ओंकारेश्वर जी चुपचाप अपनी पत्नी की बातें सुन रहे थे। मालती देवी के तर्कों में ममता भी थी, अनुभव की परिपक्वता भी थी और एक नई पीढ़ी के संघर्ष के प्रति गहरी सहानुभूति भी। उन्हें महसूस हुआ कि उनका गुस्सा वाकई बेवजह और गैर-जरूरी था। उन्होंने अपनी बहू के उस समर्पण को नजरअंदाज कर दिया था, जो वह रोज बिना कहे उनके लिए कर रही थी। कल रात ही तो जब उनकी कमर में दर्द हो रहा था, तो अनघा अपनी नींद खराब करके गरम पानी की थैली लेकर उनके कमरे में आई थी।
मेज की मुख्य कुर्सी पर बैठे ओंकारेश्वर जी ने जैसे ही पनीर की सब्जी का पहला निवाला मुंह में रखा, उनके चेहरे की झुर्रियां गुस्से और चिड़चिड़ाहट से खिंच गईं। उन्होंने तुरंत हाथ में पकड़ा हुआ चम्मच प्लेट में पटक दिया। चम्मच की तीखी आवाज पूरे कमरे में गूंज गई। पानी का गिलास उठाकर एक ही सांस में खाली करते हुए वे लाल-पीले होकर अपनी पत्नी मालती देवी की ओर मुड़े।
“अरे भाई, मुझे समझ नहीं आता कि आजकल की लड़कियां बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर कौन सा तीर मार लेती हैं, जब उन्हें दाल-सब्जी में मसालों की तमीज तक नहीं होती! कितनी बार कहा है कि मुझे शाम के खाने में तेज गरम मसाला और सूखी लाल मिर्च बिल्कुल नहीं पचती। गले से लेकर सीने तक आग लग जाती है, पेट में जलन का बवंडर उठने लगता है। जुबान इतनी सुलगने लगती है कि पता ही नहीं चलता कि पनीर खा रहे हैं या अंगारे!” ओंकारेश्वर जी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच चुका था।
रसोई के दरवाजे के पास खड़ी मालती देवी ने पति के तेवर भांपते ही स्थिति को संभालने में देर नहीं की। वे फौरन फ्रिज की तरफ बढ़ीं और ठंडे दही का एक कटोरा निकालकर मेज पर ले आईं।
“अजी सुनिए तो, आप व्यर्थ ही अपना रक्तचाप क्यों बढ़ा रहे हैं? जुबान के साथ-साथ इस उम्र में दिल को जलाना सेहत के लिए ठीक नहीं है। लाइए, इस कटोरी में से दो चम्मच ताजा दही और थोड़ी मलाई आपकी सब्जी में मिला देती हूं। इसका सारा तीखापन अभी शांत हो जाएगा,” कहते हुए मालती जी ने बड़े जतन से सब्जी की ग्रेवी में दही फेंट दिया।
दही के मिलने से सब्जी का लाल तीखा रंग तो कुछ हल्का पड़ गया, पर ओंकारेश्वर जी के मिजाज की कड़वाहट कम होने का नाम नहीं ले रही थी। उन्होंने रोटी का एक टुकड़ा सब्जी में डुबोते हुए कहा, “कल से यह जिम्मेदारी तुम अपने हाथों में लो। रोज-रोज का यह तमाशा मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा। किसी दिन मेरे मुंह से बहू के सामने कुछ कड़वा निकल जाएगा, फिर तुम ही कहोगी कि मैं अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाता और बात का बतंगड़ बना देता हूं।”
