सुबह से चाय के इंतजार में बैठे “रामदयाल जी” आज खुद को बेहद लाचार सा महसूस कर रहे हैं। बरामदे की वही कुर्सी, वही मेज, वही चाय का प्याला—जो कभी बिना बोले उनके सामने आ जाया करता था—आज जैसे उनसे रूठ गया हो।
घड़ी की टिक-टिक तेज़ लग रही थी और समय का हर पल उन्हें उनकी बेबसी का एहसास दिला रहा था। एक समय था जब रामदयाल जी के दिन की शुरुआत नौकरों की फौज से होती थी—कोई अख़बार ठीक करता, कोई जूते चमकाता, कोई पानी, तो कोई उनके दफ्तर के कपड़ों की प्रेस और परफ्यूम तक की तैयारी करता।
सरकारी अफसर रहे रामदयाल जी की सुबह नौकरों की तत्परता से लेकर पत्नी “राधिका” के निर्देशों में बने तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवानों से होती थी। राधिका सुबह मंदिर की घंटी के साथ घर को भी जगा देती—
कभी गरम-गरम पराठे, कभी उपमा, कभी दलिया, कभी कटलेट, तो कभी उनकी पसंद की विशेष मिठाई तक। और रामदयाल जी… वे अपनी कुर्सी पर बैठकर बस आदेश देते, या कभी-कभी बिना बोले भी यह मान लेते कि सब उनके लिए ही है, उनके रुतबे के लिए, उनके नाम के लिए।
अपने गुरुर में रहने और किसी को कोई अहमियत नहीं देने वाले रामदयाल जी रिटायरमेंट के बाद भी शानदार तरीके से रहते थे। उनका विश्वास था कि पैसा हो, पद रहा हो, तो इज्जत अपने आप मिलती है। परिवार में एक बेटा “अंशुल”, पुत्रवधू “नेहा” और बीवी राधिका ही है। पर उन्होंने कभी यह नहीं समझा कि परिवार सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं होता, परिवार दिलों का रिश्ता होता है—जो समय और सम्मान मांगता है।
वे परिवार को कभी पर्याप्त समय दे ही नहीं पाए। और यह समय की कमी के कारण नहीं था, बल्कि काम के बाद बचे हुए समय में भी वे सिर्फ अपने दोस्तों और क्लब में व्यस्त रहते। दफ्तर से लौटते ही तैयार होकर क्लब चले जाना, गपशप, ताश, मीटिंग, या फिर दोस्तों के साथ शहर की किसी शानदार जगह बैठना—यही उनकी दिनचर्या थी। घर के भीतर राधिका अकेले जिम्मेदारी उठाती रही—बेटे की पढ़ाई, घर की देखभाल, रिश्तेदारों का मान-सम्मान, पूजा-पाठ, त्योहार—सब कुछ।
पत्नी राधिका कम पढ़ी-लिखी महिला थी, परंतु बहुत ही गुणवान और धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण घर की, बेटे की जिम्मेदारी बखूबी निभा रही थी। उसकी दुनिया छोटा सा घर था, मंदिर था, और अपने पति-बेटे का भविष्य था। वह अपने पति के रौब को भी पति का “सम्मान” मानकर निभाती रही। परंतु रामदयाल जी यही सोचते कि सब उनके अफसर होने और उनके कमाए पैसों के कारण ही है। पत्नी के गुण कभी दिखाई ही नहीं दिए।
वे अपने बेटे की तरफ से भी बिल्कुल बेफिक्र रहते। उनका रोब और गुस्सा इतना होता कि राधिका के अलावा कोई उनके सामने आने की हिम्मत भी नहीं कर पाता था। घर में जैसे एक ‘अदृश्य आदेश’ चलता था—रामदयाल जी नाराज़ न हों, रामदयाल जी के सामने कोई बहस न करे, उनके कहे के खिलाफ कोई शब्द न बोले।
