आगे क्या – रश्मि झा मिश्रा 

बस दो महीने ही बचे थे… मरियम के रिटायरमेंट को… सिस्टर मरियम… उम्र से अधिक बूढी दिखने वाली… आंखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा… बहुत साधारण सी कद काठी… यही पहचान थी उनकी… भरी जवानी में पति का साया उठ जाने के बाद यह नौकरी मिली थी मरियम को… नर्स की ट्रेनिंग भी उन्होंने नौकरी मिलने के बाद ही ली थी… 

 अपने काम के लिए इतनी निष्ठा थी उस नई उम्र की विधवा में… कि उसने सब दुनियादारी से मुंह मोड़ लिया था… ना दोबारा ब्याह किया… ना बच्चे… ना घर… ना परिवार… कुछ भी नहीं था उनके पास… बस अस्पताल के मरीज और अस्पताल के पीछे ही उन्होंने अपनी जिंदगी के पैंतीस साल निकाल दिए…

 सिस्टर मरियम इंसानियत की मिसाल थीं… कभी भी आधी रात हो या तपती दोपहर, या फिर आंधी तूफान, वह कभी अपने काम को ना नहीं बोलती थीं… मरीजों के लिए सिस्टर सचमुच मरियम यानी मां जैसी ही थी…

 हर समय सबके दुख की साथी रही मरियम आजकल बहुत उदास रहने लगी थी… अपने सभी काम तो उसी लगन से पूरे कर रही थी, लेकिन उनके चेहरे की उदासी किसी से छिपी नहीं थी… कोई कुछ पूछता तो मरियम टाल जाती… उनकी अपनी निजी जिंदगी कुछ थी ही नहीं… सभी जानते थे कि अनाथ मरियम का अपने पति की मौत के बाद यह अस्पताल ही सब कुछ था… 

डॉक्टर आनंद लगभग बीस सालों से मरियम के साथ काम कर रहे थे… वह मरियम का बहुत सम्मान करते थे… एक दिन आते जाते उन्होंने भी मरियम से पूछ ही लिया…” क्या बात है सिस्टर… आजकल आपका चेहरा इतना मुरझाया सा क्यों रहता है… सब ठीक तो है ना…!” 

मरियम की आंखें भर आईं… ना कहते कहते भी बोल पड़ी…” कुछ नहीं डाॅक्टर… इतने दिन कुछ नहीं सोचा… बस जो सामने आया करती चली गई… अब सोचती हूं… आगे क्या… दो महीने बाद क्या करूंगी… कहां जाऊंगी… कौन है मेरा अपना… अस्पताल के अलावा तो मेरी कोई दुनिया ही नहीं है…!”

 आनंद चुप हो गए… यह बात तो वह भी जानते थे… सिस्टम मरियम के इतनी इंसानियत और निष्ठा किसी और में नहीं है… क्योंकि उन्होंने अपना सब कुछ अस्पताल को ही मान लिया था… मरियम की बात का जवाब उनके पास नहीं था… वे चले गए…

 देखते देखते जहां पैंतीस साल गुजर गए… वहां मरियम के दो महीने तो यूं ही निकल गए… मरियम की आंखों का खारा पानी आज रह रहकर छलक रहा था… उसके आगे उद्देश्य हीन जीवन सफर था… जिसकी कल्पना ने उसकी आंखों को समुद्र बना दिया था…

 जिन हाथों ने कभी कुछ अपने लिए नहीं किया… अपने वेतन से गरीबों की दवा भोजन का प्रबंध करती… जरूरतमंदों के लिए जीने वाली, सिस्टर मरियम की आज विदाई थी… 

अस्पताल प्रशासन ने उनके लिए एक छोटे समारोह का आयोजन भी किया था… सब आए, मिले मरियम ने सबको खुले दिल से गले लगाया… 

सारी औपचारिकताएं पूरी कर, सिस्टर मरियम भारी कदमों से अस्पताल से बाहर निकाल रही थी… कि तभी डॉक्टर आनंद ने पीछे से आवाज लगाया… “सिस्टर मरियम…!”

 सिस्टर रुक गईं… डॉक्टर आनंद अकेले नहीं थे… दो और साथी डॉक्टर थे उनके साथ… “सिस्टर अगर आप चाहें तो… आप आजीवन यहां अपनी सेवाएं दे सकती हैं… आपको सैलरी तो उतनी नहीं मिलेगी… लेकिन आधी देने की कोशिश जरूर करेगा प्रशासन.… अगर आपको कोई परेशानी ना हो तो रुक जाइए…!”

 मरियम को जैसे अचानक किनारा मिल गया… उन्होंने आनंद के हाथों को अपने दोनों हाथों में लेकर कसकर दबा दिया… “डॉक्टर… आपने मुझे मेरी जिंदगी लौटा दी… मैं तो मर ही जाती… इसके आगे तो मेरे पास कुछ उपाय ही नहीं था…!”

 डॉक्टर आनंद ने हाथ छुड़ाकर मरियम को गले से लगा लिया… “आप जैसे इंसान की हमें और अस्पताल दोनों को जरुरत है… सिस्टर मरियम आप हमारी भी जिम्मेदारी हैं… आप जब तक जी चाहे आराम से यहीं रहिए… मैंने उसी दिन सोच लिया था कि आपको यहां से कहीं जाने नहीं दूंगा… जिसने कभी अपने लिए नहीं जिया… वह अपने लिए क्या मांगती… इसलिए मैंने आपकी तरफ से प्रबंधन से अनुमति ले ली… चलिए अपनी दूसरी पारी की शुरुआत करने… एक नए जोश से….!”

रश्मि झा मिश्रा 

इंसानियत..

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