“आलोक, यह घर तुम्हारा भी है, लेकिन अब यहां मुफ्त की रोटियां और अंधा दुलार नहीं मिलेगा। यदि तुम्हें यहां रहना है, तो मेहनत करनी होगी, पसीना बहाना होगा और अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। मां-बाप ने बेटे की चाह में हमें खो दिया था, लेकिन हमने उन्हें कभी खोने नहीं दिया। इंसान अपनी पहचान अपनी जाति, कुल या लिंग से नहीं, अपने कर्मों से बनाता है।”
आलोक ने अपनी दोनों बहनों के हाथ पकड़ लिए और फूट-फूटकर रोने लगा।
हमारे घर में पार्वती चाची उस वक्त से काम कर रही थी जब उसका ब्याह होकर वह इस कस्बे में आई ही थी। उसका पति, शंकर, पास ही एक लकड़ी के टाल पर मजदूरी करता था, मगर दिन ढलते ही उसकी मजदूरी देशी शराब के ठेके पर लुट जाती थी। पार्वती के पीछे-पीछे उसकी दो बेटियां भी हमारे आंगन में सिमटी रहती थीं। बड़ी का नाम था वंदना, जो बमुश्किल नौ बरस की थी, और छोटी सात साल की कल्पना। दोनों लड़कियां जब सरकारी स्कूल के बस्ते टांगे सीधे हमारे घर आतीं, तो उनकी आंखें भूख से पथराई होती थीं। घर में रात की बची बासी सूखी रोटी को पानी में भिगोकर वे स्कूल जाती थीं। मेरी मां और दादी अक्सर उनके हिस्से का भात और दाल एक पीतल की थाली में ढककर रख देती थीं। वे दोनों बहनें आंगन के कोने में बैठकर उस खाने को ऐसे खातीं मानो अमृत पा लिया हो।
शंकर रोज रात को शराब पीकर पार्वती को पीटता था। उसका एक ही ताना होता—”दो-दो पत्थर मेरी छाती पर लाद दिए, एक बेटा न जन सकी जो वंश चलाए।” पार्वती भी इस सामाजिक दंश को अपनी नियति मानकर मंदिर-मस्जिद, पीर-फकीर के चक्कर काटती रहती। फिर एक दिन गांव में कोई सिद्ध बाबा आए। उन्होंने पार्वती के माथे पर भभूत लगाते हुए कहा कि इस बार उसकी कोख से कुलदीपक का जन्म होगा। यह सुनते ही शंकर के तेवर रातों-रात बदल गए। जो पति पार्वती को रोज गालियों से नवाजता था, वह अब उसके लिए बाजार से फल और कभी-कभी जलेबी लेकर आने लगा। पार्वती का सीना भी गर्व से चौड़ा हो गया था, जैसे उसने कोई बहुत बड़ा पुण्य अर्जित कर लिया हो।
नौ महीने बाद जब अस्पताल से खबर आई कि पार्वती ने बेटे को जन्म दिया है, तो शंकर ने पूरे मुहल्ले में बताशे बांटे। मैं जब मां के साथ उस नवजात को देखने गई, तो मेरी नजर उस दुबले, सांवले और रोते हुए बच्चे पर पड़ी। मेरे मुंह से अनायास ही निकल पड़ा, “चाची, वंदना और कल्पना तो कितनी सुंदर और चंदा जैसी हैं, यह तो बिल्कुल सांवला है।” पार्वती ने तुरंत मेरी बात काटते हुए बड़े गर्व से कहा, “अरे बिटिया, घी का लड्डू टेढ़ा भी भला! यह तो हमारे बुढ़ापे का सहारा है। बेटियां तो पराया धन होती हैं, कल को उड़ जाएंगी। चिता को मुखाग्नि तो यही देगा, तभी तो हमें मोक्ष मिलेगा।”
उस लड़के का नाम बड़े चाव से ‘आलोक’ रखा गया। आलोक के जन्म लेते ही उस घर की आबोहवा पूरी तरह बदल गई, मगर यह बदलाव वंदना और कल्पना के लिए किसी अभिशाप से कम न था। पार्वती के पास अब इतना समय नहीं था कि वह दोनों बच्चियों को स्कूल भेज सके। आलोक को कौन संभालता? शंकर रोज शाम को आधा लीटर दूध का पैकेट लेकर आता और हिदायत देता कि यह दूध केवल पार्वती पिए ताकि बालक को कोई कमी न हो। दोनों बेटियां सूखे होठों से उस उबलते दूध की खुशबू सूंघती रह जातीं। कुछ ही महीनों में वंदना और कल्पना का नाम स्कूल से कटवा दिया गया। उनका बचपन, उनकी किताबें और उनके सपने सब कुछ आलोक के डायपर धोने और उसे झूला झुलाने की भेंट चढ़ गए।
