ओंकारनाथ जी ने अनिकेत की आंखों में वह सच्चाई और गहराई देख ली, जो एक पिता अपनी बेटी के जीवनसाथी में देखना चाहता है। सुमित्रा देवी को भी अनिकेत की मां की सहजता ने मोह लिया। दोपहर के खाने तक दोनों परिवारों के बीच की औपचारिक दीवारें ढह चुकी थीं।
जब विदाई का समय आया, तो ओंकारनाथ जी ने अनिकेत के पिता के हाथ थाम लिए और बोले, “समधी जी, हमें अपनी पल्लवी के लिए इससे बेहतर घर और वर नहीं मिल सकता था। जात-पात तो इंसानों की बनाई दीवारें हैं, जिसे ईश्वर ने जोड़ दिया, उसे हम कौन होते हैं अलग करने वाले!”
जबलपुर के उस पुराने, मगर सलीके से सजे मकान में पिछले एक महीने से जो रौनक पसरी थी, उसकी धुरी कोई और नहीं, घर की छोटी बेटी पल्लवी थी। बड़े भाई मयंक की शादी तय क्या हुई, पल्लवी ने जैसे अपनी पलकों पर ही पूरे घर का भार उठा लिया था। शादी के कार्ड के फॉन्ट और उसकी छपाई से लेकर बारातियों के स्वागत, हल्दी-मेहंदी की सजावट, खान-पान के मीनू और यहां तक कि दूल्हे की शेरवानी की मैचिंग जूतियों तक, हर एक चीज पल्लवी की पैनी नजर से होकर गुजर रही थी। मयंक उससे महज तीन साल बड़ा था, लेकिन दोनों के बीच का रिश्ता हमेशा ऐसा रहा मानो पल्लवी उसकी बड़ी बहन और सबसे पक्की दोस्त हो। मां सुमित्रा देवी दिन भर रसोई से लेकर आंगन तक बस एक ही नाम रटती रहती थीं, “पल्लवी, जरा देखना हलवाई ने दूध कितना मंगाया है… पल्लवी, चाची जी के कमरे में चादरें बदलीं या नहीं?” और पल्लवी बिना किसी शिकन के, चेहरे पर खिली धूप जैसी मुस्कान लिए हर काम चुटकियों में समेट देती।
शादी की तैयारियों के बीच तनाव के कई मोड़ आए। सगाई के ठीक तीन दिन पहले जब लड़की वालों ने अचानक अपनी तरफ से तय किए गए होटल को बदलकर किसी दूर के रिसॉर्ट में रस्म करने की बात रखी, तो सुमित्रा देवी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया था। उन्हें लगा कि यह सीधे-सीधे लड़के वालों की तौहीन है। घर में तनातनी का माहौल बन गया था और मयंक बेचैन होकर अपने कमरे में टहल रहा था। उस वक्त भी यह पल्लवी ही थी जिसने भाभी के पिता से बड़ी शालीनता से बात की, मां को बिठाकर पानी पिलाया और बात बिगड़ने से बचा ली। पिता ओंकारनाथ जी अपनी इस सुलझी हुई बिटिया को देखते तो गर्व से उनका सीना चौड़ा हो जाता, मगर साथ ही एक फिक्र भी उन्हें घेर लेती।
संगीत की शाम जब पल्लवी ने अपने पैसों से खरीदे हुए भारी-भरकम लहंगे और आभूषण लाकर भाभी और मयंक के हाथों में रखे, तो ओंकारनाथ जी ने अकेले में उसे टोक ही दिया, “बेटा पल्लवी, तू अपनी कमाई का एक-एक पैसा इस शादी में पानी की तरह बहा रही है। तू अभी पुणे में नौकरी कर रही है, तुझे अपने भविष्य के लिए भी तो सोचना चाहिए। इतना दिखावा और इतना खर्च ठीक नहीं।”
पल्लवी ने पिता के कंधे पर सिर टिका दिया और लाड़ से बोली, “पापा, यह दिखावा नहीं है। मयंक भैया का सपना था कि उनकी शादी ऐसी हो जिसे पूरा शहर देखता रह जाए। बचपन से भैया ने अपनी हर ख्वाहिश सबसे पहले मुझे ही तो बताई है। अब जब आपकी बेटी अपने पैरों पर खड़ी है, अच्छा पैकेज कमा रही है, तो क्या मैं अपने इकलौते भाई के शौक पूरे नहीं कर सकती? आप पैसों की चिंता छोड़िए, भैया की मुस्कान से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं है।”
