बेंत की आराम कुर्सी पर बैठी 65 वर्षीय सुलोचना देवी की नजरें सामने दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर पर जमी थीं। तस्वीर धुंधली पड़ चुकी थी,
ठीक वैसे ही जैसे उनकी यादों में अब वो पुराना, भरा-पूरा घर धुंधला हो गया था। बाहर तेज बारिश हो रही थी। खिड़की के कांच से टकराती बूंदें सुलोचना के मन में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थीं। यह ठंड मौसम की नहीं थी, यह ठंड उस अकेलेपन की थी जो पिछले पांच सालों से उनकी हड्डियों में बस गई थी।
आज उनका जन्मदिन था। लेकिन घर में सन्नाटा पसरा था।
सुलोचना ने कांपते हाथों से साइड टेबल पर रखे पानी के गिलास को उठाया। उनकी नजर अपनी बहू, ‘तनीषा’ और बेटे ‘अमित’ के कमरे के बंद दरवाजे की तरफ गई। अंदर से हंसी-ठिठोली की आवाजें आ रही थीं। शायद वे ऑनलाइन कोई फिल्म देख रहे थे।
सुलोचना का मन बरबस ही 30 साल पीछे चला गया।
वह दिन उन्हें आज भी कल की तरह याद था। जब वह नई-नई ब्याह कर इस ‘गुप्ता सदन’ में आई थीं। उनकी सास, मंगला देवी, एक सख्त मिजाज की औरत मानी जाती थीं, लेकिन सुलोचना के आते ही जैसे मोम हो गई थीं। मंगला देवी ने घर की चाबियों का गुच्छा पहले ही दिन सुलोचना के पल्लू में बांध दिया था।
“बहू,” मंगला देवी ने कहा था, “यह घर अब तेरा है। मैं तो अब वानप्रस्थ की ओर हूँ। बस दो वक्त की रोटी और थोड़ा सा प्यार दे देना, मुझे और कुछ नहीं चाहिए।”
सुलोचना ने भी बड़े चाव से सिर हिलाया था। “माँजी, आप चिंता मत कीजिये। आप मेरी माँ जैसी हैं।”
शुरुआती साल बहुत अच्छे बीते। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, सुलोचना को घर की सत्ता का नशा चढ़ने लगा। पति की अच्छी नौकरी थी, पैसा आने लगा, और सुलोचना का रहन-सहन बदलने लगा। उसे अब अपनी सास, मंगला देवी का पुराना तौर-तरीका खटकने लगा था। मंगला देवी का सुबह-सुबह पूजा की घंटी बजाना, आंगन में तुलसी को जल देना, और पुराने रिश्तेदारों को घर बुलाना—यह सब सुलोचना को अपने ‘मॉडर्न लाइफस्टाइल’ में बाधा लगने लगा।
फिर आया वह मनहूस साल जब सुलोचना के पति का एक्सीडेंट में देहांत हो गया। घर में कोहराम मच गया। मंगला देवी जवान बेटे की मौत से टूट गई थीं। लेकिन सुलोचना? सुलोचना ने दुख मनाया, पर साथ ही उसने एक और योजना बना ली थी। पति की इंश्योरेंस का पैसा और प्रॉपर्टी अब उसके हाथ में थी।
एक शाम, सुलोचना ने अपनी बीमार सास के कमरे में प्रवेश किया। मंगला देवी बिस्तर पर लेटी थीं, घुटनों के दर्द से कराह रही थीं।
“माँजी,” सुलोचना ने रूखे स्वर में कहा। “अब अमित बड़ा हो रहा है। उसे अपना अलग कमरा चाहिए। और मेरे किटी पार्टी की सहेलियाँ आती हैं, तो ड्राइंग रूम छोटा पड़ता है।”
मंगला देवी ने कांपती आवाज में पूछा, “तो क्या करना है बहू?”
“मैंने सोचा है कि आँगन के पीछे जो स्टोर रूम है, उसे साफ़ करवा देती हूँ। आप वहां शिफ्ट हो जाइये,” सुलोचना ने फरमान सुना दिया। “वहां खिड़की भी है, आपको हवा लगती रहेगी। और वैसे भी आप दिन भर बिस्तर पर ही रहती हैं, आपको बड़े कमरे की क्या जरूरत?”