समय पंख लगाकर उड़ने लगा। आलोक एक वर्ष का हुआ, तो शंकर ने अपनी महीने भर की मजदूरी और पार्वती ने हमारी मां से पेशगी पैसे लेकर बहुत बड़ा उत्सव मनाया। ढोलक बजी, रिश्तेदारों को दावत दी गई। उस जश्न में दोनों बहनें फटे-पुराने, मैले कपड़ों में एक कोने में सिमटी खड़ी थीं। यदि बालक आलोक भूख या नींद से जरा सा भी बिलखता, तो पार्वती आव देखती न ताव, वंदना की चोटी पकड़कर उसे दो-चार थप्पड़ जड़ देती—”अरी कुलच्छनी! बबुआ रो रहा है और तू खड़ी तमाशा देख रही है? तुझे पाल-पोसकर क्या इसीलिए बड़ा किया है?” दोनों बच्चियां सिसक कर रह जातीं। मेरी मां कई बार पार्वती को टोकतीं, “पार्वती, तू अपनी ही जाई के साथ इतना जुल्म क्यों करती है? बेटियां तो साक्षात लक्ष्मी होती हैं।” लेकिन पार्वती के सिर पर तो बेटे का नशा चढ़ा हुआ था। वह हिकारत से कहती, “भाभी जी, आप नहीं समझेंगी। बेटियां तो सिर्फ पराया भार हैं, यह बेटा ही हमें तारने वाला है।”
धीरे-धीरे पार्वती ने अपने हिस्से का काम भी बेटियों के कंधों पर डालना शुरू कर दिया। हमारे घर का पोंछा, बर्तनों की घिसाई और डस्टिंग अब वंदना और कल्पना ही करती थीं। दोनों के बालों में जुएं पड़ गई थीं, चेहरे की चमक गायब हो चुकी थी और हाथ खुरदरे हो गए थे। जब वे मेरी किताबों और सुंदर स्कूल यूनिफॉर्म को हसरत भरी निगाहों से देखतीं, तो मेरा दिल पसीज जाता था। मां ने कई बार उनके सिर में तेल लगाया, दवा दी, लेकिन उनकी मां का दिल तो सिर्फ आलोक के लिए धड़कता था।
देखते ही देखते वंदना सत्रह साल की दहलीज पर पहुंच गई और कल्पना चौदह की। वहीं आलोक अब आठ साल का हो गया था। पार्वती और शंकर ने पेट काटकर आलोक का दाखिला शहर के एक नामी अंग्रेजी माध्यम के कॉन्वेंट स्कूल में कराया। टाई-बेल्ट और चमकते जूते पहनकर जब आलोक स्कूल बस में चढ़ता, तो शंकर और पार्वती की आंखें खुशी से भर आती थीं। दूसरी ओर, वंदना और कल्पना अब मुहल्ले के तीन और घरों में चौका-बर्तन करने लगी थीं ताकि उनके भाई की स्कूल फीस, उसकी महंगी कॉपियां और ट्यूशन का खर्च पूरा हो सके।
मगर अंधा प्यार हमेशा विनाश की नींव रखता है। आलोक को जो भी चीज चाहिए होती, वह रोकर या जिद करके छीन लेता। धीरे-धीरे उसकी आदतें बिगड़ने लगीं। वह स्कूल से साथी बच्चों की महंगी कलम, रबर और पैसे चुराकर लाने लगा। पहले तो स्कूल से चेतावनियां आईं, लेकिन पार्वती और शंकर ने हर बार यह कहकर बात टाल दी कि उनका बच्चा तो बहुत सीधा है, दूसरे बच्चे उससे जलते हैं। पांचवीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते आलोक का दुस्साहस इतना बढ़ गया कि एक दिन जब उसकी कक्षा अध्यापिका ने गृहकार्य न करने पर उसे डांटा, तो आलोक ने आव देखा न ताव, शिक्षिका की साड़ी खींचकर उनका हाथ मरोड़ दिया। घर पर बहनों और मां पर हाथ उठाने की जो आदत उसे पड़ी थी, वह अब बाहर भी दिखने लगी थी। नतीजा यह हुआ कि स्कूल प्रबंधन ने आलोक को बेइज्जत करके स्कूल से निकाल दिया। पार्वती और शंकर का अफसर बनाने का सपना पहली बार चरमराया, मगर उनकी आंखें फिर भी नहीं खुलीं। उन्होंने सिफारिशें लगाकर उसे एक सरकारी स्कूल में डाल दिया।