शादी के हर जलसे में पल्लवी ही छाई रही। अपनी होने वाली भाभी तान्या के लिए मैचिंग चूड़ियों से लेकर उसके ब्राइडल सैंडल तक ढूंढ-ढूंढकर लाने वाली पल्लवी को देखकर रिश्तेदार दंग थे। शादी की आपाधापी के बीच बैठी दादी ने एक दिन पल्लवी को पास खींचते हुए कान में फुसफुसाया, “पल्ली बिटिया, इतना लाड़-चाव मत लुटा भाई पर। मर्द की जात शादी के बाद बदल जाती है। जब अपनी लुगाई घर आती है, तो बहनें पराई लगने लगती हैं। अभी से इतना कलेजा मत निकाल कर रख, कल को चोट लगेगी तो रोएगी।”
मयंक वहीं पास खड़ा टाई की गांठ ठीक कर रहा था। उसने हंसते हुए दादी के कंधे पर हाथ रख दिया और मसखरी भरे लहजे में बोला, “दादी, आप भी न बस दूर की कौड़ियां लाती हैं! क्यों हमारे बीच में दरार डालने की कोशिश कर रही हैं? पल्लवी मेरी सिर्फ बहन नहीं, मेरी ताकत है। सूरज चाहे पूरब की जगह पश्चिम से उग जाए, लेकिन अगर मेरी पल्लू ने मुझसे जान भी मांग ली, तो मयंक पीछे नहीं हटेगा। जो मेरा है, वो सब पहले इसका है।”
हंसी-ठिठोली और आंसुओं के मिले-जुले अहसासों के बीच सारी रस्में पूरी हो गईं। तान्या दुल्हन बनकर घर आ गई। गृहप्रवेश के समय पल्लवी ने अपनी निजी बचत से खरीदी हुई सोने की चेन भाभी को और ब्रेसलेट भाई को तोहफे में दिया। चारों तरफ पल्लवी की तारीफों के पुल बांधे जा रहे थे।
शादी की धूम-धड़ाके के हफ्ते भर बाद ही पल्लवी की छुट्टियां खत्म हो गईं और उसे वापस पुणे लौटना पड़ा। वह वहां पिछले पांच सालों से एक प्रतिष्ठित ऑटोमोबाइल कंपनी में सीनियर डिजाइन इंजीनियर के पद पर काम कर रही थी। स्टेशन पर विदा करते वक्त मां ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए साफ लफ्जों में कह दिया था, “अब मयंक की जिम्मेदारी पूरी हो गई है। अगली बारी तेरी है पल्ली। अगर ऑफिस या जान-पहचान में कोई लड़का तेरी नजर में हो, तो छिपाना मत, सीधे बता देना। नहीं तो फिर हम अपने हिसाब से लड़का ढूंढना शुरू करेंगे।”
पुणे की अपनी फ्लैट की बालकनी में खड़ी पल्लवी के दिल की धड़कनें मां की इस बात को याद करके तेज हो जाती थीं। सच तो यह था कि उसकी जिंदगी में कोई था—अनिकेत। अनिकेत मर्चेंट नेवी में चीफ इंजीनियर था और दोनों पिछले ढाई साल से एक-दूसरे को गहराई से जानते और समझते थे। अनिकेत का परिवार मूल रूप से हिमाचल का था और वह जाति और रीति-रिवाजों के उस संकीर्ण दायरे में फिट नहीं बैठता था, जिसकी दुहाई अक्सर छोटे शहरों में दी जाती थी। अनिकेत की मां से पल्लवी की कई बार लंबी वीडियो कॉल्स पर बातचीत हो चुकी थी। अनिकेत की मां ने पल्लवी के खुले विचारों और शालीन स्वभाव को देखकर अपनी अनकही मंजूरी दे दी थी। अब बारी थी पल्लवी के घर में इस बात को रखने की।