दरअसल, बात कुछ यूं थी कि अभी तीन महीने पहले ही उनके इकलौते बेटे समर का विवाह इंदौर की रहने वाली अनघा से हुआ था। अनघा और समर दोनों एक ही बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी में बड़े पदों पर कार्यरत थे। दोनों ने एक-दूसरे को समझा, परखा और फिर पूरे मान-सम्मान के साथ दोनों परिवारों की सहमति से सात फेरे लिए थे। शादी के शुरुआती हफ्ते तो रिश्तेदारों के स्वागत, नए-नए रिवाजों, दावतों और फिर दक्षिण भारत के खूबसूरत हिल स्टेशनों पर घूमने-फिरने में पलक झपकते ही बीत गए। इसके बाद जब दोनों ने दोबारा अपने दफ्तर जाना शुरू किया, तब घर की वास्तविक दिनचर्या पटरी पर लौटने लगी।
मालती जी बहुत समझदार और सुलझी हुई गृहिणी थीं। उन्होंने चंद दिनों में ही भांप लिया था कि उनकी बहू अनघा उन लड़कियों में से है, जिनका बचपन और किशोरावस्था सिर्फ किताबों, प्रोजेक्ट्स, कोडिंग और करियर की अंधी दौड़ में बीता था। रसोई घर उसके लिए हमेशा एक अनजान दुनिया जैसा रहा था, जहां वह कभी कभार केवल पानी की बोतल भरने या कॉफी का मग उठाने ही गई थी। चूल्हा जलाने और छौंक लगाने के नाम पर उसके माथे पर पसीने की बूंदें छलक आती थीं।
किंतु मालती जी इस बात से भीतर ही भीतर बेहद संतुष्ट और खुश थीं कि अनघा का स्वभाव गंगाजल की तरह निर्मल और विनीत था। उसमें आधुनिकता का घमंड रत्ती भर भी नहीं था। शादी के तुरंत बाद ही उसने पूरे घर को अपना मान लिया था। उसने ससुर ओंकारेश्वर जी के ब्लड प्रेशर और शुगर की दवाइयों का पूरा चार्ट अपने फोन में सेट कर लिया था, ताकि किसी भी दिन कोई गोली छूट न जाए। सास मालती जी के घुटनों के दर्द के लिए वह खुद ऑनलाइन तलाश कर बेहतरीन आयुर्वेदिक तेल और हीटिंग पैड लेकर आई थी। सुबह दफ्तर जाने की जल्दी होने के बावजूद वह घर के छोटे-बड़े कामों, ड्राइंग रूम की सफाई और कपड़ों की व्यवस्था में हाथ बंटाने से कभी पीछे नहीं हटती थी। जब भी उसे लैपटॉप से फुर्सत मिलती, वह तुरंत रसोई में आकर मालती जी के बगल में खड़ी हो जाती और कहती, “मां जी, मुझे बताइए मैं क्या मदद करूं? आप जो कहेंगी, मैं ध्यान से सीखूंगी।”
संसार में कोई भी मनुष्य जन्म से सर्वगुण संपन्न नहीं होता। हर किसी के पास अपनी खूबियां और कुछ कमियां होती हैं। मालती जी जानती थीं कि पाक कला कोई ऐसी जटिल विद्या नहीं है जिसे कोई बुद्धिमान व्यक्ति सीख न सके। जब एक लड़की दुनिया के कठिन से कठिन इम्तिहान पास कर सकती है, तो वह दाल में नमक और सब्जी में मिर्च का सही संतुलन भी वक्त के साथ आसानी से सीख जाएगी। परंतु ओंकारेश्वर जी पुराने खयालात और स्वाद के पक्के शौकीन इंसान थे। उन्हें बहू की सारी सेवा-भावना, उसका संकोच और उसका समर्पण तभी नजर आता था, जब थाली में परोसा गया खाना उनकी जीभ के मिजाज के बिल्कुल अनुकूल होता।
“मैं तुमसे कुछ कह रहा हूं मालती, तुम खामोश क्यों हो? कल से या तो तुम स्वयं दोनों वक्त का खाना बनाओगी या फिर इस लड़की को कायदे से सिखाओ कि इस घर में किस तरह का खाना बनता है। हमारे पुरखों के समय से सात्विक और संतुलित मसालों का रिवाज रहा है,” ओंकारेश्वर जी ने कटोरी खाली करते हुए फिर से अपनी बात दोहराई।
