*”वो समझता था कि वो उसे दबाकर रखेगा क्योंकि वो ‘औरत’ है, पर वो भूल गया कि वो एक ‘पिता’ की बेटी भी है। जब एक पिता अपनी बेटी की ढाल बना, तो बिखर गया रईसी और अहंकार का वो खोखला महल।”*
“विमल, मुझे घरेलू हिंसा और दहेज़ प्रताड़ना का मतलब समझाने की ज़रूरत नहीं है, है न? मेरी बेटी के शरीर पर जो निशान हैं, उनका मेडिकल टेस्ट होते ही तुम और तुम्हारी माँ अगले दस साल तक जेल की रोटियाँ तोड़ोगे। वंदना की सैलरी से जो ईएमआई इस फ्लैट की जा रही है, उसका सबूत भी है। एक मिनट में यह फ्लैट सील हो जाएगा।
रघुनाथ जी की निगाहें बार-बार दीवार घड़ी पर टिक रही थीं। रात के दस बज चुके थे, लेकिन उनकी बेटी वंदना का अब तक कोई फोन नहीं आया था। पिछले तीन सालों का यह नियम था—चाहे आंधी आए या तूफ़ान, वंदना रात को नौ बजे अपने माता-पिता से वीडियो कॉल पर बात ज़रूर करती थी। लेकिन पिछले एक महीने से यह सिलसिला टूट रहा था। कभी “मीटिंग में हूँ” का मैसेज आता, तो कभी “नेटवर्क नहीं है” का बहाना।
सुधा जी, जो रसोई समेट कर अभी-अभी बाहर आई थीं, पति के माथे पर चिंता की लकीरें देख बोलीं, “अजी, आप भी न, नाहक ही परेशान होते हैं। बड़े शहर की नौकरी है, दामाद जी का भी अपना बिज़नेस है। हो सकता है बच्ची काम में उलझी हो। कल बात कर लेगी।”
रघुनाथ जी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और गंभीर स्वर में बोले, “सुधा, काम में उलझना और अपनों से कटना… इन दोनों में बहुत फर्क होता है। तुम्हें याद है? पिछले हफ्ते जब मैंने पैसों की बात छेड़ी थी कि उसे अपनी एफ.डी. रिन्यू करानी है, तो उसने हड़बड़ाकर फोन काट दिया था। मुझे वंदना की आवाज़ में वो खनक नहीं सुनाई देती अब। एक दबी हुई सी घबराहट है।”
सुधा जी ने पल्लू से हाथ पोंछे और कुर्सी पर बैठ गईं। “मन तो मेरा भी घबराता है। पिछली बार वीडियो कॉल पर देखा था तो चेहरा उतरा हुआ था। पूछने पर बोली कि डाइट कर रही हूँ। पर एक माँ की नज़र से पूछो तो लग रहा था जैसे अंदर ही अंदर घुल रही है।”
रघुनाथ जी ने उसी वक्त फैसला लिया। “हम कल ही सुबह की ट्रेन से मुंबई जाएंगे। सरप्राइज़ के बहाने ही सही, अपनी आँखों से देख तो लेंगे कि हमारी लाडो किस हाल में है।”
अगले दिन शाम को रघुनाथ जी और सुधा जी मुंबई के पॉश इलाके में स्थित वंदना के फ्लैट के बाहर खड़े थे। उन्होंने जानबूझकर किसी को खबर नहीं दी थी। घंटी बजाने पर वंदना के पति, विमल ने दरवाज़ा खोला। सास-ससुर को अचानक सामने देख उसके चेहरे का रंग एक पल के लिए उड़ गया, लेकिन अगले ही पल उसने बनावटी मुस्कान ओढ़ ली।
“अरे पापा जी, मम्मी जी! आप लोग? अचानक? बताया होता तो मैं गाड़ी भेज देता स्टेशन,” विमल ने उनके पैर छूते हुए कहा।
“बस बेटा, सरप्राइज़ देने का मन हुआ। सोचा वंदना का जन्मदिन नज़दीक आ रहा है, तो इस बार यहीं मना लें,” रघुनाथ जी ने घर के अंदर कदम रखते हुए कहा।