मंगला देवी की आँखों में आंसू आ गए। वह कमरा, जिसे उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर बनाया था, वह कमरा जहाँ उनकी पूरी जवानी गुजरी, आज उससे उन्हें बेदखल किया जा रहा था।
“बहू, वो स्टोर रूम तो बहुत सीलन भरा है। मेरे घुटनों का दर्द बढ़ जाएगा,” मंगला देवी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। “अमित मेरा पोता है, मैं उसके साथ ही सो जाया करुँगी।”
“नहीं माँजी!” सुलोचना चिल्लाई। “बच्चों की पढ़ाई डिस्टर्ब होती है। और आपकी खांसने की आवाज से अमित की नींद खराब होती है। आपको स्टोर रूम में ही जाना पड़ेगा। वरना…”
“वरना क्या?” मंगला देवी ने पूछा।
“वरना मैं अमित को लेकर अपने मायके चली जाऊंगी। फिर रहियेगा इस बड़े भूतों वाले घर में अकेली,” सुलोचना ने धमकी दी।
मंगला देवी डर गईं। पोते से दूर होने का डर, अकेलेपन का डर। उन्होंने चुपचाप अपना सामान समेटा और उस सीलन भरे, अंधेरे स्टोर रूम में चली गईं।
सुलोचना ने चैन की सांस ली। उसने पूरे घर को रिनोवेट करवाया। मंगला देवी के पुराने संदूक, उनकी पूजा की चौकी, उनकी यादें—सब कबाड़ी वाले को बेच दिया गया।
छोटा अमित यह सब देख रहा था। वह अक्सर दादी के पास स्टोर रूम में जाता।
“दादी, आप यहाँ क्यों रहती हो? मम्मी ने आपको यहाँ क्यों भेजा?” 10 साल का अमित पूछता।
सुलोचना वहां आ धमकती और अमित का हाथ पकड़कर खींच ले जाती। “अमित, यहाँ मत आया कर। यहाँ बदबू आती है। दादी बूढ़ी हो गई हैं, उन्हें एकांत चाहिए। चल, अपने वीडियो गेम से खेल।”
अमित धीरे-धीरे बड़ा हुआ और उसे यही सिखाया गया कि ‘बुजुर्गों को अलग रखना ही सही है ताकि घर व्यवस्थित रहे’। उसने देखा कि कैसे उसकी माँ ने दादी को घर के एक कोने में एक ‘फालतू सामान’ की तरह रखा हुआ था।
तीन साल बाद, उस सीलन भरे कमरे में निमोनिया होने से मंगला देवी का देहांत हो गया। उनके जाने के बाद सुलोचना ने एक दिखावटी तेरहवीं की, और फिर अगले ही दिन उस स्टोर रूम को तुड़वाकर वहां अमित के लिए एक ‘जिम’ बनवा दिया। उसने सोचा कि ‘बला टली’।
लेकिन वह भूल गई थी कि समय का पहिया गोल घूमता है। वह भूल गई थी कि जो बीज उसने अमित के कच्चे मन में बोये थे, वे एक दिन वटवृक्ष बनकर उसी पर गिरेंगे।
आज… 30 साल बाद।
सुलोचना के कमरे का दरवाजा खुला। उसकी बहू तनीषा अंदर आई। तनीषा बेहद खूबसूरत और कॉर्पोरेट जगत में काम करने वाली महिला थी। अमित ने लव मैरिज की थी।
“मम्मीजी,” तनीषा ने एक फाइल मेज पर पटकते हुए कहा। “हैप्पी बर्थडे।”
“थैंक यू बेटा,” सुलोचना ने उम्मीद भरी नजरों से देखा। क्या वे केक लाए हैं? क्या वे उसे कहीं घुमाने ले जाएंगे?
तनीषा सोफे पर बैठ गई और मोबाइल में कुछ स्क्रॉल करने लगी। “मम्मीजी, अमित और मैंने एक फैसला लिया है।”
“कैसा फैसला?” सुलोचना का दिल जोर से धड़का।
तनीषा ने नजरें उठाए बिना कहा, “देखिए, हमारा फ्लैट 3 बीएचके (3 BHK) है। अब हमारी बेटी ‘रिया’ बड़ी हो रही है। उसे अपना पर्सनल स्पेस चाहिए। और अमित को वर्क फ्राम होम के लिए एक ऑफिस रूम चाहिए।”
सुलोचना को कुछ समझ नहीं आ रहा था। “तो?”
