सौम्या ने आंचल फैलाकर न जाने कितने मंदिरों में मन्नत मांगी होगी…
कभी नर्मदा मैया के सामने, कभी वैष्णो देवी के दरबार में, कभी पीपल के पेड़ के नीचे दिया जलाकर…
जिसने जो कहा, सबकी सुनी…। किसी ने कहा सोमवार का व्रत रखो, तो रखा…। किसी ने कहा कन्या को खाना खिलाओ, तो खिलाया….
भगवान जैसे कुछ सुनने को ही तैयार नहीं थे…
पर कहते हैं ना, सच्चे दिल से की गई आराधना कभी बेकार नहीं जाती…
11 साल बाद जब सौम्या की गोद में वो नन्ही सी जान आई, तो पूरा घर खुशी से रो पड़ा….बिल्कुल परी जैसी सुंदर, गुलाबी-गुलाबी गाल, बड़ी-बड़ी आंखें। नाम रखा –
*संयुक्ता*
संयुक्ता सबकी लाडली थी। दादा की जान, दादी की आंखों का तारा, मां की दुनिया…. जिस चीज पर हाथ रख दे, वही हाजिर…
दिन बीते, संयुक्ता बड़ी होने लगी। पढ़ाई में होशियार, बोलने में मीठी, सबकी प्यारी…।
एक दिन दोनों परिवारों के जानने वाले एक आदमी ने कहा – “मेरा बेटा है समीर, बहुत अच्छा लड़का है, संयुक्ता के लिए एकदम सही रहेगा…।”
दोनों परिवार तैयार भी थे। समीर सीधा-सादा, सरकारी नौकरी वाला, संयुक्ता को बचपन से पसंद भी करता था।
पर न जाने क्यों, संयुक्ता को समीर में वो बात नजर नहीं आई जो एक लड़की को अपने पति में चाहिए होती है। वो धड़कन, वो एहसास… वो नहीं आया।
उसने हिम्मत करके मना कर दिया।
सौम्या ने धीरे से पूछा – “बेटी, कोई लड़का पसंद है तो बता दे, हम तेरी खुशी में ही खुश हैं।”
संयुक्ता ने नजरें झुकाकर अपने साथ पढ़ रहे एक सहपाठी का नाम लिया – *वैभव*।
बेटी की पसंद को सबने सम्मान दिया। धूमधाम से शादी हो गई। सौम्या ने सोचा – चलो, मेरी बेटी ने अपनी खुशी खुद चुनी है, अब तो खुश रहेगी।
*शुरू-शुरू में सब ठीक था…*
पर कुछ समय बाद संयुक्ता को महसूस होने लगा – वैभव बहुत लापरवाह है। उसको न संयुक्ता की इज्जत की परवाह है, न समय की।
बात-बात पर ताना मारना, दोस्तों के साथ घूमना, रात को देर से आना, और संयुक्ता से ऐसे बात करना जैसे वो कोई नौकरानी हो।
बचपन से सबकी लाडली संयुक्ता, जिसने कभी ऊंची आवाज नहीं सुनी थी, अब रोज अंदर ही अंदर टूट रही थी।
उसको समझ में आने लगा – जल्दबाजी में उसने गलत फैसला ले लिया है। पर क्या करती? इस बीच वो दो बच्चों की मां भी बन चुकी थी। एक बेटी, एक बेटा।
*एक दिन संयुक्ता मायके गई…*
वहां उसकी मुलाकात समीर से हुई। समीर अब भी वैसा ही था – शांत, सुलझा हुआ, आंखों में वही पुराना प्यार।
उसने बार-बार पूछा – “संयुक्ता, आप खुश तो हैं ना?”
संयुक्ता ने मुस्कुराकर कहा – “बिल्कुल, मैं अपने परिवार में बहुत खुश हूं।”
हालांकि भीतर से वो पूरी तरह टूट चुकी थी। कभी-कभी उसे अपने फैसले पर अफसोस भी होता। पर समीर से उसे कभी लगाव हुआ ही नहीं, ये भी सच था।
समीर की भी शादी हो गई थी, वो भी अपने परिवार में खुश था।
एक बार संयुक्ता कहीं घूमने जा रही थी। सामने वाली बर्थ पर एक युवक बैठा था – *आकाश*।
न जाने क्यों, उससे बात करके संयुक्ता को बहुत अच्छा लगा। पहली बार उसे लगा – “अरे, ऐसे ही आदमी की तो तलाश थी मुझे…”
जो बात को समझे, जो इज्जत दे, जो आंखों में देखकर मन पढ़ ले।
बातचीत बढ़ती गई। एक ही जगह दोनों को जाना था। सफर खत्म हुआ, अपने-अपने ठिकाने निकल गए। जाते-जाते उसने खुद ही कहा – “मैं आकाश…”
फोन नंबर एक्सचेंज हुए। धीरे-धीरे फोन पर बातें होने लगीं। घंटों-घंटों बातें। संयुक्ता को उसकी बातें बहुत अच्छी लगती थीं। वो हंसती थी, जो हंसी वो सालों से भूल गई थी।
धीरे-धीरे दोनों को आभास होने लगा – *हम एक दूसरे के लिए ही बने हैं…।
एक दिन आकाश ने कहा – “संयुक्ता, अपनी खुशी के लिए तुम स्वतंत्र हो। कुछ भी कर सकती हो। मेरे साथ आगे की जिंदगी गुजारना चाहो तो… आ… आ…”
आकाश आगे कुछ कहता, उससे पहले संयुक्ता के शरीर में एक सिरहन सी दौड़ गई।
उसने तपाक से कहा –
बस करो आकाश… बस करो..!
मैं दो बच्चों की मां हूं। मेरा पति है, मेरा परिवार है, मेरा घर है, मेंरा दायित्व है, मेरा फर्ज है….
और ये सब मेरे लिए पहले हैं…।
….मैं खुद के लिए बाद में हूं….।
“तुमसे बात करना मुझे अच्छा लगता था, शायद इस बात का एहसास मुझे भी नहीं था की बात यहां तक पहुंच जाएगी… पर अब और नहीं…।”
बिना एक पल गंवाए… संयुक्ता ने पहले नंबर ब्लॉक किया और हमेशा के लिए उस अध्याय को डिलीट कर दिया ….!
फोन की स्क्रीन ब्लैक हो गई ….पर संयुक्ता की आंखें साफ थी ,…उसके भीतर का कोहरा छंट चुका था !
(स्वरचित मौलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित रचना)
संध्या त्रिपाठी