घर अंदर से बेहद शानदार था। महंगे सोफे, बड़ी टीवी, और दीवारों पर लगी पेंटिंग्स। लेकिन घर में एक अजीब सी खामोशी थी।
“वंदना कहाँ है?” सुधा जी ने पूछा।
“वो… वो अभी ऑफिस से आई है, शायद फ्रेश हो रही होगी। मैं बुलाता हूँ,” विमल हड़बड़ाते हुए अंदर गया।
पाँच मिनट बाद वंदना बाहर आई। उसे देखते ही सुधा जी का कलेजा मुँह को आ गया। वंदना, जो हमेशा चहकती रहती थी, आज किसी मुरझाए हुए फूल जैसी लग रही थी। उसने फुल स्लीव्स का कुर्ता पहना हुआ था, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और शरीर जैसे आधा रह गया था।
“माँ! पापा!” वह दौड़कर उनके गले लगी, लेकिन उसकी आवाज़ में खुशी से ज़्यादा एक ‘सिसकी’ थी जिसे उसने दबाने की कोशिश की।
“तू इतनी कमज़ोर कैसे हो गई बेटा?” सुधा जी ने उसके गालों को सहलाते हुए पूछा।
“कुछ नहीं माँ, बस वर्क लोड ज़्यादा है। प्रोजेक्ट चल रहा है न,” वंदना ने नज़रें चुराते हुए कहा और रसोई की तरफ मुड़ गई। “मैं आप लोगों के लिए चाय बनाती हूँ।”
“रहने दे, मैं बनाती हूँ। तू बैठ,” सुधा जी ने कहा।
“नहीं माँ!” विमल की माँ, यानी वंदना की सास, जो अब तक अपने कमरे में थीं, बाहर आते हुए कड़क आवाज़ में बोलीं। “समधी जी आए हैं, मेहमान हैं। घर की बहू के होते हुए वो रसोई में जाएंगी तो हमारी क्या इज़्ज़त रह जाएगी? वंदना, जा बेटा, बढ़िया अदरक वाली चाय और नाश्ता बना।”
वंदना यंत्रवत (मशीन की तरह) रसोई में चली गई। रघुनाथ जी की पारखी नज़रें सब देख रही थीं। विमल सोफे पर पसर गया और अपने फोन में लग गया, जबकि वंदना रसोई में खटपट कर रही थी। सास, मालती देवी, सामने बैठकर अपनी रईसी और विमल के नए बिज़नेस की डींगे हांकने लगीं।
रात के खाने पर रघुनाथ जी ने देखा कि वंदना सबकी थाली परोस रही है, लेकिन विमल या मालती देवी ने एक बार भी उसे बैठने के लिए नहीं कहा। जब सब खा चुके, तब वंदना अपनी थाली लेकर रसोई के एक कोने में खड़ी होकर खाने लगी। रघुनाथ जी का निवाला गले से नीचे नहीं उतरा।
रात को जब सब सोने चले गए, रघुनाथ जी को नींद नहीं आई। उन्हें प्यास लगी तो वो पानी लेने बाहर आए। रसोई की लाइट अभी भी जल रही थी। वंदना सिंक में बर्तनों का ढेर साफ़ कर रही थी। रात के बारह बज रहे थे।
रघुनाथ जी दबे पाँव पीछे खड़े हो गए। वंदना बर्तन धोते-धोते अचानक सिंक का सहारा लेकर खड़ी हो गई और जोर-जोर से हांफने लगी। उसने अपनी कुर्ती की आस्तीन ऊपर की। रघुनाथ जी ने जो देखा, उससे उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वंदना की कलाई पर नीले और काले निशान थे—जैसे किसी ने बहुत जोर से मरोड़ा हो।
“वंदना!” रघुनाथ जी की चीख निकल गई।
वंदना चौंक गई और तुरंत आस्तीन नीचे कर ली। “पापा… आप सोए नहीं?”
