आँगन की धड़कन – सावित्री मल्होत्रा

देवेन्द्र बाबू के घर में उस दिन दीवाली जैसा माहौल था, हालांकि त्योहारों का मौसम अभी मीलों दूर था। उनके दो बेटों, समर और संकल्प के जन्म के पूरे पांच साल बाद घर में एक नन्ही किलकारी गूंजी थी। अस्पताल के उस छोटे से कमरे में जब नर्स ने गुलाबी तौलिये में लिपटी एक नन्ही सी जान को देवेन्द्र बाबू की बाहों में सौंपा,

तो उनकी आँखें छलक आईं। उन्होंने अपनी पत्नी कल्याणी के माथे को प्यार से चूमा और रुंधे हुए गले से बोले, “कल्याणी, मेरे जीवन में सब कुछ था, बस एक सुकून की कमी थी, जो आज तुमने मुझे इस देवी के रूप में दे दिया है।

आज मेरा परिवार पूरा हो गया।” पास ही खड़ी देवेन्द्र बाबू की माँ, रुक्मिणी देवी, ने भी अपने आंचल से आँखें पोंछते हुए कहा था, “मेरे घर का तो भाग्य ही खुल गया। बेटों से तो वंश चलता है, लेकिन बेटियों से तो घर की दीवारें मुस्कुराती हैं। इस बच्ची के आने से मेरे सूने आँगन में जैसे बसंत आ गया है।”

उस बच्ची का नाम रखा गया ‘श्रेया’। श्रेया सिर्फ अपने माता-पिता की ही आँखों का तारा नहीं थी, बल्कि अपने दोनों बड़े भाइयों, समर और संकल्प की भी जान थी। जब श्रेया ने घुटनों के बल चलना शुरू किया, तो दोनों भाई उसके आगे-पीछे ऐसे घूमते थे जैसे कोई पहरेदार हों। अगर श्रेया ज़रा सा भी रो देती,

तो पूरा घर सिर पर उठा लिया जाता। समर, जो कि सबसे बड़ा था, अपने स्कूल से लौटते ही सबसे पहले अपना बैग फेंकता और श्रेया को गोद में उठा लेता। संकल्प अपने हिस्से की टॉफियां और खिलौने हमेशा श्रेया के लिए बचा कर रखता था।

देवेन्द्र बाबू के लिए तो श्रेया जैसे उनके दिन भर की थकान मिटाने की जादू की छड़ी थी। दफ्तर से लौटते ही जब श्रेया अपनी तोतली जुबान में “पापा” कहती हुई उनकी टांगों से लिपट जाती, तो देवेन्द्र बाबू को लगता कि दुनिया की सारी दौलत उनके कदमों में आ गिरी है।

समय के साथ श्रेया बड़ी होने लगी। वह घर की सबसे छोटी सदस्या थी, लेकिन उसकी समझदारी बड़ों-बड़ों को मात देती थी। घर में कभी कल्याणी और देवेन्द्र बाबू के बीच कोई छोटी-मोटी नोकझोंक हो जाती, तो श्रेया अपनी मीठी बातों से दोनों

को हंसा देती। भाइयों के बीच अगर कभी किसी बात पर बहस होती, तो श्रेया ही वह पुल थी जो दोनों को मिलाती थी। देवेन्द्र बाबू अक्सर कल्याणी से कहते थे, “हमारी श्रेया इस घर की नींव है कल्याणी। भले ही समर और संकल्प मेरे दो हाथ हैं, लेकिन श्रेया मेरे सीने में धड़कता हुआ दिल है।”

श्रेया की पढ़ाई-लिखाई में भी कोई कसर नहीं छोड़ी गई। दोनों भाइयों ने जब अपनी नौकरियां शुरू कीं, तो उनकी पहली तनख्वाह से श्रेया के लिए ही सबसे महंगे उपहार आए। समर ने उसे एक खूबसूरत घड़ी दी और संकल्प ने उसके लिए एक लैपटॉप खरीदा ताकि उसकी कॉलेज की पढ़ाई में कोई दिक्कत न आए।

श्रेया भी अपने परिवार के हर सदस्य की पसंद-नापसंद का इतना खयाल रखती थी कि कल्याणी को कभी-कभी लगता कि जैसे वह माँ नहीं, बल्कि श्रेया उसकी माँ बन गई है। पिता के चश्मे का नंबर बदलने से लेकर भाइयों की शर्ट की मैचिंग तक, हर छोटी-बड़ी चीज़ श्रेया की नज़रों से होकर गुज़रती थी।

लेकिन बेटियों के साथ एक कड़वा सच हमेशा जुड़ा होता है—विदाई। एक दिन वह भी आया जब देवेन्द्र बाबू के एक पुराने मित्र ने अपने बेटे के लिए श्रेया का हाथ मांग लिया। लड़का बहुत ही होनहार था,

अमेरिका में एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था और परिवार भी बहुत संस्कारी था। देवेन्द्र बाबू और कल्याणी जानते थे कि श्रेया के लिए इससे अच्छा रिश्ता नहीं मिल सकता। दोनों भाइयों ने भी लड़के से मिलकर अपनी तसल्ली कर ली थी। रिश्ता पक्का हो गया।