समय अपनी गति से बहता रहा। वंदना अब ब्याहने योग्य हो चुकी थी। पार्वती और शंकर के पास उसके लिए न तो समय था और न ही कोई चिंता। उनके लिए वह बस एक बोझ थी जिसे जल्द से जल्द उतारना था। पास की बस्ती में एक अधेड़ उम्र का ऑटो चालक रहता था, जिसकी पहली पत्नी किसी बीमारी से गुजर चुकी थी। शंकर ने बिना कोई छानबीन किए, केवल यह देखकर कि लड़का बिना दान-दहेज के शादी करने को तैयार है, अठारह साल की मासूम वंदना का हाथ उस शराबी के हाथ में थमा दिया। जिस दिन वंदना विदा हुई, वह फफक-फफक कर रोई, लेकिन पार्वती के माथे पर चिंता की एक शिकन तक न थी। वह तो बस इस बात से खुश थी कि एक जिम्मेदारी कम हुई और अब सारा ध्यान आलोक पर दिया जा सकेगा।
वंदना का ससुराल नरक साबित हुआ। उसका पति दिन भर ऑटो चलाता और रात को शराब के नशे में धुत होकर घर लौटता। जरा सी बात पर वंदना को जानवरों की तरह पीटता। इधर मायके में आलोक अब पूरी तरह से बिगड़ चुका था। उसने पढ़ाई छोड़ दी थी और दिन भर आवारा लड़कों के साथ ताश खेलना, सिगरेट पीना और राह चलती लड़कियों पर फब्तियां कसना ही उसका काम रह गया था। घर में जब भी पैसों की जरूरत होती, वह पार्वती की गर्दन पकड़ लेता। शंकर यदि बीच-बचाव करने आता, तो आलोक अपने ही बाप को धक्का देकर गिरा देता। शंकर के पिता ने जो आधा बीघा पैतृक जमीन छोड़ी थी, आलोक ने जुए का कर्ज चुकाने के लिए पार्वती को धमकाकर वह जमीन भी औने-पौने दाम में बिकवा दी। दो बार तो मारपीट के मामले में पुलिस उसे हवालात भी ले गई, जहां से शंकर रोते-बिलखते कर्ज लेकर उसे छुड़ा लाया।
फिर एक मनहूस सुबह वह हुआ जिसने पूरे परिवार की नींव हिला दी। वंदना के ससुराल से खबर आई कि उसके पति ने कच्ची जहरीली शराब पी ली थी, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। तेरहवीं के बाद जब वंदना मायके की चौखट पर पहुंची, तो उसकी हालत देखकर राह चलते अजनबियों की आंखों में भी आंसू आ गए। सफेद सूती साड़ी में लिपटी उन्नीस साल की वंदना का शरीर हड्डियों का ढांचा बन चुका था। उसकी बांहों और चेहरे पर पति की मार के पुराने और नीले पड़ चुके निशान साफ दिखाई दे रहे थे। उसकी सूनी आंखें किसी गहरे शून्य में ताक रही थीं।
पार्वती और शंकर जब अपनी फूल सी बेटी की यह दुर्गति देख रहे थे, तो उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसी वक्त घर के भीतर से आलोक की कर्कश आवाज गूंजी, “ऐ बुढ़िया! यह क्या रोज-रोज का मातम फैला रखा है? निकाल पांच सौ रुपये, मुझे दोस्तों के साथ पार्टी में जाना है।” जब शंकर ने हाथ जोड़कर कहा कि घर में कफन तक के पैसे नहीं हैं, तो उस कुपुत्र ने अपनी मां को एक जोरदार तमाचा जड़ दिया और घर में रखा राशन का पीपा पटक कर चला गया।