रघुनाथ जी ने उसका हाथ पकड़ लिया और ज़बरदस्ती आस्तीन ऊपर की। “ये क्या है? सच-सच बता, वरना मैं अभी पुलिस को बुलाऊँगा।”
वंदना फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने पापा को कसकर पकड़ लिया और सिसकते हुए बोली, “पापा, मुझे यहाँ से ले चलो। मैं मर जाऊँगी यहाँ।”
आवाज़ सुनकर सुधा जी भी दौड़कर बाहर आ गईं। वंदना ने जो बताया, उसे सुनकर दोनों माता-पिता पत्थर हो गए।
वंदना ने बताया, “पापा, यह घर, यह गाड़ी, यह शान-ओ-शौकत… सब दिखावा है। विमल का बिज़नेस ठप हो चुका है। उसे जुए और सट्टे की लत है। मेरी पूरी सैलरी ये लोग महीने की पहली तारीख को ही ले लेते हैं। मेरा एटीएम कार्ड, क्रेडिट कार्ड सब सास के पास रहता है। घर की बाई को इन्होंने छह महीने पहले निकाल दिया था पैसे बचाने के लिए। मैं सुबह सात बजे उठकर पूरा काम करती हूँ, फिर ऑफिस जाती हूँ, और शाम को आकर फिर खाना बनाती हूँ। अगर मैं पैसे देने से मना करूँ या थकान की शिकायत करूँ, तो विमल… विमल मेरा हाथ मरोड़ते हैं, मुझे बालों से घसीटते हैं। कहते हैं ‘तेरी कमाई पर ही तो यह घर चल रहा है, तू एहसान नहीं कर रही’।”
सुधा जी ने अपना माथा पीट लिया। “हाय रे मेरी किस्मत! हमने सोचा था बेटी राज कर रही है, यहाँ तो मेरी बच्ची बंधुआ मजदूर बनी हुई है।”
रघुनाथ जी का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। “चलो अपना सामान पैक करो। अभी, इसी वक्त।”
तभी विमल और मालती देवी भी जाग गए।
“अरे, इतनी रात को क्या ड्रामा चल रहा है?” मालती देवी ने जमाई लेते हुए पूछा।
रघुनाथ जी ने वंदना का हाथ पकड़ा और विमल के सामने खड़े हो गए। “ड्रामा तो तुम माँ-बेटे ने रचा रखा है। शर्म नहीं आती? एक पढ़ी-लिखी, लाखों कमाने वाली लड़की को तुम लोगों ने अपनी तिजोरी भरने की मशीन और घर की नौकरानी बना रखा है?”
विमल अकड़ते हुए बोला, “पापा जी, आवाज़ नीचे। यह हमारे घर का मामला है। पति-पत्नी में तो यह सब चलता रहता है। और वंदना कौन सा मुफ्त में काम कर रही है? यह उसका घर है, पैसा और काम तो देना ही पड़ेगा।”
रघुनाथ जी ने एक थप्पड़ रसीद करने के लिए हाथ उठाया, पर रुक गए। वह मुस्कुराए—एक बहुत ही डरावनी और ठंडी मुस्कान।
“सही कहा विमल। पैसा तो देना पड़ेगा। वंदना, अपना फोन ला।”
रघुनाथ जी ने वंदना के फोन से तुरंत बैंक की ऐप खोली। उन्होंने देखा कि जॉइंट अकाउंट में वंदना की एफ.डी. तोड़कर डाली गई रकम पड़ी थी। उन्होंने तुरंत वह सारी रकम वंदना के पर्सनल अकाउंट में ट्रांसफर की और पासवर्ड बदल दिया। फिर वंदना के सैलरी अकाउंट से विमल के अकाउंट में जाने वाली ऑटो-डेबिट की सुविधा बंद कर दी।
“यह क्या कर रहे हैं आप?” विमल चिल्लाया। “यह चोरी है!”
“चोरी इसे नहीं कहते दामाद जी,” रघुनाथ जी ने शांत स्वर में कहा। “चोरी उसे कहते हैं जो तुम पिछले दो साल से मेरी बेटी की मेहनत और स्वाभिमान की कर रहे हो। और सुनो, मैंने अभी-अभी बैंक को मेल भी डाल दिया है कि वंदना के कार्ड्स चोरी हो गए हैं, इसलिए वो ब्लॉक हो जाएंगे। अब देखते हैं तुम्हारी यह नवाबी और जुए की लत कैसे चलती है।”
मालती देवी ने पैंतरा बदला। “अरे समधी जी, आप तो बात का बतंगड़ बना रहे हैं। वंदना हमारी बेटी जैसी है। थोड़ा बहुत काम कर लिया तो क्या हो गया? ले जाइए, कल को जब समाज थूकेगा कि बेटी घर छोड़कर आ गई, तब पता चलेगा।”
सुधा जी, जो अब तक रो रही थीं, शेरनी की तरह आगे आईं। “समाज? कौन सा समाज? वो समाज जो एक लड़की की लाश पर तो अफ़सोस जताता है, पर ज़िंदा लड़की अगर जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाए तो उसे ही गलत कहता है? हमें ऐसे समाज की परवाह नहीं है। मुझे मेरी बेटी ज़िंदा चाहिए, सुहागन का तमगा लेकर मरी हुई नहीं।”
रघुनाथ जी ने वंदना का सूटकेस उठाया। विमल ने रास्ता रोकने की कोशिश की। “वंदना इस घर से बाहर नहीं जाएगी। यह मेरी पत्नी है।”
रघुनाथ जी ने अपनी जेब से फोन निकाला और स्क्रीन विमल को दिखाई। स्क्रीन पर 100 नंबर डायल था, बस कॉल बटन दबाना बाकी था।
“विमल, मुझे घरेलू हिंसा और दहेज़ प्रताड़ना का मतलब समझाने की ज़रूरत नहीं है, है न? मेरी बेटी के शरीर पर जो निशान हैं, उनका मेडिकल टेस्ट होते ही तुम और तुम्हारी माँ अगले दस साल तक जेल की रोटियाँ तोड़ोगे। वंदना की सैलरी से जो ईएमआई इस फ्लैट की जा रही है, उसका सबूत भी है। एक मिनट में यह फ्लैट सील हो जाएगा। अब तुम तय करो—रास्ता छोड़ना है या पुलिस को बुलाऊँ?”