मालती देवी ने पानी का जग किनारे रखा, एक कुर्सी खींचकर उनके सामने बैठ गईं और बेहद शांत स्वर में मुस्कुराते हुए बोलीं, “अजी, बाल सफेद हो गए आपके, पर स्वाद के पीछे बच्चों जैसा मचलना और गुस्सा होना आज तक नहीं छूटा। अभी कल ही तो वह इस देहरी को पार करके हमारे आंगन में आई है। केवल तीन महीने हुए हैं। एक नए परिवेश में ढलना, दूसरे परिवार की जीवनशैली को अपनाना, सास-ससुर की नस-नस और उनकी पसंद-नापसंद को बारीकी से समझना कोई दो दिन का खेल तो नहीं है। थोड़ा वक्त तो देना ही पड़ेगा न उसे भी। फिर वह अनपढ़ तो है नहीं, उच्च शिक्षित है। खान-पान के पौष्टिक तत्वों और नुकसान को अच्छी तरह समझती है। बस अभी मसालों के डिब्बे में चम्मच डालते वक्त हाथ का अंदाज नहीं बैठ पा रहा है। कोई भी लड़की मां के पेट से खाना बनाना सीखकर नहीं आती। धीरे-धीरे आपके स्वाद का गणित भी उसकी समझ में आ जाएगा।”
ओंकारेश्वर जी ने थोड़ा तुनकते हुए कहा, “हां, तुम तो हमेशा उसका पक्ष ही लोगी। पर रसोई की बुनियादी समझ तो शादी से पहले होनी ही चाहिए न?”
मालती जी की आंखों में एक पुरानी चमक कौंध गई। वे पति को थोड़ा छेड़ते हुए बोलीं, “अच्छा! बुनियादी समझ की बात कर रहे हैं आप? जरा अपनी लाडली बेटी श्वेता को याद कीजिए। भूल गए उस दौर को? पूरे शहर के सबसे बड़े स्कूल और कॉलेज में वह हमेशा मेरिट लिस्ट में पहले नंबर पर आती थी। वाद-विवाद प्रतियोगिता हो या विज्ञान की प्रदर्शनी, हर जगह उसके नाम के डंके बजते थे। घर की अलमारियां उसके जीते हुए मेडलों और शील्ड्स से भरी पड़ी थीं। लेकिन उसकी रसोई की बुनियादी समझ का क्या आलम था? वह विवाह से एक हफ्ते पहले तक भी तुअर की दाल को ‘गाढ़ी पीली दाल’ और धुली मूंग की दाल को ‘हल्की वाली पीली दाल’ कहती थी!”
ओंकारेश्वर जी के चेहरे का तनाव थोड़ा कम हुआ, पर उन्होंने अपनी बात का बचाव करते हुए कहा, “अरे, वह तो पढ़ाई में बहुत ज्यादा व्यस्त रहती थी।”
“तो अनघा क्या दिनभर गिल्ली-डंडा खेलती थी?” मालती जी ने तुरंत जवाब दिया। “आप ही तो श्वेता को समझाते हुए थक जाते थे कि बिटिया, जब फिजिक्स के इतने लंबे-लंबे फॉर्मूले और कैलकुलस के समीकरण तुम्हें जुबानी याद हो सकते हैं, तो रसोई की इन चार सीधी-सादी दालों के नाम याद रखने में क्या नानी मरती है? आप ही तो उसे सिखाते थे कि ‘म’ से मूंग, ‘च’ से चना और ‘अ’ से अरहर का पहाड़ा याद कर ले। पर वह जब भी किचन में घुसती, कनस्तर खोलकर यही पूछती कि मां, इनमें से वह कौन सी दाल है जो पानी में जल्दी घुल जाती है? तब मैं भी सिर पीटती थी और डरती थी कि जब यह ससुराल जाएगी तो मेरी क्या इज्जत रह जाएगी। सब कहेंगे कि मां ने कुछ सिखाया ही नहीं।”
