चांदी की चम्मच से मलाईदार रसमलाई का बड़ा सा टुकड़ा मुँह में रखते हुए कामिनी ने अपनी छोटी देवरानी सुधा की ओर देखा और एक बनावटी मुस्कान चेहरे पर चिपका ली। आँगन में अभी-अभी बच्ची के नामकरण की चहल-पहल धीमी पड़ी थी। कामिनी के दोनों बेटे, जो उस समय नए कुर्ते-पायजामे में इतराते हुए घूम रहे थे, उनकी तरफ गर्व से देखते हुए उसने अपने देवर विमलेश से चुटकी ली, “क्यों देवर जी, घर में तीसरी बार लक्ष्मी जी पधारी हैं और आप हैं कि पूरे मोहल्ले में हलवाई बैठाकर दावत बाँट रहे हैं? अब तो कमर कस लीजिए, तीन-तीन शादियों का दहेज जोड़ते-जोड़ते सिर के बाल सफेद हो जाएँगे। कहीं ऐसा न हो कि बुढ़ापे में पाई-पाई के मोहताज हो जाएँ।”
विमलेश के चेहरे पर उस तंज की एक शिकन तक न उभरी। उसने अपनी गोद में लिपटी नन्हीं जान के माथे को चूमा और एक सहज, आत्मीय हँसी के साथ बोले, “अरे भाभी जी, जब ऊपर वाले ने झोली में खुशियाँ दी हैं, तो उन्हें बाँटने में कंजूसी कैसी? और रही बात दहेज और जोड़-घटाव की, तो बेटियाँ बोझ नहीं, अपना भाग्य अपने साथ लेकर जन्म लेती हैं। हम तो बस उनके रास्ते के कंकड़ हटाने वाले माली हैं, बगिया तो वो खुद महकाएँगी।”
कामिनी ने होंठ सिकोड़ लिए। उनके मन के भीतर एक अजीब सा सुकून और अहंकार दोनों एक साथ तैर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि विमलेश और सुधा ज़िंदगी की उस दौड़ में पीछे छूट गए हैं जहाँ समाज बेटों की गिनती से रुतबा तय करता है। कामिनी के दो बेटे थे—आलोक और मयंक। पूरा खानदान यही मानकर चलता था कि कामिनी का भविष्य तो सोने जैसा चमक रहा है, जबकि विमलेश का जीवन सिर्फ बेटियों की शादी की चिंता में घुल जाएगा।
कानपुर के उस पुराने, सीलन भरे किराये के दो कमरों वाले मकान में नामकरण की गहमागहमी खत्म होते ही सन्नाटा पसर गया। सारे रिश्तेदार धीरे-धीरे अपने-अपने घरों को लौट गए। अब उस घर में बचे थे विमलेश, सुधा और उनकी तीन नन्हीं दुनिया—बड़ी बेटी तन्वी, मंझली आरुषि और सबसे छोटी, जिसका नाम उस दिन बड़े लाड़ से पावनी रखा गया था।
विमलेश एक प्राइवेट फर्म में मामूली क्लर्क थे। तन्ख्वाह सीमित थी, लेकिन बेटियों के लिए उनके सपने असीम थे। सुधा अक्सर मोहल्ले की औरतों और अपनी जेठानी की बातों से सहम जाती थी। जब कभी कोई तीज-त्योहार आता और कामिनी अपने बेटों के लिए महंगे कपड़े और भविष्य की योजनाओं की शेखी बघारती, तो सुधा का दिल बैठ जाता। एक दिन जब कामिनी ने तंज कसते हुए कहा था, “सुधा, चाहे जितनी किताबें पढ़ा लो इन लड़कियों को, अंत में जाना तो पराए घर ही है। जो पैसे इनकी किताबों और कॉपियों में बहा रहे हो, उसकी जगह सोने की बालियाँ और बर्तन जोड़ना शुरू करो, वरना ब्याह के वक्त हाथ फैलाने पड़ेंगे,” तब सुधा रात को चुपचाप रो पड़ी थी।
उस रात विमलेश ने सुधा के आँसू पोंछते हुए बड़े धीरज से कहा था, “सुधा, दुनिया का काम है डराना। अगर हम अपनी बच्चियों को सिर्फ शादी की सामग्री मानकर पालेंगे, तो हम उनके साथ अन्याय करेंगे। मैं उन्हें दहेज में देने के लिए सोना-चाँदी भले न जोड़ पाऊँ, पर उन्हें ऐसी शिक्षा और हौसला ज़रूर दूँगा कि उन्हें कभी किसी के आगे झुकना न पड़े। बेटियाँ अगर अपने पैरों पर खड़ी हो गईं, तो किसी बेटे से कम सुख नहीं देंगी हमें। तुम बस भरोसा रखो।”
