अधूरा खत – एम. पी. सिंह

कुलदीप सिंह अपने गावं का जाना माना ट्रैक्टर कारीगर था ओर ठीक ठाक कमा लेता था, पर अपनी पत्नी बाला की बीमारी के कारण आर्थिक तंगी से परेशान था. कुलदीप का बेटा करतार सिंह पढ़ने में कुछ ख़ास नहीं था.

10वी तक पढ़ने के बाद अपने पिता के साथ काम करने लगा. करतार कुछ साल तक अपने पिताजी के साथ काम करता रहा, पर उसे इस काम में मजा नहीं आ रहा था.  इसी दौरान उसे फौज में भर्ती होंने का मौका मिला. उसने अपने माता पिता क़ो समझाकर आर्मी में भर्ती हों गया

ओर पोस्टिंग पर जम्मू चला गया. समय बीतता गया ओर फिर एक दिन करतार छुट्टी पर आया तो माता पिता ने शादी के लिए जोर दिया, तो वो शादी के लिए राजी हों गया और बोला कि आप दोनों लड़की देख लो, जो आपको पसंद होंगी, वहीं मेरी पसंद होंगी. कुछ दिन बाद करतार वापस जम्मू चला गया. 

माँ पिता जी ने पास के गाँव में अपने दोस्त बलवीर क़ी बेटी कुंतो क़ो पसंद कर लिया ओर करतार क़ो पसंद करने के लिए चिठ्ठी में फोटो डालकर भेज दी, लिखा कि फोटो देख ले, ज़ब आएगा

तो लड़की देख लेना,  पसंद करोगे तो बात आगे बढ़ायेगे. उस जमाने में मोबाइल तो थे नहीं, ओर लैंड लाइन भी गाँव में एक दो घरो में होते थे. करतार ने जवाब में लिखा कि लड़की आपको पसंद है तो फाइनल कर दो जब कहोगे शादी के लिए आ जाऊगा.

साथ में ये भी लिखा की एक ही बार छुट्टी आऊंगा ओर सगाई शादी सब एक साथ कर  देना. कुलदीप ओर बाला ने बलवीर के घर जाकर सब बातचीत करके कुंतो का रिस्ता अपने बेटे से पक्का कर दिया. 

सगाई ओर शादी की तारीख एक साथ रख दी ओर करतार समय पर छुट्टी लेकर आ गया. दोनों की शादी बिना किसी ज्यादा चमक – धमक की सम्पन्न हों गई. करतार और उसके घर वाले सारे ख़ुश थे.

शादी क़ो अभी एक हफ्ता ही हुआ था की करगिल की लड़ाई शुरू हों गई. रेडिओ पर समाचार आया की सब फौजीओ की छुट्टी रद्द कर दी गई है ओर वापस ड्यूटी पर हाजिर होने की अपील की गई थीं. 

करतार जम्मू वापस चला गया और ठीक ठाक पहुंचने का खत ट्रैन में ही लिख कर रख लिया ओर जम्मू पहुंचते ही पोस्ट कर दिया. समय मिलने पर करतार ने दो तीन खत और लिखें पर कुंतो ने कोई जवाब नहीं दिया. पिताजी का एक खत आया और सबकी खैरियत लिखी थीं.

साथ में लिखा था की कुंतो ने चूल्हा चौका सब संभाल लिया है और तेरी माँ एकदम वेल्ली हों गई. उसे तसल्ली थीं की माँ पिताजी के साथ कुंतो ठीक है ओर माँ क़ो भी थोड़ा आराम मिल गया है. जल्दी ही करगिल यूद्ध खत्म हुआ और भारत विजयी हुआ.

सारा माहौल नार्मल हुआ ओर करतार छुट्टी लेकर गाँव आया. गाँव में सभी लोग खुश हुए पर करतार अपनी बीवी से थोड़ा नाराज़ था क्योंकि उसने किसी भी चिट्ठी का जवाब नहीं दिया था. लेकिन करतार ने कुंतो से इसका कोई जिक्र नहीं किया.

अगले दिन जब करतार अपने कमरे मे बैठा था तो कुंतो पल्ले में कुछ छुपाकर लाई और बोली, मुझे आपसे एक काम है. करतार बोला बताओ, तो कुंतो ने एक कागज़ पल्लू से निकाल कर आगे बढ़ाया और बोली इसे पढ़कर सुनादो. करतार ने देखा की ये तो वहीं खत है जो उसने लिखा था.

वो मुस्कुराया और बोला, ये तो तुम्हारे नाम का है, तुम ही पढ़ो. कुंतो बोली, जी मुझे पढ़ना नहीं आता, तुम ही पढ़कर सुनादो. अब करतार हों समझ आया की कुंतो ने उसके खत का जवाब क्यों नहीं दिया. कुंतो का मासुम सा चेहरा ओर स्पष्ट जवाब सुनकर करतार की नाराज़गी खत्म हों गई. उसे तो खुशी थीं की उसके माँ पिताजी कुंतो से बहुत ख़ुश थे ओर उनकी अच्छे से देखभाल हों रही है. 

छुट्टी खत्म होने से पहले करतार शहर जाकर अपने घर मैं फोन लगवाने की दर्खास जमा कर आया और उसके रहते ही फोन भी लग गया. 

जब करतार वापस ड्यूटी पर गया तो उसे अपने माँ पिताजी के देखभाल और खत लिखने की चिंता नहीं थीं. जम्मू पहुंचकर उसने घर फोन किया तो कुंतो ने ख़ुश खबरी सुनाई की नया मेहमान आने वाला है. घर मैं खुशी का माहौल था तभी एक दिन बुरी खबर आई की आतंकी हमले मैं करतार शहीद हों गया. 

इस हादसे क़ो लगभग 25 साल हों गये, आज करतार का बेटा पढ़ लिख कर कॉलेज मैं पढ़ाने लगा है. कुंतो क़ो लोग उसके नाम से नहीं बल्कि शहीद करतार की बीवी के नाम से जानते है. घर मैं सबकुछ बदल गया, पर आज भी वो फोन ओर करतार के लिखें खत जो कभी पढ़े ही नहीं गये, कुंतो ने बड़े संभाल कर रखे है. 

धन्यवाद 

लेखक 

एम. पी. सिंह, कोटा 

स्वरचित, अप्रकाशित 

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