“तो यह,” तनीषा ने अब सुलोचना की आँखों में देखा। उसकी आँखों में वही रूखापन था जो कभी सुलोचना की आँखों में मंगला देवी के लिए हुआ करता था। “यह जो आपका कमरा है, यह बालकनी से जुड़ा है और सबसे बड़ा है। इसमें हम रिया का रूम और अमित का ऑफिस सेटअप करेंगे।”
“लेकिन बेटा… मैं कहाँ रहूँगी?” सुलोचना का गला सूख गया।
तनीषा ने बड़ी सहजता से कहा, “अरे, वो किचन के पास वाला जो छोटा गेस्ट रूम है न, जहाँ हम वाशिंग मशीन और एक्स्ट्रा सामान रखते हैं? हमने उसे साफ़ करवा दिया है। आप वहां शिफ्ट हो जाइये। आपके लिए तो वो काफी है। वैसे भी आपको कम ही चलना-फिरना होता है।”
सुलोचना को लगा जैसे किसी ने उनके सीने में खंजर घोंप दिया हो। वह कमरा असल में एक ‘स्टोर रूम’ जैसा ही था। वहां न खिड़की थी, न ठीक से हवा आती थी। वह वाशिंग मशीन की घरघराहट और किचन के धुएं से भरा रहता था।
“तनीषा…” सुलोचना की आवाज कांपी। “बेटा, मुझे अस्थमा है। वहां मेरा दम घुट जाएगा। मैं तो तुम्हारी माँ जैसी हूँ। अमित… अमित कहाँ है? उससे बात कराओ मेरी।”
तनीषा ने एक व्यंग्यात्मक हंसी हंसी। “अमित ने ही तो यह आईडिया दिया है मम्मीजी। उसने कहा कि ‘बचपन में माँ ने दादी को भी तो एकांत में रखा था ताकि घर डिस्टर्ब न हो’। वो तो बस आपके ही सिखाये रास्तों पर चल रहा है।”
सुलोचना सन्न रह गई। अमित! उसका अपना बेटा, जिसे उसने अपनी सास से छीनकर, लाड़-प्यार से पाला था, आज वही उसे बेघर कर रहा था?
तभी अमित कमरे में आया। उसके हाथ में एक केक था, लेकिन चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
“माँ, शिफ्टिंग आज ही करनी है,” अमित ने केक मेज पर रखते हुए कहा। “कल इंटीरियर डिज़ाइनर आएगा इस कमरे का माप लेने। प्लीज़ ड्रामा मत करना।”
सुलोचना ने बेटे को देखा। “अमित, तुझे याद है तेरी दादी? मैंने उनके साथ…”
“हाँ माँ, मुझे सब याद है,” अमित ने सुलोचना की बात काट दी। “मुझे याद है कि कैसे दादी उस स्टोर रूम में खांसती रहती थीं और तुम मुझे उनके पास जाने से रोकती थीं। तुमने कहा था न कि ‘बूढ़े लोगों को अलग रहना चाहिए, उन्हें स्पेस चाहिए’। तो बस, अब तुम्हें स्पेस दे रहे हैं। इसमें गलत क्या है?”