उस तमाचे की गूंज ने पार्वती के कानों के पर्दे और दिल के ताले दोनों एक साथ खोल दिए। वह जमीन पर बैठकर अपनी छाती पीट-पीटकर रोने लगी। जिस बेटे को उसने बुढ़ापे की लाठी समझा था, उसी ने उसका सहारा छीन लिया था। और जिन बेटियों को उसने बोझ समझकर उनके बचपन को रौंद दिया था, वे आज भी अपनी मां के आंसुओं को देखकर तड़प रही थीं। वंदना आगे बढ़ी और उसने अपनी कांपती उंगलियों से मां के आंसू पोंछे। पार्वती ने दोनों बेटियों को अपनी छाती से चिपका लिया और दहाड़ मारकर रो पड़ी, “मुझे माफ कर दो मेरी बच्चियों! मैंने चिराग के लालच में अपने ही घर की दो-दो लक्ष्मियों को अंधी कोठरी में धकेल दिया। मैं अभागिन मां हूं, मैंने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा पाप किया है।” शंकर भी सिर पकड़कर रो रहा था; पश्चाताप के आंसू उसकी दाढ़ी को भिगो रहे थे।
उस रात के अंधियारे के बाद एक नई सुबह का जन्म हुआ। पार्वती और शंकर ने अपने भीतर की सारी कमजोरी को झटक दिया। उन्होंने मन ही मन एक दृढ़ संकल्प लिया कि जो गुनाह उन्होंने अपनी बेटियों के साथ किया है, उसका प्रायश्चित वे अपनी बाकी बची सांसों से करेंगे। वे अब अपनी बेटियों को किसी के आगे हाथ फैलाने नहीं देंगे, बल्कि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करेंगे।
कुछ ही दिनों बाद आलोक एक बड़े गिरोह के साथ चोरी और डकैती की योजना बनाते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। इस बार पुलिस ने उस पर गंभीर धाराएं लगाई थीं। मुहल्ले के कुछ लोग कहने आए कि जाकर जमानत करा लो, लेकिन शंकर ने अपने आंसू पोंछते हुए दो टूक कह दिया, “जिसने मां की कोख और पिता की पगड़ी का सम्मान नहीं किया, वह कानून की सलाखों के पीछे ही ठीक है। हम उसे छुड़ाने नहीं जाएंगे। हमारे लिए वह अध्याय अब समाप्त हो चुका है।”
पार्वती और शंकर ने अपनी बची-खुची पूंजी और मेरी मां की सहायता से दोनों बेटियों के जीवन को संवारने का बीड़ा उठाया। सरकारी महिला सशक्तिकरण और कौशल विकास मिशन के तहत वंदना का दाखिला राज्य स्तरीय नर्सिंग प्रशिक्षण संस्थान में कराया गया, जबकि कल्पना की रुचि को देखते हुए उसे फैशन डिजाइनिंग और आधुनिक सिलाई-कढ़ाई के तीन वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम में भेजा गया। दोनों बहनों के रहने की व्यवस्था सरकारी छात्रावास में हो गई।
शुरुआत में राह बहुत कठिन थी। वंदना जब पहली बार किताबों को हाथ में लेती, तो उसके हाथ कांपते थे, वर्षों का छूटा हुआ अभ्यास और जीवन के गहरे जख्म उसके आत्मविश्वास को डगमगा देते थे। मगर उसकी आंखों में अपनी मां के उस पश्चाताप का मान रखने की जिद थी। वह रातों को जाग-जागकर पढ़ाई करती। कल्पना भी सिलाई मशीन के पहिये के साथ-साथ अपने सुनहरे भविष्य के ताने-बाने बुनने लगी। पार्वती और शंकर अब दिन-रात मेहनत करते। जो पार्वती कभी अपनी बेटियों पर झल्लाती थी, वह अब हर रविवार को अपनी हथेलियों से बनाए बेसन के लड्डू और फल लेकर हॉस्टल जाती और घंटों अपनी बेटियों के सिर पर ममता का हाथ फेरती।
चार साल का कठिन तप रंग लाया। वंदना ने अपने दृढ़ निश्चय और सेवा भाव के बल पर नर्सिंग की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और उसे शहर के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल में वरिष्ठ स्टाफ नर्स की स्थायी नौकरी मिल गई। श्वेत परिधान में जब वह अपने स्टेथोस्कोप के साथ अस्पताल के गलियारों में चलती, तो उसकी चाल में एक गरिमा और चेहरे पर आत्मसम्मान का तेज झलकता था। उधर कल्पना ने अपने हुनर के दम पर न केवल अपना डिप्लोमा पूरा किया, बल्कि महिला स्वयं सहायता समूह से ऋण लेकर कस्बे के मुख्य बाजार में ‘नारी शक्ति बुटीक’ नाम से अपना एक केंद्र खोला। आज उस बुटीक में इलाके की बीसियों युवतियां काम सीख रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं।