पल्लवी ने सोचा कि एकदम से माता-पिता पर यह बात जाहिर करने से बेहतर होगा कि पहले मयंक भैया को विश्वास में लिया जाए। आखिर मयंक उसका हमउम्र था, पढ़ा-लिखा था और उसी ने तो बचपन में पिता को मनाकर पल्लवी को इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बाहर भेजा था। पल्लवी को पूरा भरोसा था कि उसका भाई उसकी भावना को सबसे पहले समझेगा।
होली से ठीक तीन हफ्ते पहले, पल्लवी ने अनिकेत का प्रोफाइल और उसका नंबर मयंक को व्हाट्सएप किया और शाम को फोन करके चहकते हुए कहा, “भैया, मैंने आपको एक नंबर भेजा है। अनिकेत नाम है उसका। हम दोनों पिछले दो साल से एक-दूसरे को पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं। आप एक बार उससे तसल्ली से बात कर लीजिए और बताइएगा कि आपको वह कैसा लगा।”
मयंक ने शुरू में तो बात टालने की कोशिश की, लेकिन पल्लवी के दो-तीन बार याद दिलाने पर आखिरकार उसने एक रविवार को अनिकेत से फोन पर बात की। पल्लवी पूरे दिन बेचैनी से मयंक के फोन का इंतजार करती रही। जब रात को मयंक का फोन आया, तो पल्लवी की उम्मीदों पर जैसे किसी ने बर्फ का ठंडा पानी उड़ेल दिया।
मयंक की आवाज में वह चिर-परिचित अपनापन गायब था, उसकी जगह एक अजीब सी ठंडी अकड़ और कड़वाहट थी। उसने सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, “पल्लवी, तू पागल हो गई है क्या? लड़का दूसरी बिरादरी का है, उसका खान-पान, रहन-सहन सब अलग है। और सबसे बड़ी बात, वह मर्चेंट नेवी में है, छह-छह महीने समंदर में रहेगा, तू अकेले क्या करेगी? तूने अपनी मर्जी से इतना बड़ा फैसला लेने से पहले घर की इज्जत के बारे में सोचा?”
पल्लवी स्तब्ध रह गई। उसने संभलकर कहा, “भैया, अनिकेत बहुत सुलझा हुआ और जिम्मेदार इंसान है। जाति से क्या फर्क पड़ता है जब इंसान अच्छा हो? आप तो मॉडर्न सोच रखते हैं, आपने तो बाहर रहकर दुनिया देखी है। आप ऐसी बातें कैसे कर सकते हैं?”
मयंक झल्ला उठा, “मॉडर्न होना अलग बात है और खानदान की नाक कटाना अलग बात! तू जानती भी है कि अभी-अभी तान्या हमारे घर आई है? उसके पिता का हमारे समाज में कितना बड़ा नाम है। जब उन्हें और उनके रिश्तेदारों को पता चलेगा कि मेरी बहन ने दूसरी जाति में कोर्ट-कचहरी वाली लव मैरिज कर ली है, तो मैं उनके सामने क्या मुंह दिखाऊंगा? लोग कहेंगे कि अपनी शादी में तो इतना नाटक किया और बहन पर कोई लगाम ही नहीं है! तू अभी नादान है, नासमझी में यह सब कर रही है। मैंने अनिकेत को भी साफ कह दिया है कि इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है, बेहतर होगा कि तुम दोनों यह भूत अपने सिर से उतार दो।”
पल्लवी के कानों में मयंक के शब्द हथौड़े की तरह बज रहे थे। वह यकीन नहीं कर पा रही थी कि यह वही मयंक है जो शादी के मंडप में खड़े होकर छाती ठोककर कह रहा था कि पल्लवी के मांगे बिना वह अपनी जान भी दे सकता है। आज जब बहन ने अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशी में उसका साथ मांगा, तो भाई को अपनी नई-नवेली ससुराल और समाज के खोखले ढकोसलों की फिक्र सताने लगी थी।
पल्लवी ने कांपती आवाज में पूछा, “भैया, क्या आपने अनिकेत से सीधे यह सब कह दिया? आपने एक बार भी यह नहीं सोचा कि मैं उससे कितना प्यार करती हूं?”