बेटे की शादी के बाद भी उनके तेवर वैसे के वैसे ही रहे। हालांकि नेहा (पुत्रवधू) अपने पति और सास की तरह न तो अपने ससुर से डरती थी और न ही दबती थी, क्योंकि नेहा खुद भी एक कॉलेज में प्रोफेसर थी। उसकी शिक्षा ने उसे आत्मविश्वास दिया था, और उसकी नौकरी ने उसे स्वतंत्र सोच। वह राधिका की तरह चुप नहीं रहती थी, और यही बात रामदयाल जी को भीतर ही भीतर चुभती थी। उन्हें लगता कि यह बहू उनके “घर” की सत्ता को चुनौती देती है।
फिर भी सब कुछ ठीक ही चल रहा था—कम से कम ऊपर से। लेकिन दिक्कत आई रामदयाल जी के रिटायरमेंट के बाद। अब पूरा दिन घर पर होने लगा। दिन भर घर में बैठकर वे जब देखो तब सबके कामों में बेवजह कमी निकालते ही रहते। गुस्सा तो नाक पर रखा रहता, जिससे घर के सदस्यों से लेकर नौकरों तक का चैन-सुकून खो सा गया था।
कभी चाय में चीनी कम, कभी ज्यादा। कभी अखबार देर से, कभी ठीक से फोल्ड नहीं। कभी खाना गरम नहीं, कभी नमक ज्यादा। कभी नेहा की हँसी “ज्यादा तेज़”, कभी अंशुल का फोन “ज्यादा”, कभी राधिका का मंदिर जाना “ज्यादा।” छोटी-छोटी बातों को वह मुद्दा बना देते, और घर में हर वक्त तनाव का धुआँ भर जाता।
दोस्तों का जमघट भी हर समय घर में लगा रहता। रिटायरमेंट के बाद उनका “क्लब” जैसे उनके ड्राइंग रूम में आ बैठा। उनके सामने भी वे किसी को भी अपमानित कर देते थे। कभी बहू को ताना—“आजकल की लड़कियों को घर संभालना आता नहीं, बस नौकरी का घमंड।” कभी बेटे पर टिप्पणी—“मेरे रहते भी तुम्हें मेरी बात समझ नहीं आती?” और अगर राधिका कुछ कह देती, तो तिरस्कार से—“तुम चुप रहो, तुम्हें क्या पता?”
खैर, राधिका सब संभाल लेती। वह हर बार बहू-बेटे को इशारे से शांत कर देती, मेहमानों के सामने मुस्कुरा देती, पति के तानों को भी अपने भीतर दबा लेती। लेकिन आखिर कब तक? बूढ़ा होता शरीर, पति के तानों और अपमान को ज्यादा दिन नहीं सह पाई और एक दिन इस दुनिया से विदा ले ली।
राधिका के जाने का दिन घर में एक अजीब सन्नाटा छोड़ गया। वह सन्नाटा, जिसमें चूल्हे की आवाज भी उदास लगती थी। अंशुल की आंखों में अपराधबोध था, नेहा के चेहरे पर दुख के साथ एक थकान थी, और रामदयाल जी… वे बाहर से कठोर बने रहे। उन्होंने राधिका की तस्वीर पर फूल चढ़ाए, लोगों से औपचारिक बातें कीं, पर भीतर कहीं यह स्वीकार नहीं किया कि उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा चला गया है।
और राधिका के जाने के बाद भी रामदयाल जी के व्यवहार में कोई खास परिवर्तन नहीं आया। वे वही—आदेश, ताने, नाराज़गी। जैसे उन्हें लगा ही नहीं कि घर की “ढाल” टूट चुकी है।
नौकर भी कब तक सुनते? वे भी अब उनके कामों को अनदेखा करने लगे। जो नौकर पहले दौड़कर आते थे, अब बहाने बनाने लगे। कोई कहता “कमर में दर्द है,” कोई “मेरा समय हो गया,” कोई “आज नहीं आ पाऊँगा।”
बेटा-बहू तो बहुत पहले से ही उनसे कोई मतलब नहीं रखते थे, और अब तो बिल्कुल ध्यान ही नहीं देते। ना दवाई का, ना खाने-पीने का। ये दूरियां भी रामदयाल जी की खुद की ही बनाई हुई थीं, तो किसी से कहते भी क्या…!
आज वही हुआ—सुबह से चाय का इंतजार।
रामदयाल जी ने एक बार गला खंखारकर आवाज दी—“अरे… चाय?”
कोई जवाब नहीं।
उन्होंने फिर कहा—“नेहा…?”