मालती जी ने गहरी सांस ली और आगे कहा, “पर आज देखिए उसी श्वेता को! जब वह पुणे में अपने ससुराल में गृहस्थी संभाल रही है, तो क्या कोई कह सकता है कि यह वही लड़की है? आज वह अपने ससुर के लिए बिना तेल की रोटियां और अपनी सास के लिए महाराष्ट्रियन से लेकर गुजराती और साउथ इंडियन व्यंजन तक ऐसी महारत से बनाती है कि उसकी सास फोन करके मेरी तारीफों के पुल बांधती हैं। और अभी जब पिछले महीने हमारे बेटे की शादी में वह आई थी, तब याद है न क्या हुआ था? हलवाई ने बहुत सारे सादे बासमती चावल ज्यादा उबाल दिए थे। सब सोच रहे थे कि इतने ठंडे चावलों का क्या किया जाए, फेंकना पड़ेगा। तब श्वेता ने अपनी सूझबूझ से कढ़ी पत्ता, राई, मूंगफली और नींबू का ऐसा लाजवाब तड़का लगाकर डाइनिंग टेबल पर ‘लेमन राइस’ सजाया था कि आपने अपनी दोनों कटोरियां चाट-चाट कर खाई थीं और सीना फुलाकर समधी जी से कह रहे थे कि यह मेरी बेटी का हुनर है!”
बेटी का नाम सुनते ही और उस स्वादिष्ट लेमन राइस की याद आते ही ओंकारेश्वर जी का मन भीतर से पिघल गया। उनके चेहरे की तनी हुई त्योरियां ढीली पड़ गईं। वे थाली को आगे खिसकाते हुए एक फीकी मुस्कान के साथ बोले, “हां, यह बात तो सच है। श्वेता ने लाज रख ली थी।”
“और सिर्फ श्वेता ही क्यों?” मालती जी ने एक और पुराना पन्ना पलटते हुए कहा, “जरा चालीस साल पीछे अपनी स्मृति पर जोर डालिए। याद है वह दिन जब मैं नई-नवेली दुल्हन बनकर आपके इस घर में आई थी? मुझे तो आज भी वह दोपहर अच्छी तरह याद है, जब सासू मां ने मुझे पहली बार रसोई में गाजर और मटर की सब्जी काटने को कहा था। मैं बड़े नाज-नखरों से अपने लंबे, तराशे हुए और लाल नेलपॉलिश से सजे नाखूनों को बचाते हुए चाकू चला रही थी। अचानक चाकू फिसला और मेरे दाएं हाथ के अंगूठे का आधा नाखून कट गया। खून की एक बूंद देख कर ही मैं थाली छोड़कर जमीन पर बैठकर छोटे बच्चों की तरह फफक-फफक कर रोने लगी थी। आप कमरे से घबराए हुए भागे आए थे और सासू मां दरवाजे की ओट से सिर पकड़कर हंस रही थीं। तब तो आपने बड़े प्यार से मेरी उंगली पर पट्टी बांधी थी और कहा था कि गृहस्थी का बोझ उठाने से पहले हाथ थोड़े सख्त करने पड़ते हैं।”
ओंकारेश्वर जी की आंखों में पुरानी यादों का सावन तैर गया। वे अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए धीरे से हंस पड़े, “हां, सच में! उस दिन तो मैं हक्का-बक्का रह गया था कि इतनी सी खरोंच पर कोई इतना कैसे रो सकता है। मुझे लगा था कि पता नहीं कैसी नाजुक मिजाज लड़की से पाला पड़ गया है, यह घर क्या संभालेगी।”
“लेकिन फिर समय के साथ मैंने सब कुछ संभाला न? आपकी पसंद के अनुसार दाल में हींग का छौंक लगाना, चाय में अदरक और इलायची का सही अनुपात बैठाना और अपने प्रिय लंबे नाखूनों को बिना नुकसान पहुंचाए घर के भारी बर्तनों को मांझना भी सीख ही लिया न?” मालती जी की आवाज में एक अनुभवी स्त्री का गहरा आत्मविश्वास झलक रहा था।