मयंक ने बेरुखी से कहा, “हां, कह दिया। और सुन, यह बात अभी मम्मी-पापा के कानों में नहीं पड़नी चाहिए। पापा का ब्लड प्रेशर वैसे ही बढ़ा रहता है, उन्हें झटका लगेगा। मैं सही समय देखकर कोई अच्छा लड़का अपनी ही बिरादरी में ढूंढूंगा, तब बात करेंगे। तब तक तू अनिकेत से बातचीत बंद कर दे।”
फोन कट गया। पल्लवी शून्य में ताकती रह गई। जिस भाई को उसने अपना गुरूर समझा था, वह कितनी आसानी से स्वार्थ और झूठी प्रतिष्ठा के दलदल में धंसा हुआ निकला। उस रात पल्लवी सो नहीं सकी। आंसुओं ने तकिया भिगो दिया था, लेकिन सुबह होते-होते उन आंसुओं की जगह एक शांत दृढ़ता ने ले ली। उसने ठान लिया कि वह अपनी जिंदगी का फैसला किसी ऐसे इंसान के हाथ में नहीं छोड़ेगी, जिसके लिए बहन की खुशी से ज्यादा ससुराल वालों की झूठी शान मायने रखती हो।
अगले ही दिन दोपहर में पल्लवी ने सीधे अपनी मां को फोन लगाया। ओंकारनाथ जी भी उस वक्त घर पर ही थे। पल्लवी ने बिना किसी लाग-लपेट के, बहुत ही सहज और गंभीर आवाज में पूरी बात कह सुनाई। उसने अनिकेत के बारे में, उसके काम के बारे में, उसके परिवार के बारे में और दोनों के रिश्ते के बारे में सब कुछ सच-सच बता दिया। उसने यह भी बता दिया कि मयंक ने इस रिश्ते को सिरे से खारिज कर दिया है।
फोन के उस पार कुछ पलों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। पल्लवी की सांसें अटक गईं। उसे लगा कि शायद अब माता-पिता का गुस्सा उस पर बरसेगा। लेकिन तभी ओंकारनाथ जी की गंभीर आवाज गूंजी, “बेटा, मयंक ने क्या कहा, वह उसकी अपनी सोच हो सकती है। लेकिन तू हमारी बेटी है। तूने आज तक कभी कोई ऐसा कदम नहीं उठाया जिससे हमारा सिर झुके। अगर तूने उस लड़के को चुना है, तो उसमें जरूर कोई खूबी होगी। सिर्फ फोन पर सुनकर हम कोई फैसला नहीं करेंगे। तू अनिकेत से कह कि वह अपनी छुट्टियों में अपने माता-पिता के साथ हमारे घर आए। हम आमने-सामने बैठकर बात करेंगे।”
सुमित्रा देवी ने भी फोन हाथ में लेते हुए कहा, “हां पल्ली, शादी कोई गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं है। बिरादरी की बात अपनी जगह है, लेकिन इंसान की शराफत और नीयत सबसे बड़ी होती है। तू घबरा मत, पहले उन्हें आने दे।”
मां-बाप के इस अप्रत्याशित और संजीदा रुख ने पल्लवी के मुरझाए मन में नई जान फूंक दी। उसने राहत की गहरी सांस ली।
दो हफ्ते बाद अनिकेत अपने माता-पिता के साथ जबलपुर पहुंचा। घर का माहौल शुरू में थोड़ा औपचारिक और तनावपूर्ण था। मयंक कमरे के एक कोने में मुंह फुलाए बैठा था और तान्या भी खामोश थी। लेकिन अनिकेत के पिता, जो एक रिटायर्ड कॉलेज प्रिंसिपल थे, उन्होंने अपनी सादगी और विनम्रता से बातचीत की शुरुआत की। खुद अनिकेत ने बड़े ही आदर और आत्मविश्वास के साथ ओंकारनाथ जी के हर सवाल का जवाब दिया। उसने अपनी नौकरी के जोखिम, पल्लवी के करियर के प्रति उसका सम्मान और भविष्य की योजनाओं को बिना किसी लाग-लपेट के सामने रख दिया।
