अधिकार कैसा… – रश्मि झा मिश्रा –

…सीमा चहकते हुए मां के कमरे से निकली… निकलते ही उसका सामना भाभी से हो गया… भाभी ने उसके चेहरे की तरफ गौर से देखा… एक पल को रुकी… लेकिन कुछ बोली नहीं… सीमा के कानों में मां के झुमके झूल रहे थे…

 भाभी रोशनी सीधे मां के पास जाकर, शिकायत भरे लहजे में बोली…” वाह मां… आपने अपने झुमके सीमा दी को दे दिए… वह तो मुझे भी पसंद थे…!”

 मां सरला जी हड़बड़ा गईं… “मैंने दे दिए… किसे… कब…!”

” हां… अभी तो सीमा दी पहन कर घूम रही है…!”

” नहीं रोशनी बेटा… मैंने तो किसी को कुछ नहीं दिया है… बुला तो उसे…!”

 सीमा भागती हुई आई… “बुलाया मां…?”

 मां ने सीमा को झिड़कते हुए कहा…” यह क्या सीमा… तुमने यह झुमके क्यों निकाल लिए…!”

” क्यों क्या हो गया… मां के गहनों पर तो बेटी का ही अधिकार होता है… और आपके पास तो इतने सारे गहने भरे पड़े हैं… मैं अगर एक दो ले भी लूं, तो आपको क्या फर्क पड़ेगा…!”

 रोशनी बीच में बोल पड़ी…” भूलिए मत दी… आपकी शादी हो चुकी है… अब मां के गहनों पर सिर्फ मेरा अधिकार है…!”

 दोनों ननद भाभी मां को अनदेखा कर, एक दूसरे से अपनी हक की लड़ाई लड़ने लगीं… सरला जी अवाक हो दोनों का बस मुंह देखते रह गईं… फिर उन्होंने दोनों को डांट कर चुप किया… और गुस्से से बोलीं… “मेरे जीते जी गहने सिर्फ मेरे हैं… मैं उन्हें जिसे मन करे दूं …या फेंक दूं …या दान कर दूं… तुम लोगों का इस पर कोई अधिकार नहीं…सीमा सुन ले आज के बाद बिना मुझसे पूछे गहनों को हाथ मत लगाना… जाओ जहां से निकाले, वहीं जाकर रख आओ… तुम्हारे ब्याह में तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं रखी है हमने… इसलिए अधिक लालच ठीक नहीं… पहले कर्तव्य करो… फिर अधिकार की बात करना…!”

 सीमा पैर पटकती हुई कमरे से चली गई… मां आज के अपनी बहू और बेटी के युद्ध से इतना तो समझ गई कि… दोनों की नजर गहनों पर है… इसलिए एक-दो दिन में सरला जी ने सारे गहने सेफ में अच्छे से रखकर डबल लॉक लगा दिया… चाबी अपने पास रख ली…

 मां ने सोच लिया था… जो मेरी और अपने पिता की सेवा करेगा… हमारा ध्यान रखेगा… उसे अपने गहने दे दूंगी… यही बात उन्होंने बच्चों से भी कह दी… धीरे-धीरे समय बीता… पापा की सेहत बहुत बिगड़ गई… पता चला उनकी बीमारी में बहुत पैसे खर्च होने वाले हैं… बेटा बेटी दोनों ने अपना दुखड़ा मां को सुना दिया… “मां हम कहां से देंगे… एक तो इतनी महंगाई ऊपर से आप दोनों का खर्च भी उठा रहे हैं… अब यह बीमारी… कैसे हो पाएगा…?”

 सीमा भी अपने खर्च और परिवार का रोना रो कर निकल गई… सरला जी अपने पति के इलाज में, कोई कमी नहीं होने देना चाहती थीं…उनकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया… अब क्या करें…

 सरला जी ने अपने कामों के लिए एक छोटी लड़की चंदा को रखा था… वह उनके हर काम में उनका सहयोग करती थी… पंद्रह बरस की चंदा ने रोती हुई सरल अम्मा से कहा था…” अम्मा पैसे नहीं हैं तो कुछ गहने हों तो उन्हें ही बेचकर पैसे से बाबूजी का इलाज करवा लो ना…रोती क्यों हो… अब क्या तुम गहने पहनोगी…!” मां को बात जंच गई… सरला जी ने भी सोच लिया जिस बेटे बेटी के पास पिता के इलाज के लिए पैसे नहीं… उनके लिए गहने रखकर क्या फायदा… इसलिए सरला जी ने धीरे-धीरे एक-एक करके गहने के बदले पैसे बदलकर पापा का इलाज जारी रखा… 

बच्चे तो पहले ही मना कर चुके थे… इसलिए कोई पूछने की हिम्मत भी नहीं कर पा रहा था… एक दिन रोशनी ने हिम्मत करके पूछा… “मां इलाज के लिए पैसे कहां से आए…?” तो मां बोली… “मेरे अपने पैसे हैं… निश्चिंत रहो… तुम्हारे सर पर कर्ज डालकर नहीं मरूंगी…!” वह चुप हो गई…

 पापा की तीन साल की बीमारी में मां की सेहत और गहने सब खत्म हो गए… साथ ही पापा भी नहीं रहे… मां के गहनों की अलमारी में अभी भी ताला रहता था… बच्चे समझते थे… गहने उसी में रखे हैं…

 पापा के जाने के कुछ साल बाद एक बार सरला जी बहुत बीमार थीं… दोनों बहू और बेटी मां के पास आकर बोली…” मां तुम्हारी सेहत भी अब ठीक नहीं रहती… कल को नहीं रहोगी तो गहनों के लिए हम दोनों के रिश्ते में कलह होगा… तुम अपने हाथों से मुझे मेरा हिस्सा दे देती…!”

 सरला जी बेटी का मुंह कुछ क्षण को देखती रहीं… फिर उन्होंने अपने तकिए के नीचे से लाकर की चाबी निकाल कर उसके हाथों में दे दिया… सीमा आगे आगे… पीछे तेज कदमों से रोशनी लाकर खोलने भागी…

 चंदा की शादी ठीक हो गई थी… पर वह अभी भी दिन रात अपनी सरला अम्मा की सेवा में लगी रहती थी… चंदा की आंखों में आंसू भर आए…” अम्मा अब क्या होगा…!”

” कुछ नहीं… तू क्यों चिंता करती है…!”

 थोड़ी ही देर में दोनों दौड़ती हुई आईं… “अरे मां… लॉकर में तो बस ये एक जोड़ी कान के बुंदे हैं… और ये पचास हजार रुपए… गहने कहां गए…?”

 मां ने शांत भाव से कहा… “बच्चों गहने पापा की इलाज में खर्च हो गए… ये बुंदे चंदा की शादी में दे देना… बाकी जो पैसे हैं उनसे मेरा क्रिया कर्म कर देना… जब अपने कर्तव्य के समय तुम लोग पीछे हट गए… तो अब तुम लोगों का अधिकार कैसा…!”

 सरला मां ने अपने हाथों से चंदा का हाथ पकड़ कर कहा…” एक यही है… जिसने निस्वार्थ भाव से सब दिन मेरा साथ दिया…!” और बुंदे लेकर उसके हाथ पर रख दिए… दोनों सीमा और रोशनी एक दूसरे का मुंह देखते रह गईं… दो-चार दिनों के संघर्ष के बाद मां अपने कर्तव्यों का सही से निर्वहन कर… साथ ही अंतिम यात्रा का प्रबंध भी कर… सुकून से चल बसी…

रश्मि झा मिश्रा 

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