अधिकार

आदित्य की कार दरवाज़े पर रुकी ही थी कि भीतर से ऊँची आवाज़ें बाहर तक आ रही थीं। वह ठिठक गया—पहचान लिया, यह तो उसकी माँ सरोज जी की आवाज़ है। मन में खटका हुआ, “शायद काव्या से कोई चूक हो गई होगी… पर ऐसे चिल्लाने की क्या ज़रूरत?” वह तेज क़दमों से अंदर पहुँचा।

सरोज जी ने उसे देखते ही कहा, “अरे बेटा, ठीक वक्त पर आया है। देख ले अपनी कमाऊ बहू कैसे सुनाती है मुझे! सारा दिन घर-बच्चे मैं संभालूँ, ऊपर से फ़रमाती हैं—‘मम्मी जी, मैं महीने भर खपकर कमाती हूँ और आप चार दिन में सब उड़ा देती हैं।’ भला बताओ, मैं क्या अपने ऊपर उड़ाती हूँ? जो है, घर पर ही तो लगता है!”

आदित्य ने माहौल ताड़ लिया—पैसों की कमी, चिड़चिड़ापन, और काव्या की कोई तीखी बात। वह माँ का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकता था, सो सीधा काव्या से बोला, “तुमने माँ से ऐसी बड़ी बात क्यों कह दी? मान लिया, हम दोनों की कमाई से घर चलता है, पर इससे यह तो नहीं होता कि माँ पर इल्ज़ाम लगाओ कि वे घर नहीं संभाल रहीं या अपने लिए बचाकर रखती हैं।”

काव्या ने गहरी सांस ली, “एक बार मैंने अपनी कमाई का ज़िक्र क्या किया, सब बुरा मान गए। माँ भी, आप भी। पर यह सोचा किसी ने कि कहा क्यों? सैलरी आए चार दिन हुए हैं और जेब में बस तीन हज़ार बचे हैं। बाकी महीना कैसे निकलेगा? जब मैंने माँ से पूछा तो जवाब मिला—‘मैंने थोड़ी खर्च किया!’
मैं जानती हूँ, घर के हज़ार खर्च होते हैं, पैसे उड़ते हैं; मेरा इरादा अपमान का नहीं था। और सच कहूँ, जो ‘डायलॉग’ आज मेरे मुँह से निकला, वही पिछले दस साल से मैं सुनती आई हूँ—शायद इसी लिए शब्द उलटे लौट आए।”

वह रुकी, फिर शांत पर ठोस आवाज़ में बोली, “हाँ आदित्य, माँ मम्मी हैं—पर डायलॉग तो करती हैं। याद है जब उनके बनाए लड्डू चार दिन में ख़त्म हुए, तो बोलीं—‘इतनी मेहनत लगती है, खाते वक़्त सब झटपट साफ़।’ पापड़ पर भी यही। हर पकवान पर—‘बनाने में टाइम और मेहनत लगती है, और तुम लोग पल में चट कर देते हो।’ और यह हमेशा तब कहा जाता है, जब चीज़ मेरी प्लेट में होती है—कि ना फेंकते बनता, ना चैन से खा पाती हूँ।

मैंने कब कहा कि मैं ऑफिस जाऊँ तो आप खास पकवान बना-बना कर रखिए? और अगर बना लिया, तो खाने के लिए ही तो बने—डब्बे में सजाकर रखने के लिए नहीं। आज पैसों पर मैंने कहा तो बुरा लगा; पर मिठाई के टुकड़े गिन-गिन कर रखना, कम होने पर पूरे घर में पूछना—‘किसने खाया?’—वो ठीक है? घर की मिठाई ख़त्म होना अच्छी बात है—खाने के लिए लाई जाती है, दिखाने के लिए नहीं।”

आदित्य ने संयत होकर कहा, “माँ, काव्या गलत नहीं है। बनाने में मेहनत है—सच। पर जो सामग्री आती है, वह भी हमारी कमाई से—वह भी मेहनत से। हम कमाते हैं ताकि घर में सब अच्छा खाएँ। काव्या भी कमाती है; उसे भी पौष्टिक, भरपेट और मनपसंद खाना खाने का हक़ है। और सिर्फ़ काव्या ही क्यों—आप पूरा दिन घर संभालती हैं, आपका भी हक़ है। हर इंसान को अच्छा, संतुलित भोजन मिलना चाहिए—ये अधिकार की बात है, एहसान की नहीं।

और अगर इतना कहने के बाद भी लगे कि इस घर की बहू होने के नाते काव्या को खाने-पीने पर ‘अधिकार’ नहीं, तो माफ़ कीजिए माँ—आज से मैं भी अपने माँ-बाप के घर जैसा अधिकार यहाँ नहीं समझूँगा। बाकी, आपकी मर्ज़ी।”

यह कहकर आदित्य ने काव्या का हाथ थामा और चुपचाप कमरे में चला गया।

उधर, सरोज जी, जो अब तक गुस्से में थीं, खामोश होकर बैठ गईं। आँखों के कोर भीग आए—बेटे के शब्द जैसे आईना बनकर सामने खड़े थे। उस भीगी चमक में गलती का एहसास और पछतावे की रेखाएँ साफ़ दिख रही थीं।

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