वे ओंकारेश्वर जी के और करीब आते हुए बोलीं, “बात दरअसल यह है कि जो बेटियां स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों की चौखट लांघकर गोल्ड मेडल हासिल कर सकती हैं, जो कॉरपोरेट जगत के कड़े दबाव में रात-दिन काम करके अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकती हैं, उनके लिए रसोई की कड़ाही संभालना कोई एवरेस्ट फतह करने जैसा मुश्किल काम नहीं है। बस फर्क सिर्फ इतना है कि उस उम्र में उनका ध्यान, उनकी ऊर्जा और उनका समर्पण अपने करियर और भविष्य को गढ़ने में लगा हुआ था। समाज और परिवार भी उनसे यही उम्मीद कर रहा था कि वे पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हों।”
मालती जी ने खिड़की से बाहर आंगन में टहल रही अनघा की ओर देखा, जो इस समय भी कान में ईयरफोन लगाए अपने ऑफिस की किसी विदेशी क्लाइंट की कॉल पर धाराप्रवाह अंग्रेजी में किसी जटिल समस्या का समाधान कर रही थी।
“शिक्षा पूरी होते ही इन बच्चियों को नौकरी की आपाधापी में कूदना पड़ता है। सुबह की बस, शाम की मेट्रो, दफ्तर की फाइलें और टारगेट। इसी बीच उम्र का तकाजा देखकर हम माता-पिता झटपट उनकी शादी तय कर देते हैं। हमारी बहू के साथ भी यही हुआ। कॉलेज की पढ़ाई खत्म होते ही उसे एक बेहतरीन पैकेज पर नौकरी मिल गई। वह अपनी पहचान बनाने में जुटी थी कि आपके बेटे ने उसे जीवनसंगिनी बनाने का फैसला कर लिया। उसे कभी रसोई की दुनिया को सहजता से देखने का अवसर ही कहां मिला? पर अब वह दिल से कोशिश कर रही है। वह रोज रात को सोने से पहले मुझसे पूछती है कि बाबूजी को नाश्ते में क्या पसंद है, उन्हें लौकी के कोफ्ते किस तरह की तरी वाले अच्छे लगते हैं। जो लड़की सीखने का ऐसा जज्बा रखती हो, उसे केवल एक-दो बार सब्जी में मसाले तेज हो जाने पर भला-बुरा कहना क्या हमारे जैसे बुजुर्गों को शोभा देता है?”
ओंकारेश्वर जी चुपचाप अपनी पत्नी की बातें सुन रहे थे। मालती देवी के तर्कों में ममता भी थी, अनुभव की परिपक्वता भी थी और एक नई पीढ़ी के संघर्ष के प्रति गहरी सहानुभूति भी। उन्हें महसूस हुआ कि उनका गुस्सा वाकई बेवजह और गैर-जरूरी था। उन्होंने अपनी बहू के उस समर्पण को नजरअंदाज कर दिया था, जो वह रोज बिना कहे उनके लिए कर रही थी। कल रात ही तो जब उनकी कमर में दर्द हो रहा था, तो अनघा अपनी नींद खराब करके गरम पानी की थैली लेकर उनके कमरे में आई थी।
ओंकारेश्वर जी ने एक लंबी सांस छोड़ी और अपनी थाली को समेटते हुए नरम स्वर में बोले, “मालती, तुम बात तो बिल्कुल पते की कह रही हो। शायद मेरी ही उम्र का तकाजा है कि जीभ का स्वाद बिगड़ते ही मेरा मिजाज उखड़ जाता है। मुझे उसके सीखने के उत्साह की कद्र करनी चाहिए थी, न कि ताने मारने चाहिए थे। लेकिन अब मेरी सेहत की खातिर तुम इतना तो कर ही सकती हो न कि अगले कुछ दिनों तक जब भी वह रसोई में सब्जी या दाल में तड़का लगाए, तुम चुपचाप उसके पास खड़ी रहो। उसे समझा दो कि इस बूढ़े ससुर के पेट का हाजमा अब तेज मसालों को झेलने लायक नहीं रहा।”