ओंकारनाथ जी ने अनिकेत की आंखों में वह सच्चाई और गहराई देख ली, जो एक पिता अपनी बेटी के जीवनसाथी में देखना चाहता है। सुमित्रा देवी को भी अनिकेत की मां की सहजता ने मोह लिया। दोपहर के खाने तक दोनों परिवारों के बीच की औपचारिक दीवारें ढह चुकी थीं।
जब विदाई का समय आया, तो ओंकारनाथ जी ने अनिकेत के पिता के हाथ थाम लिए और बोले, “समधी जी, हमें अपनी पल्लवी के लिए इससे बेहतर घर और वर नहीं मिल सकता था। जात-पात तो इंसानों की बनाई दीवारें हैं, जिसे ईश्वर ने जोड़ दिया, उसे हम कौन होते हैं अलग करने वाले!”
यह सुनते ही पल्लवी की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। बैठक में खड़े मयंक का सिर शर्म से झुक गया था। जिस संकीर्ण सोच और झूठी प्रतिष्ठा के डर से वह अपनी बहन के रिश्ते में रोड़ा बन रहा था, उसके सीधे-सादे बुजुर्ग माता-पिता ने अपनी विशाल सोच से उस डर को एक झटके में ध्वस्त कर दिया था।
तान्या ने धीरे से मयंक की बांह पर हाथ रखा और कहा, “मयंक, पल्लवी ने हमारे लिए जो किया, वह कोई फरिश्ता ही कर सकता है। हमें उसकी खुशी में खुश होना चाहिए था, न कि अपनी झूठी शान देखनी चाहिए थी। दीदी का फैसला बिल्कुल सही है।”
मयंक अपनी जगह से उठा और धीरे-धीरे चलकर पल्लवी के पास आया। उसकी आंखों में पश्चाताप साफ झलक रहा था। उसने पल्लवी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और रुंधे गले से बोला, “पल्लू, मुझे माफ कर दे। मैं अपनी नई गृहस्थी और झूठी वाहवाही के चक्कर में इतना अंधा हो गया था कि यह भूल ही गया कि तू मेरे लिए क्या है। तूने हमेशा मुझे दिया ही दिया, और जब मेरा फर्ज निभाने का वक्त आया, तो मैं कायरों की तरह सोचने लगा। अनिकेत वाकई एक बेहतरीन इंसान है, और तू दुनिया की सबसे खुशहाल दुल्हन बनेगी। तेरी इस शादी की हर जिम्मेदारी अब मेरा प्रायश्चित होगी।”
पल्लवी ने बिना कुछ कहे अपने भाई को गले से लगा लिया। घर के आंगन में पुरानी कड़वाहटें धुल चुकी थीं और एक नई, सकारात्मक रोशनी चारों तरफ बिखर गई थी। रिश्तों की डोर जब समझदारी और सच्चे प्यार से बंधी हो, तो कोई भी संकीर्णता उसे तोड़ नहीं सकती।
क्या आपको भी लगता है कि शादी-ब्याह में झूठी लोक-लाज और बिरादरी के नाम पर अपनों की खुशियों की बलि चढ़ाना गलत है? क्या मयंक की तरह आज भी हमारे समाज में कई भाई अपनी बहनों के जीवन के अहम फैसलों पर ऐसी ही संकीर्ण सोच थोपते हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : शुभ्रा बैनर्जी