साल दर साल गुज़रते गए। समय अपनी गति से बहता रहा और विमलेश का छोटा सा किराये का घर एक तपोभूमि में बदल गया। घर में फिजूलखर्ची के लिए कोई जगह नहीं थी। विमलेश ने अपनी पुरानी साइकिल को कभी नहीं बदला, सुधा ने बरसों तक अपनी फटी साड़ियों के पल्लू सी-सी कर पहने, लेकिन बेटियों की स्कूल फीस, उनकी किताबों और उनकी कला सामग्री में कभी कोई कमी नहीं आने दी।
तीनों बहनें भी अपने माता-पिता के त्याग को भली-भाँति समझती थीं। वे सिर्फ किताबी कीड़ा नहीं थीं, बल्कि घर की जिम्मेदारियों को भी अपने नन्हे कंधों पर उठाना जानती थीं। घर की दीवारों पर तन्वी द्वारा बनाई गई खूबसूरत मधुबनी पेंटिंग्स सजी थीं, तो टेबल पर आरुषि के वाद-विवाद प्रतियोगिता में जीते हुए शील्ड और पावनी के विज्ञान प्रदर्शनी के मेडल चमकते थे। पूरा घर बेटियों के खिलखिलाने, पढ़ने और एक-दूसरे को सहारा देने की खुशबू से महकता रहता था।
मोहल्ले के लोग जब कभी विमलेश से पूछते, “अरे विमलेश भाई, बाल पकने लगे, पचास के पार हो गए, कब तक इस किराये के मकान में घिसटते रहोगे? अपना एक छोटा सा आशियाना क्यों नहीं बनवा लेते?”
तो विमलेश अपनी वही सौम्य मुस्कान बिखेर कर जवाब देते, “भाई साहब, ईंट-गारे की चारदीवारी तो कोई भी बैंक लोन लेकर खड़ी कर सकता है। मेरी असली इमारत तो मेरी ये तीन बच्चियाँ हैं। जिस दिन मेरी बेटियाँ समाज में अपनी पहचान बना लेंगी, उस दिन समझूँगा कि मेरा महल खड़ा हो गया। अभी मुझे उनका भविष्य गढ़ना है, अपनी छत की चिंता बाद में करूँगा।”
दूसरी तरफ, कामिनी के दोनों बेटे लाड़-प्यार और इस घमंड में बड़े हो रहे थे कि वे ‘कुल के दीपक’ हैं। पढ़ाई-लिखाई में उनका मन कम और ठाठ-बाट में ज़्यादा रहता था। जब कभी कामिनी विमलेश के घर आती, तो तन्वी को देर रात तक पढ़ते देख कहती, “इतना पढ़कर कौन सा कलेक्टर बनना है? लड़की है, रोटी बेलना सिखाओ।” लेकिन विमलेश और सुधा बस मुस्कुरा कर अपनी बेटियों के सिर पर हाथ फेर देते।
मेहनत और ईमानदारी की जड़ें कभी कमजोर नहीं होतीं। विमलेश और सुधा की बरसों की तपस्या आखिरकार रंग लाने लगी। बड़ी बेटी तन्वी ने राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पहले ही प्रयास में शानदार अंकों के साथ उत्तीर्ण कर ली और वाणिज्य कर अधिकारी के पद पर नियुक्त हुई। मंझली बेटी आरुषि ने दिन-रात एक करके चार्टर्ड एकाउंटेंसी की कठिन परीक्षा पास की और एक बहुराष्ट्रीय वित्तीय कंपनी में ऊँचे पद पर चयनित हो गई। सबसे छोटी, लाडली पावनी, जिसने बचपन से ही कंप्यूटर की दुनिया में रुचि दिखाई थी, उसने शीर्ष इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री पूरी की और गुरुग्राम की एक नामी टेक कंपनी में सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट के रूप में चुनी गई।
वह दिन विमलेश और सुधा के जीवन का सबसे भावुक दिन था, जब तीनों बेटियों ने अपनी पहली-पहली कमाई लाकर अपने पिता के खुरदुरे हाथों और माँ के आँचल में रख दी थी। विमलेश की आँखें भर आई थीं, पर उस दिन आँसू मजबूरी के नहीं, एक आत्मसम्मान से भरे पिता के गर्व के थे।
एक दिन अचानक तन्वी ने अपनी बड़ी मम्मी कामिनी को फोन मिलाया। “बड़ी मम्मी, प्रणाम। कल माँ और पापा की शादी की तीसवीं सालगिरह है। हम तीनों बहनों ने मिलकर एक छोटा सा पारिवारिक उत्सव रखा है। आप, बड़े पापा और दोनों भैया समय से ज़रूर पहुँच जाइएगा।”
कामिनी के मन में फिर वही पुराना विचार कौंधा कि किराये के उस छोटे से घर में भला क्या उत्सव होगा। फिर भी औपचारिकता निभाने के लिए उन्होंने हाँ कह दिया।
