्र होता है। क्योंकि उस दर्द ने मुझे ये सिखाया कि तुम मेरे लिए क्या मायने रखते हो।”

राघवेंद्र ने एक गहरी सांस ली। सुजाता की बातों ने उनके मन पर जमे बरसों पुराने अपराधबोध के पत्थर को जैसे खिसका दिया था। उन्होंने महसूस किया कि जो औरत उनके साथ बैठी है, वह कोई बेचारी या सताई हुई अबला नहीं है, बल्कि एक बेहद मजबूत और स्वाभिमानी महिला है जिसने अपने प्यार के लिए हर यातना को झेला और अंततः जीत हासिल की।

“तुम बहुत साहसी हो सुजाता। मैं तो बस एक कायर की तरह अपनी पुरानी गलतियों का हिसाब लगा रहा था, और तुम जिंदगी को इतने खूबसूरत नजरिए से देख रही हो,” राघवेंद्र ने सुजाता के माथे को चूमते हुए कहा।

सुजाता खिलखिला कर हंस पड़ी। “कायर नहीं हो तुम, बस थोड़े भावुक हो गए हो। अब इन आंसुओं को पोंछो। घर चलकर मुझे तुम्हारी पसंद की अदरक वाली चाय भी बनानी है। और हां, हमने जो कल से बागवानी शुरू करने का फैसला किया था, उसके लिए बाजार से कुछ पौधे भी लेकर आने हैं।”

घाट की सीढ़ियों पर अब अंधेरा हो चुका था, लेकिन राघवेंद्र के दिल में एक नई सुबह हो चुकी थी। वे दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे घाट की सीढ़ियां चढ़ने लगे। उनके कदमों में एक नई लय थी, एक ऐसा सुकून था जो सालों की तपस्या के बाद मिलता है। अतीत के पन्ने अब हमेशा के लिए बंद हो चुके थे, और आने वाले कल की किताब पूरी तरह से कोरी थी, जिसे उन्हें सिर्फ प्यार और सुकून की स्याही से लिखना था।

उन दोनों की परछाइयां नदी के शांत पानी में एक हो गई थीं, जैसे वे इस बात की गवाही दे रही हों कि सच्चा प्यार कभी खत्म नहीं होता, वह बस समय की भट्टी में तपकर और भी कुंदन हो जाता है।


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 लेखिका : नमिता पंडित

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