अंदर से हल्की-सी आवाज आई—“अंशुल ऑफिस निकल गया है, मुझे कॉलेज जाना है। किचन में रखी है… खुद बना लीजिए।”
यह वाक्य उनके कानों में जैसे हथौड़ा बनकर गिरा। “खुद बना लीजिए”—यह उन्होंने पहले कभी नहीं सुना था। यह उनके रुतबे पर चोट थी। लेकिन अब रुतबे से अधिक उन्हें खालीपन चुभ रहा था।
कल रात से राधिका की बहुत याद आ रही थी उन्हें। आज महसूस हो रहा था कि उनकी पत्नी कैसे एक ढाल की तरह रही हमेशा। उनके इतने अपमानित करने, नीचा दिखाने के बाद भी हमेशा अपने पति की इज्जत की, सम्मान दिया। और शायद इतने सालों तक रामदयाल जी को जो इज्जत मिली, वो उनकी पत्नी के कारण ही संभव हो पाया था।
जब तक जीवित रही, अपना “आत्मसम्मान” खोकर पति का सम्मान बनाए रखा।
वह कभी नहीं चाहती थी कि लोग कहें “रामदयाल जी के घर में कलह है।”
वह खुद रो लेती, पर पति की छवि बचा लेती।
वह अपमान सह लेती, पर घर की इज्जत संभाल लेती।
आज अपने रूखे और झूठे रुतबे की वजह से ही इस उम्र में अकेले पड़ गए हैं। परवाह करने वाला कोई नहीं है अब। यार-दोस्त भी अब नहीं आते, क्योंकि पहले की तरह उनका सत्कार करने वाला इस घर में कोई नहीं था। राधिका ही थी जो उनके दोस्तों के लिए भी चाय, समोसे, खाना, मिठाई—सब संभालती थी। वह मुस्कुराकर सबको बैठाती, और रामदयाल जी का रुतबा “निभाती” थी।
रूपये पैसे की कोई कमी नहीं है, पर कभी किसी को सम्मान नहीं देने वाला आज सम्मान की अहमियत समझ रहा है।
पैसे से सिर्फ रुतबा मिलता है, सम्मान नहीं।
आज उनकी नजर राधिका की तस्वीर पर गई। उस तस्वीर में राधिका वही शांत चेहरे के साथ थी, जैसे कह रही हो—“मैंने अपना हिस्सा निभाया।”
रामदयाल जी के भीतर कुछ पिघला। उन्होंने पहली बार स्वीकार किया कि उनका घर सिर्फ उनकी कमाई से नहीं चलता था—उस घर की धड़कन राधिका थी।
एक स्त्री अपने “आत्मसम्मान” के लिए कुछ भी कर सकती है। परंतु पति के “आत्मसम्मान” को बनाने में भी पत्नी का समान योगदान होता है।
राधिका ने यह योगदान दिया था—बिना शिकायत, बिना शोर, बिना शर्त।
और अब… जब वह चली गई… तो रामदयाल जी समझ रहे थे कि सम्मान मांगकर नहीं मिलता। सम्मान “दिया” जाता है—और जो देता है, वही सच्चा बड़ा होता है।
आज रामदयाल जी ने धीरे-धीरे खुद चाय बनाने की कोशिश की। चूल्हा जलाया, दूध रखा, उबाल आया तो गैस कम की। कप उठाते हुए हाथ कांप रहे थे। उनका मन बार-बार कह रहा था—“राधिका होती तो…”
कप में चाय डालते ही उन्हें लगा जैसे चाय नहीं, पछतावा उबल रहा है।
उन्होंने चाय की पहली चुस्की ली… और आंखों के कोने भीग गए।
यह बूढ़े अफसर का आंसू था—जो रुतबे की हार पर नहीं, इंसानियत की हार पर गिरा था।
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- क्या रामदयाल जी को उनके व्यवहार का फल मिला, या यह सज़ा बहुत कठोर है?
- क्या हम अक्सर घर के “नरम” लोगों की कीमत तभी समझते हैं, जब वे चले जाते हैं?
- आपके अनुसार, परिवार में सम्मान “पद” से आता है या “व्यवहार” से?
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स्वरचित काल्पनिक — कविता भड़ाना