अगली शाम जब कामिनी अपने परिवार के साथ उस पते पर पहुँची जो तन्वी ने भेजा था, तो उनकी आँखें खुली की खुली रह गईं। वह शहर के सबसे प्रतिष्ठित और भव्य होटल का सभागार था। हॉल को सफेद और सुनहरे फूलों से बेहद नफासत के साथ सजाया गया था। पृष्ठभाग में विमलेश और सुधा की शादी से लेकर अब तक के सफर की तस्वीरों का एक सुंदर कोलाज जगमगा रहा था। पकवानों का चयन ऐसा था कि हर व्यंजन में सुरुचि झलक रही थी।
पावनी सुबह ही पहली फ्लाइट से गुरुग्राम से पहुँच चुकी थी। तीनों बहनें पारंपरिक परिधानों में सजी, अपनी माँ सुधा और पिता विमलेश का हाथ थामे मेहमानों का स्वागत कर रही थीं। सुधा, जो कभी पुरानी साड़ियों में सिमटी रहती थी, आज अपनी बेटियों की पसंद की रेशमी साड़ी में गरिमामयी लग रही थी, और विमलेश का सीना गर्व से चौड़ा था।
पार्टी के बीच में, जब केक काटने की रस्म पूरी हुई, तो तन्वी ने माइक हाथ में लिया। हॉल में सन्नाटा छा गया।
तन्वी ने नम आँखों से मुस्कुराते हुए कहा, “यहाँ उपस्थित सभी आदरणीय जनों को मेरा प्रणाम। आज हमारे माता-पिता की सालगिरह है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन हमारे सपनों को सींचने में खपा दिया। दुनिया अक्सर पापा से पूछती थी कि उन्होंने अपने जीवन में क्या कमाया, अपना मकान क्यों नहीं बनाया? आज हम तीनों बहनें अपने पापा को यह बताना चाहती हैं कि उनका मकान तैयार है।”
इतना कहकर पावनी और आरुषि मंच पर आगे बढ़ीं। उनके हाथों में एक खूबसूरत मखमली डिब्बा था। जब वह डिब्बा विमलेश और सुधा के हाथों में सौंपा गया, तो उसमें शहर की सबसे शांत और सुंदर कॉलोनी में बने एक नए स्वतंत्र बंगले की रजिस्ट्री के कागजात और उसकी सुनहरी चाबियाँ थीं, जिस पर नेमप्लेट की तस्वीर छपी थी—’विमलेश-सुधा सदन’।
तन्वी ने आगे कहा, “पापा, आपने अपनी ज़िंदगी की हर ख्वाहिश हमारे भविष्य के लिए कुर्बान कर दी। लोग कहते थे कि बेटियाँ पराया धन होती हैं और केवल दहेज की चिंता लाती हैं। लेकिन आपने हमें सिखाया कि बेटियाँ स्वाभिमान होती हैं। यह घर किसी दहेज का नहीं, आपकी बेटियों के पसीने, आपकी दी हुई शिक्षा और आपके संस्कारों की नींव पर खड़ा है। अब आपको कभी किराये के मकान की सीलन नहीं झेलनी पड़ेगी।”
हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। विमलेश ने अपनी तीनों बेटियों को गले से लगा लिया। उनकी आँखों से बहते आँसू बेटियों के गालों को भिगो रहे थे।
एक कोने में खड़ी कामिनी की नज़रें ज़मीन में धंस गई थीं। उनके दोनों बेटे, जिन पर उन्हें कभी इतना अभिमान था, आज भी कोई स्थिर काम नहीं ढूँढ पाए थे और बाप की कमाई पर निर्भर थे। जिस देवर को उन्होंने कभी तीन बेटियों का ‘लाचार बाप’ कहकर ताना मारा था, आज वही विमलेश समाज के सामने एक विजेता की तरह खड़ा था—अपनी तीन सशक्त, आत्मनिर्भर और संस्कारवान बेटियों के छत्रछाया में। बेटियाँ वास्तव में अपना भाग्य खुद लिखती हैं, बशर्ते उन्हें पंख फैलाने का खुला आकाश दिया जाए।
अक्सर हमारे समाज में बेटियों के जन्म पर बधाई से पहले ‘चिंता’ की लकीरें खींच दी जाती हैं। क्या आज भी आपको लगता है कि समाज में बेटियों को बोझ या केवल दहेज की ज़िम्मेदारी समझने वाली सोच पूरी तरह बदल पाई है? आपके अनुसार माता-पिता की सबसे बड़ी पूँजी क्या है—बैंक बैलेंस या बच्चों को दी गई आत्मनिर्भरता? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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