शादी की तैयारियां शुरू हुईं। घर में रौनक तो बहुत थी, लेकिन हर किसी के दिल के एक कोने में एक अजीब सी उदासी भी पल रही थी। समर और संकल्प दिन-रात एक करके शादी के इंतज़ाम में लगे थे, लेकिन जब भी वे श्रेया को देखते, उनकी आँखें भर आतीं। देवेन्द्र बाबू तो जैसे अचानक से बूढ़े होने लगे थे।

वे रात-रात भर जागते रहते और जब कल्याणी पूछती, तो बहाना बना देते कि काम का तनाव है। लेकिन कल्याणी जानती थी कि उनके दिल में क्या चल रहा है। जिस आँगन में श्रेया ने पायल पहनकर छम-छम नाचना सीखा था, अब वह आँगन उसके बिना कैसे रहेगा, यह सोचकर ही कल्याणी का दिल बैठा जा रहा था।

शादी का दिन आ गया। घर को दुल्हन की तरह सजाया गया था। जब श्रेया लाल जोड़े में मंडप में आई, तो देवेन्द्र बाबू उसे देखते ही रह गए। उन्हें याद आ रहा था वह दिन जब उन्होंने श्रेया को पहली बार अस्पताल में अपनी बाहों में उठाया था। आज वह एक नए घर, एक नई दुनिया को संवारने जा रही थी। फेरे हुए, सिंदूर दान हुआ और फिर आ गई वह घड़ी जिससे हर पिता, हर भाई और हर माँ डरती है—विदाई।

श्रेया जब अपने भाइयों के गले लगी, तो समर और संकल्प, जो हमेशा खुद को सख्त दिखाते थे, बच्चों की तरह फफक कर रो पड़े। समर ने श्रेया के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “हमें भूल मत जाना छुटकी, और अगर किसी ने तुझे रुलाया, तो तेरे ये दोनों भाई सात समंदर पार भी आ जाएंगे।” संकल्प तो कुछ बोल ही नहीं पा रहा था, बस श्रेया का हाथ पकड़े हुए रो रहा था।

कल्याणी ने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया। दोनों के बीच कोई शब्द नहीं थे, बस आंसुओं की एक धारा थी जो उनके बरसों के प्यार और त्याग को बयान कर रही थी। सबसे अंत में श्रेया अपने पिता, देवेन्द्र बाबू के पास पहुंची। देवेन्द्र बाबू एक कोने में खड़े थे, उनकी आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। श्रेया उनके पैरों में गिर पड़ी। देवेन्द्र बाबू ने उसे उठाया और गले से लगा लिया।

“पापा, मुझे मत भेजो ना… मैं आपके बिना कैसे रहूंगी?” श्रेया सिसकते हुए बोली।

देवेन्द्र बाबू ने कांपते हाथों से उसके आंसू पोंछे और भारी आवाज़ में कहा, “मेरी बच्ची, तू इस घर की आत्मा है। तू जहां जाएगी, वहां रोशनी करेगी। यह घर हमेशा तेरा था और तेरा ही रहेगा। बस इतना याद रखना कि तेरे इस बूढ़े बाप की जान तुझमें ही बसती है।”

श्रेया की डोली उठ गई। गाड़ी धूल उड़ाती हुई आँखों से ओझल हो गई और देवेन्द्र बाबू का पूरा परिवार उस सूनी सड़क को तब तक देखता रहा, जब तक कि गाड़ी का आखिरी निशान भी मिट नहीं गया।

अगली सुबह जब घर में धूप खिली, तो वह धूप भी अजीब सी ठंडी लग रही थी। घर की हर दीवार, हर कमरा और वह आँगन एकदम शांत था। ऐसा लग रहा था जैसे घर का कोई बहुत ही अहम हिस्सा किसी ने काट कर अलग कर दिया हो। देवेन्द्र बाबू उठकर सीधे श्रेया के कमरे में गए। वहां उसका खाली बिस्तर, उसकी किताबें और उसकी परफ्यूम की हल्की सी महक अभी भी मौजूद थी। समर और संकल्प भी अपने कमरों में चुपचाप बैठे थे। ना किसी ने चाय मांगी, ना नाश्ते की कोई चर्चा हुई।

उस खामोशी में कल्याणी ने देवेन्द्र बाबू के पास आकर उनके कंधे पर हाथ रखा। देवेन्द्र बाबू फफक पड़े, “कल्याणी, यह घर अब घर नहीं रहा। मेरी श्रेया के बिना यह सिर्फ ईंट और पत्थर का एक ढांचा है।”

कल्याणी ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, “बेटियां कभी घर छोड़कर नहीं जातीं। वो हमेशा हमारे दिलों में, इस घर की यादों में ज़िंदा रहती हैं। उसने हमें जो खुशियां दी हैं, वो उम्र भर हमारे साथ रहेंगी।”

सच ही तो है, बेटियां भले ही विदा होकर किसी और के घर चली जाती हैं, लेकिन वो अपने मायके की दीवारों में अपनी हँसी, अपनी चहक और अपना प्यार इस कदर छोड़ जाती हैं कि उनके जाने के बाद भी उनकी मौजूदगी का अहसास कभी खत्म नहीं होता। एक बेटी परिवार को जो प्यार और अपनापन देती है, वह अनमोल है और शायद इसीलिए बेटियां हर घर का असली खज़ाना होती हैं।

क्या आपको भी लगता है कि बेटियों के बिना घर सूना हो जाता है? क्या आपने भी कभी अपने घर में किसी बेटी या बहन की विदाई का वो खालीपन महसूस किया है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : सावित्री मल्होत्रा

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