मुझे नहीं खाना है ऐसा खाना जिसमें कुछ स्वाद ही ना हो, सारे मुंह का मजा किरकिरा कर देती हो तुम बहु…ताने मारते हुए दिव्या की सास बोली।
दिव्या बस वहां मौन कड़ी रही। दूर से यह सब दिव्या के पति राम सुन रहे थे।
मैं दफ्तर जा रहा हू, ये बोलते हुए राम निकल ही रहा था कि दिव्या बोली खाना तो खाते जाइये। पर राम वहां से जल्दी निकल गया।
उसकी सास कटाक्ष स्वर में बोली तेरी वजह से मेरा बेटा रोज़ भूखा जाता है, कितना पतला हो गया है।
दिव्या और राम की शादी दोनों परिवार के द्वारा तय हुई थी और उनकी शादी को अभी बस कुछ पांच महीने ही हुए थे और उसकी सास तोड़ा दिव्या से जलती थी इसीलिए वो हर चीज में कोई न कोई बहाना ढूंढ लेती थी दिव्या को कड़ी कोठी सुनाने का।
दिव्या कपड़े सुखा रही थी और उस से गलती से गमछा गिर गया, उस को देखते ही उसकी सास झिल्ला उठी।
ऐसे रोज़ होता था पर दिव्या ने कभी शिकायत नहीं की अपने पति से क्योंकि राम घर लेट आते थे और बहुत थके होते है।
*अगले दिन सुबह*
सुबह सुबह बर्तनों की खटर पटर से दिव्या के सास की नींद खुली और जैसे ही किचन में गई तो आचंबित हो गई राम को चाय बनाता देख।
अरे बस अब यही दिन देखने को बचा था घर का नौजवान बेटा घर के भी काम करे और दफ्तर भी जाये, बहु तो घर में बस सोने के लिए आई है, ताने मारते हुए राम की माँ बोली।
माजी…माजी वो…वो ज़रा कल काफी बर्तन थे तो तोड़ा लेट सोई थी तो सुबह आँख देर से खुली, मुझे माफ कर दीजिए दिव्या हांफती हुई बोली।
लेकिन यहां पर भी उसकी सास नहीं रुकी और कटाक्ष में बोली, मैने भी बर्तन धोए है पर फिर भी मैं जल्दी उठ जाती थी अपने सास ससुर जी को चाय देने और साथ में राम को भी संभालती थी, अभी तुमसे इतना नहीं हो रहा, जब बच्चे होंगे तब कैसे करोगी?
राम वहां कुछ नहीं बोला बस देख रहा था। दिव्या की हिम्मत नहीं हुई राम से आँख मिलाने की।
बस मां बस गहरी साँस लेते हुए राम बोला।
उसकी मां असमंजस से राम को देखते हुए बोली अब तू अपनी माँ को चुप कराएगा, कुछ महीने पहले आई अपनी पत्नी के लिए ?
राम तोड़े ऊंचे स्वर में बोला *अच्छा बेटा बनने के चक्कर में अपनी पत्नी के साथ तो गलत नहीं कर सकता* ना मैं।
उसकी मां एक दम से आच्छंबित हुई कि उनका बेटा उनकी तरफ न होके अपनी बीवी की तरफ है।
राम ने आगे बोला जब से दिव्या घर में आई है, उसको एक पल भी अपने लिए नहीं मिला है। सारा दिन वो बस आपके काम और आपकी सेवा में लगी रहती है और आप उसकी कोशिशों को नजरअंदाज करके उसकी गलतियां गिनते रहते हो।
गलतियां तो सब से होती है ना।
उसकी मां बोली बेटा पर गलती पर…
वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि राम बोला मां पर गलती बताने का भी सलीका होता है, वो भी पहली बार ही बहु बनी है, आप बताएं, आपसे नहीं होती थी गलतियां? धीरे धीरे ही आपने सीखे थे ना काम और दादी आपको प्रोत्साहित भी करती थी और आपकी गलती आपको प्यार से समझती थी।
उसकी मां अब कुछ नहीं बोल पा रही थी बस सर झुका के कड़ी हुई थी।
दिव्या बोली राम कोई नहीं, माजी मेरे भले के लिए ही बोल रही होंगी।
राम बोला दिव्या दोनों चीजों में फरक है। और अपना आत्मसम्मान अपने हाथों में होता है। रही बात आज की, ज़माना बदल गया है मां, आज मैने चाय बना दी तो क्या हो गया। आपको तो खुश होना चाहिए कि आपके संस्कार ऐसे है कि आपका बेटा अपनी पत्नी की मदद कर रहा है। पापा की तरह नहीं की सारा काम आप पर छोड़ देते थे।
उसकी मां को अब समझ आ गया था कि उसको कोयले की खदान का कोयला नहीं हीरा मिला है बस वो उसको पहचान नहीं पाई।
उसने अपनी बहु की तरफ देख कर माफी मांगी और बोली, जिसको मैं लोमड़ी समझ रही थी असल में वो तो बहुत सयानी गाय है। मुझे माफ करदो दिव्या, राम सही कह रहा है। मैं अब तक अच्छी सास नहीं थी, पर अब मैं बहुत अच्छी सास बनके दिखाऊंगी।
दिव्या के आँखों में अश्रु आ गई और अपनी माजी के गले लग के रोने लगी और बोली आप दुनिया की सबसे अच्छी सास है।
लेखिका
तोषिका