अमित की आवाज में एक ठंडापन था, एक ऐसा ठंडापन जो सुलोचना की रीढ़ की हड्डी तक उतर गया। उसे महसूस हुआ कि यह अमित नहीं बोल रहा, यह उसका अपना ‘कर्म’ बोल रहा है। 30 साल पहले उसने जो शब्द अपनी सास से कहे थे, आज वही शब्द ब्याज समेत लौटकर आए थे।
तनीषा उठी और अलमारी से सुलोचना के कपड़े निकालकर बेड पर फेंकने लगी। “मम्मीजी, जल्दी कीजिये। मेड बाहर खड़ी है, वो सामान ले जाने में मदद कर देगी।”
सुलोचना बेजान सी बैठी रही। उसकी नजरें फिर से दीवार पर टंगी उस पुरानी तस्वीर पर गईं—जिसमें मंगला देवी (सास) और सुलोचना (बहू) साथ खड़ी थीं। उस तस्वीर में मंगला देवी मुस्कुरा रही थीं, जैसे कह रही हों—“देख लिया बहू? वक्त किसी का सगा नहीं होता।”
सुलोचना को अब उस सीलन भरे कमरे की याद आई जहाँ उसकी सास ने अपने आखिरी दिन बिताए थे। उसे याद आया कि कैसे उसने सास के गहने छीन लिए थे, कैसे उनकी साड़ियाँ मेड को बांट दी थीं।
आज तनीषा ने सुलोचना के कानों से सोने की बालियाँ उतरवा लीं।
“मम्मीजी, वहां छोटे कमरे में ये सब चोरी होने का डर है। लॉकर में रख देते हैं। वैसे भी अब आपको सजने-संवरने की क्या जरुरत?” तनीषा ने वही तर्क दिया जो कभी सुलोचना ने दिया था।
सुलोचना ने विरोध नहीं किया। उसके अंदर लड़ने की ताकत ही नहीं बची थी। उसे समझ आ गया था कि यह ‘अन्याय’ नहीं, यह ‘न्याय’ है। प्रकृति का न्याय।
धीरे-धीरे, लड़खड़ाते कदमों से सुलोचना उस छोटे, दमघोंटू कमरे की ओर बढ़ी। जैसे ही उसने उस कमरे में कदम रखा, उसे वाशिंग पाउडर की तीखी गंध और अंधेरे ने घेर लिया। वहां एक पुरानी चारपाई पड़ी थी और कोने में कबाड़ का ढेर।
सुलोचना चारपाई पर बैठ गई। बाहर अमित और तनीषा के हंसने की आवाजें आ रही थीं—वे शायद सुलोचना के पुराने कमरे (जो अब उनका होने वाला था) की सजावट की योजना बना रहे थे।
सुलोचना ने अपनी झुर्रियों वाले गालों पर लुढ़कते आंसुओं को पोंछा नहीं। वह रो रही थी, अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी उस मूर्खता के लिए जिसने उसे यह दिन दिखाया। उसने सोचा था कि सास को किनारे लगाकर वह राज करेगी, लेकिन वह भूल गई थी कि उसकी गोद में पल रहा बेटा सब देख रहा है। बच्चे भाषण से नहीं, आचरण से सीखते हैं।
उस रात बारिश और तेज हो गई। सुलोचना उस छोटे कमरे में सिकुड़ कर लेटी थी। उसे ठंड लग रही थी, लेकिन उसे ओढ़ने के लिए कम्बल मांगने की हिम्मत नहीं हुई। उसे डर था कि कहीं तनीषा आकर यह न कह दे—“अगर यहाँ नहीं रहना तो वृद्धाश्रम छोड़ आऊं?”
तभी उसे महसूस हुआ कि कमरे के कोने में, अंधेरे में, कोई बैठा मुस्कुरा रहा है। वह कोई और नहीं, उसका अपना अतीत था, जो उसे बता रहा था कि रिश्तों की नींव अगर छल और स्वार्थ पर रखी जाए, तो उसकी छत बुढ़ापे में जरूर गिरती है।
सुलोचना ने हाथ जोड़कर ऊपर देखा और बुदबुदाई, “माफ़ करना माँजी… माफ़ करना।”
लेकिन माफ़ी मांगने का समय तो 30 साल पहले था। अब तो बस ‘भुगतने’ का समय था।
बाहर अमित अपनी बेटी रिया को समझा रहा था, “बेटा, दादी को डिस्टर्ब मत करना। वो बूढ़ी हैं, उन्हें अलग रहना पसंद है।”
रिया ने मासूमियत से सिर हिलाया।
सुलोचना ने यह सुना और अपनी आँखे बंद कर लीं। एक और पीढ़ी तैयार हो रही थी, एक और चक्र शुरू हो चुका था। और इस चक्रव्यूह को तोड़ने वाला कोई नहीं था, क्योंकि इसकी रचनाकार वह खुद थी।
लेखिका : कविया गोयल