समय का चक्र घूमा, लेकिन इस बार उसने न्याय की चादर ओढ़ रखी थी। पार्वती और शंकर अब बूढ़े हो चले थे। उनके चेहरे की झुर्रियों में पुरानी तकलीफों के निशान जरूर थे, मगर आंखों में एक गहरा संतोष था। जिस आंगन में कभी बेटियों की सिसकियां गूंजती थीं, आज उसी आंगन में खुशहाली और सम्मान का वास था। वंदना अपनी हर महीने की पगार लाकर सबसे पहले अपनी मां के आंचल में रखती और कहती, “मां, यह सब तुम्हारा ही तो है।” कल्पना अपने कमाए पैसों से पिता के लिए नया चश्मा और दवाइयां लेकर आती।
एक दिन शाम को जब पूरा परिवार आंगन में तुलसी के पौधे के पास बैठा चाय पी रहा था, तभी दरवाजे पर एक दुबला-पतला, दाढ़ी बढ़ाए और मैले कपड़ों में लिपटा युवक आकर खड़ा हो गया। वह आलोक था, जो जेल की सजा काटकर लौटा था। उसकी नजरें झुकी हुई थीं और चेहरे पर अपराधबोध था। उसने थरथराते कदमों से आंगन में प्रवेश किया और शंकर तथा पार्वती के पैरों में गिर पड़ा, “बाबूजी… मां… मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारी जिंदगी बर्बाद कर दी। मुझे अपनी चौखट पर एक कोने में पड़ा रहने दो।”
शंकर का हाथ एक पल के लिए कांप उठा, मगर उसने कोई ममता नहीं दिखाई। तब वंदना आगे बढ़ी। उसने अपने भाई के कंधे पर हाथ रखा और उसे सहारा देकर उठाया। वंदना की आंखों में कोई नफरत या बदले की भावना नहीं थी, बल्कि एक सक्षम और स्वावलंबी बहन का धैर्य था। उसने शांत स्वर में कहा, “आलोक, यह घर तुम्हारा भी है, लेकिन अब यहां मुफ्त की रोटियां और अंधा दुलार नहीं मिलेगा। यदि तुम्हें यहां रहना है, तो मेहनत करनी होगी, पसीना बहाना होगा और अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। मां-बाप ने बेटे की चाह में हमें खो दिया था, लेकिन हमने उन्हें कभी खोने नहीं दिया। इंसान अपनी पहचान अपनी जाति, कुल या लिंग से नहीं, अपने कर्मों से बनाता है।”
आलोक ने अपनी दोनों बहनों के हाथ पकड़ लिए और फूट-फूटकर रोने लगा। आज उसे समझ आ चुका था कि कुल का असली दीपक कौन था। पार्वती ने आसमान की ओर देखा और हाथ जोड़ लिए। उसकी आंखों से जो आंसू बह रहे थे, वे अब पश्चाताप के नहीं, बल्कि एक नए भोर के स्वागत के आंसू थे, जहां बेटियां अब पराया धन नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सबसे मजबूत ढाल बन चुकी थीं।
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कहानी पर आपकी राय:
क्या आज भी हमारे समाज में बेटों को ‘बुढ़ापे की लाठी’ और बेटियों को ‘पराया धन’ समझने की मानसिकता पूरी तरह समाप्त हो पाई है? जब माता-पिता अपने ही बच्चों में लिंग के आधार पर भेद करते हैं, तो उसका खामियाजा किसे भुगतना पड़ता है? क्या वंदना और कल्पना की तरह हर बेटी को अपनी तकदीर खुद लिखने का अवसर नहीं मिलना चाहिए? अपनी बहुमूल्य राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
मूल लेखिका : वीणा सिंह