मालती जी के चेहरे पर एक आश्वस्त करने वाली ममतामयी मुस्कान बिखर गई। वे हंसते हुए बोलीं, “अजी, आपकी इस रोज-रोज की नुक्ताचीनी और जीभ के चटोरेपन से निपटने के लिए मुझे इस ट्रेनिंग कैंप का हेडमास्टर तो बनना ही पड़ेगा! कल सुबह की चाय से ही बहू और मेरी नई पाठशाला शुरू हो जाएगी।”
तभी अनघा अपने फोन की कॉल समाप्त करके अंदर आई। उसके चेहरे पर दिनभर की थकान साफ झलक रही थी, फिर भी होंठों पर एक मीठी मुस्कान थी। उसने ससुर जी की खाली थाली देखी और संकोच से नजरें झुकाते हुए बोली, “बाबूजी, आज सब्जी में मिर्च कुछ ज्यादा हो गई थी न? मुझे मां जी ने बताया था, पर शायद अंदाज गलत हो गया। आपके पेट में जलन तो नहीं हो रही? अगर कहें तो मैं आपके लिए सादा मूंग की खिचड़ी बना लाऊं?”
ओंकारेश्वर जी ने पहली बार अपनी बहू की ओर एक पिता के अपनत्व भरे नजरिए से देखा। उनके चेहरे का सारा रूखापन गायब हो चुका था। उन्होंने बहुत ही सौम्य और प्यार भरे स्वर में कहा, “अरे नहीं बेटा, बिल्कुल जरूरत नहीं है। तुम्हारी सासू मां ने उसमें थोड़ा दही मिला दिया था, तो स्वाद एकदम लाजवाब हो गया था। पेट तो भर गया, पर हां, कल से जब तुम रसोई में जाओ, तो अपनी इस सासू मां को भी साथ ले जाना। इनसे हमारे खान-पान का गुप्त नुस्खा सीख लो, फिर देखना, इस पूरे शहर में तुम्हारे हाथ जैसा खाना कोई नहीं बना पाएगा।”
ससुर जी के मुंह से यह अप्रत्याशित और स्नेह भरा वाक्य सुनकर अनघा का चेहरा खिल उठा। उसकी आंखों में एक कृतज्ञता और आत्मविश्वास की चमक तैर गई। उसने तुरंत मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “जी बाबूजी, बिल्कुल! कल से मैं मां जी की शागिर्द बन जाऊंगी।”
रसोई की चौखट पर खड़े होकर मालती जी और ओंकारेश्वर जी ने एक-दूसरे को देखा। घर का वातावरण, जो थोड़ी देर पहले तक एक छोटी सी शिकायत के कारण भारी और तनावपूर्ण हो गया था, अब समझदारी, धैर्य और अपनत्व की मीठी सुगंध से महक रहा था। उस रात डाइनिंग टेबल पर केवल मसालों का तीखापन ही शांत नहीं हुआ था, बल्कि एक नई गृहस्थी में प्रेम और सामंजस्य का एक ऐसा अटूट तड़का लग चुका था, जो आने वाले वर्षों तक इस परिवार को जोड़े रखने वाला था।
क्या हमारे समाज में आज भी कामकाजी बहुओं से यह उम्मीद रखना सही है कि वे पहले ही दिन से हर घरेलू काम में पारंगत हों? क्या थोड़ा सा धैर्य और सास-ससुर का मार्गदर्शन एक बहू को बेटी जैसा संबल नहीं दे सकता? इस विषय पर आपकी क्या राय है, हमें अपनी टिप्पणी के माध्यम से जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : उमा महाजन