विमल और मालती देवी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। जिस ‘सोने के अंडे देने वाली मुर्गी’ को वे अब तक दबाकर रखे हुए थे, आज उसके पिंजरे की चाबी उसके पिता ने छीन ली थी। वे सहम कर पीछे हट गए।
वंदना ने जाते-जाते मुड़कर देखा। उस घर को, जहाँ उसने अपने सपने, अपनी खुशियाँ और अपना स्वाभिमान गिरवी रख दिया था। उसने अपनी कलाई से वो सोने के कंगन उतारे जो विमल ने शादी पर दिए थे (और जिनके पैसे भी असल में वंदना के पिता ने ही दिए थे) और मेज पर पटक दिए।
“विमल,” वंदना की आवाज़ में अब कंपन नहीं, एक ठंडी दृढ़ता थी। “मैं पैसे कमा सकती हूँ, घर चला सकती हूँ, तो अपनी ज़िंदगी भी चला सकती हूँ। मुझे पति चाहिए था, मालिक नहीं। और तुम्हें पत्नी नहीं, जागीर चाहिए थी। हमारा हिसाब आज यहीं बराबर होता है। मेरे डिवोर्स के पेपर्स मेरे वकील के ज़रिए पहुँच जाएंगे।”
रघुनाथ जी और सुधा जी अपनी बेटी को लेकर उस नर्क से बाहर निकल आए। रात की ठंडी हवा में वंदना ने एक गहरी सांस ली। यह सांस आज़ादी की थी।
कार में बैठते ही वंदना फिर रो पड़ी। “पापा, मैंने आप लोगों का सिर झुका दिया। मेरा घर टूट गया।”
रघुनाथ जी ने गाड़ी रोक दी। उन्होंने पीछे मुड़कर वंदना का माथा चूमा।
“बेटा, घर टूटा नहीं है, आज तू बच गई है। ईंट-पत्थर की दीवारों को घर नहीं कहते, जहाँ सम्मान हो वो घर होता है। और सिर झुकने की बात? मेरा सिर तो आज गर्व से ऊँचा हो गया कि मेरी बेटी ने अंत में ही सही, पर गलत के खिलाफ खड़ा होना स्वीकार किया। याद रखना, एक ‘तलाकशुदा’ बेटी, एक ‘लाश’ बेटी से लाख गुना बेहतर है।”
सुधा जी ने वंदना को गले लगा लिया। “अब रोना नहीं। अब नई शुरुआत होगी। तू पढ़ेगी, आगे बढ़ेगी। तू किसी पर बोझ नहीं है, तू तो खुद अपनी पहचान है।”
वंदना ने अपने आंसुओं को पोंछा। उसे महसूस हुआ कि भले ही उसके हाथ खाली हैं, लेकिन उसका वजूद अब सुरक्षित है। उसे अब किसी के तलवे चाटने की ज़रूरत नहीं थी। उसके माता-पिता ने उसे सिर्फ जन्म नहीं दिया था, आज उसे पुनर्जन्म दिया था।
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**निष्कर्ष:**
दोस्तों, हमारी बेटियाँ बहुत सहनशील होती हैं। वे परिवार बचाने के लिए, माता-पिता को दुःख न हो इसलिए, और “लोग क्या कहेंगे” के डर से चुपचाप बहुत कुछ सहती रहती हैं। लेकिन माता-पिता का फ़र्ज़ सिर्फ़ कन्यादान करना नहीं है। कन्यादान के बाद भी अपनी बेटी के ‘जीवनदान’ की रक्षा करना उनका ही धर्म है। अगर आपको लगे कि आपकी बेटी की आवाज़ बदल रही है, उसकी हंसी गायब हो रही है, तो इंतज़ार मत कीजिये। दरवाजा खटखटाइये, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।
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मूल लेखिका : आरती कुशवाहा